4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन Objective

4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन Objective

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बाढ़ के समय निम्नलिखित में से किस स्थान पर जाना चाहिए ?
(क) ऊँची भूमि वाले स्थान पर
(ख) गाँव के बाहर
(ग) जहाँ हैं उसी स्थान पर
(घ) खेतों में
उत्तरं-
(क) ऊँची भूमि वाले स्थान पर

प्रश्न 2.
मलवे के नीचे दबे हुए लोगों को पता लगाने के लिए किस यंत्र की मदद ली जाती
(क) दूरबीन
(ख) इंफ्रारेड
(ग) हेलीकॉप्टर
(घ) टेलीस्कोप
उत्तर-
(ख) इंफ्रारेड

प्रश्न 3.
आग से जलने की स्थिति में जले हुए स्थान पर क्या प्राथमिक उपचार करना चाहिए?
(क) ठंडा पानी डालना चाहिए
(ख) गर्म पानी डालना
(ग) अस्पताल पहुंचाना
(ग) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) ठंडा पानी डालना चाहिए

प्रश्न 4.
बस्ती/मकान में आग लगने की स्थिति में क्या करना चाहिए?
(क) अग्निशामक यंत्र को बुलाना
(ख) दरवाजे खिड़कियाँ लगाना
(ग) आग बुझाने तक इंतजार करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) अग्निशामक यंत्र को बुलाना

प्रश्न 5.
सुनामी किस स्थान पर आता है ?
(क) स्थल
(ख) समुद्र
(ग) आसमान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) समुद्र

उपभोोक्‍ता का अधिकार

उपभोक्ता सांरक्षण अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत उपभोक्ता को कुछ अधिकार सुरक्षा का अधिकार प्रदान किए गए हैं।

  1. सुरक्षा का अधिकारः- उपभोक्ता का प्रथम अधिकार सुरक्षा का अधिकार है। उपभोकता को ऐसे वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है जिससे उसके शरीर या संपत्ति को हानि हो सकती है जैसे- बिजली का आयरन विद्युत आपूर्ति की खराबी के कारण करंट मार देता है या एक डॉक्टर ऑपरेशन करते समय लापरवाही बरतता है जिसके कारण मरीज को खतरा या हानि हो सकती है।
  2. सुचना पाने का अधिकारः- उपभोकता को वे सभी आवश्यक सुचनाएँ प्राप्त करने का अधिकार है जिसके आधार पर वह वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदने का निर्णय कर सकते हैं। जैसेः- पैकेट बंद सामान खरीदने पर उसका मुल्य इस्तेमाल करने की अवधि, गणवत्ता इत्यादि की सुचना प्राप्त करें।
  3. चुनाव या पसंद करने कर अधिकारः- उपभोक्ता अपने अधिकार के अंतर्गत विभिन्न निर्माताओं द्वारा निर्मित विभिन्न ब्रांड, किस्म, रूप, रंग, आकार तथा मूल्य की वस्तुओं में किसी भी वस्तु का चुनाव करने को स्वतंत्र है।
  4. सुनवाई का अधिकारः- उपभोक्ता को अपने हितों को प्रभावित करनेवाली सभी बातो को उपयुक्त मंचो के समक्ष प्रस्तुत करने कर अधिकार है। उपभोक्ता को अपने को मंचो के साथ जुड़कर अपने बातों को रखनी चाहिए।
  5. शिकायत निवारण या क्षतिपूर्ति का अधिकारः- यह अधिकार लोगों को आश्वासन प्रदान करता है कि क्रय की गयी वस्तु या सेवा उचित ढ़ंग की अगर नही निकली तो उन्हे मुआवजा दिया जएगा।
  6. उपभोकता शिक्षा का अधिकारः- उपभोकता शिक्षा का अधिकार के अर्न्तगत, किसी वस्तु के मूल्य, उसकी उपयोगिता, कोटी तथा सेवा की जानकारी एवं अधिकारों से ज्ञान प्राप्ती की सुविधा जैसी बातें आती है जिसके माध्यम से शिक्षित उपभोकता धोखाधड़ी, दगाबाजी से बचने के लिए स्वंय सबल, संरक्षित एवं शिक्षित हो सकते हैं और उचित न्याय के लिए खड़े हो सकते हैं

उपभोकता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ताओं को उनकी शिकायतां के निवारण के लिए व्यवस्था दी गई है जिसे तीन स्तरों पर स्थापित किया गया है-

राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग

राज्य स्तर पर राज्य स्तरीय आयोग

जिला स्तर पर जिला मंच (फोरम)

उपभोक्ता संरक्षण हेतु सरकार द्वारा गठित न्यायिक प्रणाली

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में त्रिस्तरीय अर्द्धन्यायिक व्यवस्था है, जिसमें, जिला मंचों, राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग  की स्थापना की गई है।

अगर उपभोक्ता राष्ट्रीय फोरम से संतुष्ट नहीं होता है तो वह आदेश के 30 दिनों के अंदर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।

उपभोकता- शिकायत‘, क्या, कहाँ, कैसे?

इस समय देश में 582 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और एक राष्ट्रीय आयोग काम कर रहे हैं जिसके द्वारा दायर 24 लाख मामलो में 84% मामलों को निपटाया जा चुका है।

शिकायत क्या करें ?

यदि कोई उत्पादक या व्यापारी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में परिभाषित उपभोकता के अधिकारे के विरूद्ध कार्य करता है तब उपभोकता शिकायत दर्ज कर सकते हैं!

शिकायत कहाँ करें ?

यदि किसी व्यक्ति या सेवा का मूल्य 20 लाख से कम है तो वह शिकायत जिला फोरम में दर्ज करा सकते हैं।

शिकायत करने का तरीका

उपभोकता द्वारा शिकायत सादें कागज पर की जा सकती है जिसे दर्ज करने के लिए कोई शुल्क नही देना होता है साथ ही इसे व्यक्तिगत रूप से या डाक द्वारा भेजा जा सकता है।

पुनः अगर वस्तु व सेवा का मूल्य 20 लाख के ऊपर और 1 करोड़ के नीचे हो तो शिकायत राज्य आयोग के पास की जा सकती है और अगर किसी वस्तु या सेवा का मूल्य या क्षतिपूर्ति राशि 1 करोड़ से अधिक होने पर उपभोकता राष्ट्रीय अयोग में इसकी शिकायत कर सकता है।

शिकायत कैसे की जाए ?

शिकायत सादे कागज पर की जा सकती है।

शिकायत में निम्नलिखित विवरण होना चाहिए-

शिकायत कर्ताओं तथा विपरित पार्टी के नाम का विवरण तथा पता।

शिकायत से संबंधित तथ्य एवं यह सब कब और कहाँ हुआ।

शिकायत में उल्लिखित आरोपों के सर्मथन में दस्तावेज।

शिकायत पे शिकायतकर्ताओं अथवा उसके प्राधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए।

अपनी शिकायत भेजें ताकि इसका समाधान हो सके।

मुद्रा का इतिहास

मुद्रा का इतिहास

मुद्रा को आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। मुद्रा के विकास के इतिहास को मानव सभ्यता के विकास का इतिहास कहा जा सकता है। सभ्यता के प्रारंभिक अवस्था में जब मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित थी तो वे अपनी जरूरत की वस्तुएँ स्वयं उत्पादित कर लिया करते थे। लेकिन लोगों की संख्या मं वृद्धि के साथ ही उनकी आवश्यताओं में भी वृद्धि होने लगी, जिसे पूर्ति करने में कठिनाई महसूस की जाने लगी। तब वे आपस में एक-दूसरे के द्वारा उत्पादित वस्तुओं के आदान-प्रदान से अपनी आवश्कताओं की पूर्ति करने लगे। जिसके कारण मुद्रा का विकास हुआ।

आज प्रायः मनुष्य किसी एक काम में ही अपना समय लगाता है। इससे जो आय प्राप्त होता है उससे अन्य वस्तुएँ प्राप्त कर लेता है। जिसके कारण आज विनिमय का महत्व बढ़ गया है।

विनिमय के स्वरूप- विनिमय के दो रूप है-

  1. वस्तु विनिमय प्रणाली तथा
  2. मौद्रिक विनिमय प्रणाली।
  3. वस्तु विनिमय प्रणाली- वस्तु विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहा जाता है जिसमें एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का आदान-प्रदान होता है। जैसे- गेहूँ से चावल का बदलना, दूध से दही का बदलना, शब्जी से घी का बदलना आदि।

वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ

  1. आवश्यकता के दोहरे संयोग का अभाव- आवश्यकता के दोहरे संयोग का मतलब है कि एक की जरूरत दूसरे से मेल खा जाए लेकिन ऐसा कभी संयोग ही होता था कि किसी की जरूरत किसी से मेल खा जाए। ऐसी स्थिति में कठिनाई होती थी।
  2. मूल्य के सामान्य मापक का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली में ऐसा कोई सर्वमान्य मापक नहीं था जिसकी सहायता से सभी प्रकार के वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को ठीक प्रकार से मापा जा सके। जैसे- जैसे एक सेर चावल के बदले कितना तेल दिया जाए? एक गाय के बदले कितनी बकरियाँ दी जायें?
  3. मूल्य संचय का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली के द्वारा उत्पादित वस्तुओं के संचय की असुविधा थी। व्यवहार में व्यक्ति कुछ वस्तुओं का उत्पादन करता है जो शीघ्र नष्ट हो जाती है। ऐसी जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुओं की संचय की असुविधा होती थी।
  4. सह-विभाजन का अभाव- कुछ वस्तुएँ ऐसी होती है, जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता है, यदि उनका विभाजन कर दिया जाए तो उनकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। जैसे एक गाय के बदले में तीन चार वस्तुएँ लेनी होती थी और वे वस्तुएँ अलग-अलग व्यक्तियों के पास थी। इस स्थिति में गाय के तीन चार टुकड़े नहीं किए जा सकते। ऐसी स्थिति में विनिमय का कार्य नहीं हो सकता है।
  5. भविष्य के भुगतान की कठिनाई- वस्तु विनिमय प्रणली में उधार लेने तथा देने में कठिनाई होती थी। जैसे कोई व्यक्ति किसी से दो वर्षों के लिए एक गाय उधार लेता है और इस अवधि के बीतने पर वह लौटा देता है। लेकिन दो वर्षों के अंदर उधार लेनेवाला व्यक्ति गाय के दूध पिया तथा उसके गोबर को जलावन के रूप में उपयोग किया। ऐसी स्थिति में उधार लेने वाले को मुनाफा होता था तथा उधार देनेवाले को घाटा होता था।
  6. मूल्य हस्तांतरण की समस्या- वस्तु विनिमय प्रणाली में मूल्य हस्तांतरण में कठिनाई होती थी। जैसे कोई व्यक्ति किसी स्थान को छोड़कर दूसरे जगह बसना चाहता। ऐसी स्थिति में उसको अपनी सम्पत्ति छोड़कर जाना पड़ता था, क्योंकि उसे बेचना कठिन था।
  7. मौद्रिक विनिमय प्रणाली- मुद्रा का विकास मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सुप्रसिद्ध विद्वान क्राउथर ने कहा था कि ‘ जिस तरह यंत्रशास्त्र में चक्र, विज्ञान में अग्नि और राजनीतिशास्त्र में मत का स्थान है, वही स्थान मानव के आर्थिक जीवन में मुद्रा का है।

मौद्रिक विनिमय प्रणाली में पहले कोई व्यक्ति अपनी वस्तु या सेवा को बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और फिर उस मुद्रा से अपनी जरूरत की अन्य वस्तुएँ प्राप्त करता है।

मुद्रा के कार्य- मुद्रा के प्रमुख कार्य हैं-

  1. विनिमय का माध्यम,
  2. मुल्य का मापक,
  3. विलंबित भुगतान का मान,
  4. मूल्य का संचय,
  5. क्रय शक्ति का स्थानांनतरण और
  6. साख का आधार।

मुद्रा का विकास

मुद्रा का क्रमिक विकास निम्नलिखित है-

  1. वस्तु विनिमय,
  2. वस्तु मुद्रा,
  3. धात्विक मुद्रा,
  4. सिक्के,
  5. पत्र मुद्रा और
  6. साख मुद्रा

मुद्रा का आर्थिक महत्व

आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में मुद्रा का काफी महत्व है। यदि मुद्रा न होती तो विश्व के विभिन्न देशों में इतनी आर्थिक प्रगति कभी भी संभव नहीं होती। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था हो या समाजवादी अर्थव्यवस्था हो या मिश्रित अर्थव्यवस्था हो, सभी में मुद्रा आर्थिक विकास के मार्ग में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ट्रेस्कॉट ने कहा है कि ‘यदि मुद्रा हमारी अर्थव्यवस्था का हृदय नहीं तो रक्त-स्त्रोत तो अवश्य है।‘

मुद्रा से लाभ

  1. मुद्रा से उपभोक्ता को लाभ
  2. मुद्रा से उत्पादक को लाभ
  3. मुद्रा और साख
  4. वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों का निराकरण
  5. मुद्रा और पूँजी की तरलता
  6. मुद्रा और पूँजी की गतिशीलता
  7. मुद्रा और पूँजी निर्माण
  8. मुद्रा और बड़े पैमाने के उद्योग
  9. मुद्रा और आर्थिक प्रगति
  10. मुद्रा और सामाजिक कल्याण

राष्ट्रीय आय

राष्ट्रीय आयः-  राष्ट्रीय आय का मतलब किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मूल्य से लगाया जाता है। वर्ष भर में किसी देश में अर्जित आय की कुल मात्रा को राष्ट्रीय आय कहा जाता हैं।

राष्ट्रीय आय की धारणा को हम निम्नलिखित आयामों के द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं।

राष्ट्रीय आय की धारणा-

  1. सकल घरेलू उत्पाद
  2. कुल या सकल राष्ट्रीय उत्पादन
  3. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन

सकल घरेलू उत्पादः- एक देश की सीमा के अन्दर किसी भी दी गई समयावधि, प्रायः एक वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं का कूल बाजार या मौद्रिक मूल्य, उस देश का सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।

  1. कुल या सकल राष्ट्रीय उत्पादनः- किसी देश में एक साल के अर्न्तगत जितनी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन होता है उनके मौद्रिक मूल्य को कुल राष्ट्रीय उत्पादन कहते हैं। कुल राष्ट्रीय उत्पादन तथा सकल घरंलू उत्पादन में अंतर हैं। कुल राष्ट्रीय उत्पादन का पता लगाने के लिए सकल घरेलू उत्पादन में देशवासियों द्वारा विदेशों में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मुल्य को जोड़ दिया जाता है तथा विदेशियों द्वारा देश में उत्पादित वस्तुओं के मूल्य को घटा दिया जाता है।
  2. शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादनः- कुल राष्ट्रीय उत्पादन को प्राप्त करने के लिए हमें कुछ खर्चा करना पड़ता है। अतः कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से इन खर्चों को घटा देने से जो शेष बचता है वह शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन कहलाता हैं। कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से कच्चा माल की कीमत पूँजी की घिसावट एवं मरम्मत पर किए गए व्यय, कर एवं बीमा का व्यय घटा देने से जो बचता है, उसे शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन कहते हैं।

अर्थव्यवस्था के प्रकार

अर्थव्यवस्था के प्रकार

विश्व में निम्न तीन प्रकार की अर्थव्यवस्था पाई जाती हैं-

  1. पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाः- पूँजीवादी अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहाँ उत्पादन के साधनां का स्वामित्व एवं संचालन नीजी व्यक्तियों के पास होता है जो इसका उपयोग अपने निजी लाभ के लिए करते हैं। जैसेः-अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि।
  2. समाजवादी अर्थव्यवस्थाः- समाजवादी अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था हैं जहाँ उत्पादन के साधनां का स्वामित्व एवं संचालन देश की सरकार के पास जाता है जिसका उपयोग सामाजिक कल्यान के लिए किया जाता है। चीन, क्युबा आदि देशों मे समाजवादी अर्थव्यवस्था हैं।
  3. मिश्रत अर्थव्यवस्थाः- मिश्रत अर्थव्यवस्था पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था

का मिश्रण है। मिश्रित अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है जहाँ उत्पादन के साधनों का स्वामित्व सरकार तथा निजीं व्यक्तियों के पास होता है।

रेलमार्ग

रेलमार्ग :

भारत में रेल परिवहन का विकास 16 अप्रैल 1853 ई० से शुरू हुआ था। पहली बार रेलगाड़ी मुम्बई से थाणे के बीच 34 किलोमीटर की लंबाई में चली थी। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने लाभ के उद्देश्य से रेलों का जाल बिछाने पर जोर दिया।

भारतीय रेलवे :

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में रेल परिवहन के विकास पर अधिक जोर दिया गया। भारतीय रेल परिवहन कई विशेषताओं से युक्त है। इनमें कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित है।

  1. तीव्र गति से चलने वाली राजधानी एक्सप्रेस एवं शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों का परिचालन दो महानगरों के बीच किया जा रहा है।
  2. छोटे शहरों को महानगरों एवं बड़े शहरों से जोड़ने के लिए जन-शताब्दी एक्सप्रेस गाड़ियाँ चलायी जा रही है।
  3. 1 अगस्त 1947 से रेल मंत्रालय ने रेल यात्री बीमा योजना शुरू की है।
  4. कोलकाता और दिल्ली में मेट्रो रेल सेवा के तहत भूमिगत रेल सेवा दी जा रही है।
  5. रेल संपत्तियों एवं रेल यात्रियों की सुरक्षा के लिए जी. आर. पी, एवं आर. पी. एफ की व्यवस्था की गई है।
  6. पूर्वोतर राज्य में मेघालय एक ऐसा राज्य है जहाँ रेलमार्ग नहीं है।
  7. भारतीय रेल प्रणाली एशिया की सबसे बड़ी तथा विश्व की तीसरी बड़ी रेल प्रणाली है।
  8. विश्व की सबसे अधिक विद्युतीकृत रेलगाड़ीयाँ रूस के बाद भारत में ही चलती है।

भारतीय रेल प्रतिदिन लगभग 1.24 करोड़ यात्रियों को यातायात की सुविधा देती है।

भारत में सड़कों का विकास

सड़कमार्ग :  सड़कमार्ग परिवहन का सबसे सामान्य, सुलभ एवं सुगम साधन है। इसका उपयोग एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में अवश्य करता है। भारत में लगभग 33 लाख किलोमीटर लंबी सड़क है। यह विश्व के सर्वाधिक सड़क जाल वाले देशों में स्थान रखता है। ग्रैंड ट्रंक रोड देश का सबसे पुरानी सड़क है। इस सड़क को शेरशाह सूरी द्वारा बनवाया गया था। यह कोलकाता से अमृतसर तक को जोड़ता है। आजकल इसे अमृतसर से दिल्ली तक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-1 तथा दिल्ली से कोलकाता तक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-2 के नाम से जाना जाता है।

भारत में सड़कों का विकास :

भारत में सड़कों के विकास का आरंभिक प्रमाण हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों की सभ्यता में मिलते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में लगभग 2.42 लाख किलोमीटर कच्ची एवं 1.46 लाख किलोमीटर लंबी पक्की सड़कें थी।

देश में सड़कों की कुल लंबाई 1950-51 ई० में 4 लाख किलोमीटर थी जो 2006-07 में बढ़कर 33 लाख किलोमीटर हो गई।

पक्की सड़कों की लंबाई की दृष्टि से देश में पहला स्थान महाराष्ट्र का है। पक्की सड़कों की कम लंबाई वाला राज्य लक्षद्वीप है।

सड़कों का प्रकार :

हमारे देश में सड़कों को चार प्रकारों में बाँटा गया है।

  1. राष्ट्रीय राजमार्ग 2. राज्य राजमार्ग 3. जिला की सड़कें 4. ग्रामीण सड़कें।
  2. राष्ट्रीय राजमार्ग :

राष्ट्रीय राजमार्ग विभिन्न भागों, प्रांतों को आपस में जोड़ने का करता है। यह देश के एक छोर से दूसरे छोर तक फैला हुआ है। देश का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग-7 है। इसकी लंबाई 2369 किलोमीटर है। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण एवं देखभाल का दायित्व केन्द्र सरकार को है। देश में कुल 228 राष्ट्रीय राजमार्ग है।

  1. राज्य राजमार्ग

राज्य राजमार्ग राज्यों की राजधानियों को विभिन्न जिला मुख्यालयों से जोड़ने का काम करती है। इन सड़कों का निर्माण देखरेख की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। देश में ऐसे सड़कों की लंबाई कुल सड़कों का मात्र 4 प्रतिशत है।

  1. जिला सड़कें

जिला सड़कें राज्यों के विभिन्न जिला मुख्यालयों एवं शहरों को मिलाने का काम करती है। देश की कुल सड़कों का यह 14 प्रतिशत है। इन सड़कों का निर्माण देखरेख की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है।

  1. ग्रामीण सड़कें :

ये सड़के विभिन्न गाँवों को जोड़ने का काम करती है। देश के कुल सड़कों का यह 80 प्रतिशत है।

  1. सीमांत सड़के :

राजनीतिक एवं सामरिक दृष्टि से इस प्रकार के सड़कों का निर्माण सीमावर्त्ती क्षेत्रों में किया जाता है। इन सड़कों के रखरखाव सीमा सड़क संगठन करता है। युद्ध की स्थिति में इन सड़कों का उपयोग अधिक होता है। इन्हीं सड़कों के माध्यम से सीमा पर सैनिकों के लिए आवश्यक सामान भेजा जाता है।

सूती वस्त्र उद्योग | जूट या पटसन उद्योग

सूती वस्त्र उद्योग :

भारत में सर्वप्रथम 1854 ई० में काबस जी नानाभाई डाबर ने मुम्बई में आधुनिक सुती वस्त्र उद्योग का विकास किया।

सूती वस्त्र उद्योग आज भारत का सबसे विशाल उद्योग है। यह कृषि के बाद रोजगार प्रदान करनेवाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है।

सकल घरेलू उत्पादन में इसका योगदान 4.0 प्रतिशत है एवं विदेशी आय में इसका योगदान 17 प्रतिशत है।

सूती वस्त्र उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में कपास का उपयोग किया जाता है। मुम्बई को सूती कपड़ों की महानगरी कहा जाता है। क्योंकि सिर्फ मुम्बई महानगरी क्षेत्र में देश का लगभग एक चौथाई सूती वस्त्र तैयार किया जाता है।

जूट या पटसन उद्योग :

सूती वस्त्र उद्योग के बाद जूट उद्योग भारत का दूसरा महत्वपूर्ण उद्योग है। कच्चे जूट और जूट से बने समान के उत्पादन में भारत विश्व में पहला स्थान है। जूट के समान के निर्यात में भारत विश्व में बंगलादेश के बाद दूसरा स्थान है। पश्चिम बंगाल में 80 प्रतिशत से अधिक जूट के समानों का उत्पादन होता है।

कृषि के प्रकार

कृषि के प्रकार- तीन प्रकार की कृषि होती है।

  1. प्रारंभिक जीविका कृषि
  2. गहन जीविका कृषि
  3. वाणिज्यिक कृषि
  4. प्रारंभिक जीविका कृषि- इस प्रकार की कृषि में पारंपरिक रूप से खेती की जाती है। इसमें आधुनिक तकनीक का अभाव होता है जिसके कारण उपज कम होता है। इसमें फसल उत्पादन जीविका निर्वाह के लिए किया जाता है।
  5. गहन जीविका कृषि- यह कृषि देश के अधिकतर भागों में की जाती है। जहाँ जनसंख्या अधिक होता है, वहाँ इस प्रकार के कृषि पद्धति को अपनाया जाता है। इसमें श्रम अधिक लगता है। इस प्रकार की कृषि में भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए परंपरागत ज्ञान, बीजों के रख-रखाव एवं मौसम संबंधी ज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक होता है। जनसंख्या बढ़ने से जोतों का आकार काफी छोटा हो गया है। इस कृषि में मुख्य रूप से धान की खेती होती है। इसमें किसानों के पास व्यापार के लिए बहुत कम उत्पादन बचता है। इसलिए इसे जीविका निर्वाहक कृषि भी कहते हैं।
  6. वाणिज्यिक कृषि अथवा व्यापारिक कृषि- इस प्रकार के कृषि में फसल व्यापार के लिए उगाई जाती है। इस में आधुनिक कृषि तकनीक के द्वारा अधिक पैदावार वाले परिष्कृत बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई, कीटनाशक आदि का उपयोग किया जाता है। भारत में इस कृषि पद्धति को हरित क्रांति के बाद व्यापक रूप से पंजाब एवं हरियाणा में अपनाया गया। इसमें मुख्य रूप से गेहूँ की खेती की जाती है। बासमती चावल भी पंजाब और हरियाणा में उगाई जाती है। इसके अलावा चाय, काफी, रबड़, गन्ना, केला भी उगाया जाता है।

गैर-पारम्परिक शक्ति के स्त्रोत

गैर-पारम्परिक शक्ति के स्त्रोत

अधिक दिनों तक हम शक्ति के पारम्परिक स्त्रोतों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं क्योंकि यह समाप्य संसाधन है। इसलिए गैर-पारम्परिक शक्ति संसाधनों से ऊर्जा के विकास बहुत ही अधिक आवश्यक है। ऊर्जा के गैर पारम्परिक स्त्रोतों में बायो गैस, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा एवं जैव ऊर्जा महत्वपूर्ण हैं।

सौर ऊर्जा- यह कम लागत वाला पर्यावरण के अनुकूल तथा निर्माण में आसान होने के कारण अन्य ऊर्जा स्त्रोतों की अपेक्षा ज्यादा लाभदायक है।

राजस्थान और गुजरात में सौर ऊर्जा की ज्यादा संभावनाएँ हैं।

पवन ऊर्जा- पवन चक्कियों से पवन ऊर्जा की प्राप्ति की जाती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। देश में पवन ऊर्जा की संभावित उत्पादन क्षमता 50000 मेगावाट है। गुजरात के कच्छ में लाम्बा का पवन ऊर्जा संयंत्र एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है। दूसरा बड़ा संयंत्र तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्थित है।

ज्वारीय ऊर्जा तथा तरंग ऊर्जा- समुद्री ज्वार और तरंग के कारण गतिशील जल से ज्वारीय और तरंग ऊर्जा प्राप्त किया जाता है।

भूतापीय ऊर्जा- यह ऊर्जा पृथ्वी के उच्च ताप से प्राप्त किया जाता है।

बायो गैस एवं जैव ऊर्जा- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि अपशिष्ट, पशुओं और मानव जनित्र अपशिष्ट के उपयोग से घरेलू उपयोग हेतु बायो गैस उपयोग की जाती है। जैविक पदार्थों के अपघटन से बायो गैस प्राप्त की जाती है।

जैविक पदार्थों से प्राप्त होनेवाली ऊर्जा को जैविक ऊर्जा कहते हैं। कृषि अवशेष, नगरपालिका, औद्योगिक एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थ जैविक पदार्थों के उदाहरण है।