कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 5 प्रहेलिकाः (सन्धि) का अर्थ | Prahelika class 7 sanskrit

इस पोस्‍ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 7 संस्‍कृत के पाठ 5 ‘प्रहेलिकाः (सन्धि)(Prahelika class 7 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Prahelika class 7 sanskrit

पञ्चमः पाठः
प्रहेलिकाः
( सन्धि )

1. अपदो दूरगामी च, साक्षरो न च पंडितः ।

अमुखः स्फुटवक्ता च, यो जानाति सः पण्डितः ।।

अर्थ — जो पैर रहित है और दूर तक जाता है। पढ़ा लिखा है लेकिन विद्वान नहीं है । मुखरहित है लेकिन स्पष्ट बोलता है, उसे जो जानता है वह पण्डित (विद्वान) है बताओ यह क्या है ?

2. न तस्यादि न तस्यान्तः, मध्ये यस्तस्य तिष्ठति ।

ममाप्यस्ति तवाप्यस्ति, यदि जानासि तद् वद ॥

अर्थ — जिसके आरंभ तथा अन्त में ‘न’ अक्षर हो और दोनों ‘न’ के बीच में ‘य’ अक्षर हो, जो मुझे भी है और तुझे भी है । यदि जानते हो तो बताओ यह क्या है ?

3. नान्नं फलं वा खादामि न पिबामि जलं क्वचित् ।

चलामि दिवसे रात्रौ, समयं बोधयामि च ॥

अर्थ न तो मैं अन्न खाता हूँ न फल ही खाता हूँ। कहीं जल भी नहीं पीता हूँ।

मैं दिन-रात चलता रहता हूँ और समय बताता हूँ। बताओ क्या हूँ ?

4. मुखं कृष्णं वपुः क्षीणं, मञ्जूषायां च संवृत्तम् ।

घर्षणं मे दहत्याशु, रसवत्यां वसाम्यहम् ॥

अर्थ- मेरा मुँह काला है। शरीर दुबला-पतला है और मैं पेटी (डिब्बा) में बंद रहता हूँ । रगड़ने पर मैं अतिशीघ्र जलता हूँ तथा मैं रसोई में रहता हूँ। बताओ मैं क्या हूँ ?

5. तिष्ठामि पादेन बको न पड्डुः, दाता फलानां न कृतिने यत्नः ।

मौनेन जीवामि मुनिर्न मूकः सेव्योऽस्मि कोऽहं नृपतिर्न देवः ।।

अर्थ — मैं एक पैर पर खड़ा रहता हूँ, लेकिन न तो बगुला हूँ और न ही लँगड़ हूँ । फलों का दान करता हूँ लेकिन न तो कर्म करता हूँ और न ही परिश्रम करता हूँ सदा चुप (मौन) रहता हूँ लेकिन न तो साधु हूँ और न गूँगा। मैं सेवा कराने योग्य अर्थात् पूज्य हूँ परन्तु राजा या देवता नहीं हूँ । बताओ तो मैं क्या हूँ ?

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कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 4 स्वतन्त्रता-दिवसः (लोट् तथा लृट्लकार) का अर्थ | Swatantrta diwas class 7 sanskrit

इस पोस्‍ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 7 संस्‍कृत के पाठ 4 ‘स्वतन्त्रता-दिवसः (लोट् तथा लृट्लकार)(Swatantrta diwas class 7 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Swatantrta diwas class 7 sanskrit

चतुर्थः पाठः
स्वतन्त्रता-दिवसः
(लोट् तथा लृट्लकार )

पाठ-परिचय — प्रस्तुत पाठ ‘स्वतंत्रता-दिवस:’ में स्वतंत्रता के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। 15 अगस्त, 1947 ई. को हमें अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिली थी। दासता की इस मुक्ति के लिए हमें महान् कुर्बानियाँ करनी पड़ी थी । इसीलिए जब स्वतंत्रता मिली तो हमने इस दिन को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया उसी दिन से हमारे देश के लोग 15 अगस्त’ को राष्ट्रीय पर्व के रूप में पूर्ण उत्साह से मनाते हैं तथा स्वातंत्र्य संग्राम में शहीद होने वालों के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं ।

कुन्तल: :       मित्र ! त्वम् इदानीमपि न प्रस्तुतः ? कदा विद्यालयं चलिष्यसि ?
रहीम    :        ननु, शीघ्रम् आगच्छामि । आवां सहैव विद्यालयं गमिष्यावः ।
कुन्तल: :       चल, चल शीघ्रम् । विद्यालये स्वतन्त्रतादिवसस्य भव्यः समारोहः अस्ति । तत्र ध्वजस्य उत्तोलनाय मन्त्री   आगमिष्यति ।
                    (उभौ गच्छत:)
रहीम   :         पश्य, पश्य कुन्तल ! अयं जोसफः आगच्छति । स विद्यालयं गन्तुं धावति । (जोसफ प्रति) मा मा मित्र माधाव । वयं सहैव चलिष्यामः ।
                     (सर्वे विद्यालयं प्राप्ताः)
शीला :          स्वागतं, स्वागतम् । आगच्छत । ध्वजस्य उत्तोलनस्थले सर्वे आचार्याः प्रधानाचार्यश्च वर्तन्ते । मन्त्री महोदयः अपि शीघ्रमागमिष्यति । चलत । स्व-                           स्थाने अवस्थिताः भवत । ( मन्त्री ध्वजोत्तोलनं करोति ततः स्वतन्त्रतादिवसस्य महत्त्वं बोधयति । )
मन्त्री :           अस्य विद्यालयस्य मान्याः प्रधानाचार्याः, अन्ये प्रतिष्ठिताः आचार्याः प्रियाः छात्राः ! नूनं स्वतन्त्रतादिवसस्य शुभः अवसरः प्रतिवर्षम् आयाति, अस्माकं देशस्य पूर्वपुरुषाणां बलिदानं बोधयति ।
अर्थ :  कुन्तल : मित्र ! तुम अभी तक तैयार नहीं हुए हो ? कब विद्यालय चलोगे ?
रहीम : ठीक है, जल्द आता हूँ । हम दोनों एक साथ ही विद्यालय चलेंगे।
कुन्तल : चलो, जल्दी चलो। विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस का भव्य समारोह है
वहाँ झंडा फहराने के लिए मंत्रीजी आएँगे। (दोनों जाते हैं)
रहीम : देखो, देखो कुन्तल । यह जोसफ आता है। वह विद्यालय पहुँचने के लिए दौड़ता है । ( जोसफ की ओर ) नहीं, मित्र नहीं । मत दौड़ो | हम लोग एक साथ ही चलेंगे। (सभी विद्यालय पहुँचते हैं)
शीला: स्वागत है, स्वागत है। आओ। झंडा फहराने के स्थान पर सारे शिक्षक तथा प्रधानाध्यापक हैं। मंत्री महोदय भी जल्दी ही आएँगे। चलो, अपने- अपने स्थान पर खड़े हो जाएँ। (मंत्री झंडा फहराते हैं और उसके बाद स्वतंत्रतादिवस के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं ।)
मंत्री : इस विद्यालय के माननीय प्रधानाध्यापक तथा अन्य प्रतिष्ठित शिक्षकगण एवं प्रिय छात्रों ! निश्चित रूप से स्वतंत्रता दिवस का यह पर्व हर वर्ष मनाया जाता है, जो पूर्वजों के त्याग को याद करा देता है ।

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अस्माकं देशस्य एकैकः जनः अद्य प्रमुदितः । अधुना वयं सर्वथा स्वतन्त्राः । किन्तु संयमः अस्माकं धनं वर्तते । शास्त्राणि कथयन्ति “ आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।”
अतः तदेव कार्यं करणीयं येन सर्वे जनाः प्रमुदिताः भवन्तु न कस्यापि कुत्रापि कष्टं भवेत् । अत्र जीवनस्य समरसता अपेक्षिता । सर्वे समानाः सन्ति । न कुत्रापि विषमता भवेत् । धर्मः, जाति:, वर्ग:, प्रान्तः, वेश-भूषा, आहारः कामं पृथक् भवेत् किन्तु सर्वे अस्यैव देशस्य स्वतन्त्राः नागरिकाः । कथमपि विषमः व्यवहारः न करणीयः । तदैव स्वतन्त्रतायाः वास्तविकं महत्त्वं भविष्यति ।
अतः जयतु भारतम्, जयन्तु भारतीयाः ।
(इति कथयित्वा मन्त्री महोदयः नमस्कारं करोति । मधुरान्नं गृहीत्वा सर्वे गृहं गच्छन्ति ।)
अर्थ – हमारे देश का हर कोई आज अति प्रसन्न है । इस समय हम पूर्ण स्वतन्त्र हैं । लेकिन संयम ही हमारा धन है। ग्रंथों में बताया गया है—अपने आचरण के प्रतिकूल (विपरीत) दूसरों के साथ व्यवहार नहीं करना चाहिए ।
इसलिए वैसा ही कार्य करना चाहिए, जिससे सबका मन खुश हो और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचे । अर्थात् हमारे व्यवहार से किसी को कष्ट न हो । हर व्यक्ति के प्रति समानता का भाव हो । सभी मानव एक समान हैं। किसी के साथ असमानता का भाव न हो । धर्म, जाति, वर्ग, प्रान्त, पहनावा, खान-पान तथा कार्य में भिन्नता संभव है, लेकिन सभी एक ही देश के वासी (नागरिक) हैं, इसलिए असमान व्यवहार करना उचित नहीं है । ऐसा विचार ( समानता का विचार) रखने पर ही स्वतंत्रता का सही मूल्य साबित होगा ।
भारत की जय हो, भारतीयों की जय हो। (ऐसा कहकर मंत्री महोदय सबको नमस्कार करते हैं । और सभी मिठाई लेकर घर चले जाते हैं ।)

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कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 3 ऋतुपरिचयः (विशेष्य-विशेषण-सम्बन्ध) का अर्थ | Rituparichay class 7 sanskrit

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तृतीयः पाठः
ऋतुपरिचयः
(विशेष्य-विशेषण-सम्बन्ध)

पाठ-परिचय- भारत ऋतुओं का देश है। यहाँ क्रम से छः ऋतुएँ, यथा-वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त और शिशिर आते हैं। हर ऋतु की अपनी खास विशेषता है। इन्हीं ऋतुओं के अनुकूल मौसम में बदलाव आता है। जैसे- वसंत में पेड़-पौधे नये पत्तों से लद जाते हैं तथा फल-फूलों से वातावरण में अलौकिक सौन्दर्य प्रकट कर देते हैं। ग्रीष्म में सूर्य की प्रचंड किरणों से धरती तावे की तरह गर्म हो जाती है तो वर्षा के आते ही नदी-नाले वर्षा जल पाकर सारी सीमाओं को लाँघ प्रलय जैसी स्थिति उपस्थिति कर देती है । प्रस्तुत पाठ में इन्हीं ऋतुओं का वर्णन किया गया है।

अस्माकं देशे षट् ऋतवः भवन्ति – वसन्तः, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्तः, शिशिरं च । वसन्ते सर्वेषु पादपेषु नवानि किसलयानि पुष्पाणि च भवन्ति । सर्वत्र शोभनः समयः नातिशीतः नातितापः भवति । कोकिलानां मधुरः स्वरः राजते । ग्रीष्मे सूर्यस्य तापः प्रखरः भवति । जलाशयाः प्रायेण जलशून्याः भवन्ति । सर्वे जीवाः छायाम् इच्छन्ति । विद्यालयेषु ग्रीष्मे अवकाशः भवति ।  

वर्षाकाले आकाश: मेघयुक्तः भवति । यदा-कदा वृष्टिरपि भवति । सम्पूर्णा पृथ्वी जलेन तृप्यति । कृषिः सर्वत्र शोभते । यदा अतिवृष्टिः भवति तदा नदीषु जलप्लावनं जायते । जनाः कष्टम् अनुभवन्ति । मांर्गाः अपि विच्छिन्नाः भवन्ति । शरत्काले पुनः शोभनः समयः आगच्छति । नदीषु जलाशयेषु च जलं स्वच्छं भवति । अस्मिन् समये एव दुर्गापूजा, दीपावली च प्रसिद्धौ उत्सवौ

भवतः ।

अर्थ- हमारे देश में छ: ऋतुएँ होती हैं—–वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त तथा शिशिर । वसन्त में सारे पौधे नये पत्ते तथा फूलों से लद जाते हैं। सब जगह सुन्दर समय होता है। इस समय न अधिक जाड़ा होता है और न अधिक गर्मी रहती है। इसी समय कोयल की मधुर आवाज सुनाई पड़ती है। ग्रीष्म ऋतु में धूप तेज होती है । प्राय: जलाशय सूख जाते हैं। सारे जीव छाया चाहते हैं। विद्यालयों में गर्मी की छुट्टी हो जाती है।

वर्षा ऋतु में आकाश बादलों से ढक जाता है। कभी-कभी वर्षा भी होती है। ग्रीष्म के ताप से तप्त धरती वर्षाजल से तृप्त होती है। सर्वत्र फसलें लगा दी जाती हैं। जब अधिक वर्षा होती है तब नदियों में बाढ़ आ जाती है। लोग कष्ट अनुभव करते हैं। बाढ़ के कारण रास्ते (सड़क) टूट जाते हैं। फिर शरद के आने पर समय अनुकूल हो जाता है। नदियों और तालाबों के जल निर्मल (स्वच्छ) हो जाते हैं। इस समय ही दुर्गापूजा और दीपावली जैसे प्रसिद्ध त्योहार होते हैं ।

हेमन्ते शीतस्य आरम्भः भवति । सूर्यस्य किरणा: रोचन्ते । धान्यं क्षेत्रेषु पक्वं भवति । कृषकाः तेन प्रसन्नाः भवन्ति । शिशिरे शीतस्य आधिक्यं भवति । सूर्यस्य किरणा: अपि यदा-कदा तुषारै: : लुप्ताः भवन्ति । निर्धनाः जनाः शीतेन पीडाम् अनुभवन्ति । यत्र-तत्र अग्निः प्रज्वालितः सेवितश्च भवति । सर्वेषु ऋतुषु वसन्तः राजा कथ्यते ।

अर्थ — हेमन्त ऋतु में जाड़ा आरंभ होता है। धूप बड़ी अच्छी लगती है। खेतों में धान की फसल पक जाती हैं। किसान उसे देखकर खुश होते हैं। जाड़े में ठंड की अधिकता हो जाती है। सूर्य की किरणें कभी-कभी ओस (कोहरे) से अदृश्य (लुप्त) हो जाती हैं। गरीब लोग जाड़े (ठंड) के कारण कष्ट अनुभव करते हैं। और आग जलाकर सेवन करते (तापते) हैं । वसंत को सब ऋतुओं का राजा कहा जाता है ।

ग्रीष्मो वर्षाः शरच्चैव हेमन्तो शिशिरं तथा । तेषु सर्वेषु राजायं वसन्तो मोददायक: ।। 1

अर्थ- ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त तथा जाड़े इन सब ऋतुओं का राजा वसंत ही मन को आनन्द प्रदान करने वाला होता है ।

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कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 2 कर्मशशककथा (लङ्लकार) का अर्थ | Karmashshakkatha class 7 sanskrit

इस पोस्‍ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 7 संस्‍कृत के पाठ 2 ‘कर्मशशककथा (लङ्लकार) (Karmashshakkatha class 7 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

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द्वितीयः पाठः
कर्मशशक कथा
(लङ्लकार)

पाठ परिचय – प्रस्तुत पाठ ‘कूर्मशशककथा’ विष्णु शर्मा लिखित ‘पंचतंत्र’ नामक कथा ग्रंथ से संकलित हैं। इसमें नियमित रूप से परिश्रम करने की सलाह दी गई है कथाकार का कहना है कि जो नियमित रूप से परिश्रम करता है, वही जीवन संग्राम में सफल होता है, चाहे वह मंद बुद्धि क्यों न हो ? इसी नियमित परिश्रम के फलस्वरूप मंदगति वाला कछुआ आगे निकल गया तथा द्रुतगति से चलनेवाले खरहा को लज्जित होना पड़ा। अत: छात्रों को याद रखना चाहिए कि नियमित परिश्रम से ही अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं ।

चम्पारण्ये सरोवरे एकः कूर्मः निवसति स्म । तस्य मित्रता शशकेन अभवत् । तौ सर्वदा एकत्र स्थित्वा नाना कथाः कथयतः । परस्परम् आलापेन तयोः मित्रता दृढा जाता । एकदा तौ विचारं कृतवन्तौ यत् वनस्य उपान्ते गन्तव्यम् । आवयोः मध्ये कः तत्र प्रथमं गच्छेत् ? कूर्मः अकथयत् – अहमेव तत्र प्रथमं गमिष्यामि । शशकः अहसत् – त्वं तु शनैः-शनैः चलसि । कथं तत्र प्रथमं गमिष्यसि ? अहमेव तत्र प्रथमं प्राप्स्यामि ।  

अर्थ – चम्पा नामक वन के तालाब में एक कछुआ रहता था । उसकी दोस्ती एक खरहे से हो गई । वे दोनों सदा एकसाथ रहकर अनेक कहानियाँ कहते रहते थे । आपसी बातचीत से दोनों में गहरी दोस्ती हो गई । एकबार दोनों में विचार हुआ कि वन के अन्तिम छोर पर पहुँचा जाए। हमदोनों में से पहले कौन वहाँ पहुँचता है ? कछुए ने कहा— पहले मैं ही वहाँ पहुँचूँगा । ( इसपर ) खरहा हँसने लगा तुम तो धीरे-धीरे चलते हो । कैसे पहले वहाँ पहुँचोगे ? मैं ही पहले वहाँ पहुँचूँगा ।

कूर्मः नियमस्य पालकः सदा परिश्रमी च आसीत् । सः शनैः-शनैः किन्तु निरन्तरं चलितः । शशकः दीर्घकालं मार्गे विरम्य पुनः तीव्रया गत्या अचलत् । यदा स वनस्य उपान्तं

प्राप्तवान् तदा अपश्यत् यत् कूर्मः पूर्वमेव तत्र अवस्थितः अस्ति । शशकः लज्जितः जातः । सत्यमुक्तम् – निरन्तरं श्रमेण असम्भवम् अपि कार्यं सम्भवति । क्व कूर्मस्य मन्थरगतिः, क्व शशकस्य तीव्रगतिः । किन्तु कूर्मः निरन्तरं कार्येण विजयी अभवत् ।

अर्थ — कछुआ नियम का पालन करनेवाला और हमेशा परिश्रम करने वाला था । वह धीरे-धीरे, लेकिन लगातार चलता रहा । खरहा देर तक राह में रुककर (विश्राम करके) फिर तेज गति से चला । जब वह जंगल के अन्तिम छोर पर पहुँचा तो देखा कि कछुआ उससे पहले ही पहुँच चुका है। (यह देखकर) खरहा लज्जित हो गया । सच ही कहा गया लगातार परिश्रम करते रहने से कठिन काम भी आसान हो जाता है । (क्योंकि) कहाँ धीरे-धीरे चलनेवाला कछुआ और कहाँ तेज दौड़नेवाला खरहा। लेकिन लगातार काम करते रहने अर्थात चलते रहने के कारण कछुआ विजयी हो गया ( और खरहा हार गया)।

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कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 1 वन्दना (नमः तथा नमामि के प्रयोग) का अर्थ | Vandana class 7 sanskrit

इस पोस्‍ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 7 संस्‍कृत के पाठ 1 ‘वन्दना (नमः तथा नमामि के प्रयोग) (Vandana class 7 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

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प्रथमः पाठः
वन्दना
(नमः तथा नमामि के प्रयोग)

पाठ- परिचय — प्रस्तुत पाठ ‘वन्दना’ में सृष्टिकर्त्ता प्रभु की महानता का वर्णन किया गया है। परमात्मा की यह वन्दना विभिन्न पौराणिक श्लोकों में की गई है। ईश्वर ही संसार के सारे कार्यों का संचालक है। उसी की कृपा से सुख-शांति की प्राप्ति होती है मनुष्य उसी की कृपा से सद्ज्ञान प्राप्त करता है । वह भक्तवत्सलं तथा जग का कल्याण करनेवाला है । इसलिए सबका कर्तव्य है कि उस महान् प्रभु की वन्दना करें ।

नमस्ते विश्वरूपाय प्राणिनां पालकाय ते ।
जन्म-स्थिति-विनाशाय विश्ववन्द्याय बन्धवे ॥1॥

अर्थ- हे विश्वरूप ! प्राणियों के पालनकर्त्ता, संसार की रचना तथा विनाश करनेवाले, जगत्-वन्दनीय प्रभु! आपको नमस्कार है ।

प्रसादे यस्य सम्पत्तिः विपत्तिः कोपने तथा ।
नमस्तस्मै विशालाय शिवाय परमात्मने ॥2॥

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अर्थ — जिसके प्रसन्न होने पर या जिसकी कृपा से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और क्रोध करने पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ता है उस महान परमात्मा शिव को अथवा मंगल के लिए नमस्कार है ।  

ज्ञानं धनं सुखं सत्यं तपो दानमयाचितम् ।
प्रसादे यस्य लभते मानवस्तं नमाम्यहम् ॥3॥

अर्थ — मनुष्य को जिसके प्रसन्न (कृपा) होने पर बिना माँगे ज्ञान, धन, सुख, सत्य,
तपस्या तथा दान प्राप्त होते हैं उस महान् प्रभु की मैं प्रार्थना करता हूँ ।

नमामि देवं जगदीशरूपं स्मरामि रम्यं च जगत्स्वरूपम् ।
वदामि तद्-वाचक-शब्दवृन्दं महेश्वरं देवगणैरगम्यम् ||4||

अर्थ- संसार के स्वामी प्रभु को नमस्कार है जिसने इतने सुन्दर संसार की रचना की है। और उस परमेश्वर का स्मरण करता हूँ जो देवताओं द्वारा न प्राप्त होने योग्य होते हुए भी हमें प्राप्त हो जाता है अर्थात् जिसकी कृपा से हमें सद्-असद् का ज्ञान प्राप्त होता है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ और स्मरण करता हूँ ।

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कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान अध्‍याय 6 लोकतांत्रिक व्‍यवस्था का संकट | Loktantrik vyavastha ka sankat

अध्‍याय 6
लोकतांत्रिक व्‍यवस्था का संकट

आपातकाल की पृष्‍ठभूमि

इंदिरा गाँधी एक कदावर नेता के रूप में उभरी थीं और उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी। इस अवधि में न्‍यायपालिका और सरकार के आपसी रिश्‍तों में भी तनाव आए। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरूद्ध माना। कांग्रेस पार्टी का मानना था कि अदालत का यह रवैया लोकतंत्र के सिद्धांतों और संसद की सर्वोच्‍चता के विरूद्ध है। कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि अदालत एक यथास्थितिवादी संस्‍था है और यह संस्‍था गरीबों को लाभ पहुँचाने वाले कल्‍याण-कार्यक्रमों को लागू करने की राह में रोड़े अटका रही है।

आर्थिक संदर्भ

1971 के चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। बहरहाल 1971-72 के बाद के सालों में भी देश की सामाजिक-आर्थिक देशों में खास सुधार नहीं हुआ। बांग्‍लादेश के संकट से भारत की अर्थव्‍यवस्‍था पर भारी बोझ पड़ा था। 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्‍तान की सीमा पार करके भारत आ गए थे। इसके बाद पाकिस्‍तान से युद्ध भी करना पड़ा। युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। इसी अवधि में अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई।

औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी और बेरोजगारी बहुत बढ़ गई थी 1972-73 के वर्ष में मानसुन असफल रहा। इससे कृषि की पैदावार में भारी गिरावट आई। खाद्यान्‍न का उत्‍पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असंतोष का माहौल था। इस स्थिति में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने बड़े कारगर तरीके से जन-विरोध की अगुवाई की। संसदीय राजनीति में विश्‍वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी इस अ‍वधि में बढ़ी। इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्‍यवस्था को खत्‍म करने के लिए हथियार उठाया तथा राज्‍यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ये समूह मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्‍यादा सक्रिय थे।

गुजरात और बिहार के आंदोलन

गुजरात और बिहार दोनों ही राज्‍यों में कांग्रेस की सरकार थी। यहाँ के छात्र-आंदोलन ने इन दोनों प्रदेशों की राजनीति पर गहरा असर डाला। 1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्‍न, खाद्य तेल तथा अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तुओं की बढ़ती हुई कीमत तथा उच्‍च पदों पर जारी भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। ऐसे में गुजरात में राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया गया। कांग्रेस (ओ) के प्रमुख नेता मोरारजी देसाई ने कहा कि अगर राज्‍य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनिश्चितकाली भूख-हड़ताल पर बैठ जाऊँगा। मोरारजी देसाई अपने कांग्रेस के दिनों में इंदिरा गाँधी के मुख्य विरोधी रहे थे। विपक्षी दलों द्वारा समर्थित छात्र-आंदोलन के गहरे दबाव में 1975 के जून में विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस इस चुनाव में हार गई।

1974 के मार्च माह में बढ़ती हुई कीमतों, खाद्यान्‍न के अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ बिहार में छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। छात्रों ने अपने अगुवाई के लिए जयप्रकाश नारायण को बुलावा भेजा था। जेपी ने छात्रों का निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा। जयप्रकाश नारायन ने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्‍त करने की माँग की। उन्‍होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्‍पूर्ण क्रांति’ का आव्‍हान किया ताकि उन्‍हीं के शब्‍दों में ‘सच्‍चे लोकतंत्र’ की स्‍थापना की जा सके। बिहार की सरकार के खिलाफ लगातार घेराव, बंद और हड़ताल का सिलसिला चल पड़ा। बहरहाल, सरकार ने इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्‍व में चल रहे आंदोलन के साथ ही साथ रेलवे के कर्मचारियों ने भी एक राष्‍ट्रव्‍यापी हड़ताल का आव्‍हान किया।

नक्‍सलवादी आंदोलन

1975 में जेपी ने जनता के ‘संसद-मार्च’ का नेतृत्‍व किया। देश की राजधानी में अब तब इतनी बड़ी रैली नहीं हुई थी। जयप्रकाश नारायण को अब भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्‍ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेस दलों का समर्थन मिला। गुजरात और बिहार, दोनों ही राज्‍यों के आंदोलन को कांग्रेस विरोधी आंदोलन माना गया।

न्‍यायपालिका से संघर्ष

इस क्रम में तीन संवैधानिक म‍सले उठे थे: क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? सर्वोच्‍च न्‍यायालय का जवाब था कि संसद ऐसा नहीं कर सकती। दुसरा यह कि क्‍या संसद  संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? इस मसले पर भी सर्वोच्‍च न्यायालय का यही कहना था कि सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सक‍ती कि अधिकारों की कटौती हो जाए। तीसरे, संसद ने यह कहते हुए संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है, लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्‍त कर दिया। इससे सरकार और न्‍यायपालिका के बीच संबंधों में तनाव आया।

1973 में केशवादनंद भारती के मुकदमे में सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा फैसला सुनाने के तुरंत बाद भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश का पद खाली हुआ। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के सबसे वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश को भारत का मुख्य न्‍यायाधीश बनाने की परिपाटी चली आ रही थी, लेकिन 1973 में सरकार ने तीन वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों की अनदेखी करके न्‍यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्‍य न्‍यायाधीश नियुक्‍त किया।

आपा‍तकाल की घोषणा

12 जून 1975 के दिन इलाहाबाद उच्‍च न्यायालय के न्‍यायाधीश जगमोहन लाल सिंहा ने एक फैसला सुनाया। इस फैसले में उन्‍होंने लोकसभा के लिए इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया। न्‍यामूर्ति ने यह फैसला समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा दायर एक चुनाव याचिका के मामले में सुनाया था। राजनारायण, इंदिरा गाँधी के खिलाफ 1971 में बतौर उम्‍मीदवार चुनाव में खड़े हुए थे। याचिका में इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को चुनौती देते हुए तर्क दिया गया था कि उन्‍होंने चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्‍तेमाल किया था। उच्‍च न्‍यायालय के इस फैसले का मतलब यह था कि कानूनन अब इंदिरा गाँधी सांसद नहीं रहीं और अगर अगले छह महीने की अवधि में दोबारा सांसद निर्वाचित नहीं होतीं, तो प्रधानमंत्री के पद पर कायम नहीं रह स‍कतीं।24 जुन 1975 को सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने उच्‍च न्‍यायालय के इस फैसले पर आंशिक स्‍थगनादेश सुनाते हुए कहा कि जब तक इस फैसले को लेकर की गई अपील की सुनवाई नहीं होती तब तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी; लेकिन वे लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती हैं। 

संकट और सरकार का फैसला

एक बड़े राजनीतिक संघर्ष के लिए अब मैदान तैयार हो चुका था। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों ने इंदिरा गाँधी के इस्तीफा के लिए दबाव डाला। इन दलों ने 25 जून 1975 को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शण किया। जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आव्‍हान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें।

सरकार ने इन घटनाओं के मदेनजर जवाब में’आपातकाल’ की घोषणा कर दी। 25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्‍छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्‍छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी  की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।

25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्‍ट्रपति फखरूदीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्‍ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी। आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई।

परिणाम

सरकाल के इस फैसले से विरोध-आंदोलन एकबारगी रूक गया; हड़तालों पर रोक लगा दी गई। अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसे प्रेस सेंसरशिप के नाम से जाना जाता है। सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मदेनजर सरकार ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात-ए-इस्‍लामी पर प्रतिबंध लगा दिया। धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी।

सरकार ने निवारक नजरबंदी का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल किया। इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इ‍सलिए नहीं किया जाता कि उन्‍होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका सके गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं। जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारी किया गया। वे बंदी प्रत्‍यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे स‍कते थे।

‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ और ‘स्‍टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने प्रेस पर लगी सेंसरशिप का विरोध किया। इंदिरा गाँधी के मामले में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के फैसले की पृष्‍ठभूमि में संविधान में संशोधन हुआ। इस संशोधन के द्वारा प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और उपराष्‍ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौ‍ती नहीं दी जा सकती। आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ। देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना।

आपातकाल के संदर्भ में विवाद

आपा‍तकाल भारतीय राजनीति का सर्वाधिक विवादास्‍पद प्रकरण है। शाह आयोग ने अपनी जाँच में पाया कि इस अवधि में बहुत सारी ‘अति’ हुई।

क्‍या ‘आपातकाल’ जरूरी थी?

आपा‍तकाल की घोषणा के कारण का उल्‍लेख करते हुए संविधान में बड़े सादे ढंग से ‘अंदरूनी गड़बड़ी’ जैसे शब्‍द का व्‍यवहार किया गया है। 1975 से पहले कभी भी ‘अंदरूनी गड़बड़ी’ को आधार बनाकर आपातकाल की घोषणा नही की गई थी। सरकार का मानना था कि बार-बार का धरना-प्रदर्शन और सामूहिक कार्रवाई लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

सीपीआई (इसने आपातकाल के दौरान कांग्रेस को समर्थन देना जारी रखा था) का विश्‍वास था कि भारत की एकता के विरूद्ध अंतर्राष्‍ट्रीय साजिश की जा रही है। आपातकाल के बाद सीपीआई ने महसूस किया कि उसका मूल्‍यांकन गलत था और आपातकाल का समर्थन करना एक गलती थी।

दूसरी तरफ, आपातकाल के आलोचकों का तर्क था कि आजादी के आंदोलन से लेकर लगातार भारत में जन आंदोलन का एक सिलसिला रहा है। जेपी सहित विपक्ष के अन्‍य नेताओं का खयाल था कि लोकतंत्र में लोगों को सार्वजनिक तौर पर सरकार के विरोध का अधिकार होना चाहिए। बिहार और गुजरात में चले विरोध-आंदोलन ज्‍यादातर समय अहिंसक और शांतिपूर्ण रहे। देश के अंदरूनी मामलों की देख-रेख का जिम्‍मा गृह मंत्रालय का होता है। गृह मंत्रालय ने भी कानून व्‍यवस्‍था की बाबत कोई चिंता नहीं जतायी थी। आंदोलन अपनी हद से बाहर जा रहे थे, तो सरकार के पास अपनी रोजमर्रा की अमल में आने वाली इतनी शक्तियाँ थीं कि वह ऐसे आंदोलनों को हद में ला सकती थी। लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ठप्‍प करके ‘आपातकाल’ लागू करने जैसे अतिचारी कदम उठाने की जरूरत कतई न थी।

आपातकाल के दौरान क्‍या-क्‍या हुआ?

सरकार ने कहा कि वह आपातकाल के जरिए कानून व्‍यवस्‍था को बहाल करना चाहती थी, कार्यकुशलता बढ़ाना चाहती थी और गरीबों के हित के कार्यक्रम लागू करना चाहती थी। इस उदेश्‍य से सरकार ने एक बीस-सूत्रीकार्यक्रम की घोषणा की और इसे लागू करने का अपना दृढ़ संकल्‍प दोहराया। सीब-सूत्री कार्यक्रम में भूमि-सुधार, भू-पुनर्वितरण, खेतिहर मजदूरों के पारिश्रमिक पर पुनर्विचार, प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी, बंधुआ मजदूरी की समाप्ति, आदि मसले शामिल थे। गरीब और ग्रामीण जनता को भी उम्‍मीद थी कि सरकारी कर्मचारीयों पर अनुशासन लागू करने के वायदे कर रही है, उन्‍हें अब कारगर तरीके से लागू किया जाएगा।

आपातकाल के आलोचकों ने ध्‍यान दिलाया है कि सरकार के ज्‍यादातर वायदे पूरे नहीं हुए। आलोचकों ने निवारक नजरबंदी के बड़े पैमाने के इस्‍तमाल पर भी सवाल उठाए। कुल 676 नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी। शाह आयोग का आकलन था कि निवारक जनरबंदी के कानूनों के तहत लगभग एक लाख ग्‍यारह हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रेस पर कई तरह की पाबंदी लगाई गई। इसमें कई पाबंदियाँ गैरकानूनी थीं। आपातकाल के दौरान पुलिस हिरासत में मौत और यातना की घटनाएँ घटीं। गरीब लोगों के मनमाने ढंग से एक जगह से उजाड़कर दूसरी जगह बसाने की भी घटनाएँ हुईं। जनसंख्‍या नियंत्रण के अति उत्‍साह में लोगों को अनिवार्य रूप से नसबंदी के लिए मजबूर किया गया।

आपातकाल के सबक

आपातकाल से एकबारगी भारतीय लोकतंत्र की ताकत और कमजोरियाँ उजागर हो गईं।

दूसरे, आपा‍काल से संविधान में वर्णित आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव भी प्रकट हुए, जिन्‍हें बाद में सुधार लिया गया। अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ ‘सशस्‍त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्‍ट्रपति को लिखित में दे।

आपा‍तकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्‍यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।

आपातकाल के बाद की राजनीति

जैसे ही आपातकाल खत्‍म हुआ और लोकसभा के चुनावों की घोषणा हुई, वैसे ही आपातकाल का सबसे जरूरी और कीमती सबक राजव्‍यवस्‍था ने सीख लिया। 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओं’ के नारे पर चुनाव लड़ा। जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरूद्ध था।

लोकसभा के चुनाव-1977

18 महीने के आपातकाल के बाद 1977 के जनवरी माह में सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया। इसी के मुताबिक सभी नेताओं‍ और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा कर दिया गया। 1977 के मार्च में चुनाव हुए। ऐसे में विपक्ष को चुनावी तैयारी का बड़ा कम समय मिला, लेकिन राजनीतिक बदलाव की गति बड़ी तेज थी। चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों न एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्‍व स्‍वीकार किया। कांग्रेस के कुछ अन्‍य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्‍व में एक नयी पार्टी बनाई। इस पार्टी का नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था और बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।

हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्‍टभूमि में जनमत कांग्रेस के विरूद्ध था। जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी पार्टी वोट एक ही जगह पड़ेंगी। बात बिलकुल साफ थी कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।

जनता सरकार

1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद नेताओं के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए होड़ में मोररजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम शामिल थे। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्‍व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था। जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी। जनता पार्टी बिखर गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार ने 18 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। कांग्रेस पार्टी ने समर्थन पर दूसरी सरकार चरण सिंह के नेतृत्‍व में बनी। लेकिन बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का फैसला किया। इस वजह से चरणस सिंह की सरकार मात्र चार महीने तक सत्ता में रही।

1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी बुरी तरह परास्त हुई। 1977 के चुनाव में उत्तर भारत में इस पार्टी को जबरदस्‍त सफलता मिली थी। इंदिरा गाँधी के नेतृत्‍व में कांग्रेस पार्टी ने 1980 के चुनाव में एक बार फिर 1971 के चुनावों वाली कहानी दुहराते हुए भारी सफलता हासिल की। कांग्रेस पार्टी को 353 सीटें मिलीं और वह सत्ता में आई।

विरासत

1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्‍मक गतिमति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी। अपने बदले हुए स्‍वभाव में कांग्रेस ने स्‍वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा। उसने अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और गरीबों की हिमायती पार्टी मताना शुरू किया। आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्‍यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपा‍तकाल के मूल में था।

अध्‍याय 7 जन आंदोनों का उदय | Jan andolan ka uday class 12

अध्‍याय 7

जन आंदोनों का उदय

जन आंदोलनों की प्रकृति

यह घटना 1973 में घटी जब मौजूदा उत्तराखंड के एक गाँव के स्‍त्री-पुरूष एकजुट हुए और जंगलों की व्‍यासायिक कटाई का विरोध किया। सरकार ने जंगलों की कटाई के लिए अनु‍मति दी थी। इन लोगों ने पेडों को अपनी बाँहों में घेर लिया ताकि उन्‍हें कटने से बचाया जा सके। यह विरोध आगामी दिनों में भारत के पर्यावरण आंदोलन के रूप में परिणत हुआ और ‘चिपको-आंदोलन’ के नाम से विश्‍वप्रसिद्ध हुआ।

चिपको आंदोलन

इस आंदोलन की शुरूआत उतराखंड के दो-तीन गाँव से हुई थी! गाँव वालों ने वन विभाग से कहा कि खेती-बाडी के औजार बनाने के लिए हमें अंगू के पेड काटने की अनुमति दी जाए । वन    विभाग ने अनु‍मति देने से इनकार कर दिया। बहरहाल, विभाग ने खेल-सामग्री के एक विनिर्माता को जमीन का यही टुकडा व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल के लिए आबंटित कर दिया। इससे गाँव वालों में रोष पैदा हुआ और उन्‍होंने सरकार के इस कदम का विरोध किया। गाँववासियों ने माँग की कि जंगल की कटाई का कोई भी ठेका बाहरी व्‍यक्ति को नहीं दिया जाना चाहिए और स्‍थानीय लोगों का जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कारगर नियंत्रण होना चाहिए।

चिपको आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी की। इलाके में सक्रिय जंगल कटाई के ठेकेदार यहाँ के पुरूषों को शराब की आपूर्ति का भी व्‍यवसाय करते थे। महिलाओं ने शराबखोरी की लत के खिलाफ भी लगातार आवाज उठायी। इससे आंदोलन का दायरा विस्‍तृत हुआ और उसमें कुछ और सामाजिक मसले आ जुडे। आखिरकार इस आंदोलन को सफलता मिली और सरकार ने पंद्रह सालों के लिए हिमालयी क्षेत्र में पेडों की कटाई पर रोक लगा दी ताकि इस अवधि में क्षत्र का वनाच्‍छादन फिर से ठीक अवस्‍था में आ जाए।

दल-आधारित आंदोलन

जन आंदोलन कभी सामाजिक तो कभी राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकते हैं और अकसर ये आंदोलन दोनों ही रूपों के मेल से बने नजर आते हैं। उदाहरण के लिए, हम अपने स्‍वाधीनता आंदोलन को ही लें। यह मुख्‍य रूप से राजनीतिक आंदोलन था। लेकिन हम जानते हैं कि औपनिवेशिक दौर में सामाजिक-आर्थिक मसलों पर भी विचार मंथन चला जिससे अनेक स्‍वतंत्र सामाजिक आंदोलनों का जन्‍म हुआ, जैसे-जाति प्रथा विरोधी आंदोलन, किसान सभा आंदोलन और मजदूर संगठनों के आंदोलन।

ऐसे कुछ आंदोलन आजादी के बाद के दौर में भी चलते रहे। मुंबई, कोलकाता और कानपुर जैसे बडे शहरों के औद्योगिक मजदूरों के बीच मजदूर संगठनों के आंदोलन का बडा जोर था।

किसान और मजदूरों के आंदोलन का मुख्‍य जोर आर्थिक अन्‍याय तथा असमानता के मसले पर रहा। ऐसे आंदोलनों ने औपचारिक रूप से चुनावों में भाग तो नहीं लिया लेकिन राजनीतिक दलों से इनका नजदी‍की रिश्‍ता कायम हुआ।

राजनीतिक दलों से स्‍वतंत्र आंदोलन

‘सतर’ और ‘अस्‍सी’ के दशक में समाज के कई तबकों का राजनीतिक दलों के आचार-व्‍यवहार से मोहभंग हुआ। इसका तात्‍कालिक कारण तो यही था कि जनता पार्टी के रूप में गैर-कांग्रेसवाद का प्रयोग कुछ खास नहीं चल पाया और इसकी असफलता से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल भी कायम हुआ था। देश ने आजादी के बाद नियोजित विकास का मॉडल अपनाया था। इस मॉडल को अपनाने के पीछे दो लक्ष्‍य थे-आर्थिक संवृद्धि और आय का समतापूर्ण बँटवारा। आजादी के शुरूआती 20 सालों में अर्थव्‍यवस्‍था के कुछ क्षेत्रों में उल्‍लेखनीय संवृद्धि हुई, लेकिन इसके बावजूद गरीबी और असमानता बडे पैमाने पर बरकरार रही।

राजनीतिक धरातल पर सक्रिय कई समूहों का विश्‍वास लोकतांत्रिक संस्‍थाओं और चुनावी राजनीति से उठ गया। ये समूह दलगत राजनीति से अलग हुए और अपने विरोध को स्‍वर देने के लिए इन्‍होंने आवाम को लामबंद करना शुरू किया। मध्‍यवर्ग के युवा कार्यकर्ताओं ने गाँव के गरीब लोगों के बीच रचनात्‍मक कार्यक्रम तथा सेवा संगठन चलाए। इन संगठनों के सामाजिक कार्यो की प्रकृति स्‍वयंसेवी थी इसलिए इस संगठनों को स्‍वयंसेवी संगठन या स्‍वयंसेवी क्षेत्र के संगठन कहा गया।

ऐसे स्‍वयंसेवी संगठनों ने अपने को दलगत राजनीति से दूर रखा। स्‍थानीय अथवा क्षेत्रीय स्‍तर पर ये संगठन न तो चुनाव लडे और न ही इन्‍होंने किसी एक राजनीतिक दल को अपना समर्थन दिया। ऐसे अधिकांश संगठन राजनीति में विश्‍वास करते थे और उसमें भागीदारी भी करना चाहते थे, लेकिन इन्‍होंने राजनीतिक भागीदारी के लिए राजनीतिक दलों को नहीं चुना। इसी कारण इन संगठनों को ‘स्‍वतंत्र राजनीतिक संगठन’ कहा जाता है। इन संगठनों का मानना था कि स्‍थानीय मसलों के समाधान में स्‍थानीय नागरिकों की सीधी और सक्रिय भागीदारी राजनीतिक दलों की अपेक्षा कहीं ज्‍यादा कारगर होगी।

अब भी ऐसे स्‍वयंसेवी संगठन शहरी और ग्रामीण इलाकों सक्रिय हैं। बहरहाल, अब इनकी प्रकृति बदल गई है।

उदय

सातवें दशक के शुरूआती सालों से शिक्षित दलितों की पहली पीढ़ी ने अनेक मंचों से अपने हक की आवाज उठायी। इनमें ज्‍यादातर शहर की झुग्गी-बस्तियों में पलकर बड़े हुए दलित थे। दलित हितों की दावेदारी के इसी क्रम में महाराष्‍ट्र में 1972 में दलित युवाओं का एक संगठन ‘दलित पैंथर्स’ बना। आजादी के बाद के सालों में दलित समूह मुख्‍यतया जाति-आधारित असमानता और भौतिक साधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्‍याय के खिलाफ लड़ रहे थे। वे इस बात को लेकर सचेत थे कि संविधान में जाति-आधारित किसी भी तरह के भेदभाव के विरूद्ध गारंटी दी गई है। आरक्षण के कानून तथा सामाजिक न्‍याय की ऐसी ही नीतियों का कारगर क्रियान्‍वयन इनकी प्रमुख माँग थी।

भारतीय संविधान में छुआछुत की प्रथा को समाप्‍त कर दिया गया है। सरकार ने इसके अंतर्गत ‘साठ’ और ‘सत्तर’ के दशक में कानून बनाए। इसके बावजूद पुराने जमाने में जिन जातियों को अछुत माना गया था, उनके साथ इस नए दौर में भी सामाजिक भेदभाव तथा हिंसा का बरताव कई रूपों में जारी रहा। दलितों की बस्तियाँ मुख्‍य गाँव से अब भी दूर होती थीं। दलित महिलाओं के साथ दुर्व्‍यवहार होते थे। दलितों के सामाजिक और आर्थिक उत्‍पीड़न को रोक पाने में कानून की व्‍यवस्‍था नाकाफी साबित हो रही थी। दूसरी तरफ, दलित जिन राजनीतिक दलों का समर्थन कर रहे थे जैसे-रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, वे चुनावी राजनीति में सफल नहीं हो पा रही थीं। इन वजह से ‘दलित पैंथर्स’ ने दलित अधिकारों की दावेदारी क‍रते हुअ जन-कार्रवाई का रास्‍ता अपनाया।

गतिविधि

महाराष्‍ट्र के विभिन्‍न इलाकों में दलितों पर बढ़ रहे अत्‍याचार से लड़ना दलित पैंथर्स की अन्‍य मुख्‍य गतिविधि थी। दलित पैंथर्स तथा इसके समधर्मा संगठनों ने दलितों पर हो रहे अत्‍याचार के मुद्दे पर लगातार विरोध आंदोलन चलाया। इसके परिणामस्‍वरूप सरकार ने 1989 में एक व्‍यापक कानून बनाया। इस कानून के अंतर्गत दलित पर अत्‍याचार करने वाले के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया।

भारतीय किसान यूनियन

सत्तर के देशक से भारतीय समाज में कई तर‍ह के असंतोष पैदा हुए। अस्‍सी के दशक का कृषक-संघर्ष इसका एक उदाहरण है

उदय

1988 के जनवरी में उत्तर प्रदेश के एक शहर मेरठ में लगभग बीस हजार किसान जमा हुए। ये किसान सरकार द्वारा बिजली की दर में की गई बढ़ोतरी का विरोधी कर रहे थे। किसान जिला समाहर्ता के दफ्तर के बाहर तीन हफ्तों तक डेरा डाले रहे। इसके बाद इनकी माँग मान ली गई। किसानों का यह बड़ा अनुशासित धरना था और जिन दिनों वे धरने पर बैठे थे उन दिनों आस-पास के गाँवों से उन्‍हें निरंतर राशन-पानी मिलता रहा। धरने पर बैठे किसान, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के सदस्‍य थे।

1980 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के उदा‍रीकरणस के प्रयास हुए और क्रम में नगदी फसल के बाजार को संकट का सामना करना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन ने गन्‍ने और गेहूँ के सरकारी खरीद मूल्‍य में बढ़ोतरी करने, कृषि उत्‍पादों के अंतर्राज्‍यीय आवाजाही पर लगी पाबंदियाँ हटाने, समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की माँग की।

ऐसी माँग देश के अन्‍य किसान संगठनों ने भी उठाईं। महाराष्‍ट्र के शेतकारी संगठन ने किसानों के आंदोलन को ‘इंडिया’ की ताकतों (यानी शहरी औद्योगिक क्षेत्र) के खिलाफ ‘भारत’ (यानी ग्रामीण कृषि क्षेत्र) का संग्राम करार दिया। आप तीसरे अध्‍याय में यह बात पढ़ ही चुके हैं कि भारत में अपनाए गए विकास के मॉडल से जुड़े विवादों में कृषि बनाम उद्योग का विवाद प्रमुख था।

विशेषताएँ

सरकार पर अपनी माँग को मानने के लिए दबाव डालने के क्रम में बीकेयू ने रैली, धरना, प्रदर्शन और जेल भरो अभियान का स‍हारा लिया। पूरे अस्‍सी के दशक भर बीकेयू ने राज्‍य के अनेक जिला मुख्‍यालयों पर इन किसानों की विशाल रैली ओयोजित की। देश की राजधानी दिल्‍ली में भी बीकेयू ने रैली का आयोजन किया।

1990 के दशक के शुरूआती सालों तक बीकेयू ने अपने को सभी राजनीतिक दलों से दूर रखा था। इस संगठन ने राज्यों में मौजूद अन्‍य किसान संगठनों को साथ लेकर अपनी कुछ माँग मनवाने में सफलता पाई। इस अर्थ में किसान आंदोलन अस्‍सी के दशक में सबसे ज्‍यादा सफल सामाजिक आंदोलन की सफलता के पीछे इसके सदस्‍यों की राजनीतिक मोल-भाव की क्षमता का हाथ था।

महिलाओं ने शराब माफिया को हराया

चित्तूर जिले के कलिनारी मंडल स्थित गुंडलुर गाँव की महिलाएँ अपने गाँव में ताड़ी की बिक्री पर पाबंदी लगाने के लिए एकजुट हुईं। उन्होंने अपनी बात गाँव के ताड़ी विक्रेता तक पहुँचाई। महिलाओं ने गाँव में ताड़ी लाने वाली जीप की वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। जब गाँव के ताड़ी-बिक्रेता ने ठेकेदार को इसकी सूचना दी तो ठेकेदार ने उसके साथ गुंडों का एक दल भेजा। गाँव की महिलाएँ इससे भी नहीं डरीं। ठेकेदार ने पुलिस को बुलाया लेकिन पुलिस भी पीछे हट गई। एक सप्‍ताह बाद ताड़ी की बिक्री का विरोध करने वाली महिलाओं पर ठेकेदार के गुंडो ने सरियों और घातक हथियारों से हमला किया। लेकि‍न गुंडों को हार माननी पड़ी। फिर महिलाओं ने तीन जीप ताड़ी फेंक दिया।

ताड़ी-विरोधी आंदोलन

एक अलग तरह का आंदोलन दक्षिणी राज्‍य आंध्र प्रदेश में आकार ले रहा था। यह महिलाओं का एक स्‍वत:स्फूर्त आंदोलन था। ये महिलाएँ अपने आस-पड़ोस में मदिरा की बिक्री पर पाबंदी की माँग कर रही थीं।

वर्ष 1992 के सितंबर और अक्‍तूबर माह में इस तरह की खबरें प्रेस में लगभग रोज दिखती थी। ग्रामीण महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी। यह लड़ाई माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ थी। इस आंदोलन ने ऐसा रूप धारण किया कि इसे राज्‍य में ताड़ी-विरोधी आंदोलन के रूप में जाना गया।

उदय 

आंध्र प्रदेश के नेल्‍लौर जिले के एक दूर-दराज के गाँव दुबरगंटा में 1990 के शुरूआती दौर में महिलाओं के बीच प्रौढ़-साक्षरता कार्यक्रम चलाया गया जिसमें महिलाओं ने बड़ी संख्‍या में पंजीकरण कराया। कक्षाओं में महिलाएँ घर के पुरूषों द्वारा देशी शराब, ताड़ी आदि पीने की शिकायतें करती थीं। ग्रामीणों के शराब की गहरी लत लग चुकी थी। शराबखोरी से क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था बुरी तर‍ह प्रभावित हो रही थी। शराबखोरी से सबसे ज्यादा दिक्‍कत महिलाओं को हो रही थी। इससे परिवार की अर्थव्‍यवस्‍था चरमराने लगी।

नेल्लोर में महिलाएँ ताड़ी की बिक्री के खिलाफ आगे आई और उन्‍होंने शराब की दुकानों को बंद कराने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। यह खबर तेजी से फैली और करीब 5000 गाँवों की महिलाओं ने आंदोलन में भाग लेना शरू कर दिया। प्रतिबंध संबंधी एक प्रस्‍ताव को पास कर इसे जिला कलेक्‍टर को भेजा गया। नेल्‍लोर जिले में ताड़ी की नीलामी 17 बार रद् हुई। नेल्‍लोर जिले का यह आंदोलन धीरे-धीरे पूने राज्‍य में फैल गया।

आंदोलन की क‍ड़ीयाँ

ताड़ी-विरोध आंदोलन का नारा बहुत साधारण था-‘ताड़ी की बिक्री बंद करो।’ राज्य सरकार को ताड़ी की बिक्री से काफी राजस्व की प्राप्ति होती थी इसलिए वह इस पर प्रतिबंध नहीं लगा रही थी। स्‍थानीय महिलाओं के समूहों ने इस जटिल मुद्दे को अपने आंदोलन में उठाना शुरू किया। वे घरेलू हिंसा जैसे निजी मुद्दों पर बोलने का मौका दिया।

इस तरह ताड़ी-विरोध आंदोलन महिला का एक हिस्सा बन गया। आठवें दशक के दौरान महिला आंदोलन परिवार के अंदर और उसके बाहर होने वाली यौन हिंसा के मुद्दों पर केंद्रित रहा। धीरे-धीरे महिला आं‍दोलन कानूनी सुधारों से हटकर सामाजिक टकराव के मुद्दों पर भी खुले तौर पर बात करने लगा। नवें दशक तक आते-आते महिला आंदोलन समान राजनीतिक प्रतिनिधित्‍व की बात करने लगा था। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के अंतर्गत महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक निकायों में आरक्षण दिया गया है। इस व्‍यवस्था को राज्‍यों की विधानसभाओं तथा संसद में भी लागू करने की माँग की जा रही है।

नर्मदा बचाओं आंदोलन

वे सभी सामाजिक आंदोलन जिनके बारे में हमने अभी तक चर्चा की है, देश में आजादी के बाद अपनाए गए आर्थिक विकास के मॉडल पर सवालिया निशान लगाते रहे हैं। एक ओर जहाँ चिपको आंदोलन ने इस मॉडल में निहित पर्यावरणीय विनाश के मुद्दे को सामने रखा, वहीं दूसरी ओर, किसानों ने कृषि क्षेत्र की अनदेखी पर रोष प्रकट किया। इसी तरह जहाँ दलित समुदायों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ उन्‍हें जन-संघर्ष की ओर ले गई वहीं ताड़ी-बंदी आंदोलन ने विकास के नकारात्‍मक पहलुओं की ओर इशारा किया।

सरदार सरोवर परियोजना 

आठवें दशक के प्रारंभ में भारत के मध्‍य भाग में स्थित नर्मदा घाटी में विकास परियोजना के तहत मध्‍य प्रदेश, गुजरात और महाराष्‍ट्र से गुजरने वाली नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर 30 बड़े, 135 मझोले तथा 300 छोटे बाँध बनाने का प्रस्‍ताव रखा गया। गुजरात के सरदार सरोवर और मध्‍य प्रदेश के नर्मदा सागर बाँध के रूप में दो सबसे बड़ी और बहु-उद्देश्‍यीय परियोजनाओं का निर्धारण किया गया। नर्मदा नदी के बचाव में नर्मदा बचाओ आंदोलन चला।

सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत एक बहु-उद्देश्‍यीय विशाल बाँध बनाने का प्रस्‍ताव है। बाँध समर्थकों का कहना है कि इसके निर्माण से गुजरात के एक बहुत बड़े हिस्‍से सहित तीन पड़ोसी राज्‍यों में पीने के पानी, सिंचाई और बिजली के उत्‍पादन की सुविधा मुहैया कराई जा सकेगी तथा कृषि की उपज में गुणात्‍मक बढ़ोतरी होगी।

प्रस्‍तावित बाँध के निर्माण से संबंधित राज्‍यों के 245 गाँव डूब के क्षेत्र में आ रहे थे। अत: प्रभावित गाँवों के करीब ढाई लाख लोगों के पुनर्वास का मुद्दा सबसे पहले स्‍थानीय कार्यकर्ताओं ने उठाया।

वाद-विवाद और संघर्ष

आंदोलन के नेतृत्‍व ने इस बात की ओर ध्‍यान दिलाया कि इस परियोजनाओं का लोगों के पर्यावास, आजीविका, संस्‍कृति तथा पर्यावरण पर बुरा असर पड़ा है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी परियोजनाओं की निर्णय प्रक्रिया में स्‍थानीय समुदायों की भागीदारी होनी चाहिए और जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर उनका प्रभावी नियंत्रण होना चाहिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं का गुजरात जैसे राज्‍यों में तीव्र विरोध हुआ है। परंतु अब सरकार और न्‍यायपालिका दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि लोगों को पुनर्वास मिलना चाहिए। सरकार द्वारा 2003 में स्‍वीकृत राष्‍ट्रीय पुनर्वास नीति को नर्मदा बचाओ जैसे सामाजिक आंदोलन की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को बाँध का काम आगे बढ़ाने की हिदायत दी है लेकिन साथ ही उसे यह आदेश भी दिया गया है कि प्रभावित लोगों का पुनर्वास सही ढंग से किया जाए। नर्मदा बचाओ आंदोलन दो से भी ज्‍यादा दशकों तक चला। नवें दशक के अंत तक पहुँचते नर्मदा बचाओ आंदोलन से कई अन्‍य स्‍थानीय समूह और आंदोलन भी आ जुड़े।

जन आंदोलन के सबक

जन आंदोलन का इतिहास हमें लोकतांत्रिक राजनीति को बेहतर ढंग से समझने में मदद देता है। सामाजिक आंदोलनों ने समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्‍याओं को अभिव्‍यक्ति दी जो अपनी दिक्‍कतों को चुनावी राजनीति के जरिए हल नहीं कर पा रहे थे।

इन आंदोलनों के आलोचक अकसर यह दलील देते हैं कि हड़ताल, धरना और रैली जैसी सामूहिक कार्रवाईयों से सरकार के कामकाज पर बुरा असर पड़ता है।

सुचना के अधिकार का आंदोलन  

सुचना के अधिकार का आंदोलन जन आंदोलनों की सफलता का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह आंदोलन सरकार से एक बड़ी माँग को पूरा कराने में सफल रहा है। इस आंदोलन की शुरूआत 1990 में हुई और इसका नेतृत्‍व किया मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने। राजस्‍थान में काम कर रहे इस संगठन ने सरकार के सामने यह माँग रखी कि अकाल राहत कार्य और मजदूरों को दी जाने वाली पगार के रिकॉर्ड का सार्वजनिक खुलासा किया जाए।

इस मुहिम के तहत ग्रामीणों ने प्रशासन से अपने वेतन और भुगतान के बिल उपलब्‍ध कराने को कहा। दरअसल, इन लोगों को लग रहा था कि स्‍कूलों, डिस्‍पेंसरी, छोटे बाँधों तथा सामुदायिक केंद्रों के निर्माण कार्य के दौरान उन्‍हें दी गई मजदूरी में भारी घपला हुआ है। कहने के लिए के विकास परियोजनाएँ पूरी हो गई हो गई थीं लेकिन लोगों का मानना था कि सारे काम में धन की हेराफेरी हुई है। पहले 1994 और उसके बाद 1996 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने जन-सुनवाई का आयोजन किया और प्रशान को इस मामले में अपना पक्ष स्‍पष्‍ट करने को कहा।

आंदोलन के दबाव में सरकार को राजस्‍थान पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करना पड़ा। नए कानून के तहत जनता को पंचायत के दस्‍तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिप प्राप्‍त करने की अनुमति मिल गई। संशोधन के बाद पंचायतों के लिए बजट, लेखा, खर्च, नीतियों और लाभार्थियों के बारे में सार्व‍जनिक घोषणा करना अनिवार्य कर दिया गया। 1996 में एमकेएसएस ने दिल्‍ली में सुचना के अधिकार को लेकर राष्‍ट्रीय समिति का गठन किया। इस कार्रवाई का लक्ष्‍य सूचना के अधिकार को राष्‍ट्रीय अभियान का रूप देना था। इससे पहले, कंज्‍यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (उपभोक्‍ता शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र), प्रेस काउंसिल तथा शौरी समिति ने सुचना के अधिकार का एक मसौदा तैयार किया था। 2002 में ‘सूचना की स्वतंत्रता’ नाम का एक विधेयक पारित हुआ था। यह एक कमजोर अधिनियम था और इसे अमल में नहीं लाया गया। सन् 2004 में सूचना के अधिकार के विधेयक को सदन में रखा गया। जून 2005 में विधेयक को राष्‍ट्रपति की मंजूरी हासिल हुई।

आंदोलन का म‍तलब सिर्फ धरना-प्रदर्शन या सामूहिक कार्रवाई नहीं होता। इसके अंतर्गत किसी समस्‍या से पी‍ड़ीत लोगों का धीरे-धीरे एकजुट होना और समान अपेक्षाओं के साथ एक-सी माँग उठाना जरूरी है। इसके अतिरिक्‍त, आंदोलन का एक काम लोगों को अपने अधिकारों को लेकर जागरूक बनाना भी है ताकि लोग यह समझें कि लोकतंत्र की संस्‍थाओं से वे क्‍या-क्‍या उम्‍मीद कर सकते हैं।

समकाली सामाजिक आंदोलन किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द ही जनता को लामबंद करते हैं। इस तरह वे समाज के किसी एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्‍व कर पाते हैं। इसी सीमा के चलते सरकार इन आंदोलनों की जायज माँगों को ठुकराने का साहस कर पाती है।

Class 12th Pol. Science अध्‍याय 6 लोकतांत्रिक व्‍यवस्था का संकट | chapter 6 political science class 12 notes in hindi

अध्‍याय 6
लोकतांत्रिक व्‍यवस्था का संकट

आपातकाल की पृष्‍ठभूमि

इंदिरा गाँधी एक कदावर नेता के रूप में उभरी थीं और उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी। इस अवधि में न्‍यायपालिका और सरकार के आपसी रिश्‍तों में भी तनाव आए। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरूद्ध माना। कांग्रेस पार्टी का मानना था कि अदालत का यह रवैया लोकतंत्र के सिद्धांतों और संसद की सर्वोच्‍चता के विरूद्ध है। कांग्रेस ने यह आरोप भी लगाया कि अदालत एक यथास्थितिवादी संस्‍था है और यह संस्‍था गरीबों को लाभ पहुँचाने वाले कल्‍याण-कार्यक्रमों को लागू करने की राह में रोड़े अटका रही है।

आर्थिक संदर्भ

1971 के चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। बहरहाल 1971-72 के बाद के सालों में भी देश की सामाजिक-आर्थिक देशों में खास सुधार नहीं हुआ। बांग्‍लादेश के संकट से भारत की अर्थव्‍यवस्‍था पर भारी बोझ पड़ा था। 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्‍तान की सीमा पार करके भारत आ गए थे। इसके बाद पाकिस्‍तान से युद्ध भी करना पड़ा। युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। इसी अवधि में अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई।

औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी और बेरोजगारी बहुत बढ़ गई थी 1972-73 के वर्ष में मानसुन असफल रहा। इससे कृषि की पैदावार में भारी गिरावट आई। खाद्यान्‍न का उत्‍पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असंतोष का माहौल था। इस स्थिति में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने बड़े कारगर तरीके से जन-विरोध की अगुवाई की। संसदीय राजनीति में विश्‍वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी इस अ‍वधि में बढ़ी। इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्‍यवस्था को खत्‍म करने के लिए हथियार उठाया तथा राज्‍यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ये समूह मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्‍यादा सक्रिय थे।

गुजरात और बिहार के आंदोलन

गुजरात और बिहार दोनों ही राज्‍यों में कांग्रेस की सरकार थी। यहाँ के छात्र-आंदोलन ने इन दोनों प्रदेशों की राजनीति पर गहरा असर डाला। 1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्‍न, खाद्य तेल तथा अन्‍य आवश्‍यक वस्‍तुओं की बढ़ती हुई कीमत तथा उच्‍च पदों पर जारी भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। ऐसे में गुजरात में राष्‍ट्रपति शासन लगा दिया गया। कांग्रेस (ओ) के प्रमुख नेता मोरारजी देसाई ने कहा कि अगर राज्‍य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनिश्चितकाली भूख-हड़ताल पर बैठ जाऊँगा। मोरारजी देसाई अपने कांग्रेस के दिनों में इंदिरा गाँधी के मुख्य विरोधी रहे थे। विपक्षी दलों द्वारा समर्थित छात्र-आंदोलन के गहरे दबाव में 1975 के जून में विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस इस चुनाव में हार गई।

1974 के मार्च माह में बढ़ती हुई कीमतों, खाद्यान्‍न के अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ बिहार में छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। छात्रों ने अपने अगुवाई के लिए जयप्रकाश नारायण को बुलावा भेजा था। जेपी ने छात्रों का निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा। जयप्रकाश नारायन ने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्‍त करने की माँग की। उन्‍होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्‍पूर्ण क्रांति’ का आव्‍हान किया ताकि उन्‍हीं के शब्‍दों में ‘सच्‍चे लोकतंत्र’ की स्‍थापना की जा सके। बिहार की सरकार के खिलाफ लगातार घेराव, बंद और हड़ताल का सिलसिला चल पड़ा। बहरहाल, सरकार ने इस्‍तीफा देने से इनकार कर दिया।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्‍व में चल रहे आंदोलन के साथ ही साथ रेलवे के कर्मचारियों ने भी एक राष्‍ट्रव्‍यापी हड़ताल का आव्‍हान किया।

नक्‍सलवादी आंदोलन    

1975 में जेपी ने जनता के ‘संसद-मार्च’ का नेतृत्‍व किया। देश की राजधानी में अब तब इतनी बड़ी रैली नहीं हुई थी। जयप्रकाश नारायण को अब भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्‍ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेस दलों का समर्थन मिला। गुजरात और बिहार, दोनों ही राज्‍यों के आंदोलन को कांग्रेस विरोधी आंदोलन माना गया।

न्‍यायपालिका से संघर्ष

इस क्रम में तीन संवैधानिक म‍सले उठे थे: क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? सर्वोच्‍च न्‍यायालय का जवाब था कि संसद ऐसा नहीं कर सकती। दुसरा यह कि क्‍या संसद  संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? इस मसले पर भी सर्वोच्‍च न्यायालय का यही कहना था कि सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सक‍ती कि अधिकारों की कटौती हो जाए। तीसरे, संसद ने यह कहते हुए संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है, लेकिन सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्‍त कर दिया। इससे सरकार और न्‍यायपालिका के बीच संबंधों में तनाव आया।

1973 में केशवादनंद भारती के मुकदमे में सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा फैसला सुनाने के तुरंत बाद भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश का पद खाली हुआ। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के सबसे वरिष्‍ठ न्‍यायाधीश को भारत का मुख्य न्‍यायाधीश बनाने की परिपाटी चली आ रही थी, लेकिन 1973 में सरकार ने तीन वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों की अनदेखी करके न्‍यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्‍य न्‍यायाधीश नियुक्‍त किया।

आपा‍तकाल की घोषणा

12 जून 1975 के दिन इलाहाबाद उच्‍च न्यायालय के न्‍यायाधीश जगमोहन लाल सिंहा ने एक फैसला सुनाया। इस फैसले में उन्‍होंने लोकसभा के लिए इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया। न्‍यामूर्ति ने यह फैसला समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा दायर एक चुनाव याचिका के मामले में सुनाया था। राजनारायण, इंदिरा गाँधी के खिलाफ 1971 में बतौर उम्‍मीदवार चुनाव में खड़े हुए थे। याचिका में इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को चुनौती देते हुए तर्क दिया गया था कि उन्‍होंने चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्‍तेमाल किया था। उच्‍च न्‍यायालय के इस फैसले का मतलब यह था कि कानूनन अब इंदिरा गाँधी सांसद नहीं रहीं और अगर अगले छह महीने की अवधि में दोबारा सांसद निर्वाचित नहीं होतीं, तो प्रधानमंत्री के पद पर कायम नहीं रह स‍कतीं। 24 जुन 1975 को सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने उच्‍च न्‍यायालय के इस फैसले पर आंशिक स्‍थगनादेश सुनाते हुए कहा कि जब तक इस फैसले को लेकर की गई अपील की सुनवाई नहीं होती तब तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी; लेकिन वे लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती हैं।

संकट और सरकार का फैसला

एक बड़े राजनीतिक संघर्ष के लिए अब मैदान तैयार हो चुका था। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों ने इंदिरा गाँधी के इस्तीफा के लिए दबाव डाला। इन दलों ने 25 जून 1975 को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शण किया। जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आव्‍हान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें।

सरकार ने इन घटनाओं के मदेनजर जवाब में ‘आपातकाल’ की घोषणा कर दी। 25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्‍छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्‍छेद के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी  की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।

25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्‍ट्रपति फखरूदीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की। राष्‍ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी। आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई।

परिणाम  

सरकाल के इस फैसले से विरोध-आंदोलन एकबारगी रूक गया; हड़तालों पर रोक लगा दी गई। अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना जरूरी है। इसे प्रेस सेंसरशिप के नाम से जाना जाता है। सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मदेनजर सरकार ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात-ए-इस्‍लामी पर प्रतिबंध लगा दिया। धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी।

सरकार ने निवारक नजरबंदी का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल किया। इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इ‍सलिए नहीं किया जाता कि उन्‍होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका सके गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं। जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारी किया गया। वे बंदी प्रत्‍यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे स‍कते थे।

‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ और ‘स्‍टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने प्रेस पर लगी सेंसरशिप का विरोध किया। इंदिरा गाँधी के मामले में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के फैसले की पृष्‍ठभूमि में संविधान में संशोधन हुआ। इस संशोधन के द्वारा प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति और उपराष्‍ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौ‍ती नहीं दी जा सकती। आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ। देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल करना।

आपातकाल के संदर्भ में विवाद  

आपा‍तकाल भारतीय राजनीति का सर्वाधिक विवादास्‍पद प्रकरण है। शाह आयोग ने अपनी जाँच में पाया कि इस अवधि में बहुत सारी ‘अति’ हुई।

क्‍या ‘आपातकाल’ जरूरी थी?

आपा‍तकाल की घोषणा के कारण का उल्‍लेख करते हुए संविधान में बड़े सादे ढंग से ‘अंदरूनी गड़बड़ी’ जैसे शब्‍द का व्‍यवहार किया गया है। 1975 से पहले कभी भी ‘अंदरूनी गड़बड़ी’ को आधार बनाकर आपातकाल की घोषणा नही की गई थी। सरकार का मानना था कि बार-बार का धरना-प्रदर्शन और सामूहिक कार्रवाई लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

सीपीआई (इसने आपातकाल के दौरान कांग्रेस को समर्थन देना जारी रखा था) का विश्‍वास था कि भारत की एकता के विरूद्ध अंतर्राष्‍ट्रीय साजिश की जा रही है। आपातकाल के बाद सीपीआई ने महसूस किया कि उसका मूल्‍यांकन गलत था और आपातकाल का समर्थन करना एक गलती थी।

दूसरी तरफ, आपातकाल के आलोचकों का तर्क था कि आजादी के आंदोलन से लेकर लगातार भारत में जन आंदोलन का एक सिलसिला रहा है। जेपी सहित विपक्ष के अन्‍य नेताओं का खयाल था कि लोकतंत्र में लोगों को सार्वजनिक तौर पर सरकार के विरोध का अधिकार होना चाहिए। बिहार और गुजरात में चले विरोध-आंदोलन ज्‍यादातर समय अहिंसक और शांतिपूर्ण रहे। देश के अंदरूनी मामलों की देख-रेख का जिम्‍मा गृह मंत्रालय का होता है। गृह मंत्रालय ने भी कानून व्‍यवस्‍था की बाबत कोई चिंता नहीं जतायी थी। आंदोलन अपनी हद से बाहर जा रहे थे, तो सरकार के पास अपनी रोजमर्रा की अमल में आने वाली इतनी शक्तियाँ थीं कि वह ऐसे आंदोलनों को हद में ला सकती थी। लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ठप्‍प करके ‘आपातकाल’ लागू करने जैसे अतिचारी कदम उठाने की जरूरत कतई न थी।

आपातकाल के दौरान क्‍या-क्‍या हुआ?

सरकार ने कहा कि वह आपातकाल के जरिए कानून व्‍यवस्‍था को बहाल करना चाहती थी, कार्यकुशलता बढ़ाना चाहती थी और गरीबों के हित के कार्यक्रम लागू करना चाहती थी। इस उदेश्‍य से सरकार ने एक बीस-सूत्रीकार्यक्रम की घोषणा की और इसे लागू करने का अपना दृढ़ संकल्‍प दोहराया। सीब-सूत्री कार्यक्रम में भूमि-सुधार, भू-पुनर्वितरण, खेतिहर मजदूरों के पारिश्रमिक पर पुनर्विचार, प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी, बंधुआ मजदूरी की समाप्ति, आदि मसले शामिल थे। गरीब और ग्रामीण जनता को भी उम्‍मीद थी कि सरकारी कर्मचारीयों पर अनुशासन लागू करने के वायदे कर रही है, उन्‍हें अब कारगर तरीके से लागू किया जाएगा।

आपातकाल के आलोचकों ने ध्‍यान दिलाया है कि सरकार के ज्‍यादातर वायदे पूरे नहीं हुए। आलोचकों ने निवारक नजरबंदी के बड़े पैमाने के इस्‍तमाल पर भी सवाल उठाए। कुल 676 नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी। शाह आयोग का आकलन था कि निवारक जनरबंदी के कानूनों के तहत लगभग एक लाख ग्‍यारह हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रेस पर कई तरह की पाबंदी लगाई गई। इसमें कई पाबंदियाँ गैरकानूनी थीं। आपातकाल के दौरान पुलिस हिरासत में मौत और यातना की घटनाएँ घटीं। गरीब लोगों के मनमाने ढंग से एक जगह से उजाड़कर दूसरी जगह बसाने की भी घटनाएँ हुईं। जनसंख्‍या नियंत्रण के अति उत्‍साह में लोगों को अनिवार्य रूप से नसबंदी के लिए मजबूर किया गया।

आपातकाल के सबक  

आपातकाल से एकबारगी भारतीय लोकतंत्र की ताकत और कमजोरियाँ उजागर हो गईं।

दूसरे, आपा‍काल से संविधान में वर्णित आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव भी प्रकट हुए, जिन्‍हें बाद में सुधार लिया गया। अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ ‘सशस्‍त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्‍ट्रपति को लिखित में दे।

आपा‍तकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्‍यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।

आपातकाल के बाद की राजनीति

जैसे ही आपातकाल खत्‍म हुआ और लोकसभा के चुनावों की घोषणा हुई, वैसे ही आपातकाल का सबसे जरूरी और कीमती सबक राजव्‍यवस्‍था ने सीख लिया। 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओं’ के नारे पर चुनाव लड़ा। जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरूद्ध था।

लोकसभा के चुनाव-1977

18 महीने के आपातकाल के बाद 1977 के जनवरी माह में सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया। इसी के मुताबिक सभी नेताओं‍ और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा कर दिया गया। 1977 के मार्च में चुनाव हुए। ऐसे में विपक्ष को चुनावी तैयारी का बड़ा कम समय मिला, लेकिन राजनीतिक बदलाव की गति बड़ी तेज थी। चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों न एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्‍व स्‍वीकार किया। कांग्रेस के कुछ अन्‍य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्‍व में एक नयी पार्टी बनाई। इस पार्टी का नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था और बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।

हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्‍टभूमि में जनमत कांग्रेस के विरूद्ध था। जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी पार्टी वोट एक ही जगह पड़ेंगी। बात बिलकुल साफ थी कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।

जनता सरकार  

1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद नेताओं के बीच प्रधानमंत्री के पद के लिए होड़ में मोररजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम शामिल थे। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनता पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्‍व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था। जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी। जनता पार्टी बिखर गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार ने 18 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। कांग्रेस पार्टी ने समर्थन पर दूसरी सरकार चरण सिंह के नेतृत्‍व में बनी। लेकिन बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का फैसला किया। इस वजह से चरणस सिंह की सरकार मात्र चार महीने तक सत्ता में रही।

1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी बुरी तरह परास्त हुई। 1977 के चुनाव में उत्तर भारत में इस पार्टी को जबरदस्‍त सफलता मिली थी। इंदिरा गाँधी के नेतृत्‍व में कांग्रेस पार्टी ने 1980 के चुनाव में एक बार फिर 1971 के चुनावों वाली कहानी दुहराते हुए भारी सफलता हासिल की। कांग्रेस पार्टी को 353 सीटें मिलीं और वह सत्ता में आई।

विरासत    

1969 से पहले तक कांग्रेस विविध विचारधारात्‍मक गतिमति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी। अपने बदले हुए स्‍वभाव में कांग्रेस ने स्‍वयं को विशेष विचारधारा से जोड़ा। उसने अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और गरीबों की हिमायती पार्टी मताना शुरू किया। आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्‍यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपा‍तकाल के मूल में था।

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