कक्षा 7 संस्‍कृत पाठ 12 अरण्यम् (कृ, घृ, त्यज्, मुच्, स्था धातु के प्रयोग) का अर्थ | Aranyam class 7 sanskrit

इस पोस्‍ट में हम बिहार बोर्ड कक्षा 7 संस्‍कृत के पाठ 12 ‘अरण्यम् (कृ, घृ, त्यज्, मुच्, स्था धातु के प्रयोग)(Aranyam class 7 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Aranyam class 7 sanskrit

द्वादशः पाठः
अरण्यम्
(कृ, घृ, त्यज्, मुच्, स्था धातु के प्रयोग)

पाठ-परिचय- प्रस्तुत पाठ ‘अरण्यम्’ में पेड़-पौधे के महत्त्व एवं पर्यावरण की स्वच्छता के विषय में बताया गया है। पर्यावरण की शुद्धता पर ही जल, वायु तथा मिट्टी की शुद्धता निर्भर करती है। वृक्ष प्राण वायु छोड़ते हैं तथा दूषित वायु ग्रहण करते है। मानव का जीवन इन्हीं पेड़-पौधों पर निर्भर करता है । इसलिए पेड़ों की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है । यदि ये पेड़-पौधे नहीं रहेंगे तो प्राणियों का भी अन्त हो जाएगा।

वृक्षाणां समूहः अरण्यं वनं वा भवति । अरण्ये प्रकृतिसंभवाः वृक्षाः भवन्ति । तत्र वन्याः प्राणिनः निवसन्ति । व्याघ्राः सिंहाः, भल्लुकाः, वानराः शृगालप्रभृतयः पशवः अरण्ये एव सहजरूपेण निवसन्ति ।

अरण्येषु विविधाः वनस्पतयः भवन्ति । तेभ्यः फलानि मिलन्ति । अरण्येभ्यः विविधाः

ओषधयश्च मिलन्ति । वनेभ्यः प्राप्तेभ्यः विविधेभ्यः काष्ठेभ्यो जनाः उपस्कराणां निर्माणं कुर्वन्ति ।

प्राणिनां प्राणरक्षायै वनम् अत्यावश्यकम् अस्ति । वयम् ऑक्सीजननामकं प्राणवायुं धारयामः कार्बनडाईऑक्साइड – नामकं दूषितं वायुं त्यजामः । वृक्षाः दूषितं वायुं गृह्णन्ति स्वच्छं वायुं च मुञ्चन्ति । इत्थं वृक्षाः परोपकारिणः सन्ति ।

अर्थ- वृक्षों का समूह वन अथवा जंगल कहलाता है। वन में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न पेड़ होते हैं । उसमें जंगली जानवर बाघ, सिंह, भालू, बन्दर, सियार आदि स्वाभाविक रूप से ही रहते हैं ।

वन में अनेक प्रकार के पेड़-पौधे होते हैं। उससे फल मिलते हैं, अनेक प्रकार की औषधीय जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं। वन से प्राप्त लकड़ियों से लोग उपस्कर आदि बनवाते हैं। प्राणियों (जीवों) की प्राणरक्षा के लिए वन (पेड़-पौधों) का होना अति आवश्यक है। हमलोग ऑक्सीजन नामक प्राणवायु साँस लेते हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड नामक दूषित वायु छोड़ते हैं । वृक्ष दूषित वायु ग्रहण करते हैं तथा शुद्ध वायु (ऑक्सीजन) छोड़ते हैं। इस प्रकार पेड़ परोपकारी होते हैं।

अधुना संसारे पर्यावरणप्रदूषणं निरन्तरं वर्धमानमस्ति । वायुप्रदूषणात् जनाः रुग्णाः भवन्ति । जीवनोपयोगिनां वस्तूनां मध्ये वायोः प्रथमं स्थानमस्ति । वायुं विना वयं क्षणमपि न जीवामः ।

वायुप्रदूषणं नाशयितुम् अरण्यम् आवश्यकम् । वृक्षाः संसारे सततं वर्धमानाम् उष्णतां वारयितुं क्षमाः । अरण्यं वर्षार्थं मेघान् आकर्षति । अनेन भूक्षरणं न्यूनं भवति। वन्यजीवा : संरक्षिता: तिष्ठन्ति ।

इदानीं जनाः तात्कालिकलाभाय वृक्षाणां छेदनं कुर्वन्ति । निरन्तरं वृक्षाणां कर्तनेन संसारस्य महती हानिः सञ्जाता । इयमेव स्थितिः स्यात् तर्हि सर्वं जीवनं प्रदूषणेन कठिनं भविष्यति । अतः वृक्षाणां संरक्षणं संवर्धनं च कर्तव्यम् ।

अर्थ — इस समय संसार में पर्यावरण प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। वायु प्रदूषण से लोग रोगी होते हैं । जीवनोपयोगी वस्तुओं में वायु का पहला स्थान है। हवा के बिना हम क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकते हैं। वायु प्रदूषण नष्ट करने के लिए वन का होना आवश्यक है । संसार में बढ़ती हुई गर्मी रोकने में वृक्ष समर्थ होता है। वन वर्षा के लिए बादल को आकृष्ट करता है। इससे मिट्टी का कटना ( बहना) कम होता है । जंगली जीव सुरक्षित रहते हैं ।

इस समय क्षणिक लाभ के लिए वृक्ष को काटते हैं। लगातार वृक्ष को काटने से संसार को बड़ी हानि हो रही है । यदि इसी प्रकार की स्थिति रही तो प्राणियों का जीना कठिन हो जाएगा । इसलिए वन की सुरक्षा तथा पेड़ लगाना हमारा कर्तव्य है ।

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