मोपला विद्रोह | Mopla Vidroh 1921

मोपला विद्रोह

आधुनिक केरल राज्य के मालाबार तट पर किसानों का एक बड़ा विद्रोह हुआ, जिसे मोपला विद्रोह कहा जाता है।

मोपला स्थानिय पट्टेदार और खेतिहर थे, जो इस्लाम धर्म के अनुयायी थे, जबकि स्थानीय ‘नम्बूदरी‘ एवं ‘नायर‘ भू-स्वामी उच्च जातीय हिन्दू थे।

अन्य भू-स्वामीयों की तरह उन्हें भी सरकारी संरक्षण प्राप्त था और पुलिस एवं न्यायालय इनका समर्थन करती थी।

1921 में एक नयी स्थिति उत्पन्न हुई जब कांग्रेस ने किसानों के हित में भूमि एवं राजस्व सुधारों की मांग की और खिलाफत आंदोलन को समर्थन दे दिया।

इस नई स्थिति से उत्साहित हो कर मोपला विद्रोहियों ने एक धार्मिक नेता अली मुसालियार को अपना राजा घोषित कर दिया और सरकारी संस्थाओं पर हमले आरंभ कर दिए।

परिस्थिति की गंभिरता को देखते हुए अक्टूबर 1921 में विद्रोहियों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई आरम्भ हूयी।

दिसम्बर तक दस हजार से अधिक विद्रोही मारे गए और पचास हजार से अधिक बन्दी बना लिए गए।

इस प्रकार यह विद्रोह धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

खेड़ा आन्दोलन | Kheda Movement in Hindi

खेड़ा आन्दोलन

गुजरात के खेड़ा जिला में किसानों ने लगान माफी के लिए आंदोलन चलाया।

महात्मा गाँधी ने लगान माफी के लिए किसानों की माँग का समर्थन किया क्योंकि 1917 में अधिक बारिस के कारण खरिफ की फसल को व्यापक क्षति पहुँची थी।

लगान कानुन के अन्तर्गत ऐसी स्थिति में लगान माफी का प्रावधान नहीं था।

22 जून, 1918 को यहाँ गाँधीजी ने सत्याग्रह का आह्वान किया, जो एक महीने तक जारी रहा।

इसी बीच रबी की फसल होने तथा सरकार द्वारा भी दमनकारी उपाय समाप्त करने से स्थिति काफी बदली और गाँधीजी ने सत्याग्रह समाप्त करने की घोषणा कर दी।

इस सत्याग्रह के द्वारा गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र में भी किसानों में अंग्रेजों की शोषण मूलक कानूनों का विरोध करने का साहस जगा।

चम्पारण आन्दोलन पर टिप्‍पणी | Champaran Movement

चम्पारण आन्दोलन

बिहार के नील उत्पादक किसानों की स्थिति बहुत दयनीय थी।

यहाँ नीलहे गोरों द्वारा तीनकठिया व्यवस्था प्रचलित थी, जिसमें किसानों के अपने भूमि के 3/20 हिस्से पर खेती करनी पड़ती थी। यह समान्यतः उपजाऊ भूमि होती थी।

किसान नील की खेती करना नहीं चाहते थे क्योंकि इससे भूमि की उर्वरता कम हो जाती थी।

1908 में तीनकठिया व्यवस्था में सुधार लाने की कोशिश की थी, परन्तु इससे किसानों की गिरती हुई हालत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

नीलहों के इस अत्याचार से किसान त्रस्त थे।

इसी समय 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में चम्पारण के ही एक किसान राजकुमार शुक्ल ने सबका ध्यान समस्या की ओर आकृष्ट कराया तथा महात्मा गांधी को चम्पारण आने का अनुरोध किया।

किसानों की माँग को लेकर 1917 में महात्मा गाँधी ने चंपारण आंदोलन की शुरुआत की।

गांधीजी के दबाव पर सरकार ने ‘चम्पारण एग्रेरीयन कमेटी‘ का गठन किया। गांधीजी भी इस कमेटी के सदस्य थे।

इस कमेटी के सिफारिश पर ब्रिटीश सरकार ने किसानों पर से तीनकठिया व्यवस्था और अन्य कर भी समाप्त कर दिया।

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण | Nationalism in India

राजनीतिक कारण

भारत में राष्ट्रवाद : 19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रीय चेतना का उदय मुख्य रूप से अंग्रजी शासन व्यवस्था का परिणाम था।

  • भारत में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में विभिन्न कारणों का योगदान रहा परन्तु सभी किसी-न-किसी रूप में ब्रिटेन सरकार की प्रशासनिक नीतियों से संबंधित थी।
  • 1878 ई॰ में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन ने ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट‘ पारित कर प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया।
  • 1879 में ‘आर्म्स एक्ट‘ के द्वारा भारतीयों के लिए अस्त्र-शस्त्र को रखना गैर कानूनी घोषित कर दिया गया।
  • 1883 में ‘इलबर्ट बिल‘ का पारित होना। इस बिल का उद्देश्य भारतीय और यूरोपीय व्यक्तियों के फौजदारी मुकदमों की सुनवाई सामान्य न्यायालय में करना था और उस विशेषाधिकार को समाप्त करना था, जो यूरोप के निवासियों को अभी तक प्राप्त था और जिसके अर्न्तगत उनके मुकदमें सिर्फ यूरोपीय जज ही सुन सकते थे। यूरोपीय जनता ने इसका विरोध किया जिसके कारण सरकार को इस बिल को वापस लेना पड़ा।
  • 1899 में लार्ड कर्जन ने ‘कलकŸा कॉपरेशन‘ एक्ट पारित किया जिसमें नगर पालिका में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में कमी और गैर निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गई।
  • 1904 में विश्वविद्यालय अधिनियम द्वारा विश्वविद्यालय पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया जाना।
  • 1905 में बंगाल विभाजन कर्जन के द्वारा सम्प्रदायिकता के आधार पर कर देना।
  • 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट पारित कर उŸोजित लेख छापने वाले को दंडित करना।

आर्थिक कारण

  • नकदी फसलों की उगाही अपनी मनमानी किमतों पर करना।
  • उद्योग क्षेत्रों में मजदूरों, कामगारों को मुसीबतों का सामना करना
  • 1882 में सूती वस्त्रों पर से आयात शुल्क हटा लेना।
  • भारत में औद्योगीकरण की समस्या।
  • अधिक भू-राजस्व (लगान) वसुलना।
  • सामाजिक कारण
  • अंग्रेजों के द्वारा भारतीयों को हेय दृष्टि से देखना।
  • रेलगाड़ी में, क्लबों में, सड़कों पर और होटलों में अंग्रेज भारतीय के साथ दुर्व्यवहार करना।
  • इंडियन सिविल सर्विस में भारतीयों के साथ भेद-भाव करना।

धार्मिक कारण

  • धर्मसुधार आंदोलन
  • धर्म के प्रति लोगों में निष्ठा की भाव को जागृत करना।
  • बहुत सारे धर्म सुधारकों ने एकता, समानता एवं स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाना।

बोल्शेविक क्रांति सम्‍पूर्ण जानकारी | खूनी रविवार | Bolshevik Revolution

खूनी रविवार

1905 में रूस-जापान युद्ध में रूस के पराजय के कारण 9 जनवरी 1905 को लोगों का समूह ‘रोटी दो‘ के नारे के साथ सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए सेंट पीटर्सवर्ग स्थित महल की ओर जा रहा था। परन्तु जार की सेना ने इस निहत्थे लोगों पर गोलियाँ बरसाई जिसमें हजारों लोग मारे गये इसलिए 22 जनवरी को खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है।

बोल्शेविक क्रांति

  • इसी समय लेनिन का उदय हुआ। जार की सरकार ने लेनिन को निर्वासित कर दिया था।
  • जब रूस में मार्च 1917 की क्रांति हुई, तो वह जर्मनी की सहायता से रूस पहुँचा, तब रूस की जनता का उत्साह बढ़ गया।
  • लेनिन ने घोषित किया कि रूसी क्रांति पूरी नहीं हुई है। अतः एक दूसरी क्रांति अनिवार्य है।
  • लेनिन ने तीन नारे दिये- भूमि, शांति और रोटी।
  • लेनिन ने बल प्रयोग द्वारा केरेन्सकी सरकार को उलट देने का निश्चय किया। सेना और जनता दोनों ने उसका साथ दिया।
  • 7 नवम्बर 1917 को बोल्शेविकों ने पेट्रोग्राद के रेलवे स्टेशन, बैंक, डाकघर, टेलिफोन-केंन्द्र, कचहरी तथा अन्य सरकारी भवनों पर अधिकार कर लिया।
  • केरेन्सकी रूस छोड़कर भाग गया।
  • इस प्रकार रूस की महान बोल्शेविक क्रांति ( इसे अक्टुबर क्रांति भी कहते हैं।) सम्पन्न हुई।

कार्ल मार्क्स की जीवनी | The Life of Karl Marx

कार्ल मार्क्स (1818-1883)

  • कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई, 1818 ई० को जर्मनी के राइन प्रांत के ट्रियर नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था।
  • कार्ल मार्क्स के पिता हेनरिक मार्क्स एक प्रसिद्ध वकील थे, जिन्होंने बाद में चलकर ईंसाई धर्म ग्रहण कर लिया था।
  • मार्क्स ने बोन विश्व विद्यालय में विधि की शिक्षा ग्रहण की परन्तु 1836 में वे बर्लिन विश्वविद्यालय चले आये, जहाँ उनके जीवन को एक नया मोड़ मिला।
  • 1843 में उन्होंने बचपन के मित्र जेनी से विवाह किया।
  • कार्ल मार्क्स की मुलाकात पेरिस में 1844 ई० में फ्रेडरिक एंगेल्स से हुई जिससे जीवन भर उसकी गहरी मित्रता बनी रही।
  • मार्क्स ने 1867 ई० में ‘दास-कैपिटल‘ नामक पुस्तक की रचना की जिसे ‘समाजवादियों की बाइबिल‘ कहा जाता है।

मार्क्स के सिद्धांत

  • द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत
  • वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत
  • इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या
  • मूल्य एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
  • राज्यहीन और वर्गहीन समाज की स्थापना

कार्ल मार्क्स के अनुसार छः ऐतिहासिक चरण हैं।

  • आदिम साम्यवादी युग
  • दासता का युग
  • सामन्ती युग
  • पूँजीवादी युग
  • समाजवादी युग
  • साम्यवादी युग

यूटोपियन समाजवादी से क्‍या समझते हैं

यूटोपियन समाजवादी

कार्ल मार्क्स से पहले के समाजवाद को यूटोपियन समाजवाद कहते हैं तथा कार्ल मार्क्‍स के बाद के समाजवाद को वैज्ञानिक समाजवाद कहते हैं। प्रथम यूटोपियन समाजवादी सेंट साइमन थे। वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कार्ल मार्क्‍स हैं।

प्रथम यूटोपियन समाजवादी, जिसने समाजवादी विचारधारा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, एक फ्रांसीसी विचारक सेंट साइमन था।

उसका मानना था कि राज्य एवं समाज को इस ढंग से संगठित करन चाहिए कि लोग एक दूसरे का शोषण करने के बदले मिलजुल कर प्रकृति का दोहन करें।

प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार वेतन मिलना चाहिए।

फ्रांस से बाहर सबसे महत्वपूर्ण यूटोपियन चिंतक ब्रिटिश उद्योगपति रार्बट ओवन था।

समाजवाद एवं साम्यवाद में अंतर स्‍पष्‍ट करें।

समाजवाद एवं साम्यवाद में अंतर स्‍पष्‍ट करें।

समाजवाद-

  • समाज को महत्व दिया जाता है।
  • समाज में असमानता को कम करके समानता स्थापित करने की बात करता है।
  • असमानता को दूर करने के लिए राज्य को उपयोगी माना जाता है।
  • ऐसा माना जाता है कि राज्य ही समाज में समानता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • समाजवाद में प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता के अनुसार कार्य दिया जाने तथा कार्य के अनुसार वेतन की बात किया जाता है।
  • ज्यादा काम करने पर ज्यादा वेतन और कम काम करने पर कम वेतन देने पर जोर देता है।

साम्यवाद-

  • साम्यवादी राज्य को समाप्त करना चाहते हैं।
  • क्योंकि राज्य द्वारा शोषण करने वालो को बल मिलता है।
  • साम्यवादी कहते हैं कि इन दो वर्गों में संघर्ष जरूर होगा और जिस दिन संघर्ष-क्रांति करा जायेगा तब ही शोषित वर्ग जीत सकेगा।
  • शोषित वर्ग इसलिए जीतेगा क्योंकि शोषित वर्ग बहुत अधिक संख्या में होते हैं।
  • शोषण करने वाले लोग कम होते हैं।
  • जब शोषित जीत जायेंगे तब समानता आऐगी।
  • आर्थिक स्थिति में समानता हो।
  • आवश्यकता के अनुसार वेतन पर जोर देता है।

हंगरी पोलैंड और बोहमिया में राष्ट्रीयता का उदय पर टिप्‍पणी

हंगरी में राष्ट्रीयता का उदय

आंदोलन का नेतृत्व ’कोसुथ’ तथा ’फ्रांसिस डिक’ नामक क्रांतिकारी के द्वारा किया जा रहा था। फ्रांस में लुई फिलिप का हंगरी के राष्ट्रवादी आन्दोलन पर विशेष प्रभाव पड़ा । कोसूथ ने ऑस्ट्रियाई आधिपत्य का विरोध करना शुरू किया तथा व्यवस्था में बदलाव की मांग करने लगा। इसका प्रभाव हंगरी तथा आस्ट्रिया दोनों देशों की जनता पर पडा। जिसके कारण यहाँ राष्ट्रीयता के पक्ष में आन्दोलन शुरू हो गए। 31 मार्च 1848 ई० को आस्ट्रिया की सरकार ने हंगरी की कई बातें मान ली, जसके अनुसार स्वतंत्र मंत्रिपरिषद की मांग स्वीकार की गई । इन आन्दोलनों ने हंगरी को राष्ट्रीय अस्मिता प्रदान की। इस प्रकार हंगरी में हो रहे राष्‍ट्रवादी आंदोलन सफल हुआ।

पोलैंड में राष्‍ट्रवाद का उदय

पोलैंड में भी राष्ट्रवादी भावना के कारण, रूसी शासन के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गए। 1830 ई. की क्रांति का प्रभाव यहाँ के उदारवादियों पर भी व्यापक रूप से पड़ा था परन्तु इन्हें इंग्लैंड तथा फ्रांस की सहायता नहीं मिल सकी। अतः इस समय रूस ने पोलैंड के विद्रोह को कुचल दिया।

बोहेमिया में राष्‍ट्रवाद का उदय

बोहेमिया जो ऑस्ट्रियाई शासन के अंतर्गत था, में भी हंगरी के घटनाक्रम का प्रभाव पड़ा। बोहेमिया की बहुसंख्यक चेक जाति की स्वायत्त शासन की मांग को स्वीकार किया गया परन्तु आन्दोलन ने हिंसात्मक रूप धारण कर लिया। जिसके कारण ऑस्ट्रिया द्वारा क्रांतिकारियों का सख्ती से दमन कर दिया गया। बोहेमिया में होने वाले क्रांतिकारी आन्दोलन की उपलब्धियाँ स्थायी न रह सकीं। इस प्रकार यहाँ का आंदोलन असफल हो गया।

यूनान में राष्ट्रीयता का उदय Notes

यूनान में राष्ट्रीयता का उदय

यूनान का अपना गौरवमय अतीत रहा है। जिसके कारण उसे पाश्चात्य का मुख्य स्रोत माना जाता था। यूनानी सभ्यता की साहित्यिक प्रगति, विचार, दर्शन, कला, चिकित्सा विज्ञान आदि क्षेत्र की उपलब्धियाँ यूनानियों के लिए प्रेरणास्रोत थे। यूनान तुर्की साम्राज्य के अधीन था।

फ्रांसीसी क्रांति से यूनानियों में राष्ट्रीयता की भावना की लहर जागी, क्योंकि धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर इनकी पहचान एक थी।

हितेरिया फिलाइक नामक संस्था की स्थापना ओडेसा नामक स्थान पर की। इसका उद्देश्य तुर्की शासन को युनान से निष्काषित कर उसे स्वतंत्र बनाना था।

इंग्लैंड का महान कवि वायरन यूनानियों की स्वतंत्रता के लिए यूनान में ही शहीद हो गया। इससे यूनान की स्वतंत्रता के लिए सम्पूर्ण यूरोप में सहानुभूति की लहर दौड़ने लगा।

रूस भी यूनान की स्वतंत्रता का पक्षधर था।

1821 ई० में अलेक्जेंडर चिपसिलांटी के नेतृत्व में यूनान में विद्रोह शुरू हो गया।

1827 में लंदन में एक सम्मेलन हुआ जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस तथा रूस ने मिलकर तुर्की के खिलाफ तथा यूनान के समर्थन में संयुक्त कार्यवाही करने का निर्णय लिया।

इस प्रकार तीनों देशों की संयुक्त सेना नावारिनो की खाड़ी में तुर्की के खिलाफ एकत्र हुई। तुर्की के समर्थन में सिर्फ मिस्र की सेना ही आयी। युद्ध में मिश्र और तुर्की की सेना बुरी तरह पराजित हुई

1829 ई० में एड्रियानोपल की संधि हुई, जिसके तहत तुर्की की नाममात्र की प्रभुता में यूनान को स्वायत्ता देने की बात तय हुई।

परन्तु यूनानी राष्ट्रवादियों ने संधि की बातों को मानने से इंकार कर दिया।

1832 में यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। बवेरिया के शासक ‘ओटो’ को स्वतंत्र यूनान का राजा घोषित किया गया। इस तरह यूनान पर से रूस का प्रभाव भी जाता रहा।