5. Yatriyon ke najariya se | यात्रियों के नजरिए से

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ पाँच यात्रियों के नजरिए से ( Yatriyon ke najariya se) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

 

5. यात्रियों के नजरिए से

लोग यात्राएं क्यों करते थे ?
यात्रा करने के निम्‍न कारण थे—
कार्य की तलाश में
प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए
व्यापार  के लिए
सैनिक पुरोहित और तीर्थ यात्रियों के रूप में
साहस की भावना से प्रेरित होकर
भारत में आने वाले यात्री
अल बिरूनी (11वीं शताब्दी में आया, उज़बेकिस्‍तान से )
मार्कोपोलो (13वीं शताब्‍दी में आया, इटली से)
इब्न बतूता ( 14वीं शताब्दी में आया, मोरक्‍को से )
अब्‍दुल रज्‍जाक (15वीं शताब्‍दी में आया, समरकंद से)
फ्रांस्वा बर्नियर ( 17वीं शताब्दी में आया )

Class 12th History Chapter 5 Yatriyon ke najariya se Notes

अल – बिरूनी
जन्म स्थान : उज्बेकिस्तान में ख्वारिज्म नाम की जगह हुआ।
जन्म : 973 में जिस जगह अल बिरूनी का जन्म हुआ था।
वह जगह शिक्षा के लिए बहुत प्रसिद्ध थी ।
अल बिरूनी ने अपने समय की सबसे बेहतर शिक्षा प्राप्त की थी।
भाषाएँ : सीरियाई , फारसी, हिब्रू , संस्कृत।
अल बिरूनी को यूनानी भाषा नहीं आती थी।
लेकिन फिर भी वो प्लेटो के विचारों को पढता था।

अल बिरूनी भारत कैसे आया
सन् 1017 ई० में ख्वारिज्म पर आक्रमण हुआ।
यह आक्रमण सुलतान महमूद (महमूद गजनवी) ने किया था।
सुलतान महमूद ख्वारिज्म पर आक्रमण करके यहाँ के सभी कवियों और विद्वानों को अपने साथ अपनी राजधानी गजनी ले गया।
जिन विद्वानों को महमूद अपने साथ ले गया था उनमे से अल बिरूनी भी एक था।
जब पंजाब का हिस्सा भी महमूद के नियंत्रण में आ गया तब, अल बिरूनी की भारत आने की रुचि बढ़ी।
अल बिरूनी ने ब्राह्मण, पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया

किताब- उल- हिन्द
यह किताब अल बिरूनी ने लिखी थी। यह किताब अरबी भाषा में लिखी गयी थी।
इस किताब की भाषा बहुत सरल थी।
इस विस्तृत ग्रन्थ में : धर्म, दर्शन, त्यौहार, खगोल विज्ञान, रीति रिवाज, प्रथाओं, भार- तौल, मूर्तिकला, कानून के बारे में लिखा गया था।
यह किताब 80 अध्यायों में विभाजित थी।
यह किताब एक विशेष तरीके से लिखी गयी थी।
इसमें शुरू में एक प्रश्न पूछा जाता था
फिर उसका वर्णन लिखा गया था
अंत में उसकी अन्य संस्कृतियों से तुलना की जाती थी |

अल बिरूनी का जाति व्यवस्था विवरण
अल बिरूनी ने यह बताने की कोशिश की थी, कि जाति व्यवस्था केवल भारत में ही नहीं  बल्कि फारस में भी है और अन्य देशों में भी है।
अल बिरूनी ने बताया की प्राचीन फारस में चार वर्ग हुआ करते थे :
पहला    – घुड़सवार तथा शासक वर्ग
दूसरा – भिक्षु तथा पुरोहित वर्ग
तीसरा -वैज्ञानिक, चिकित्सक तथा खगोलशास्त्री वर्ग
चौथा – किसान और अन्य शिल्पकार वर्ग
अलबरूनी ने जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को माना लेकिन उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया
अलबरूनी ने लिखा कि “ हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है “
सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है।
अलबरूनी ने जोर देकर कहा कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।
उसके अनुसार जाति व्यवस्था में अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के खिलाफ थी।

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इब्न बतूता (एक जिद्दी यात्री)
इब्न बतूता एक हठीला और जिद्दी यात्री था।
इब्न बतूता ने जो किताब लिखी थी उसे रिहला (किताब-उल-रिहला) कहा जाता है।
यह यात्रा वृतांत अरबी में लिखा गया था।
इब्न बतूता के वृतांतों से हमें बहुत ही रोचक जानकारियाँ मिलती हैं।
जन्म : मोरक्को के तैन्जियर में इब्न बतूता का जन्म एक सम्मानित और शिक्षित परिवार में हुआ था।
इब्न बतूता का परिवार इस्लामी कानूनों का जानकार था।
इब्न बतूता ने बहुत कम उम्र में ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली थी।
इब्न बतूता को यात्राओं का बहुत शौक था।
इब्न बतूता मानता था की किताबी ज्ञान से ज्यादा ज्ञान हमें यात्राओं से मिलता है।

इब्न बतूता भारत कैसे आया ?
भारत आने से पहले इब्न बतूता मक्का, सीरिया, इराक, फारस, ओमान की यात्रा करके आया था।
मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्न बतूता सन 1333 में स्थलमार्ग से सिंध पहुंचा।
उसने दिल्ली के सुलतान मो. बिन तुगलक के बारे में सुना था।
इब्न बतूता सुलतान से एक बार मिलना चाहता था।
इब्न बतूता ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।
इब्न बतूता का हुनर देख कर सुल्तान तुगलक ने उसे दिल्ली का न्यायधीश नियुक्त किया।
इब्न बतूता न्यायधीश के पद पर कई सालों तक रहा।
इब्न बतूता ने सुलतान का विश्वास खो दिया और फिर उसे जेल में डाल दिया गया।
कुछ समय बाद सुलतान और उसके बीच की ग़लतफहमी दूर हो गयी और उसे राजकीय सेवा करने का मौका मिला और दूत के रूप में चीन भी गया।
इब्न बतूता को बहुत बार उसकी यात्राओं के दौरान लूटा गया था।
परन्तु फिर भी वह यात्रा करता रहा इ‍सलिए उसे एक जिद्दी यात्री कहा जाता है।

इब्न बतूता द्वारा शहरो का वर्णन
इब्न बतूता जब भारत आया तो वो भारत के बाजारों में घूमा।
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों को अवसरों से भरा पाया।
इब्न बतूता ने बताया की अगर किसी के पास कौशल है और इच्छा है तो इस शहर में अवसरों की कमी नही है।
शहर घनी आबादी वाले और भीड़ – भाड़ वाले थे।
सड़कें बहुत ही चमक-धमक वाली थी।
बाजार बहुत ही रंग-बिरंगे एवं सुंदर थे।
यहाँ के बाजार अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं से भरे रहते थे।
इब्न बतूता ने दिल्ली को एक बड़ा शहर बताया और बताया की यह भारत में सबसे बड़ा है।
इब्न बतूता बताता है की दौलताबाद भी दिल्ली से कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
बहुत सारे बाजारों में मंदिर और मस्जिद दोनों होते थे।
इब्न बतूता ने बताया की भारत में मलमल का कपडा महंगा था और केवल धनी आदमी ही उन्हें पहन सकते थे।

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इब्न बतूता द्वारा संचार प्रणाली का वर्णन
डाक व्‍यवस्‍था से गुप्‍तचरों की खबरें मात्र पाँच दिनों में राजा के पास पहुँच जाती थी।

अश्व डाक व्यवस्था
अश्‍व डाक व्‍यवस्‍था को उलुक भी कहा जाता था। इस व्यवस्था में हर 4 मील पर राजकीय घोड़े खड़े रहते थे। और घोड़े सन्देश लेकर जाते थे।

पैदल डाक व्यवस्था
इस व्यवस्था में प्रत्येक मील पर तीन अवस्थान (रहने-ठहरने का स्‍थान) होते थे जिन्हें दावा कहा जाता है।
इसमें संदेशवाहक के हाथ में छड़ लिए दौड़ लगाता है और उसकी  छड़  में घंटियां बंधी होती थी।
हर मील पर एक संदेशवाहक  छड़  लेने के लिए तैयार रहता था।
व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य ने विशेष उपाय किए थे।
लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्रामगृह स्थापित किए थे।
यहां व्यापारियों को विभिन्न सुविधाएं मिल जाती थी।

इब्न बतूता द्वारा दासों का वर्णन
इब्न बतूता बताता है दास बाजारों में सामान्य वस्तुओं की तरह खरीदे और बेचे जाते थे।
दासों को भेंट (Gift)  में भी दिया जाता था।
जब इब्न बतूता सिंध पंहुचा तो उसने सुलतान मो. बिन तुगलक के लिए  घोड़े और दास खरीदे और उन्हें भेंट किये।
दासों को सामान्य घर का काम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
दास पालकियां भी उठाया करते थे।
इब्न बतूता बताता है की दासियों को अमीरों पर नजरे रखने के लिए नियुक्त किया जाता था।
दासियाँ संगीत और गाने का भी काम करती थी।
लगभग 1500 ईसवी में भारत में पुर्तगालियों के आगमन के बाद उनमें से कई लोगों ने भारतीय सामाजिक रीति रिवाज और धार्मिक प्रथाओं के विषय में विस्तृत वृतांत लिखे थे।
कुछ ऐसे विदेशी लेखक थे जिन्होंने भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषा में अनुवाद किया

जेसुईट रॉबर्टो नोबिली
दुआर्ते बरबोसा ने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा
1600 ई. के बाद भारत में डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी यात्री आने लगे थे।
इनमें से एक प्रसिद्ध नाम फ्रांसीसी जौहरी ज्यों बैप्टीटस तैवर्नियर का था।
इसने कम से कम 6 बार भारत की यात्रा की और यह भारत की व्यापारी की स्थितियों से बहुत प्रभावित हुए
उन्होंने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की।

फ्रांस्वा बर्नियर
फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था
वह एक चिकित्सक, राजनीतिक ,दार्शनिक तथा इतिहासकार था।
वह मुगल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था।
वह 1656 से 1668 तक भारत में 12 वर्ष तक रहा।
फ्रांस्वा बर्नियर मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा।
सम्राट शाहजहां के जेष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में और बाद में मुगल दरबार के 1 आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद खान के साथ
एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में
पूर्व और पश्चिम की तुलना फ्रांस्वा बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की और विवरण लिखें।
वह भारत में जो भी देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था।
बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में  दयनीय बताया।
बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670 – 71 में प्रकाशित हुए थे।
अगले 5 वर्षों के भीतर ही अंग्रेजी, डच, जर्मन और इतावली भाषाओं में इनका अनुवाद हो गया।
1670 और 1725 के बीच उसका वृतांत फ्रांसीसी में 8 बार पुनर्मुद्रित हो चुका था।
1684 तक यह तीन बार अंग्रेजी में पुनर्मुद्रित हुआ था।
बर्नियर का ग्रंथ Travels In The Mughal Empire  था।
बर्नियर ने अपने वृत्तांत में की गई चर्चाओं में मुगलों के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढांचे में स्थापित करने का प्रयास किया
उसने मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से की और यूरोप को श्रेष्ठ बताया।
उसने भारत में जो भिन्नताएं महसूस कि उन्हें पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया
जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो।

फ्रांस्वा बर्नियर का भूमि स्वमित पर प्रश्न
बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच
मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था।
बर्नियर भूमि पर निजी स्वामित्व को बेहतर मानता था।
उसने भूमि पर राज्य के स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों दोनों के लिए हानिकारक माना।
उसे यह लगा कि मुगल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था।
जो इसे अपने अमीरों के बीच में बांटता था और इसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए बुरे परिणाम होते थे।
बर्नियर का मानना था की राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे।
इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोतरी के लिए अधिक निवेश के प्रति उदासीन थे।
इस प्रकार निजी भूस्वामित्व के अभाव  ने बेहतर भूधारकों के वर्ग के उदय को रोका
जो भूमि के रखरखाव और बेहतरी के प्रति सजग सचेत हों।
इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का उत्पीड़न और समाज के सभी वर्गों के जीवन पतन की स्थिति उत्पन्न हुई।
सिवाय शासक वर्ग के बर्नियर ने भारतीय समाज को दरिद्र लोगों का जनसमूह बताया।
यह जनसमूह एक ऐसे समूह का अधीन थे जो अल्पसंख्यक था।
बर्नियर ने बताया की भारत में 2 समूह थे

Class 12th History Chapter 5 Yatriyon ke najariya se Notes
एक बहुत अमीर
एक बहुत गरीब
भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं थे
बर्नियर ने मुगल साम्राज्य को इस रूप में देखा–
इसका राजा भिखारियों और क्रूर लोगों का राजा था।
इसके शहर और नगर विनष्ट तथा खराब हवा से दूषित थे।
इसके खेत झाड़ीदार तथा घातक दलदल से भरे हुए थे।
इसका मात्र एक ही कारण था-  राजकीय भू- स्वामित्व
आश्चर्य की बात यह है कि एक भी सरकारी मुगल दस्तावेज में यह बात नहीं मिलती
कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।
बर्नियर मुगल कालीन शहरों को शिविर नगर कहता है।
उसका आशय उन नगरों से जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे।
उसका विश्वास था कि यह राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और इसके कहीं और चले जाने के बाद तेजी से पतन हो जाता था
बर्नियर कहता है कि सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे
      1- उत्पादन केंद्र
      2- व्यापारिक नगर
      3- बंदरगाह नगर
      4- धार्मिक केंद्र
      5- तीर्थ स्थान
व्यापारी अक्सर मजबूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यवसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे
पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ कहा जाता था।
अन्य शहरी समूहों में व्यवसायिक वर्ग था
जैसे कि – चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता, चित्रकार, संगीतकार, सुलेखक आदि

बर्नियर का सती प्रथा पर मार्मिक विवरण
लाहौर में मैंने एक बहुत ही सुंदर अल्पवयस्क विधवा जिसकी आयु मेरे विचार में 12 वर्ष से अधिक नहीं थी कि बलि होते हुए देखा
उस भयानक नर्क की ओर जाते हुए वह असहाय छोटी बच्ची जीवित से अधिक मृत्यु प्रतीत हो रही थी।
उसके मस्तिष्क की व्यथा का वर्णन नहीं किया जा सकता।
वह कांपते हुए बुरी तरह से रो रही थी
लेकिन तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत जिसने उसे अपनी आस्तीन के नीचे दबाया हुआ था।
की सहायता से उसे अनिच्छुक पीड़िता को जबरन घातक स्थल की ओर ले गए,
उसे लकड़ियों पर बैठाया, उसके हाथ और पैर बांध दिए, ताकि वह भाग ना जाए
और इस स्थिति में उस मासूम प्राणी को जिंदा जला दिया गया।
मैं अपनी भावनाओं को दबाने में और उनके कोलाहलपूर्ण तथा व्यर्थ के क्रोध को बाहर आने से रोकने में असमर्थ था। Class 12th History Chapter 5 Yatriyon ke najariya se Notes

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4. Vicharak vishwas aur imarte | विचारक, विश्वास और इमारतें

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ चार विचारक, विश्वास और इमारतें (Vicharak vishwas aur imarte) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

vicharak vishwas aur imarte

4. विचारक, विश्वास और इमारतें

सांची की एक झलक
सांची का स्तूप बौद्ध धर्म से संबंधित एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
19वीं सदी में यूरोपियों ने सांची के स्तूप में अपनी दिलचस्पी दिखाई।
फ्रांसीसी भी सांची के स्तूप को देखकर मोहित हो गए थे।
अंग्रेज तथा फ्रांसीसी दोनों ही सांची के तोरणद्वार को ले जाना चाहते थे।
फ्रांसीसी ने तो तोरणद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में ले जाने के लिए शाहजहां बेगम से इजाजत मांगी।
लेकिन बड़ी ही सावधानी से इन तोरणद्वार की प्लास्टर प्रतिकृति बनाई गई।
और अंग्रेज तथा फ्रांसीसी दोनों ही इससे संतुष्ट हो गए।
इस कारण मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी ही जगह रह गई।

भोपाल के शासक शाहजहां बेगम
भोपाल के शासक शाहजहां बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तान जहां बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रखरखाव के लिए धन अनुदान दिया।
जॉन मार्शेल ने सांची के महत्व को समझा और उस पर ग्रंथ लिखा।
तथा अपने द्वारा लिखे गए ग्रंथ को सुल्तान जहां को समर्पित किया।
सुल्तान जहां ने वहां पर एक संग्रहालय तथा अतिथि शाला बनाने के लिए भी धन का अनुदान दिया।
सुल्तान जहां ने जॉन मार्शेल के द्वारा लिखी गई पुस्तक के प्रकाशन में भी धन का अनुदान दिया

Class 12th History Chapter 4 Vicharak vishwas aur imarte Notes

यज्ञ और विवाद
ईसा पूर्व पहली सहस्त्राब्दी का समय दुनिया के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
इस काल में महत्‍वपूर्ण महापुरूष (चिंतक) आए, जिनके नाम और उनसे संबंधित देश निम्‍न है—
ईरान- जरथुस्त्र
चीन – खुंगत्‍सी
यूनान – सुकरात, प्लेटो, अरस्तू
भारत – महावीर, बुद्ध
इन्होंने जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया।
मनुष्य तथा विश्व व्यवस्था के बीच रिश्ते को समझने का प्रयास।
इसी समय गंगा घाटी में नए राज्य और शहर का उदय हो रहा था।
जिस कारण आर्थिक और सामाजिक जीवन में कई महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे थे।
इन चिंतकों ने बदलते हुए हालात को समझने का भी प्रयास किया।

यज्ञों की परंपरा
प्राचीन युग से ही कई धार्मिक विश्वास, चिंतन, व्यवहार की कई धाराएं चली आ रही थी।
पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी हमें ऋग्वेद से मिलती है।
ऋग्वेद में अग्नि, सोम, इन्द्र आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह उपलब्ध है।

लोग यज्ञ क्यों करते थे ?
(1) मवेशी के लिए.
(2) पुत्र के लिए.
(3) अच्छे स्वास्थ्य के लिए
(4) लंबी उम्र के लिए
प्रारंभ में यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे।
लेकिन बाद में कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाने लगे।
राजसूय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ काफी जटिल थे।
इन यज्ञों को सरदार या राजा द्वारा किया जाता था।
इन यज्ञ के लिए ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।
उपनिषद से पाई गई विचारधारा से यह पता लगता है कि लोग निम्न प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए उत्सुक थे।
(1) जीवन का अर्थ
(2) मृत्यु के बाद जीवन की संभावना
(3) पुनर्जन्म
(4) पुनर्जन्म का अतीत के कर्मों से संबंध

वाद विवाद और चर्चायें
समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपरा का उल्लेख मिलता है।
शिक्षक एक जगह से दूसरी जगह घूम घूम कर अपने दर्शन, ज्ञान तथा विश्व के विषय में अपनी समझ को लेकर एक-दूसरे से तथा सामान्य लोगों से तर्क, वितर्क करते थे।
यह चर्चाएं कुटागारशाला (कुटागारशाला – नुकीली छत वाली झोपडी) में या ऐसे उपवन में होती थी।
जहां घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे।
मनीषी का अर्थ- ज्ञानी, विद्वान, चिंतन करने वाला
इन चर्चाओं में यदि कोई शिक्षक अपनी प्रतिद्वंदी को अपनी बातों तथा तर्कों से समझा लेता था तो वह अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था।
ऐसे ही कुछ शिक्षको में महावीर और गौतम बुद्ध भी शामिल थे।
इन्होने तर्क दिया कि मनुष्य खुद अपने दुखों से मुक्ति का प्रयास स्वयं कर सकता है।
इन्होंने वेदों को चुनौती दी।
इनके अनुसार ब्राह्मण व्यवस्था गलत थी।
यह किसी व्यक्ति के अस्तित्व को उसकी जाति और लिंग से निर्धारण होना गलत मानते थे।
जाति प्रथा को भी गलत मानते थे।

Class 12th History Chapter 4 Vicharak vishwas aur imarte Notes

जैन धर्म
संस्थापक– स्वामी ऋषभदेव/आदिनाथ (प्रथम तीर्थंकर)
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए है। तीर्थंकर का अर्थ दूखों से भरे संसार रूपी सागर को पार लगाने वाला।
पार्श्वनाथ– 23 वें तीर्थंकर
महावीर – 24 वें तीर्थंकर
महावीर स्‍वामी जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे।

जैन दर्शन की अवधारणा
(1) सारा संसार प्राणवान है.
(2) पत्थर,चट्टान और जल में भी जीवन होता है।
(3) सदैव जीवों के प्रति अहिंसा का पालन करना चाहिए।
(4) मनुष्यो, जानवरों, पेड़ – पौधों और कीड़े- मकोड़ों को नहीं मारना चाहिए।
(5) जैन अहिंसा के सिद्धांत ने पूरे भारतीय चिंतन को प्रभावित किया।
जैन धर्म के लोग मानते हैं की जन्म और पुनर्जन्म का चक्र मनुष्य के कर्म द्वारा निर्धारित होता है।
कर्म के चक्र से मुक्ति पाने के लिए त्याग और तपस्या के रास्ते को अपनाने की जरूरत है।
यह संसार के त्याग से भी संभव हो पाता है।
इसी कारण मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य नियम बनाया गया।

जैन साधु और साध्वी के 5 व्रत
(1) अहिंसा – हत्या ना करना
(2) सत्य – झूठ ना बोलना
(3) अस्तेय – चोरी ना करना
(4) अपरिग्रह – धन इकट्ठा ना करना
(5) ब्रह्मचर्य – ब्रह्मचर्य का पालन करना
उपयुक्‍त पाँचों व्रत को पंचायन धर्म कहा गया, जिसका सिद्धांत महावीर स्‍वामी ने दिया।

जैन  धर्म  का  विस्तार
धीरे-धीरे जैन धर्म भी भारत में विभिन्न हिस्सों में फैलने लगा।
बौद्ध विद्वानों की तरह जैन विद्वानों ने भी प्राकृत, संस्कृत तथा तमिल जैसी अनेक भाषाओं में अपना साहित्य लिखा।
वर्तमान समय में काफी प्राचीन जैन मूर्तियां उपलब्ध है।

बौध धर्म
मूल नाम – सिद्धार्थ
पिता – शाक्यों के राजा शुद्धोदन
माता – महामाया देवी
गौतम बुद्ध के जन्‍म के एक सप्‍ताह में ही उनकी माँ महामाया की मृत्‍यु हो गई, उसके बाद महामाया की बहन प्रजापति गौतमी (गौतम बुद्ध की मौसी) से उनके पिता शुद्धोदन की विवाह हुआ। इस प्रकार प्रजापति गौतमी सौतेली माँ हुई।
जन्म – 563 B.C. कपिलवस्तु, लुम्बिनी (नेपाल)
गृहत्याग – 29 वर्ष की आयु में
मृत्यु – 483 B.C. उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में
ज्ञान की प्राप्ति – बोधगया (बिहार), निरंजना नदी के किनारे (फल्गु नदी के किनारे), पीपल वृक्ष के नीचे (बोधिवृक्ष)
ज्ञान प्राप्ति – निर्वाण (जब गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई तो उसे निर्वाण कहा गया।)
प्रथम उपदेश – सारनाथ (धर्म चक्र प्रवर्तन)
भगवान बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु, लुम्बिनी (नेपाल) में हुआ।
उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था.
यह शाक्य कबीले के सरदार के पुत्र थे।
सिद्धार्थ को जीवन के कटु यथार्थ से दूर
महल की चारदीवारी में सभी सुख सुविधाएं प्रदान की गई। उन्‍हें महल से बाहर नहीं जाने दिया जाता था। क्‍योंकि ज्‍योतिषों ने भविष्‍यवाणी किया था कि वह सन्‍यासी होगा।
सिद्धार्थ महल के बाहर की दुनिया देखना चाहते थे।
एक बार उन्होंने अपने सारथी को शहर घुमाने के लिए मनाया।
जब वह महल की बाहर की दुनिया में आए तो उनकी यह पहली यात्रा काफी पीड़ादायक थी।
उन्होंने बाहर चार दृश्य देखें जिससे उनका जीवन परिवर्तित हो गया तथा उनके मन में वैराग्‍य की भावना आ गई।

वे निम्‍न चार दृश्य देखे—
(1) एक बूढ़ा व्यक्ति
(2) एक बीमार व्यक्ति
(3) एक लाश (शव)
(4) एक सन्यासी
इन चारों में से सिद्धार्थ ने फैसला किया कि वे संन्यास का रास्ता अपनाएंगे।
उन्होंने महल की सुख-सुविधाओं को त्याग दिया तथा सत्य की खोज में महल को छोड़कर निकल गए।
सिद्धार्थ ने साधना के कई मार्गों को खोजने का प्रयास किया।
उन्होंने अपने शरीर को अधिक से अधिक कष्ट दिया।
जिसके कारण वह मरते-मरते बचे।
इस प्रकार उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्हें बुद्ध के नाम से जाना गया।
बाकी जीवन भर उन्होंने धर्म एवं सम्यक (शुद्ध जीवन) यापन की शिक्षा दी।
बौद्ध धर्म की मृत्‍यु को स्‍तूप से दर्शाया गया।

Class 12th History Chapter 4 Vicharak vishwas aur imarte Notes

बुद्ध की शिक्षाएं
बौद्ध की महत्‍वपूर्ण ग्रंथ त्रिपिटक है, जिसके तीन भाग निम्‍न है—
(1) विनय पिटक– बौद्ध संघ के नियम अर्थात इससे बौद्ध धर्म से संबंधित जानकारी प्राप्‍त होती है।
(2) सुत्त पिटक– उपदेश तथा बौद्ध धर्म में प्रवेश करने के नियम है।
(3) अभिधम्म पिटक– दार्शनिक सिद्धांत अर्थात बौद्ध धर्म के विचार को इस ग्रंथ में रखा गया है।
सुत पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का पुनर्निर्माण किया गया।
कुछ कहानियों में अलौकिक शक्तियों का वर्णन किया गया है।
तो कुछ कहानियों में अलौकिक शक्तियों की बजाय बुद्ध ने विवेक और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयास किया।
महात्‍मा बुद्ध ने चार आर्य सत्‍य, 8 आष्‍टांगिक मार्ग, 10 महत्‍वपूर्ण उपदेश (उनके द्वारा दिए गए 10 महत्‍वपूर्ण उपदेश को शील कहा गया।) तथा तीन दर्शन दिए।
(1) विश्व अस्थिर है यह लगातार बदलता रहता है।
(2) यहां कुछ भी स्थाई नहीं है।
(3) भगवान का होना अप्रासंगिक है। (ईश्‍वर नहीं है)
(4) राजाओं को दयावान होने की सलाह दी।
(5) सत्य और अहिंसा
(6) मध्यम मार्ग अपनाना।
निर्वाण- निर्वाण का अर्थ होता है अहम और इच्छा को खत्म करना।
बुद्ध ऐसा मानते थे कि हमारी समस्याओं की जड़ हमारी इच्छाएं हैं।
यदि हम अपनी इच्छाओं और लालसा का त्याग कर देंगे तो हमें निर्वाण की प्राप्ति होगी।
बुद्ध ने अपने शिष्यों को अंतिम निर्देश यह दिया कि तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूंढना है।
परिनिर्वाण- निर्वाण प्राप्‍त व्‍यक्ति की जब मृत्‍यु होती है, तो उसे परिनिर्वाण कहा जाता है।
महापरिनिर्वाण- महात्‍मा गाँधी की मृत्‍यु की घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है।
बौद्ध धर्म के तीन रत्‍न हैं—
(1) बुद्ध, (2) संघ (बौद्ध धर्म के साधू-संत) और (2) धम्‍म (महात्‍मा बुद्ध की उपदेश वाली किताब)
बुद्ध के अनुयायी
बुद्ध से प्रभावित होकर धीरे धीरे शिष्यों का दल तैयार हो गया।
अब आवश्यकता थी एक संघ की स्थापना की।
संघ की स्थापना की गई कुछ भिक्षु धम्म के शिक्षक बन गए।
यह बिल्कुल सादा जीवन बिताते थे।
यह उतना ही वस्तु अपने पास रखते थे जितना जीवन यापन के लिए जरूरी हो।
जैसे- भोजन दान प्राप्त करने के लिए कटोरा,
यह लोग दान पर निर्भर रहते थे।
इसीलिए इन्हें भिक्षु कहा जाता था।
प्रारंभ में केवल पुरुष ही संघ में शामिल हो सकते थे।
बाद में आनंद नामक शिष्‍य के कहने पर महिलाओं को भी संघ में शामिल होने की अनुमति मिली।
गौतम बुद्ध के प्रिय शिष्य आंनद ने बुद्ध को समझा कर महिलाओं को संघ में शामिल करने की अनुमति प्राप्त की।
बुध की उपमाता प्रजापति गौतमी संघ में शामिल होने वाली पहली भिक्षुणी बनी।
बौद्ध धर्म में शामिल होनेवाली पहली महिला प्रजापति गौतमी (बुद्ध की सौतेली माँ) थी तथा दूसरी महिला आम्रपाली (वैशाली की नर्तकी) थी।
कई स्त्रियां जो संघ में शामिल हुई थी। वह भी धम्म की उपदेशिका बन गई।
बाद में यह महिलाएं थेरी बन गई।
थेरी – जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया।
बुद्ध के अनुयाई विभिन्न सामाजिक वर्गों से आए थे।
बुद्ध के अनुयाई इन सामाजिक वर्गों से आए थे—
(1) राजा
(2) धनवान
(3) गरीब
(4) सामान्य जन
(5) कर्मकार
(6) दास
(7) शिल्पी (कारीगर, मकान बनाने वाला) आदि।
जो एक बार संघ में शामिल हो जाता था।
उसके बाद सभी को समान माना जाता था।
भिक्षु या भिक्षुणी बन जाने के बाद पुरानी पहचान को त्याग देना पड़ता था।
बुद्ध जब जीवित थे उस काल में बौद्ध धर्म तेजी से फैला।
लेकिन बुद्ध की मृत्यु के पश्चात भी यह धर्म तेजी से विभिन्न देशों में फैलने लगा।
जो लोग समकालीन प्रथाओं से असंतुष्ट थे बौद्ध धर्म में शामिल होने लगे।
बौद्ध शिक्षा में जन्म के आधार पर श्रेष्ठ नहीं माना जाता। बल्कि मनुष्य के कर्म उसके अच्छे आचरण को महत्व दिया जाता था।
इसी कारण महिला और पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए।

धम्म की विशेषता
(1) बड़ों का सम्मान करना
(2) अपने से छोटो के साथ उचित व्यवहार करना
(3) सत्य बोलना, धार्मिक सहिष्णुता
(4) विद्वानों, ब्राह्मनों के प्रति सहानुभूति की नीति
(5) अहिंसा का संदेश, सभी धर्मों का सम्मान
(6)दासों और सेवकों के प्रति दया का व्यवहार करना

स्तूप
बहुत प्राचीन काल से ही लोग कुछ जगह को पवित्र मानते थे अक्सर जहां खास वनस्पति होती थी, अनूठी चटाने थी या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य था, वहां पवित्र स्थल बन जाते थे। ऐसे कुछ स्थानों पर एक छोटी सी वेदी भी बनी रहती थी। जिन्हें कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों की चर्चा है इनमें बुध के जीवन से जुड़ी जगहों का ही वर्णन है।

स्तूप क्या है
स्तूप एक अर्ध गोलाकार संरचना है। (उल्‍टा कटोरा के आकार का)
स्तूप की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी।
इसमें बुद्ध से जुड़े अवशेषों को दफनाया गया। इसलिए बौद्ध धर्म में यह पवित्र समझा जाने लगा।
इस संरचना को बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

Class 12th History Chapter 4 Vicharak vishwas aur imarte Notes

स्तूप कैसे बनाए गए थे
विभिन्न प्राचीन स्तूपों की वेदिकाओं और उनके स्तंभों में कुछ अभिलेख मिले हैं।
इन अभिलेखों के अध्ययन के बाद इतिहासकारों को यह पता लगा कि इन स्तूपों को बनाने तथा सजाने के लिए दान दिया जाता था।
यह दान राजा, शिल्पकार, व्यापारियों, महिला तथा पुरुष, आम लोगों, भिक्षु द्वारा दिया गया था।

स्तूप की संरचना
स्तूप का संस्कृति अर्थ – टीला है।
इसका जन्म एक गोलार्ध आकृति के मिट्टी के टीले से हुए है।
इसे बाद में अंड कहा गया।
धीरे-धीरे इसकी संरचना अधिक जटिल होती गई।
इसमें कई चौकोर और गोलाकारों का संतुलन बनाया जाने लगा।
अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी।
यह छज्जे जैसा संरचना ईश्वर के घर का प्रतीक था।
इसके ऊपर एक छतरी लगी होती थी।
स्तूप के चारों ओर एक घेरा होता था जो इस पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करता था।
कुछ स्तूपों पर तोरणद्वार भी मिले हैं.
इन तोरणद्वार पर नक्काशी अशोकवादन नामक एक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बांट कर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया।
ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, सांची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बनाए गए।

स्तूप की खोज अमरावती और सांची की नियति
स्थानीय राजा
सन् 1796 में एक स्थानीय राजा मंदिर बनाना चाहते थे।
उन्हें अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले।
उन्होंने वहां मिले पत्थर का इस्तेमाल करने का निश्चय किया।
उन्हें लगा इस पहाड़ी में जरूर कोई खजाना छिपा है।
अंग्रेज अधिकारी कॉलिन मैकेंजी इस स्थान से गुजरे उन्होंने कई मूर्तियों का चित्र बनाया।
सन् 1854 में गुंटूर ( आंध्र प्रदेश ) के कमिश्नर ने अमरावती क्षेत्र की यात्रा की।
वे कई मूर्तियों और पत्थर के टुकड़ों को मद्रास ले गए।
इन पत्थर को कमिश्नर के नाम पर एलियट संगमरमर के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार को भी खोजा और यह निष्कर्ष निकाला कि अमरावती का स्तूप बौद्ध लोगों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था।
1850 के दशक में अमरावती के स्तूप के पत्थर को अलग-अलग स्थान पर ले जाया गया।
कुछ पत्थर कोलकाता में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल पहुंचे।
कुछ मद्रास कुछ पत्थर लंदन तक पहुंचा दिए।
इस स्थान पर जो भी अंग्रेज अधिकारी आते।
यहां से कुछ ना कुछ लेकर जरूर जाते हैं।

एक अलग सोच के व्यक्ति – एच. एच कॉल
एच. एच कॉल एक अलग सोच के व्यक्ति थे।
यह ऐसा मानते थे कि देश की प्राचीन कलाकृतियों को लूट कर ले जाना अच्छा नहीं है।
इनका मानना था कि संग्रहालय में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृति रखी जानी चाहिए और असली कृति को उसी स्थान पर रखा रहने देना चाहिए जहां वह प्राप्त हुई हो।

सांची क्यों बच गया जब कि अमरावती नष्ट हो गया ?
अमरावती की खोज पहले हो गई थी।
अमरावती के स्तूप के संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई।
विद्वान अमरावती के महत्व को नहीं समझ पाए, 1818 में जब सांची की खोज हुई।
उस समय यह स्तूप अच्छी हालत में था।
स्तूप के तीन तोरणद्वार खड़े थे।
चौथा तोरणद्वार गिरा हुआ था।
सांची के तोरणद्वारों को भी अंग्रेज और फ्रांसीसीयों ने अपने देश ले जाने का प्रयास किया।
लेकिन इसका संरक्षण हो पाया।
मूल कृतियां सांची में ही स्थापित रह गई।

मूर्तिकला
प्राचीन मूर्तियां इतनी खूबसूरत थी कि यूरोपीय लोग इन्हें अपने देश ले जाना चाहते थे। और ले जाने में सफल भी हुए।
क्योंकि यह मूर्तियां खूबसूरत और मूल्यवान थी।

पत्थर में गढी कथाएं
कुछ ऐसे घुमक्कड़ कथावाचक होते थे।
जो अपने साथ कपड़े या कागज पर बने चित्र को लेकर घूमते थे।
जब वह कोई कहानी सुनाते तब वे इन चित्रों को दिखाते थे.
कला इतिहासकारों ने जब सांची की मूर्तिकला को गहराई से अध्ययन किया.
तब यह पाया कि यह दृश्य वेशांतर जातक से लिया गया है.
इसमें एक दानी राजकुमार की कहानी है.
जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को दान में दिया.
और स्वयं अपने पत्नी और अपने बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया.
उपासना के प्रतीक
बौद्ध मूर्तिकला को समझने के लिए कला इतिहासकारों के द्वारा बुद्ध चरित लेखन को समझना पड़ा.
बौद्ध चरित लेखन के अनुसार भगवान बुद्ध को एक पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान प्राप्त हुआ.
इस घटना को कुछ प्रारंभिक मूर्तिकार ने बुद्ध को मानव रूप में ना दिखा कर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के द्वारा दिखाने का प्रयास किया.

लोक परंपराएं
सांची में कुछ ऐसी मूर्तियां मिली है जिनका संबंध शायद सीधा बौद्ध मत से नहीं है.
इसमें कुछ सुंदर स्त्रियों की मूर्ति है.
शुरू में विद्वान इस मूर्ति के महत्व को नहीं समझ पाए.
क्योंकि इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नजर नहीं आता था।
लेकिन साहित्यिक परंपराओं का अध्ययन करने के बाद यह पता लगा कि यह शालभंजिका की मूर्ति है।
लोक परंपरा में ऐसा माना जाता है कि इस स्त्री के द्वारा छुए जाने से पेड़ों में फूल खिल जाते हैं और फल लगने लगते हैं।
इन्हें शुभ प्रतीक माना जाता था इसी कारण इसे स्तूप में लगाया गया।
इससे यह भी पता लगता है कि बौद्ध धर्म में
बाहर के विश्वासों, प्रथा और धारणाओं को शामिल किया गया जिससे बौद्ध धर्म समृद्ध हुआ।
इसके अलावा जानवरों की मूर्तियां भी मिली है।
हाथी, घोड़े, गाय, बैल, बंदर इत्यादि।
जातक से कई जानवरों की कहानियां ली गई है।
जानवरों को मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप
में इस्तेमाल किया जाता था।
उदाहरण- हाथी शक्ति और ज्ञान का प्रतीक
एक महिला की मूर्ति भी मिली है जो हाथी के ऊपर जल छिड़क रही है।
कुछ इतिहासकार इन्हें बुद्ध की मां मानते हैं।
तो कुछ इतिहासकार इन्हें लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं।
गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थी।

नई धार्मिक परंपराएं – महायान बौद्ध मत
भगवान बुद्ध की मृत्यु के बाद के समय में बौद्ध धर्म दो भाग में बंट गया—
(1) हीनयान (ये प्राचीन परंपरा को मानते थे)
(2) महायान (ये नवीन है)

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हीनयान की विशेषता
पुरानी परम्परा को मानते हैं।
निर्वाण के लिए व्यक्तिगत प्रयास।
बुद्ध को मनुष्य माना
मूर्तिपूजा निषेध

महायान की विशेषता
ये नवीन परम्परा को मानते हैं।
बुद्ध को इन्‍होंने अवतार माना।
मूर्तिपूजा को अपनाया को अपनाया।
बाद में महायान शाखा भी दो भागों में बँट गया— शुन्‍यवाद और ब्रजयान

पौराणिक हिंदू धर्म का उदय
वैष्णव – विष्णु के अनुयाई।
शैव – शिव के अनुयाई।
वैष्णववाद में कई अवतारों की पूजा होती है।
ऐसा माना जाता है कि पापियों के बढ़ते प्रभाव के चलते दुनिया में व्यवस्था बिगड़ जाती है।
तब संसार की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते हैं।
यह अलग-अलग अवतार देश के विभिन्न हिस्सों में काफी लोकप्रिय थे।
कई अवतारों को मूर्ति के रूप में दिखाया जाता है।

शैव
शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में दिखाया गया है।
इतिहासकारों को इन मूर्तिकला को समझने के लिए पुराणों का अध्ययन करना पड़ा।
इनमें बहुत से किस्से ऐसे थे जो सैकड़ों साल पहले रचने के बाद सुने और सुनाए जाते थे इसमें देवी देवताओं की कहानियां है।
इनमें संस्कृत के श्लोक लिखे थे।
जिन्हें ऊंची आवाज में पढ़ा जाता था।
इन्हें महिलाएं और शूद्र भी सुन सकते थे।

मंदिरों का निर्माण
शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे।
जिन्हें गर्भगृह कहा जाता था।
इनमें एक दरवाजा होता था जिसमें उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए अंदर जा सके।
बाद में गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा ढांचा बनाया जाने लगा। जिसे शिखर कहा जाता था।
मंदिर की दीवारों पर भित्ति चित्र उत्पन्न किए जाते थे।
बाद में मंदिरों का निर्माण का तरीका बदला।
अब मंदिरों के साथ बड़े सभा स्थल ऊंची दीवारें भी जुड़ गए।
जलापूर्ति का इंतजाम भी किया जाने लगा।
शुरु-शुरु के मंदिर कुछ पहाड़ियों को काटकर
कृतिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे।
कृतिम गुफाएं अशोक के आदेश के बाद आजीवक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थी।
यह परंपरा धीरे-धीरे विकसित होती रही।
सबसे विकसित रूप हमें आठवीं सदी के
कैलाशनाथ के मंदिर में नजर आता है।
यह मंदिर पूरी पहाड़ी काटकर बनाया गया।

अनजाने को समझने की कोशिश
अंग्रेजों ने जब 19वीं सदी में देवी-देवताओं की मूर्तियां देखी तो वे इसके महत्व को समझ नहीं पाए।
कई सिर, हाथ वाली मूर्ति मनुष्य और जानवर के रूपों में मिलाकर बनाई गई मूर्ति।
यह मूर्ति यूरोपियों को विकृत लगी वह इन से घृणा करने लगे।
इन विद्वानों ने ऐसे अजीबोगरीब मूर्तियों को समझने के लिए उनकी तुलना ऐसी परंपरा से की जिसके बारे में वह पहले से जानते थे।
उन्होंने प्राचीन यूनान की कला परंपरा से भारतीय मूर्तिकला की तुलना की। Class 12th History Chapter 4 Vicharak vishwas aur imarte Notes

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3. Bandhutva jati tatha varg | बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ तीन बंधुत्व, जाति तथा वर्ग (Bandhutva jati tatha varg) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

Bandhutva jati tatha varg

3. बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

महाभारत के बारे में
महाभारत दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य है
महाभारत में एक लाख से अधिक श्लोक हैं
इसका पुराना नाम जय संहिता था। जय संहिता में 8800 श्‍लोक था। जय संहिता में ही जब और श्‍लोक जोड़ा गया, तो उसे महाभारत नाम रखा गया।
महाभारत के लेखक वेदव्‍यास हैं।
महाभारत के खंडों को पर्व कहा जाता है। इसमें कुल 18 पर्व है। जिसमें सबसे महत्‍वपूर्ण पर्व भीष्‍म पर्व है, जिसे गीता कहा जाता है।
यह भारत के सबसे समृद्ध ग्रंथों में से एक है
महाभारत की रचना 1000 वर्ष तक होती रही है। (लगभग 500 BC से)
महाभारत से उस समय के समाज की स्थिति तथा सामाजिक नियमों के बारे में जानकारी मिलती है।
महाभारत में शामिल कुछ कथाएं तो इस काल से पहले भी प्रचलित थी।
महाभारत में दो परिवारों के बीच हुए युद्ध का चित्रण है।
महाभारत मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे।
महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण की शुरूआत वी.एस .सुन्थाकर ने शुरू की।

महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण
समालोचना- अच्छी तरह से देखना, विश्लेषण करना।
(1) समीक्षा करना
(2) गुण-दोष की परख करना
(3) निरीक्षण करना
संस्कृत के विद्वान वी.एस .सुन्थाकर के नेतृत्व में 1919 में एक महत्वकांक्षी परियोजना की शुरुआत हुई।
इसमें अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत ग्रंथ का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने की जिम्मेदारी उठाई।
इस परियोजना के लिए देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को इकठ्ठा किया गया।
पांडुलिपि में पाए गए श्लोकों का अध्ययन किया गया।
उन श्लोकों की तुलना का एक तरीका निकाला गया।
विद्वानों ने ऐसे श्लोकों को चुना जो लगभग सभी पांडुलिपि में उपलब्ध थे।
इनका प्रकाशन 13000 पेज में फैले अनेक ग्रंथ खंडों (Parts) में किया
इस परियोजना को पूरा करने में 47 साल लगे।
इस पूरी परियोजना के बाद दो बातें सामने आई।
पहली- उत्तर भारत में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण भारत में केरल और तमिलनाडु तक सभी पांडुलिपियों में समानता देखने को मिली।
दूसरी- कुछ शताब्दियों के दौरान महाभारत के प्रेषण में कई क्षेत्रीय भिन्नता भी नजर आईं
इन प्रभेदों का संकलन मुख्य पाठ की टिप्पणी और परिशिष्ट के रूप में किया।
13000 पेज में से आधे से अधिक में इन्हीं प्रभेदों की जानकारी है।

Class 12th History Chapter 3 Bandhutva jati tatha varg Notes

बधुत्व एवं परिवार
परिवार समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था थी।
संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग किया जाता है।
सभी परिवार एक जैसे नहीं होते।
विभिन्न परिवारों में सदस्यों की संख्या, एक दूसरे से उनका रिश्ता, क्रियाकलाप अलग-अलग हो सकती है।
एक ही परिवार के लोग भोजन तथा अन्य संसाधनों को आपस में बांट कर इस्तेमाल करते हैं।
लोग अपने परिवार में मिलजुल कर रहते थे।
परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा था इन्हें संबंधी कहा जाता है
इनके लिए जाति समूह शब्द का इस्तेमाल भी किया जाता है
कुछ परिवारों में चचेरे, मौसेरे भाई, बहनों
से भी खून का रिश्ता माना जाता है लेकिन सभी समाज में ऐसा नहीं था।

पितृवांशिक व्यवस्था
पितृवांशिक एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समाज में पुरुष को अधिक महत्व दिया जाता है।
इस परंपरा में घर का मुखिया पुरुष होता है उसके पास अधिक शक्ति होती है।
इस व्यवस्था में पिता के बाद पुत्र को संपत्ति तथा शक्ति प्राप्त हो जाती है।

महाभारत
महाभारत का युद्ध कौरव और पांडव के बीच हुआ।
(i) कौरव  ( कुरु वंश )
(ii)पांडव  (कुरु वंश)
इनका एक जनपद पर शासन था।
इनके बीच भूमि और सत्ता को लेकर युद्ध हुआ।
इसमें पांडव जीत गए।
इनके उपरांत पित्रवांशिक उत्तराधिकार को घोषित किया गया।
पित्रवांशिक में पुत्र अपनी पिता की मृत्यु के बाद पिता की संपत्ति, संसाधन तथा सिंहासन पर अधिकार जमा सकते थे।
अधिकतर राजवंश पित्रवंशिकता प्रणाली को अपनाते थे।
यदि पुत्र ना हो तो भाई या अन्य बंधु-बांधव को भी उत्तराधिकारी बनाया जा सकता था।
कुछ विशेष परिस्थितियों में स्त्री को भी सत्ता दी जा सकती थी।

विवाह के नियम
विवाह 8 प्रकार के होते थे।
बहिर्विवाह पद्धति- गोत्र से बाहर विवाह करने की प्रथा।
अंतविवाह पद्धति- एक गोत्र एक कुल या एक जाति या एक ही स्थान में बसने वाले में विवाह।
बहुपति प्रथा- एक से अधिक पति होना।
बहुपत्नी प्रथा – एक से अधिक पत्नियां।
अपने गोत्र से बाहर विवाह करना सही माना जाता था।
पुत्री को पिता के संसाधनों (संपत्ति) पर अधिकार नहीं था।
कन्यादान अर्थात विवाह के समय कन्या को भेंट देना पिता का महत्वपूर्ण कर्तव्य माना जाता था।
धीरे धीरे नए नगरों का उद्भव शुरू हुआ। सामाजिक जीवन कठिन हो गया।
अब सामाजिक जीवन में परिवर्तन देखने को मिला। व्यापार बढ़ने लगा।
दूर-दराज से लोग आकर वस्तुओं की खरीद फरोख्त करने लगे।
एक दूसरे से मिलते थे इस प्रकार नया नगरीय परिवेश सामने आया।
लोगों द्वारा विचारों का आदान-प्रदान होने लगा।
समाज में विश्वासों और व्यवहारों में परिवर्तन आने लगे।
इन चुनौतियों के जवाब में ब्राह्मणों ने समाज के लिए आचार संहिता तैयार किए।
आचार संहिता में दिए गए नियमों का पालन ब्राह्मणों को तथा समाज को करना पड़ता था
इन नियमों का संकलन लगभग 500 BC से
धर्मसूत्र तथा धर्मशास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथों में किया गया।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति थी।
मनुस्मृति का संकलन लगभग 200 BC से 200 AD के बीच हुआ।
धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र में विवाह के 8 प्रकार बताए गए है।
इनमें से पहले 4 प्रकार विवाह सही माने जाते हैं।
बाकियों को निंदित माना गया है
ऐसा माना जाता है कि निंदित विवाह पद्धति को वह लोग अपनाते थे जो ब्राह्मण नियमों को नहीं मानते थे।

स्त्री का गोत्र
गोत्र एक प्राचीन ब्राह्मण पद्धति है
इसका प्रचलन लगभग 1000 ईसा पूर्व के बाद हुआ।
इसके तहत लोगों को गोत्र में वर्गीकृत किया गया।
प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।
उस गोत्र के सदस्य को ऋषि का वंशज माना जाता था।

Class 12th History Chapter 3 Bandhutva jati tatha varg Notes

गोत्र के दो महत्वपूर्ण नियम
(1) विवाह के बाद स्त्री को अपने पिता के गोत्र को बदल कर पति का गोत्र लगाना पड़ता था।
(2) एक गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।

क्या इन नियमों का अनुसरण सभी करते थे?
सातवाहन शासकों के अभिलेख का अध्ययन करने के बाद इतिहासकारों ने साबित किया कि यह शासक ब्राह्मण गोत्र व्यवस्था का पालन नहीं करते थे।
कुछ सातवाहन राजा बहुपत्नी प्रथा को मानते थे।
इन राजाओं की पत्नियों ने विवाह के बाद भी अपने पिता के गोत्र को अपनाया था।
जब इतिहासकारों ने सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली उनकी पत्नियों के नामों का विश्लेषण किया तो यह ज्ञात हुआ कि उनके नाम गौतम तथा वशिष्ठ गोत्रों से उद्भव थे।
जो कि उनके पिता का गोत्र था। इससे यह पता लगता है कि विवाह के बाद भी अपने पति के गोत्र को नहीं अपनाया।
कुछ रानियां एक ही गोत्र से थी जोकि बहिविवाह पद्धति के नियमों के खिलाफ था।
दक्षिण भारत में कुछ समुदायों में अंतर्विवाह पद्धति भी अपनाई गई थी।
इसके तहत बंधुओं में विवाह संबंध हो जाते थे। जैसे- चचेरे, ममेरे, भाई बहन।
इससे यह ज्ञात होता है कि उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में नियमों को मानने में विभिन्नताएं थी।

समाज में भिन्नताएं ( विषमताएं )
समाज में वर्ण व्यवस्था थी। समाज चार वर्णों में विभाजित हुआ था।
1. ब्राह्मण
2. क्षत्रिय
3. वैश्य
4. शूद्र

धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार चारों वर्णों के लिए आदर्श जीविका के नियम बनाए हुए थे।  चारों वर्णों का कार्य नीचे दिए गए हैं—
(1) ब्राह्मण- अध्ययन करना, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना, दान देना और दान लेना।
(2) क्षत्रिय- शासन करना, युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना,न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान-दक्षिणा देना।
(3) वैश्य- कृषि, पशुपालन, गौ-पालन, व्यापार, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान देना।
(4) शूद्र – तीनो वर्णों की सेवा करना।
ब्राह्मण वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति को दैवीय व्यवस्था मानते थे।
ब्राह्मण शासकों को यह उपदेश देते थे कि शासक इस व्यवस्था के नियमों का पालन राज्यों में करवाएं।
ब्राह्मणों ने लोगों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म पर आधारित है।

क्या सदैव क्षत्रिय ही राजा होते थे ?
शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे, लेकिन वास्तव में कई शासक ऐसे रहे हैं जो क्षत्रिय नहीं थे लेकिन फिर भी राजा थे।
उदाहरण– 1. चन्द्रगुप्त मौर्य-मौर्य वंश के संस्थापक।
बौद्ध गंथों में चन्‍द्रगुप्‍त मौर्य को ब्राह्मण माना गया है जबकि क्षत्रिय उन्‍हें निम्न कुल (निची जाति) के मानते हैं।
उदाहरण– 2. सुंग और कवण-मौर्य के उतराधिकारी ब्राह्मण थे।
उदाहरण– 3. शक शासक मध्य एशिया से आये थे। जिन्‍हें बर्बर कहा जाता था।
उदाहरण– 4. नंद वंश के संस्‍थापक महापद्मनंद शुद्र था।
उदाहरण– 5. सातवाहन शासक गौतमी पुत्त सिरी सातकर्नी ब्राह्मण था।
सातवाहन शासक स्वयं को अनूठा ब्राह्मण तथा क्षत्रियों का हनन करने वाला बताया।
सातवाहन खुद को ब्राह्मण बताते थे जबकि ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार राजा केवल क्षत्रिय ही बन सकता है।
यह 4 वर्णों की मर्यादा बनाए रखने का दावा करते थे।
लेकिन अंतर्विवाह पद्धति का भी पालन करते थे।
इस प्रकार यह साबित होता है कि सदैव क्षत्रिय ही राजा नहीं होते थे। जो राजनीतिक सत्ता का उपभोग कर सकता था।
जो व्यक्ति समर्थन और संसाधन जुटा सकता था। वह शासक बन सकता था।

जाति और सामाजिक गतिशीलता
ब्राह्मण का कार्य- अध्ययन करना, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना, दान देना और दान लेना।
क्षत्रिय- शासन करना, युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना ,न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान दक्षिणा देना।
वैश्य- कृषि, पशुपालन, गौ-पालन, व्यापार, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान देना।
शूद्र- तीनो वर्णों की सेवा।

जाति
जातियां जन्म पर आधारित होती थी।
वर्ण की संख्या चार थी। लेकिन जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं होती थी।
जब ब्राह्मण व्यवस्था (वर्ण व्यवस्था) का कुछ नए समुदाय से आमना-सामना हुआ।
जिन्हें चार वर्णों की व्यवस्था में शामिल नहीं किया जा सकता था।
उन्हें जातियों में बांट दिया गया।
जैसे – निषाद (मल्‍लाह या नाविक), सुवर्णकार (सुनार)।
एक ही जाति के लोग जीविका के लिए एक ही जैसे कार्य करते थे।
भारतीय उपमहाद्वीप विविधताओं से भरा था।
यहां ऐसे समुदाय भी रहते थे जो ब्राह्मण व्यवस्था को नहीं मानते थे। संस्कृत साहित्य में ऐसे समुदायों को विचित्र, असभ्य, बर्बर, जंगली चित्रित किया जाता है।
उदाहरण– वन में बसने वाले लोग।
शिकार, कंद-मूल संग्रह करने वाले लोग।
निषाद वर्ग- एकलव्य भी इसी वर्ग का था।
यायावर (यायावर का अर्थ- घूम‍ने-फिरने वाले लोग, घुमक्‍कड़) और पशुपालकों को भी ऐसा ही समझा जाता था।
जो लोग संस्कृत भाषी नहीं थे।
उन्हें मलेच्छ कहकर हीन दृष्टि से देखा जाता था।

चार वर्णों के परे अधीनता
ब्राह्मण वर्ग ने कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था की सामाजिक प्रणाली से बाहर माना।
ब्राह्मणों ने समाज के कुछ वर्गों को अस्पृश्य घोषित किया।
ब्राह्मण मानते थे कुछ कर्म पवित्र होते हैं तथा कुछ कर्म दूषित होते हैं।
पवित्र- यज्ञ, अनुष्ठान, वेद अध्ययन इत्यादि
दूषित- चमड़े से संबंधित, शवों को उठाना, अंत्येष्टी।

चांडाल
मरे हुए जानवरों को छूने वाले को चांडाल कहा जाता था।
चांडालों को वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निचले स्तर में रखा था।
ब्राह्मण चांडालों का छूना, देखना भी अपवित्र मानते थे।
चांडाल को गांव के बाहर रहना होता था।
यह लोग फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल करते थे।
मरे हुए लोगों के कपड़े तथा लोहे के आभूषण पहनते थे।
रात में गांव और नगर मे चलने की अनुमति नहीं थी।
मरे हुए लोगों का अंतिम संस्कार करना पड़ता था।
वधिक के रूप में काम करते थे।
चीनी बौद्ध भिक्षु – फ़ा-शिएन के अनुसार
अस्पृश्य लोगों को सड़क पर चलते हुए करताल बजाना पड़ता था।
जिससे अन्य लोगों ने देखने के दोष से बच जाएं।
चीनी यात्री शवैन त्सांग के अनुसार वधिक और सफाई करने वाले लोग शहर के बाहर रहते थे।

संपत्ति पर अधिकार
(i) लैंगिक आधार
(ii) वर्ण आधार
संपत्ति पर स्त्री तथा पुरुष के भिन्न अधिकार (लैंगिक आधार)
मनुसमिरिति के अनुसार—
पिता की जायदाद का माता पिता की मृत्यु के पश्चात सभी पुत्रों में समान रूप से बांटा जाना चाहिए, लेकिन ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था।
पिता की संपत्ति पर स्त्री हिस्सेदारी की मांग नहीं कर सकती थी।
विवाह के समय जो उपहार मिलते थे उन पर स्त्री का अधिकार होता था। इसे स्त्रीधन कहा जाता था।
इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता लेकिन मनुस्मृति के अनुसार स्त्रियों को अपने पति के आज्ञा के खिलाफ गुप्त रूप से धन संचय करने की विरुद्ध चेतावनी दी जाती है।
कुछ साक्ष्य प्रभावती गुप्त से संबंधित मिले हैं
जिससे पता लगता है कि प्रभावती गुप्त संसाधनों पर अधिकार रखती थी।
ऐसा कुछ परिवारों में हो सकता है
लेकिन सामान्यत जमीन, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण था।

Class 12th History Chapter 3 Bandhutva jati tatha varg Notes

वर्ण और संपत्ति के अधिकार
ब्राह्मण ग्रंथ के अनुसार संपत्ति पर अधिकार का एक और आधार वर्ण था।
शूद्रों के लिए एकमात्र जीविका का साधन था तीनों उच्च वर्ण की सेवा करना।
तीन उच्च वर्णो के पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रकार के कार्य को चुनने की संभावना थी।
समाज में ब्राह्मण और क्षत्रिय की स्थति अधिकतर समृद्ध थी।
ब्राह्मण ग्रंथों धर्म सूत्र और धर्म शास्त्र में वर्ण व्यवस्था को उचित बताया जाता है।
लेकिन बौद्ध धर्म में वर्ण व्यवस्था की आलोचना की गई है।
बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया है।

एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा संपत्ति में भागीदारी
समाज में सदैव वही व्यक्ति प्रतिष्ठित नहीं होता जिसके पास अधिक संपत्ति हो , बल्कि
ऐसा व्यक्ति जो दानशील हो, जो दयालु हो। उसे प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था।
जो व्यक्ति स्वयं के लिए संपत्ति इकट्ठा करता है। वह घृणा का पात्र होता था।
प्राचीन तमिलकम(तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश का क्षेत्र) ऐसा क्षेत्र था जंहा ऐसे साहित्यिक लेख मिले है।
जिनमें इन आदेशों को संजोए गया है।
इस क्षेत्र में 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियां थी।
यह सरदार अपनी प्रशंसा गाने और लिखने वाले कवियों के आश्रयदाता होते थे।
तमिलकम- दक्षिण भारत का प्राचीन नाम तमिलकम है।

दक्षिण के राजा तथा सरदार
भारत के दक्षिण में कुछ सरदरियो का उदय हुआ।
तमिलकम – तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश , केरल
तमिलकम क्षेत्र में आता है।
उस क्षेत्र में चोल, चेर और पांडय जैसी सरदारी अतित्व में आई।
यह राज्य काफी समृद्ध थे।
तमिल भाषा में प्राप्त संगम साहित्य में सामाजिक और आर्थिक संबंधों का चित्रण है
धनी और निर्धन के बीच विषमता जरूर थी।
लेकिन समृद्ध लोगों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह मिल बांटकर अपने संसाधनों का उपयोग करेंगे।

एक सामाजिक अनुबंध
बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों ने समाज में फैली विषमता ( असामनता ) के लिए एक अलग अवधारणा दी।
सुत्तपिटक नामक ग्रंथ में एक मिथक का वर्णन है।
प्रारंभ में मानव पूरा विकसित नहीं थे वनस्पति जगत भी पूरा विकसित नहीं था
सभी जीव एक शांतिपूर्ण जगत में रहते थे
प्रकृति से उतना ही ग्रहण करते थे जितनी एक समय के भोजन की आवश्यकता होती है
लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था समाप्त होने लगी।
मनुष्य लालची और कपटी हो गया, समाज में बुराइयां फैलने लगी।
ऐसे में लोगों ने विचार किया कि क्या हम कोई ऐसे मनुष्य को चुन सकते हैं। जो उचित बात पर क्रोधित हो, जो व्यक्ति ऐसे व्यक्तियों को सजा दे जो दूसरों को प्रताड़ित करते हैं।
ऐसे व्यक्तियों को समाज से निकाले जिन्हें निकालने की आवश्यकता है और उसे इस कार्य के बदले हम सभी मिलकर चावल का अंश देंगे।
सभी लोगों की सहमति से चुने जाने के कारण उसे महासम्मत की उपाधि प्राप्त होगी।
इससे यह पता लगता है कि राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर करता था।
जनता राजा की इस सेवा के बदले उसे कर (TAX ) देती थी।
इससे यह प्रतीत होता है की मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार थे। तो भविष्य में उसे बदल भी सकते थे।

साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल- इतिहासकार और महाभारत
(1) इतिहासकारों द्वारा साहित्यिक स्रोतों के इस्तेमाल के समय कौन सी सावधानियां बरती जाती हैं ?
(2) इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय किन पहलुओं पर विचार करते हैं?
(1) ग्रंथ की भाषा
(2) ग्रंथ के प्रकार
(3) लेखक
(4) लेखक का दृष्टिकोण
(5) श्रोता
(6) रचना का काल
(7) रचना भूमि
इतिहासकार ग्रंथ की भाषा पर विशेष ध्यान देते हैं, कि ग्रंथ किस भाषा में लिखा गया है।
जैसे– पाली, प्राकृत अथवा तमिल- आम लोगों की भाषा।
संस्कृत- पुरोहित तथा खास वर्ग की भाषा।
इतिहासकार ग्रंथ के प्रकार पर ध्यान देते हैं, ग्रंथ कई प्रकार के हो सकते हैं।
जैसे- कथा ग्रंथ या मंत्र ग्रंथ
कथा- जिसे लोग पढ़ और सुन सकते थे।
मंत्र- अनुष्ठान के दौरान अनुष्ठानकर्ता द्वारा पढ़े और उच्चारित किए जाते थे।
इतिहासकार लेखकों का विशेष ध्यान रखते हैं।
किस ग्रंथ को किस लेखक ने लिखा है उस लेखक का दृष्टिकोण क्या है।
इतिहासकार ग्रंथ के श्रोताओं पर भी ध्यान देते हैं क्योंकि कोई भी ग्रंथ श्रोता की अभिरुचि को ध्यान में रखकर ही लिखा जाता है।
इतिहासकार ग्रंथ के काल का भी ध्यान रखते हैं कि वह ग्रंथ किस काल में लिखा गया है
उस समय की सामाजिक स्थिति क्या थी।
ग्रंथ की रचनाभूमि का भी ध्यान रखा जाता है कि ग्रंथ को किस स्थान पर लिखा गया है।
इन सारी बातों पर विशेष ध्यान रखकर विश्लेषण करने के बाद ही
इतिहासकार किसी ग्रंथ की विषयवस्तु का
इतिहास के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल करते हैं।

भाषा एवं विषयवस्तु
महाभारत का जो पाठ हम इस्तेमाल कर रहे हैं।
वह संस्कृत भाषा में है।
महाभारत की संस्कृत भाषा वेदों और प्रशस्तिओं की संस्कृत भाषा से काफी सरल है।
इसकी भाषा सरल होने के कारण इसको व्यापक स्तर पर आसानी से समझा जाता था।
इतिहासकार महाभारत ग्रंथ की विषयवस्‍तु को दो मुख्‍य शीर्षकों- आख्‍यान और उपदेशात्‍मक के अंतर्गत रखते हैं। आख्‍यान में कहानी का संग्रह है और उपदेशात्‍मक में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण है।
ज्यादातर इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं की महाभारत ग्रंथ एक भाग में नाटकीय कथानक था।
इसमें उपदेशात्मक भाग बाद में जोड़े गए हैं

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लेखक एक या अनेक और तिथियां
महाभारत की मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे इन्हें सूत कहा जाता था।
यह क्षत्रीय योद्धाओं के साथ युद्ध भूमि में जाते थे।
तथा उनकी विजयगाथा व उनकी उपलब्धियों के बारे में कविताएं लिखते थे।
इन रचनाओं का प्रेषण मौखिक रूप से ही होता था।
लेकिन पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अपना अधिकार कर लिया और इसको लिखित रूप प्रदान किया।
लगभग 200 BC से 200 AD के बीच महाभारत के रचना काल का एक और चरण दिखा।
इस समय भगवान विष्णु की पूजा अधिक होने लगी थी।
श्री कृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था।
बाद में लगभग 200 से 400 ईसवी AD के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते उपदेशात्मक प्रकरण (Topic) महाभारत में जोड़े गए।
प्रारंभ में यह ग्रंथ 10000 श्लोकों से कम का था।
लेकिन धीरे धीरे इस में श्लोकों की संख्या बढ़ती गई और एक लाख श्लोक हो गए।
साहित्यिक परंपरा में महाभारत के रचयिता ऋषि व्यास को माना जाता है।

सदृश्यता की खोज
महाभारत में भी अन्य ग्रंथों की तरह युद्ध, वन, महल, बस्ती आदि का जीवंत चित्रण मौजूद है।
1951-52 में पुरातत्ववेता बी. बी. लाल ने मेरठ ( वर्तमान उत्तर प्रदेश ) के हस्तिनापुर गांव में उत्खनन काम किया।
ऐसा हो सकता है कि यह स्थान कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती है।
जिसका वर्णन महाभारत में मिलता है।
बी. बी. लाल को क्षेत्र में आबादी के 5 स्तर के सबूत मिल गए।
बी. बी. लाल ने दूसरे स्तर पर मिलने वाले घरों के बारे के लिखा।
“जिस क्षेत्र का उत्खनन किया गया है वहां घरों को बनाने की कोई निश्चित परियोजना नहीं मिली लेकिन यहां पर मिट्टी की बनी दीवारे और कच्ची मिट्टी की बनी मिली है”
सरकंडे की छाप वाली मिट्टी के प्लास्टर की खोज की गई है।
इससे यह पता लगता है कि कुछ घरों की दीवारों सरकंडे (नरकट जैसा पौधा जो नदी-तालाब में पाया जाता है। इससे टोकरियाँ, पेटियाँ और नाव बनाए जाते हैं।) से बनाई गई थी।
और उसके ऊपर मिट्टी का प्लास्टर चढ़ा दिया गया।
घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने थे।
घरों के गंदे पानी के निकास के लिए ईंटो के नाले बनाए गए थे।
कुँए के साक्ष्य भी मिले हैं, कुएं का प्रयोग होता था।
मल की निकासी वाले गर्त का प्रयोग होता था।
महाभारत ग्रंथ की सबसे चुनौतीपूर्ण कथा द्रोपदी से 5 पांडवों के विवाह की है।
इससे ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उस समय बहुपति प्रथा रही होगी।
समय के साथ बहुपति प्रथा बाद में ब्राह्मणों में अमान्य हो गई।
लेकिन हिमालय क्षेत्र में यह प्रथा आज भी प्रचलन में है।
ऐसा माना जाता है कि उस समय स्त्रियों की कमी होने के कारण बहुपति प्रथा को अपनाया गया।

एक गतिशील ग्रंथ
महाभारत को एक गतिशील ग्रंथ कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना हजार वर्ष तक होती रही है।
इसमें नए-नए प्रकरण (टॉपिक) जुड़ते चले गए।
महाभारत का विकास केवल संस्कृत पाठ के
साथ ही समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि शताब्दियों से इस महाकाव्य के कई
भाग भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए।
अनेक कहानियों को जिन का उद्भव एक विशेष क्षेत्र में हुआ। इस महाकाव्य में समाहित कर लिया गया।
इसके प्रसंगों को मूर्तिकला और चित्रों में भी दर्शाया गया।
इसमें नाटक और नृत्य कला के लिए भी विषय वस्तु प्रदान की गई है। Class 12th History Chapter 3 Bandhutva jati tatha varg Notes

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2. Raja kisan aur nagar | राजा, किसान और नगर नोट्स

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ दो राजा, किसान और नगर (Raja kisan aur nagar) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

Raja kisan aur nagar

2. राजा, किसान और नगर (Raja kisan aur nagar)

नंन्द वंश के संस्थापक महापद्मनन्द था। नन्द वंश का अगला शासक धनानन्द था।
धनान्द को चन्द्रगुप्त मौर्य ने पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना किया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाल लिया। आरंभिक अभिलेख तथा सिक्के में इन्हीं लिपियों का उपयोग किया गया था।
जेम्स प्रिंसेप ने पता लगा लिया कि अधिकतर अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी लिखा है।
पियदस्सी का अर्थ- मनोहर मुखाकृति वाला राजा।
कुछ अभिलेखों में राजा का नाम अशोक भी लिखा मिला है।
क्योंकि बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक सबसे अधिक प्रसिद्ध शासक था।
अभिलेख की परिभाषा पत्थर ,धातु तथा मिट्टी के बर्तन पर खुदे हुए लेख को अभिलेख कहा जाता है।
जो भी व्यक्ति अभिलेखों को बनवाते थे उनमें उन लोगों की उपलब्धियां उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य तथा उनके विचारों को लिखा जाता था।
अधिकतर अभिलेख राजाओं के क्रियाकलाप, विजय अभियान तथा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का ब्यौरा देते हैं।
कुछ अभिलेखों में इनके निर्माण की तारीख भी मिली है।
प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे जाते थे।
प्राकृत भाषा आम जनता की भाषा थी।
इसके अलावा तमिल, पाली, संस्कृत जैसी भाषा के शब्द भी अभिलेखों में मिले हैं।
अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेख शास्त्र कहा जाता है।

जनपद और महाजनपद
जनपद- जनपद दो शब्दों जन और पद से मिलकर बना है। जन का अर्थ जनता और पद का अर्थ पैर होता है। अर्थात जहां लोग आकर बस जाए।
ऐसा क्षेत्र जहां लोग निवास करते हैं। जनपद कहलाता है।
महाजनपद- लगभग 2500 वर्ष पूर्व कई जनपद अधिक महत्वपूर्ण हो गए थे। इन्हें महाजनपद कहा जाने लगा था।
अधिकतर महाजनपदों की एक राजधानी होती थी।
इन राजधानियों की किलेबंदी की गई थी।
किलेबंद राजधानी का रखरखाव सेना तथा नौकरशाहों द्वारा किया जाता था।
अधिकांश महाजनपदों पर राजा का शासन होता था।
लेकिन गण और संघ के नाम से प्रसिद्ध राज्य में कई लोगों का समूह शासन करता था, इस समुह का प्रत्‍येक व्‍यक्ति राजा कहलाता था।
16 महाजनपदों का उल्लेख बौद्ध और जैन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। मगध, गांधार, वज्जि, कौशल, कुरु, पांचाल, अवंती इन महाजनपदों का नाम कई बार मिलता है।
भगवान महावीर तथा भगवान बुद्ध इन्हीं गण से संबंधित थे।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व एक परिवर्तनकारी काल
छठी शताब्दी इसा पूर्व को एक परिवर्तनकारी काल माना जाता है क्योंकि इस काल में आरंभिक राज्यों का उदय हुआ, नगरों का उदय हुआ, लोहे का प्रयोग बढ़ गया, तथा सिक्कों का विकास हुआ।
बौद्ध और जैन दार्शनिक विचारधाराओं का विकास हुआ।
ब्राह्मणों द्वारा धर्मशास्त्र नामक ग्रंथों की रचना की गई।
धर्म शास्त्रों के अनुसार क्षत्रिय ही राजा बन सकते थे। राजा का काम किसानों व्यापारियों तथा शिल्पकार से कर तथा भेंट वसूलना था।
धीरे-धीरे राज्य अपनी स्थाई सेना और नौकरशाही तंत्र बनाने लगे थे।
समूहशासन उसे कहते हैं जहाँ सत्ता पुरूषों के एक समुह के हाथ में होती थी।

16 महाजनपदों में प्रथम : मगध
मगध बिहार राज्य में स्थित है।
मगध छठी से चौथी शताब्दी ई. पूर्व में सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया था।
इसके शक्तिशाली होने के पीछे कई कारण हैं।
जैसे- उपजाऊ भूमि थी जिससे अच्छी फसल होती थी।
लोहे की खदान उपलब्ध थीं।
लोहे से औजार तथा हथियार बनाना आसान था।
जंगलों में हाथी उपलब्ध थे।
सेना में हाथियों को शामिल किया जाता था।
गंगा और इसकी उपनदियों से आने जाने का रास्ता आसान और सस्ता था।
मगध प्राकृतिक रूप से सुरक्षित था।
मगध में योग्य तथा शक्तिशाली शासक थे।
जैसे- बिंबिसार, अजातशत्रु, महापद्मनंद।
इन शासकों की बेहतर नीतियों के कारण मगध इतना समृद्ध था।
प्रारंभ में राजगाह (राजगृह या राजगीर) मगध की राजधानी होती थी।
परंतु चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में इसकी राजधानी पाटलिपुत्र को बनाया गया।
शासक उदायिन के समय मगध की राजधानी पाटलिपुत्र लाया गया।
मगध का दूसरा शासक शिशुनाग ने पाटलिपुत्र से राजधानी वैशाली ले गया। फिर कालाशोक ने अंतिम रूप से मगध की राजधानी पाटलिपुत्र लाया।

मौर्य साम्राज्य (321-185 ई. पू.)
धनानंद को चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा हराकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की गई। चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी।
चाणक्य को विष्णुगुप्त या कौटिल्य या गुणीपुत्र भी कहा जाता है। इन्होंने अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखी है। अर्थशास्‍त्र राजनीति से संबंधित पुस्‍तक हैा

मौर्य साम्राज्य के जानकारी के स्रोत
मौर्य वंश की जानकारी बौद्ध तथा जैन साहित्य से मिलती है।
इसके जानकारी के दूसरे स्त्रोत प्राचीन भवन, स्तूप, इमारतें, गुफाएं, मृदभांड, अभिलेख, असोक के अभिलेख, मूर्तिकला, अर्थशास्त्र, इंडिका, पुराण, मुद्राराक्षस आदि से मिलते हैं।
जैन और बौद्ध साहित्य मौर्य साम्राज्य के बारे में विस्तृत वर्णन करते हैं।

चाणक्य द्वारा लिखी अर्थशास्त्र मौर्य साम्राज्य के बारे में जानकारी देती है।
अर्थशास्त्र में राजनीति तथा लोक प्रशासन का वर्णन मिलता है।
यूनानी राजदूत मेगास्थनीज द्वारा लिखी गई इंडिका मौर्य साम्राज्य का वर्णन करते हैं।
पुराणों से मौर्य साम्राज्य की जानकारी मिलती है।
विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में यह बताया गया है कि किस प्रकार से चाणक्य नीति के द्वारा चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश को समाप्त करके मौर्य साम्राज्य स्थापित किया।
ब्राहमण ग्रंथ तथा धर्म शास्त्रों से उस समय के समाज तथा उनके नियमों का वर्णन मिलता है।
मौर्य काल के प्राचीन भवन तथा स्तूप से जानकारी प्राप्त होती है। मौर्यकालीन मृदभांड से मौर्य इतिहास की जानकारी मिलती हैं। पत्थर पर लिखे अभिलेख मौर्य काल की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। मौर्य काल की मूर्तिकला मौर्य इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है

मौर्य साम्राज्य में प्रशासन
चंद्रगुप्त मौर्य के पुत्र- बिन्दुसार
बिन्दुसार के पुत्र- असोक
मौर्य साम्राज्य के पांच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे।
जिसमें से एक राजधानी तथा चार प्रांतीय केंद्र थे।
राजधानी- पाटलिपुत्र (पटना) तथा चार प्रांतीय केंद्र- तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि तथा सुवर्ण गिरी।
अशोक के अभिलेखों के अनुसार पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर से लेकर (आंध्र प्रदेश) उत्तरांचल तक हर स्थान पर एक जैसे संदेश उत्कीर्ण मिले हैं।
तक्षशिला और उज्जैन दोनों लंबी दूरी वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित थे।
राजधानी से प्रांत तक जाने में कई सप्ताह या महीने का समय लगता होगा।
ऐसे में यात्रियों के विश्राम तथा खान-पान की व्यवस्था की गई होगी।
सुरक्षा का कार्य सेना को सौंपा गया था।

सेना
मेगास्थनीज के अनुसार- सैनिक गतिविधियों के लिए एक समिति और छः उपसमितियां थी।
मौर्य सामाज्य के पास विशाल सेना थी।
पहली का कार्य- नौसेना का संचालन
दूसरी का कार्य- यातायात, खान पान की देखरेख
तीसरी का कार्य- पैदल सैनिकों का संचालन
चौथी का कार्य- अश्वरोही
पांचवी का कार्य- रथारोही
छठी का कार्य- हाथियों का संचालन

अन्य उपसमितियां
उपकरण को ढोने के लिए बैलगाड़ी का प्रबंध करना।
सैनिकों के लिए भोजन की व्यवस्था करना।
जानवरों के लिए चारे की व्यवस्था करना।
सैनिक की देखभाल के लिए सेवकों को नियुक्त करना।

अशोक का धम्म
अशोक का धम्‍म निम्निलिखि था-
बड़ों का सम्मान करना, सत्य बोलना।
अपने से छोटों के साथ उचित व्यवहार करना।
विद्वानों ब्राह्मणों के प्रति सहानुभूति की नीति, अहिंसा का संदेश, सभी धर्मो का सम्मान, दासों और सेवकों के प्रति दयावान होना।
अशोक के अनुसार धम्म के माध्यम से लोगों का जीवन इस संसार में तथा इसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा।
धम्म के प्रचार के लिए धम्म महामात नाम के अधिकारी को नियुक्त किया जाता था।

मौर्य साम्राज्य का महत्व
19वीं सदी में जब इतिहासकारों ने भारत के आरंभिक इतिहास को लिखना शुरु किया तो मौर्य साम्राज्य को इतिहास का प्रमुख काल माना गया क्योंकि पहली बार चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा एक अखंड भारत बनाया गया।
मौर्य काल की मूर्तिकला सराहनीय थी।
मौर्य काल अशोक ने अपने नाम के आगे बड़ी बड़ी उपाधियां नहीं जोड़ी।
इतिहासकारों ने अशोक को एक महान सम्राट माना।
राष्ट्रवादी इतिहासकार के लिए अशोक को एक प्रेरणा का स्रोत माना गया।
मौर्य साम्राज्य मात्र 150 वर्ष तक ही चल पाया लेकिन भारतीय इतिहास में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

दक्षिण भारत
दक्षिण भारत के प्रमुख वंश सातवाहन, चोल, चेर, पांड्य थे।
दक्षिण के राजा तथा सरदार
भारत के दक्षिण में कुछ सरदरियो का उदय हुआ।
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल क्षेत्र में चोल, चेर और पांडय जैसी सरदारी अतित्व में आई।
यह राज्य काफी समृद्ध थे।

सरदार तथा सरदारी
सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता है सरदार का पद वंशानुगत भी हो सकता है और नहीं भी। सरदार के समर्थक उसके परिवार के लोग होते हैं।
सरदार के कार्य- अनुष्ठान का संचालन करना, युद्ध का नेतृत्व करना, लड़ाई, झगड़े, विवाद को सुलझाना था।
सरदार अपने अधीन लोगों से भेंट लेता था।
अपने समर्थकों में उस भेंट को बांट देता है।
सरदारी में कोई स्थाई सेना या अधिकारी नहीं होते थे।
इन राज्यों के बारे में जानकारी प्राचीन तमिल संगम ग्रंथों से मिलती है।
इन ग्रंथों में सरदारों के बारे में विवरण है।
कई सरदार तथा राजा लंबी दूरी के व्यापार से भी राजस्व इकट्ठा करते थे।
इनमें सातवाहन तथा शक राजा प्रमुख हैं।
शक राजा- मध्य एशियाई मूल से आए थे।

दैविक राजा
राजाओं के द्वारा उच्च स्थिति प्राप्त करने का एक माध्यम देवताओं से जुड़ना था। कुषाण राजा जिन्होंने मध्य एशिया से लेकर पश्चिम उत्तर भारत तक शासन किया।
इन शासकों ने मंदिरों में अपनी विशाल मूर्तियां लगवाई।
शायद वह स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे।
कुषाण राजा ने अपने नाम के आगे देवपुत्र की उपाधि भी लगाई थी।
कुषाण काल के सिक्कों में भी एक तरफ राजा और दूसरी तरफ देवता का चित्र होता था।
शुद्ध सोने का सिक्‍का कुषाण वंशों ने चालू किया था।
उत्तर प्रदेश में मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण राजा की विशाल मूर्ति मिली है।
अफगानिस्तान के एक देवस्थान पर भी ऐसी ही मूर्ति मिली है।

गुप्त साम्राज्य
मौर्य काल के बाद गुप्तकाल को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। गुप्त साम्राज्य की स्थापना श्रीगुप्त द्वारा लगभग 275 ईसवी में की गई थी।
गुप्त काल की राजकीय भाषा संस्कृत थी।
गुप्त काल में अधिकतर सिक्के सोने से बनाए जाते थे।
सार्वाधिक सोन का सिक्‍का गुप्‍त काल में प्रचलित था, लेकिन अशुद्ध था।
शुद्ध चाँदी का सिक्‍का गुप्तकाल में शुरू किया गया। मयूर शैली का सिक्‍का भी गुप्‍त काल में शुरू किया गया था।
गुप्त साम्राज्य का इतिहास साहित्यिक स्रोतों, सिक्कों तथा अभिलेखों की सहायता से जानकारी लेकर लिखा गया है।
गुप्त साम्राज्य में कवियों द्वारा अपने राजा की प्रशंसा में लिखी गई।
प्रशस्ति भी एक ऐतिहासिक स्रोत है।
उदाहरण- प्रयाग प्रशस्ति।
प्रयाग प्रशस्ति- यह एक अभिलेख है, जिसे समुद्रगुप्‍त के दरबारी कवि हरिषेण के द्वारा लिखा गया है। इस अभिलेख में समुद्रगुप्‍त के विजय अभियान की चर्चा की गई है। यह अभिलेख प्रयाग (इलाहाबाद) में लगाया गया था।
प्रयाग प्रशस्ति की रचना समुंद्र गुप्त के राजकवि हरिषेण द्वारा की गई। इसे संस्कृत भाषा में लिखा गया था।

जनता में राजा की छवि

जनता राजा के बारे में क्या सोचती थी इसके प्रमाण नहीं मिलते।
ऐसे में इतिहासकारों ने जातक तथा पंचतंत्र जैसे ग्रंथों में दी गई कहानियों की समीक्षा करके पता लगाने का प्रयास किया।
जातक कथाएं पहली सहश्रताब्दी ईस्वी के मध्य पाली भाषा में लिखी गई थी
उदाहरण- गंतिंदु जातक नामक कहानी
इसमें बताया गया कि एक कुटिल राजा से उसकी प्रजा किस प्रकार से दुखी रहती है। बूढे़ महिला पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक, यहां तक कि जानवर भी इसमें शामिल है। जब राजा अपनी पहचान बदल कर प्रजा के बीच में पता लगाने गया कि लोग उसके बारे में कैसा सोचते हैं तो सब ने उसकी बुराई करनी शुरू कर दी।
लोगों ने शिकायत की कि रात में डकैत लोगों पर हमला करते हैं तथा दिन में राजा के अधिकारी टैक्स इकट्ठा करने के लिए आ जाते थे। इसीलिए लोग गांव छोड़कर जंगल में बस गए।

उपज बढ़ाने के तरीके
उपज बढ़ाने के लिए किसान निम्‍नलिखित विधियों का प्रयोग करते थे—
लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग करना।
कुएं, तालाब और नहरों के द्वारा से सिंचाई करना।
पर्वतीय क्षेत्रों में खेती के लिए कुदाल का उपयोग करना।
गंगा की घाटी में धान की रोपाई के कारण उपज बढ़ गई।

ग्रामीण समाज में विभिन्नताएं
कृषि की नई तकनीक अपनाने के बाद उपज जरूर बढ़ी लेकिन इसका लाभ सबको नहीं हुआ।
खेती से जुड़े लोगों में भेद बढ़ता जा रहा था।
बौद्ध कथाओं में भूमिहीन किसान तथा श्रमिक ,जमींदार का उल्लेख मिला है।
पाली भाषा में गहपति शब्द का प्रयोग छोटे किसान और जमीदारों के लिए किया जाता था।
बड़े-बड़े जमीदार और गांव के प्रधान शक्तिशाली थे जो कि किसानों पर अपना नियंत्रण रखते थे।
गांव के प्रधान का पद वंशानुगत होता था।
गहपति- इसके अंदर किसान, जमींदार, सधारण व्यक्ति, व्यापारी आते थे।
गहपति- गहपति घर का मुखिया होता था और घर में रहने वाली महिलाओं, बच्चों, नौकरों और दासों पर नियंत्रण करता था। घर से जुड़े भूमि, जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का वह मालिक होता था। कभी-कभी इस शब्द का प्रयोग नगरों में रहने वाले संभ्रांत व्यक्तियों (समाज या समुदाय में उस छोटे से गुट को संभ्रांत कहते हैं जो अपनी संख्या से कहीं ज़्यादा धन, राजनैतिक शक्ति या सामाजिक प्रभाव रखता है।) और व्यापारियों के लिए भी होता था।
हर्षचरित संस्‍कृत में लिखी गई हर्षवर्धन की जीवनी है, जिसे हर्षवर्धन के राजकवि वाणभट्ट ने लिखा है।

भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीण
भूमिदान अधिकतर ब्राह्मणों को या धार्मिक संस्थाओं को दिए जाते थे।
ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से ही भूमि दान के प्रमाण मिले है।
कई अभिलेखों में भूमि दान का उल्लेख मिलता है
कुछ अभिलेख पत्थरों पर लिखवाए गए थे
अधिकतर भूमिदान का उल्लेख ताम्र पत्रों पर उत्कीर्ण मिला है
आरंभिक अभिलेख संस्कृत भाषा में थे
लेकिन 7 वीं शताब्दी के बाद के अभिलेख संस्कृत, तमिल ,तेलुगू भाषाओं में भी मिले हैं
उदाहरण
गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाद दक्कन के वाकाटक परिवार में हुआ था।
संस्कृत धर्मशास्त्र के अनुसार महिलाओं का
भूमि का अधिकार नहीं होता था।
लेकिन अभिलेख से जानकारी मिली है कि प्रभावती भूमि की मालकिन थी और प्रभावती ने भूमिदान भी की थी।
शायद इसलिए कि वह एक रानी थी और ऐसा इसलिए भी संभव हो सकता है
कि धर्मशास्त्रों को हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किया जाता हो
भूमिदान के अभिलेख देश के कई हिस्सों से मिले हैं
अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह की भूमि दान में दी गई है
कुछ स्थानों पर बहुत छोटी भूमि दान में दी है।
तो कुछ स्थानों में बहुत बड़ी-बड़ी भूमि दान में दी गई है।
दान प्राप्त करने वाले लोगों के अधिकारों में भी अलग-अलग क्षेत्रों में परिवर्तन देखने को मिला है।

इतिहासकारों में भूमिदान के प्रभाव को लेकर विवाद
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि शासक भूमिदान के द्वारा कृषि को प्रोत्साहित करना चाहते थे।
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि भूमिदान एक संकेत है।
राजनीतिक प्रभुत्व का दुर्बल होने का राजा समर्थन जुटाने के लिए भूमिदान करते थे।

नगर एवं व्यापार
नए नगर
अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियां थे।
ज्यादातर नगर संचार मार्ग के किनारे बसे थे।
पाटलिपुत्र (पटना) – नदी के किनारे
उज्जयिनी – भूतल मार्ग के किनारे
पुहार- समुद्र तट के किनारे
मथुरा- व्यवसायिक सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधि का केंद्र

नगरीय जनसंख्या
नगरों में विभिन्न प्रकार के लोग रहते थे।
शासक किलेबंद नगरों में रहते थे।
इन क्षेत्रों से कई पुरा अवशेष प्राप्त हुए हैं
जैसे- मिट्टी के कटोरे और थालियां जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है तथा सोने-चांदी, कांस्य, तांबे, हाथी दांत, शीशे जैसे अलग-अलग पदार्थों के गहने, उपकरण, हथियार, बर्तन आदि।
दूसरी शताब्दी ई. तक आते-आते कई नगरों से दानात्मक अभिलेख प्राप्त हुए।
इन अभिलेखों में दान देने वाले का नाम तथा उसका व्यवसाय भी लिखा था।
इनमें नगरों में रहने वाले धोबी, बुनकर, बढ़ई, लिपिक, कुम्हार, स्वर्णकार अधिकारी, धर्मगुरु, व्यापारी और राजाओं के विवरण लिखे होते हैं।
श्रेणी का भी उल्लेख मिला है , श्रेणी व्यापारियों के संघ को कहा जाता था
यह व्यापारी लोग कच्चे माल को खरीद कर
उनसे सामान बनाकर बाजार में बेच देते थे

उपमहाद्वीप और उसके बाहर का व्यापार
भारत का व्यापार प्राचीन काल से ही बाहर से होता था।
हमें हड़प्पा सभ्यता में भी ऐसे प्रमाण मिले हैं
छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ही उपमहाद्वीप में जलमार्ग और भू मार्ग का जाल बिछ गया था।
भू मार्ग के जरिए मध्य एशिया तथा उससे आगे भी व्यापार होता था।
समुद्र तट पर बने बंदरगाहों से अरब सागर होते हुए उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया तक, बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिण पूर्व एशिया की तरफ शासक इन मार्गों पर नियंत्रण करके व्यापारियों से सुरक्षा के बदले धन लेते थे।
इन मार्गों पर जाने वाले व्यापारियों में पैदल फेरी लगाने वाले व्यापारी बैलगाड़ी और घोड़े पर जाने वाले व्यापारी समुद्री मार्ग से भी लोग यात्रा करते थे जो खतरनाक लेकिन लाभदायक भी था।
कुछ  प्रसिद्ध सफल व्यापारी बहुत धनी होते थे।
यह व्यापारी नमक, कपड़ा, अनाज, धातु से बनी चीज ,पत्थर, लकड़ी ,जड़ी बूटी जैसे अनेक सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाते थे।
रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसाले तथा कपड़े और जड़ी बूटियों की बहुत भारी मांग थी।
इन वस्तुओं को अरब सागर के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता था।

सिक्के और राजा
व्यापार के लिए सिक्कों का प्रयोग किया जाता था। सिक्कों के प्रयोग से व्यापार काफी हद तक आसान हो गया। चांदी तथा तांबे के सिक्के सबसे पहले ढाले गए। (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) इन सिक्कों को आहत सिक्के कहा जाता था। ऐसे बहुत सारे सिक्के विभिन्न स्थलों पर खुदाई के दौरान मिले हैं।
मुद्रासास्त्रियों ने इन सिक्कों का अध्ययन करके इनके वाणिज्यिक प्रयोग के क्षेत्रों का पता लगाया है। आहत सिक्के पर बने प्रतीकों से पता लगता है कि इन्हें विभिन्न राजाओं द्वारा जारी किया गया था।
लेकिन ऐसा भी संभव है कि धनी लोगों, व्यापारियों, नागरिकों ने भी इस प्रकार के कुछ सिक्के जारी किए हैं।
शासकों की प्रतिमा और उनके नाम के साथ सबसे पहले सिक्कों को हिंद- यूनानी शासकों ने जारी किया था।
सोने के सिक्के सबसे पहले पहली शताब्दी ईस्वी में कुषाण शासकों के द्वारा जारी किए गए। उत्तर और मध्य भारत में ऐसे सिक्के मिले हैं।
सोने के सिक्कों का प्रयोग संभवत बहुमूल्य वस्तुओं के व्यापार में किया जाता होगा। दक्षिण भारत में बड़ी संख्या में रोमन सिक्के मिले हैं।
पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के यौधेय शासकों द्वारा तांबे के सिक्के भी जारी किए गए थे।
गुप्त काल में कुछ शासकों द्वारा सोने के भव्य सिक्के जारी किए गए। इन सिक्कों में सोना उच्च गुणवत्ता का था।

छठी शताब्दी ई. में सोने के सिक्के मिलने कम क्यों हो गए ?
कुछ इतिहासकार का मानना है कि रोमन साम्राज्य का पतन होने के कारण व्यापार में कमी आई।
अन्य इतिहासकारों का मानना है कि इस काल में नए नगरों और व्यापार के नए तंत्रों का उदय हुआ था। सिक्‍के इसलिए भी कम मिलने लगे कि किसी ने उनका संग्रह करके नहीं रखा था।

अभिलेखों का अर्थ कैसे निकाला जाता है ?
अभिलेख का अर्थ निकालने के लिए विद्वान विभिन्न लिपियों का अध्ययन करते हैं। प्राचीन लिपियों का आधुनिक लिपियों से मिलान करते हैं

ब्राह्मी लिपि का अध्ययन
भारत की जितनी भी आधुनिक भाषाएं हैं इन में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है अशोक के जो अभिलेख मिले हैं वह अधिकतर ब्राह्मी लिपि में थे। 18 वीं सदी में यूरोप के विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता लेकर आज के समय की बंगाली और देवनागरी लिपि में कई पांडुलिपियों का अध्ययन शुरू किया। इनके अक्षर का प्राचीन अक्षरों से तुलना की।
अभिलेखों का अध्ययन करने वाले कुछ विद्वानों ने कई बार अनुमान लगाया कि यह संस्कृत में लिखें लेकिन यह प्राकृत में लिखे गए थे फिर कई दशकों की मेहनत के बाद जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के काल की ब्राह्मी लिपि में लिखे अभिलेखों का अर्थ 1838 में निकाल लिया।

अभिलेखों से प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्य
अशोक की उपाधि
देवंप्रिय- देवताओं का प्रिय
प्रियाद्सी- देखने में सुन्दर, मनोहर मुखाकृति वाला राजा।

खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया
खरोष्ठी लिपि में लिखे गए अभिलेख पश्चिमोत्तर में मिले हैं
इस क्षेत्र में हिंद यूनानी शासकों का शासन था।
इन शासकों ने सिक्कों में अपने नाम यूनानी और खरोष्ठी लिपि में लिखवाए थे।
यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया और इनका अर्थ निकालने का प्रयास किया।

अभिलेख साक्ष्य सीमा
अभिलेख से संबंधित निम्‍नलिखित कठिनाईयां आती है—
अक्षरों का हल्के ढंग से उत्कीर्ण होना, अभिलेखों का नष्ट हो जाना।
अभिलेखों पर अक्षर लुप्त होना, कुछ अभिलेख सुरक्षित नहीं बचे।
अभिलेख के शब्दों का वास्तविक अर्थ की पूरी जानकारी न होना।
अभिलेखों में रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में जानकारी ना होना।

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1. ईंट, मनकें और अस्थियाँ | Class 12th History iit manke tatha asthiyan

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ एक ईंट, मनकें और अस्थियाँ (iit manke tatha asthiyan) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इस पाठ से संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

iit manke tatha asthiyan

1. ईंट, मनकें और अस्थियाँ (Class 12th Chaper 1 Iit manke tatha asthiyan)

ऐसा माना जाता है कि मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिश्र की सभ्यता तथा चीन की पीली नदी की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है।
विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता मेसोपोटामिया की सभ्यता है। जो एक ग्रामीण सभ्यता थी।
सिंधू सभ्यता
विश्व की प्रथम नगरीय सभ्यता सिंधू सभ्यता है जिसकी खोज 1920 के दशक में हुई। जिससे ज्ञात हुआ की हड़प्पा सभ्यता जैसा आज तक कोई सभ्यता कोई भी नगरीय सभ्यता नहीं थी।
इस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
सिंधु सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता इसलिए कहा जात है कि इस सभ्यता की खुदाई सबसे पहले हड़प्पा नामक स्थल से हुई।
अर्थात सिंधू सभ्यता की पहली खुदाई हड़प्पा नामक स्थल से होने के कारण सिंधू सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
जब अंग्रेजों के द्वारा पंजाब प्रांत से रेलवे लाईन बिछाई जा रही थी, तो उत्खनन कार्य के दौरान कुछ इंजीनियरों को हड़प्पा पुरास्थल मिला, फिर जब विस्तार से उसकी खुदाई की गई तो इससे पता चला कि यहाँ एक सभ्यता बसती थी।
हड़प्पा सभ्यता की जानकारी चार्ल्स मैसन ने दिया था।
इसका सर्वेक्षण कनिंघम ने किया तथा जॉर्न मार्शल के नेतृत्व में इस सभ्यता की खुदाई हुई।
इस सभ्यता की प्रमुख स्थल हड़पा, मोहनजोदड़ो, कालिबंगा, सुरकोटदा, लोथल, बनवाली, आलमगीरपूर, रंगपूर, रोपड़ आदि हैं।
सिंधू सभ्यता के लगभग 300 स्थल पाए गए।
यह सभ्यता 13 लाख वर्ग किमी में फैली हुई थी।
इस सभ्यता का नामकरण जॉन मार्शल ने किया था।
इस सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार है।
सिंधू सभ्यता का काल 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक है।
इस सभ्यता को सिंधु नदी के किनारे बसे होने के कारण इसका नाम सिंधु सभ्यता या सिंधु घाटी सभ्यता पड़ा।
इस सभ्यता के अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि और व्यापार था।
गेहूँ, जौ, दाल, सफेद, तिल और बाजरे उगाने का साक्ष्य मिला है।
ये लोग भेड़, बकरी, भैंस तथा सुअर का पालन करते थे।
इस सभ्यता में मछली तथा हड्डीयों के साक्ष्य मिले हैं।
इससे यह अनुमान लगता है कि हड़प्पाई निवासी जानवरों का मांस खाते थे।
सिंधु सभ्यता के लोग गाय से परिचित नहीं थे।
इस सभ्यता के लोग युद्ध और तलवार से परिचित नहीं थे।
यहाँ माप-तौल का न्यूनतम बाट 16 किलोग्राम का था।
यहाँ की सड़कें तथा नालियाँ ग्रीड पद्धति से बनाए गए हैं, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थी।
इनका व्यापार विदेशों से होता था।
इनका समाज मातृसतात्मक थी।
ये लोग अपने पूर्वजों को उत्तर-दक्षिण दिशा में दफनाते थे।
ये अपने पूर्वजों को दफनाते समय घड़ा रख देते थे।
यहाँ कीमती रत्नों के साथ पूर्वजों को दफनाने की परम्परा नहीं थी।
यहाँ के निवासी जानवरों के मांस खाते थे।
यह कृषि में टेराकोटा (पक्की हुई मिट्टी) के हल का प्रयोग करते थे।
यहाँ के मुहर पर वृभष का चित्र तथा एक सिंग वाले जानवर का चित्र मिलता है।
इतिहासकारों का अनुमान है कि सिंधु सभ्यता के निवासी खेत जोतने में बैल का प्रयोग करते थे।
हरियाणा के एक स्थल बनवाली से टेराकोटा (मिट्टी) के बने हल का साक्ष्य मिला हुआ है।
तथा गुजरात के कालीबंगा से जुते हुए खेत का प्रमाण मिले हैं।
इस सभ्यता के लोहे से परिचित नहीं थे।
इस समय के हथियार पत्थर तथा कांस्य का होता था।
सिंधु सभ्यता के लोग सिंचाई के लिए कुआँ और जलाशयों का प्रयोग करते थे।
अफगानिस्तान में शोतुघई से नहरों के प्रमाण मिले हैं तथा गुजरात के धौलावीरा से जलाशय का प्रमाण मिले हैं।
सिंधु सभ्यता का पश्चिमी क्षोर- सुतकागैंडोर (पाकिस्तान), उत्तरी क्षोर- माण्डा (कश्मीर), पूर्वी क्षोर- आलमगीरपूर (उŸारप्रदेश) तथा दक्षिणी क्षाेेर- दैमाबाद (महाराष्ट्र) थी।
हड़प्पा सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी।
सबसे पहले खोजा गया स्थल हड़प्पा था।
लेकिन सबसे प्रसिद्ध स्थल मोहनजोदड़ो था।
पुरास्थल ऐसे स्थल को कहते हैं जिस स्थल पर पुराने औजार, बर्तन (मृदभांड), इमारत तथा इनके अवशेष मिलते हैं।
यह एक शहरी नियोजित शहरी केंद्र था।
यहां बस्ती दो भागों में विभाजित थी।
पहला दूर्ग और दूसरा निचला शहर
दुर्ग ऊँचाई पर स्थित था साथ ही छोटा था।
दुर्ग में अमीर और सम्पन्न लोग रहते थे।
निचला शहर कम ऊँचाई पर था तथा इसमें आम लोग रहते थे।
यह बड़े क्षेत्र में था।
हड़प्पा स्थल की खुदाई दयाराम साहनी ने 1921 में किया।
मोहनजोदड़ो की खुदाई राखलदास बनर्जी ने 1922 में किया।
हड़प्पा, कोटदीजी और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में है तथा सुरकोटदा, रंगपुर तथा लोथल गुजरात में है।
गुजरात का लोथल एक बंदरगाह था तथा व्यापारिक नगर भी था। यहाँ से फारस का व्यापार होता था।
राजस्थान के कालिबंगा से चुड़ी का साक्ष्य मिला है।
मोहनजोदड़ों का अर्थ- ‘मृतकों का टिला‘ होता है।
दुर्ग की विशेषता
दुर्ग को चारों तरफ से दीवार से घेरा गया था। यह दीवार निचले शहर को अलग करती थी।
अन्नागार में अनाज रखा जाता था।
हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा अन्नागार पुरास्थल मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुआ था।
विशाल स्नानागार- सबसे बड़ा विशाल स्नानागार का प्रमाण मोहनजोदड़ो से मिले हैं।
यह आँगन में बना एक आयताकार जलाशय होता था, जो चारों ओर से एक गलियारे से घिरा हुआ था।
जलाशय तक जाने के लिए इसमे सीढ़ियां बनी थी।
जलाशय का पानी एक बड़े नाले के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता था।
संभवतः इसका उपयोग अनुष्ठान के स्नान के लिए किया जाता होगा।
निचला शहर की विशेषता
दुर्ग की तुलना में नीचला शहर कम ऊँचाई पर थे।
यहाँ आवासीय भवन थे।
निचले शहर दुर्ग के मुकाबले अधिक बड़े क्षेत्र में बसा था।
इसको भी दीवार से घेरा गया था।
यहां भी कई भवनों को ऊँचे चबुतरे पर बनाया गया था।
यह चबूतरे नींव का काम करते थे।
जल निकासी की व्यवस्था
हड़प्पा शहरों में नियोजन के साथ जल निकासी की व्यवस्था की गई थी।
सड़कों और गलियों को लगभग ग्रीड पद्धति से बनाया गया था।
यह एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।
हाड़प्पाई भवनों को देखकर ऐसा पता लगा है।
कि पहले यहां नालियों के साथ गलियां बनाई गई।
उसके बाद गलियों के अगल-बगल मकान बनाए गए ।
प्रत्येक घर का गंदा पानी इन नालियों के जरिए बाहर चला जाता था।
यह नालियां बाहर जाकर बड़े नालों से मिल जाती थी।
जिससे सारा पानी नगर के बाहर चला जाता था
गृह स्थापत्य कला
मोहनजोदड़ो के निचले शहर में आवासीय भवन हैं ।
यहां के आवास में एक आंगन और उसके चारों और कमरे बने थे।
आंगन खाना बनाने और कताई करने के काम आता था।
यहां एकान्तता ( प्राइवेसी ) का ध्यान रखा जाता था।
भूमि तल ( ग्राउंड लेवल ) पर बनी दीवारों में।
खिड़कियां नहीं होती थीं मुख्य द्वार से कोई घर के अंदर या आंगन को नहीं देख सकता था।
हर घर में अपना एक स्नानघर होता था जिसमें ईटों का फर्श होता है।
स्नानघर का पानी नाली के जरिए सड़क वाली नाली पर बहा दिया जाता था कछ घरों में छत पर जाने के लिए सीढ़ियां बनाई जाती थी।
कई घरों में कुएं भी मिले हैं कुएं एक ऐसे कमरे में बनाए जाते थे।
जिससे बाहर से आने वाले लोग भी पानी पी सके।
आर्थिक और सामाजिक विभिन्‍नताएं
ऐसा अनुमान लगाया गया है। कि मोहनजोदड़ो में कुएं की संख्या लगभग 700 थी हड़़प्पाई समाज में भिन्नता का अवलोकन हर समाज में रहने वाले लोगों के बीच सामाजिक और आर्थिक भिन्नताएं होती हैं इन भिन्नताओं को जानने के लिए इतिहासकार कई तरीकों का प्रयोग करते है।
इन तरीकों में है एक है – शवाधान का अध्ययन हड़प्पा सभ्यता में लोग अंतिम संस्कार व्यक्ति को दफनाकर करते थे कई ऐसे साक्ष्य मिले हैं कि कई कब्र की बनावट एक दूसरे से भिन्न है।
कई कब्रों में ईंटों की चिनाई की गई थी।
कई कब्रों में मिट्टी के बर्तन तथा आभूषण भी दफना दिए जाते थे।
शायद यह लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते हो या यह सोच कर दफनाते हैं की मृत्यु के बाद इन वस्तओं का उपयोग ) किया जाएगा।
पुरुष तथा महिला दोनों के कब्र से आभूषण मिले हैं |
कुछ कब्रों में तांबे के दर्पण , मनके से बने आभूषण आदि मिले है। मिस्र के विशाल पिरामिड हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थे इनमें बड़ी मात्रा में धन-संपत्ति दफनाए जाती थी।
इसे देखकर ऐसा लगता है कि हड़प्पा के निवासी मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तु दफनाने में विश्वास नहीं करते थे।
इतिहासकारों द्वारा उत्पादन केंद्रों की पहचान
जिन स्थानों पर शिल्प उत्पादन कार्य होता था।
वहां कच्चा माल तथा त्यगि गई वस्तुओं का कूड़ा करकट मिला है इससे इतिहासकार अनुमान लगा लेते थे कि इन स्थानों में शिल्प उत्पादन कार्य होता था।
पुरातत्वविद सामान्यतः पत्थर के टुकड़े, शंख, तांबा अयस्क जैसे कच्चे माल, शिल्पकारी के औजार, अपूर्ण वस्तुएं, त्याग दिया गया माल, कूड़ा करकट ढूंढते हैं।
इनसे निर्माण स्थल तथा निर्माण कार्य की जानकारी प्राप्त होती है।
यदि वस्तुओं के निर्माण के लिए शंख तथा पत्थर को काटा जाता था तो इनके टुकड़े कूड़े के रूप में उत्पादन स्थल पर फेंक दिए जाते थे। कभी-कभी बेकार टुकड़ों को छोटे आकार की वस्तुएं बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था।
हड़प्पाई लिपि
हड़प्पाई लिपि चित्रात्मक लिपि थी।
इस लिपि में चिहनों की संख्या लगभग 375 से 400 के बीच है।
यह लिपि दाएं से बाएं और लिखी जाती थी।
हड़प्पा लिपि एक रहस्यमई लिपि इसलिए कहलाती है। क्योंकि इसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका।
बाट
इस सभ्यता का न्यूनतम् बाट 16 किलोग्राम का था।
बाट चटी नामक पत्थर से बनाए जाते थे।
छोटे बड़ों का प्रयोग आभूषण और मनको को तोलने के लिए किया जाता था।
धातु से बने तराजू के पलडे भी मिले हैं यह बाट देखने में बिल्कुल साधारण होते थे।
इनमें किसी प्रकार का कोई निशान नहीं बनाया जाता था।
हड़प्पाई शासक को लेकर पुरातत्वविदों में मतभेद
मोहनजोदड़ो से एक विशाल भवन मिला है।
जिसे प्रासाद की संज्ञा दी गई है।
लेकिन यहां से कोई भव्य वस्तु नहीं मिली एक पत्थर की मूर्ति को पुरोहित राजा का नाम दिया गया है। लेकिन इसके भी विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिले हैं।
कुछ पुरातत्वविद कहते हैं कि हड़प्पा समाज में शासक नहीं थे सभी की स्थिति समान थी।
कुछ पुरातत्वविद कहते हैं की हड़प्पा सभ्यता में कोई एक शासक नहीं थे
बल्कि यहां एक से अधिक शासक थे।
जैसे – मोहनजोदड़ो , हड़प्पा आदि में अलग-अलग राजा होते थे
हड़प्पा सभ्यता का पतन (अंत)
हड़प्पा सभ्यता के अंत के कई कारण हैं जिसमें से प्रमुख कारण हैं-बाढ़ आना, सिंधु नदी का मार्ग बदलना, भूकंप के कारण, जलवायु परिवर्तन, आर्यों का आक्रमण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन आदि है।

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