Bihar Board Class 12th History Solutions Notes भारतीय इतिहास के कुछ विषय | NCERT Class 12th History Solutions Notes in Hindi

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Bihar Board Class 12th History Solutions

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Class 12th History Solutions Notes इतिहास के सम्‍पूर्ण पाठ का व्‍याख्‍या

Bihar Board Class 12th History Solutions Notes

BSEB Bihar Board Class 12th History Book Solutions इतिहास
Class 12th History भाग 1: भारतीय इतिहास के कुछ विषय

Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता
Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ
Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज
Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास

Class 12th History भाग 2: भारतीय इतिहास के कुछ विषय

Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ
Chapter 6 भक्ति सूफी परंपराएँ
Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर
Chapter 8 किसान, जमींदार और राज्य
Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

Class 12th History भाग 3: भारतीय इतिहास के कुछ विषय

Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात
Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान
Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर, योजना , स्थापत्य
Chapter 13 महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आन्दोलन
Chapter 14 विभाजन को समझना
Chapter 15 संविधान का निर्माण

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15. Sanvidhan ka nirman | संविधान का निर्माण

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ पंद्रह संविधान का निर्माण (Sanvidhan ka nirman) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

15. संविधान का निर्माण

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है।
यह 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया था।

उथल पुथल का दौर
संविधान निर्माण से पहले के साल बहुत उथल पुथल वाले थे।
यह महान आशाओ का क्षण भी था और भीषण मोहभंग का भी।
15 अगस्त 1947 को भारत देश आजाद हुआ।
लेकिन इसका बंटवारा भी कर दिया गया।
लोगों में 1942 आंदोलन की यादें अभी जीवित थी।
सुभाष चंद्र बोस द्वारा किए गए प्रयास भी लोगों को बखूबी याद थे।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों राजनीतिक दल धार्मिक सौहार्द और सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने में असफल हुए।
1946 अगस्त महीने में कलकत्ता में हिंसा शुरू हुई।
यह हिंसा उत्तरी और पूर्वी भारत में लगभग साल भर चलती रही।
कई दंगे फसाद हुए, नरसंहार हुआ।
इसके साथ ही देश का बंटवारे की घोषणा भी हुई।
असंख्य लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने को मजबूर हुए।
आजादी का दिन खुशी का दिन था।
लेकिन इसी समय भारत के बहुत सारे मुसलमानों और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख के लिए एक निर्मम चुनाव का क्षण था।
लोगों को शरणार्थी बनकर यहां से वहां जाना पड़ा।
मुसलमान पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान की तरफ जा रहे थे।
वही हिंदू और सिख पश्चिमी बंगाल व पूर्वी पंजाब की तरफ बढ़े जा रहे थे।
उनमें से बहुत सारे बीच रास्ते में ही मर गए।
देश के सामने एक और गंभीर चुनौती रियासतों को लेकर थी।
ब्रिटिश भारत का लगभग एक तिहाई भूभाग पर रियासते थी।
ऐसे समय में कुछ महाराजा तो बहुत सारे टुकड़ों में बंटे भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे।
लेकिन वल्लभ भाई पटेल जी ने इन रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Class 12th History Chapter 15 Sanvidhan ka nirman Notes
संविधान सभा का गठन
केबिनेट मिशन योजना द्वारा सुझाए गए प्रस्ताव के अनुसार 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ था।
संविधान सभा के कुल सदस्य की संख्या- 389 थी।
ब्रिटिश भारत – 296 सीट
देसी रियासत – 93 सीट
हर प्रांत व देशी रियासतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें दी जानी थी।
लगभग 1000000 लोगों पर एक सीट आवंटित की गई थी।
संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था।
नई संविधान सभा में कांग्रेस प्रभावशाली थी।
प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने सामान्य चुनाव क्षेत्रों में भारी जीत प्राप्त की।
मुस्लिम लीग ने अधिकतर मुस्लिम सीटों पर जीत प्राप्त की।
लेकिन मुस्लिम लीग ने भारतीय संविधान सभा का बहिष्कार किया।
और अपने लिए अलग संविधान बनाया और पाकिस्तान की मांग जारी रखी।
शुरुआत में समाजवादी भी संविधान सभा से दूर रहे।
क्योंकि वह इसे अंग्रेजों की बनाई हुई संस्था मानते थे।
संविधान सभा में 82% सदस्य कांग्रेस पार्टी के ही सदस्य थे।
कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस के सदस्यों के बीच आपसी मतभेद देखने को मिले।
क्योंकि कई कांग्रेसी समाजवाद से प्रेरित थे।
तो कई अन्य जमीदारों के हिमायती थे।
कुछ सांप्रदायिक दलों के करीब थे।
तो कुछ पक्के धर्मनिरपेक्ष थे।
संविधान सभा में जो भी चर्चाएं होती थी।
वह जनमत से प्रभावित होती थी जब संविधान सभा में बहस होती थी।
तो विभिन्न पक्षों की दलीलें अखबारों में छपी जाती थी।
इन प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस चलती थी।
इस तरह प्रेस में होने वाली इस आलोचना और जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति और असहमति पर गहरा असर पड़ता था।
सामूहिक सहभागिता बनाने के लिए जनता के सुझाव भी आमंत्रित किए जाते थे।
कई भाषाई अल्पसंख्यक, अपनी मातृभाषा की रक्षा की मांग करते थे।
धार्मिक अल्पसंख्यक, अपने विशेष हित सुरक्षा करवाना चाहते थे।
दलित जाति, शोषण के अंत की मांग कर रही थी।
दलितों ने सरकारी संस्थाओं में आरक्षण की मांग की।

मुख्य आवाज
संविधान सभा में 6 सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है
1) जवाहरलाल नेहरू
2) वल्लभभाई पटेल
3) राजेंद्र प्रसाद
4) डॉक्टर भीमराव अंबेडकर
5) के. एम. मुंशी
6) अल्लादी कृष्णास्वामी
7) बी.एन राव
8) एस. एन. मुखरजी
नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था।
भारत का राष्ट्रीय ध्वज केसरिया, सफेद और गहरे हरे रंग की तीन बराबर चौड़ाई वाली पार्टियों का तिरंगा झंडा होगा।
जिसके बीच में गहरे नीले रंग का चक्र होगा।
वल्लभ भाई पटेल मुख्य रूप से पर्दे के पीछे कई महत्वपूर्ण काम कर रहे थे।
इन्होंने कई रिपोर्ट के प्रारूप लिखने में खास मदद की और परस्पर विरोधी विचारों के बीच सहमति पैदा करने में भूमिका अदा की।
डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे।
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर संविधान सभा के सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे।
अंबेडकर जी कांग्रेस के राजनीतिक विरोधी रहे थे।
लेकिन स्वतंत्रता के समय महात्मा गांधी की सलाह पर उन्हें केंद्रीय विधि मंत्री के पद संभालने का न्योता दिया गया था।
उन्हें संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनाया गया।
इनके साथ दो अन्य वकील काम कर रहे थे।
गुजरात के के. एम. मुंशी और मद्रास के अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर।
बी. एन. राव (सरकार के संवैधानिक सलाहकार)
एस. एन. मुखर्जी (मुख्य योजनाकार)
अंबेडकर जी के पास सभा में संविधान के प्रारूप को पारित करवाने की जिम्मेदारी थी।
इस काम में कुल मिलाकर 3 वर्ष लगे।
इस दौरान हुई चर्चाओं के मुद्रित रिकॉर्ड 11 खंडों में प्रकाशित हुए।

संविधान की दृष्टि
संविधान सभा की पहले बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
मुस्लिम लीग ने इसका बहिष्कार किया था।
डॉक्टर सच्चिदानंद सिन्हा को सभा का अस्थाई अध्यक्ष चुना गया।
दूसरी बैठक – 11 दिसंबर 1946
राजेंद्र प्रसाद को सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया।
तीसरी बैठक- 13 दिसंबर 1946
नेहरू जी ने उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया।
Class 12th History Chapter 15 Sanvidhan ka nirman Notes
उद्देश्य प्रस्ताव
यह एक ऐतिहासिक प्रस्ताव था।
इसमें स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
इसमें भारत को एक स्वतंत्र, संप्रभु (Sovereign) गणराज्य घोषित किया गया।
नागरिकों को न्याय, समानता व स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया।
इसमें वचन दिया गया की अल्पसंख्यक पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों और दमित तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए रक्षात्मक प्रावधान किए जाएंगे।

लोगों की इच्छा
भारतीय संविधान का उद्देश्य यह होगा कि
लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक दूसरे में समावेश किया जाए।
और भारतीय संदर्भ में इन विचारों की रचनात्मक व्याख्या की जाए।
नेहरू ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के लिए क्या उचित है।

संविधान सभा के कम्युनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिड़ी
सोमनाथ लाहिड़ी को संविधान सभा की चर्चाओं पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्याह साया दिखाई देता था।
इन्होंने संविधान सभा के सदस्यों तथा आम भारतीयों से आग्रह किया कि वह साम्राज्यवादी शासन के प्रभाव से खुद को पूरी तरह आजाद करें।
1946- 47 की सर्दियों में जब संविधान सभा में चर्चा चल रही थी।
तो अंग्रेज अभी भारत में ही थे।
जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार शासन तो चला रही थी।
लेकिन उसे सारा काम वायसराय तथा लंदन में बैठी ब्रिटिश सरकार की देखरेख में करना पड़ता था।
सोमनाथ लाहिड़ी ने अपने साथियों को समझाया कि संविधान सभा अंग्रेजों की बनाई हुई है।
और वह अंग्रेजों की योजना को साकार करने का काम कर रही है।
नेहरू ने इस बात को स्वीकार किया कि ज्यादातर राष्ट्रवादी नेता एक भिन्न प्रकार की संविधान सभा चाहते थे और यह सही भी था कि ब्रिटिश सरकार का उस के गठन में काफी हाथ था।
और उसने सभा के कामकाज पर कुछ शर्ते लगा दी थी।
लेकिन नेहरू ने कहा आपको उस स्रोत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
जहां से इस सभा को शक्ति मिल रही है।
सरकार सरकारी कागजों से नहीं बनती।
सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती हैं।
हम यहां इसलिए जुटे हैं क्योंकि हमारे पास जनता की ताकत है।
और हम इतनी दूर तक ही जाएंगे जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे।
फिर चाहे वह किसी भी समूह या पार्टी से संबंधित ही क्यों ना हो।
इसलिए हमें भारतीय जनता के दिलों में समाए आकांक्षाओं और भावनाओं को हमेशा अपने जेहन में रखना चाहिए और उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।
संविधान सभा उन लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन मानी जा रही थी।
जिन लोगों ने स्वतंत्रता के आंदोलन में हिस्सा लिया था।
जब 19वीं शताब्दी में समाज सुधारकों ने बाल विवाह का विरोध किया।
और विधवा विवाह का समर्थन किया तो वे सामाजिक न्याय का ही अलख जगा रहे थे।
जब विवेकानंद ने हिंदू धर्म में सुधार के लिए मुहिम चलाई।
तो वे धर्मों को और ज्यादा न्यायसंगत बनाने का प्रयास कर रहे थे।
जब ज्योतिबा फुले ने दलित जातियों की पीड़ा का सवाल उठाया।
कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट ने मजदूर और किसानों को एकजुट किया।
तो वह भी आर्थिक और सामाजिक न्याय के लिए ही जूझ रहे थे।
एक दमनकारी और अवैध सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन लोकतंत्र व न्याय का नागरिकों के अधिकारों और समानता का संघर्ष ही था।
Class 12th History Chapter 15 Sanvidhan ka nirman Notes
पृथक निर्वाचिका
27 अगस्त 1947 को मद्रास के बी. पोकर बहादुर ने पृथक निर्वाचन के पक्ष में एक भाषण दिया।
इसके बाद बहुत से राष्ट्रवादी भड़क गए थे।
अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं उन्हें हम चाह कर भी नहीं हटा सकते।
हमें जरूरत एक ऐसे राजनीतिक ढांचे की है।
जिसके भीतर अल्पसंख्यक भी और लोगों के साथ सद्भाव के साथ जी सके।
और समुदायों के बीच में मतभेद कम से कम हो।
इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक लोगों का पूरा प्रतिनिधित्व हो।
उनकी आवाज सुनी जाए और उनके विचारों पर ध्यान दिया जाए।
देश के शासन में मुसलमानों की एक सार्थक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए पृथक निर्वाचन के अलावा और कोई रास्ता नहीं हो सकता।
बहादुर को लगता था कि मुसलमानों की जरूरतों को गैर मुसलमान अच्छी तरह नहीं समझ सकते।
ना ही अन्य समुदाय के लोग मुसलमानों का कोई सही प्रतिनिधि चुन सकते हैं।
इस बयान के बाद भड़के हुए राष्ट्रवादियों द्वारा गरमा-गरम बहस चली।
राष्ट्रवादियों का कहना था कि पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था लोगों को बांटने के लिए अंग्रेजों की चाल थी।
आर. वी. धुलेकर ने बहादुर को संबोधित करते हुए कहा था।
अंग्रेजों ने संरक्षण के नाम पर अपना खेल खेला।
इसकी आड़ में उन्होंने तुम्हें फुसला लिया।
अब इस आदत को छोड़ दो अब कोई तुम्हें बहकाने वाला नहीं है।
सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि “पृथक निर्वाचिका एक ऐसा विषय है जो हमारे देश की पूरी राजनीति में समा चुका है“
उनके अनुसार यह एक ऐसी मांग थी।
जिसने एक समुदाय को दूसरे समुदाय से भिड़ा दिया।
राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, रक्तपात को जन्म दिया और देश के विभाजन का कारण बनी.
पटेल जी ने कहा क्या तुम इस देश में शांति चाहते हो अगर चाहते हो तो इसे फौरन छोड़ दो।
गोविंद वल्लभ पंत ने कहा यह प्रस्ताव न केवल राष्ट्र के लिए, बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक है।
वह बहादुर के इस विचार से सहमत थे कि किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि समाज के विभिन्न तबकों में वह कितना आत्मविश्वास पैदा कर पाती है।
लेकिन पृथक निर्वाचिका के मुद्दे पर जी. बी. पंत बिल्कुल सहमत नहीं थे।
उनका कहना था कि यह एक आत्मघाती मांग है।
जो अल्पसंख्यकों को स्थाई रूप से अलग-थलग कर देगी।
उन्हें कमजोर बना देगी और शासन में उन्हें प्रभावी हिस्सेदारी नहीं मिल पाएगी“
उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए किसान नेता और समाजवादी विचारों वाले एन.जी. रंगा ने आह्वान किया कि अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या आर्थिक स्तर पर की जानी चाहिए।
एन.जी. रंगा की नजर में असली अल्पसंख्यक गरीब और दबे कुचले लोग हैं।
उन्होंने इस बात का स्वागत किया कि संविधान में हर व्यक्ति को कानूनी अधिकार दिए जा रहे हैं।
लेकिन उन्होंने इसकी सीमाओं को भी चिन्हित किया।
उन्होंने कहा कि जब तक अधिकारों को लागू करने का प्रभावी इंतजाम नहीं किया जाएगा।
तब तक गरीबों के लिए इस बात का कोई मतलब नहीं है।
अब उनके पास जीने का, पूर्ण रोजगार का अधिकार आ गया है या अब वे सभा कर सकते हैं।
सम्मेलन कर सकते हैं।
संगठन बना सकते हैं।
उनके पास नागरिक स्वतंत्रता हैं।
यह जरूरी था कि ऐसी परिस्थितियां बनाई जाए और जहां संविधान द्वारा किए गए अधिकारों का जनता प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सकें।
रंगा ने कहा कि “उन्हें सहारों की जरूरत है उन्हें एक सीढ़ी चाहिए“
एन.जी.रंगा ने आम जनता और संविधान सभा में उसके प्रतिनिधित्व का दावा करने वालों के बीच मौजूद विशाल खाई की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया।
“हम किस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं अपने देश की आम जनता का और उसके बावजूद हममें से ज्यादातर लोग उस जनता का हिस्सा नहीं है हम उनके हैं।”
उनके लिए काम करना चाहते हैं, लेकिन जनता खुद संविधान सभा तक नहीं पहुंच पा रही है।
इसमें कुछ समय लग सकता है तब तक हम यहां उनके ट्रस्टी हैं।
उनके हिमायती हैं और उनके पक्ष में आवाज उठाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं“
रंगा ने आदिवासियों को भी ऐसे ही समूहों में गिनाया था।
इनमें जयपाल सिंह जैसे जबरदस्त वक्ता भी शामिल थे।
जयपाल सिंह ने उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा
“एक आदिवासी होने के नाते मुझ से यह उम्मीद नहीं की जाती कि मैं इस प्रस्ताव की बारीकियों को समझता होऊंगा।
लेकिन मेरा सहज विवेक कहता है कि हममें से हर एक व्यक्ति को मुक्ति के उस मार्ग पर चलना चाहिए और मिलकर लड़ना चाहिए।
अगर भारतीय जनता में ऐसा कोई समूह है जिसके साथ सही व्यवहार नहीं किया गया तो वह मेरा समूह है।
मेरे लोगों को पिछले 6000 साल से अपमानित किया जा रहा है।
इनकी उपेक्षा की जा रही है।
मेरे समाज का पूरा इतिहास भारत के गैर मूल निवासियों के हाथों लगातार शोषण और छीना झपटी का इतिहास रहा है।
जिसके बीच में जब-तब विद्रोह और अव्यवस्था भी फैली है।
इसके बावजूद मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों पर विश्वास करता हूं।
मैं आप सबके इस संकल्प का विश्वास करता हूं कि अब हम एक नया अध्याय रचने जा रहे हैं।
स्वतंत्र भारत का एक ऐसा अध्याय जहां सब के पास अवसरों की समानता होगी।
जहां किसी की उपेक्षा नहीं होगी“
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जयपाल सिंह
आदिवासियों की सुरक्षा के लिए तथा उन्हें आम आबादी के स्तर पर लाने के लिए जरूरी परिस्थितियां रचने की आवश्यकता पर सुंदर वक्तव्य दिया
“आदिवासी कबीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं है। लेकिन उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है”
उन्हें वहां से बेदखल कर दिया गया जहां वह रहते थे।
उन्हें उनके जंगलों और गांव से वंचित कर दिया गया।
उन्हें नए घरों की तलाश में भागने के लिए मजबूर किया गया।
उन्हें आदिम और पिछड़ा मानते हुए शेष समाज उन्हें हिकारत की नजरों से देखता है।
जयपाल ने आदिवासियों और शेष समाज के बीच मौजूद भावनात्मक और भौतिक फासले को खत्म करने के लिए बड़ा जजबाती बयान दिया।
हमारा कहना है कि आपको हमारे साथ घुलना मिलना चाहिए।
हम आपके साथ मेलजोल चाहते हैं।
जयपाल सिंह पृथक निर्वाचिका के हक में नहीं थे।
लेकिन उनको भी यह लगता था कि विधायिका में आदिवासियों को प्रतिनिधित्व प्रदान  करने के लिए सीटों में आरक्षण की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि इस तरह औरों को आदिवासियों की आवाज सुनने और उनके पास आने के लिए मजबूर किया जा सकेगा“
हमें हजारों साल तक दबाया गया है।
संविधान में दलित जातियों के अधिकारों को किस तरह परिभाषित किया जाए।
राष्ट्रीय आंदोलनों के दौरान डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने दलित जातियों के पृथक निर्वाचन की मांग की थी।
जिसका महात्मा गांधी ने यह कहते हुए विरोध किया था कि ऐसा करने से यह समुदाय स्थाई रूप से शेष समाज से कट जाएगा।
संविधान सभा इस विवाद को कैसे हल कर सकती थी?
दलित जातियों को किस तरह की सुरक्षा दी जा सकती थी ?
दलित जातियों के कुछ सदस्यों का कहना था.
कि अस्पृश्यों (अछूत) की समस्या को केवल संरक्षण और बचाव के जरिए हल नहीं किया जा सकता।
उनके अपंगता के पीछे जाति में बंटा समाज तथा इस समाज के सामाजिक कायदे कानून और नैतिक मूल्यों मान्यताओं का हाथ है।
समाज ने उनकी सेवा और श्रम का इस्तेमाल किया है। परंतु उन्हें सामाजिक तौर पर खुद से दूर रखा है।
अन्य जातियों के लोग उनके साथ घुलने मिलने से कतराते हैं।
उनके साथ खाना नहीं खाते, उन्होंने मंदिर में नहीं जाने दिया जाता।
मद्रास के सदस्य जे. नागप्पा ने कहा था
“हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं पर अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं है”
हमें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया है।
हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है“
नागप्पा ने कहा कि संख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं है।
आबादी में उनका हिस्सा 20 से 25% है।
उनकी पीड़ा का कारण यह है कि उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा गया है।
उसका कारण उनकी संख्यात्मक महत्वहीनता नहीं है।
उनके पास ना तो शिक्षा तक पहुंची थी।
ना ही शासन में हिस्सेदारी।
सवर्ण बहुमत वाली संविधान सभा को संबोधित करते हुए।
मध्य प्रांत के श्री के. जी. खंडेल करने कहा था।
“ हमें हजारों साल तक दबाया गया है ,,,, दबाया गया,,,,,
इस हद तक दबाया कि हमारे दिमाग हमारी देह काम नहीं करती।
और अब हमारा हृदय भी भावशून्य हो चुका है।
ना ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं यह हमारी स्थिति है “
बंटवारे की हिंसा के बाद अंबेडकर तक ने पृथक निर्वाचन की मांग छोड़ दी थी।
संविधान सभा ने अंततः यह सुझाव दिया कि अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए।
हिंदू मंदिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया जाए।
निचली जातियों को विधायिका और सरकारी नौकरी में आरक्षण दिया जाए।
बहुत सारे लोगों का मानना था कि इससे भी समस्या हल नहीं हो पाएगी।
सामाजिक भेदभाव को केवल संवैधानिक कानून पारित करके खत्म नहीं किया जा सकता।
समाज की सोच बदलनी होगी।
परंतु लोकतांत्रिक जनता ने इस प्रावधानों का स्वागत किया।
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राज्य की शक्तियां
संविधान सभा में इस बात पर काफी बहस हुई थी।
कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के क्या अधिकार होने चाहिए ?
दोनों में से किसे अधिक शक्ति मिलनी चाहिए।
जवाहरलाल नेहरू शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में थे।
उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष के नाम लिखे पत्र में कहा था।
अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है।
एक दुर्बल केंद्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी।
क्योंकि ऐसा केंद्र शांति स्थापित करने में।
आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में
और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज उठाने में सक्षम नहीं होगा।
संविधान के मसविदे ( draft ) में तीन सूची बनाई गई।
1) केंद्रीय सूची ( संघ सूची )
2) राज्य सूची
3) समवर्ती सूची
( केंद्र सूची)- केवल केंद्र सरकार के अधीन आने वाले मामले।
( राज्य सूची)- केवल राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले मामले।
( समवर्ती सूची)- केंद्र और राज्य दोनों की साझा जिम्मेदारी।
खनिज पदार्थ तथा प्रमुख उद्योगों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण दिया गया।
अनुच्छेद 356 में गवर्नर की सिफारिश पर।
केंद्र सरकार को राज्य सरकार के सारे अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार दे दिया।

केंद्र बिखर जाएगा
मद्रास के सदस्य के सन्तनम ने।
राज्यों के अधिकारों की हिमायत की।
उन्होंने कहा कि न केवल राज्यों को।
बल्कि केंद्र को मजबूत बनाने के लिए शक्तियों का पुनर्वितरण जरूरी है।
यह दलील एक जिद सी बन गई है।
कि तमाम शक्तियां केंद्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा।
सन्तनम ने कहा कि यह गलतफहमी है।
अगर केंद्र के बाद जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी होगी।
तो वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा।
उसके कुछ दायित्व में कमी करने से।
और उन्हें राज्यों को सौंप देने से केंद्र ज्यादा मजबूत हो सकता है।
सन्तनम का मानना था की शक्तियों का मौजूदा वितरण उन को कमजोर बना देगा।
राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देगा।
क्योंकि भू राजस्व के अलावा अधिकतर टैक्स केंद्र सरकार के अधिकार में दे दिए गए हैं।
यदि पैसा ही नहीं होगा तो राज्यों में विकास परियोजना कैसे चलेगी।
मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता।
जिसमें इकाई को आकर केंद्र से यह कहना पड़े।
कि मैं अपने लोगों की शिक्षा व्यवस्था नहीं कर सकता।
मैं उन्हें साफ सफाई नहीं दे सकता।
मुझे सड़कों में सुधार तथा उद्योग की स्थापना के लिए खैरात दे दीजिए।
बेहतर होगा कि हम संघीय व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दें।
और एकल व्यवस्था स्थापित करें।
सन्तनम ने यह भी कहा कि अगर अधिक जांच पड़ताल किए बिना।
शक्तियों का वितरण लागू कर दिया गया।
तो हमारा भविष्य अंधकार में पड़ जाएगा।
कुछ ही सालों में सारे प्रांत, केंद्र के विरुद्ध खड़े हो जाएंगे।
उन्होंने इस बात के लिए जमकर जोर लगाया।
कि समवर्ती सूची और केंद्रीय सूची में कम से कम विषय को रखा जाए.
उड़ीसा के एक सदस्य ने यहां तक चेतावनी दे डाली.
कि संविधान में शक्तियों का बेहिसाब विकेंद्रीकरण के कारण “केंद्र बिखर जाएगा “
आज हमें एक शक्तिशाली सरकार की आवश्यकता है “
राज्यों के लिए अधिक शक्तियों की मांग से सभा में तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी थी.
शक्तिशाली केंद्र के जरूरत को असंख्य अवसरों पर रेखांकित किया जा चुका था.
अंबेडकर जी ने घोषणा की थी.
कि वह एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र चाहते हैं.
1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था.
उससे भी ज्यादा शक्तिशाली केंद्र.
सड़कों पर हो रही हिंसा के कारण देश टुकड़े-टुकड़े हो रहा था.
उस का हवाला देते हुए बहुत सारे सदस्यों ने बार-बार यह कहा.
कि केंद्र की शक्तियों में भारी इजाफा होना चाहिए.
ताकि वह सांप्रदायिक हिंसा को रोक सके.
प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों की मांग का जवाब देते हुए.
गोपाल स्वामी अय्यर ने जोर देकर कहा.
केंद्र ज्यादा से ज्यादा मजबूत होना चाहिए.
बालकृष्णा शर्मा ने विस्तार से इस बात पर प्रकाश डाला.
कि शक्तिशाली केंद्र का होना जरूरी है.
ताकि वह देश के हित में योजना बना सके.
उपलब्ध आर्थिक संसाधन जुटा सके.
उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सके.
देश को विदेशी आक्रमण से बचा सके.
देश के बंटवारे से पहले कांग्रेस ने प्रांतों को काफी स्वायत्तता देने पर अपनी सहमति जता दी थी।
कुछ हद तक मुस्लिम लीग को इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश की थी।
कि जिन प्रांतों में मुस्लिम लीग की सरकार बनी है।
वहां दखलंदाजी नहीं की जाएगी।
लेकिन बंटवारे को देखने के बाद ज्यादातर राष्ट्रवादियों की राय बदल चुकी थी।
उनका कहना था कि आप एक विकेंद्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनीतिक दबाव नहीं बचे।
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राष्ट्र की भाषा
रत देश में अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोग रहते हैं।
उनकी सांस्कृतिक विरासत अलग है।
ऐसे में राष्ट्र निर्माण कैसे किया जा सकता है ?
कैसे लोग एक दूसरे की बातें सुन सकते हैं या एक दूसरे से जुड़ सकते हैं।
जबकि वे एक दूसरे की भाषा भी नहीं समझते।
संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर कई महीनों तक तीखी बहस हुई।
और कई बार तनातनी पैदा हो गई।
सवाल यही था कि राष्ट्रभाषा किसे बनाएं ?
तीस के दशक तक कांग्रेस ने यह मान लिया था।
कि हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए.।
महात्मा गांधी का मानना था कि हर एक को एक ऐसी भाषा बोलने चाहिए।
जिसे लोग आसानी से समझ सके।
हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी।
भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी।
यह विविध संस्कृतियों का आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।
जैसे जैसे समय बीता।
बहुत तरह के स्रोतों से नए नए शब्द और अर्थ इसमें जुड़ते गए।
और उसे विभिन्न क्षेत्रों के बहुत सारे लोग समझने लगे।
महात्मा गांधी को ऐसा लगता था कि यह बहुत सांस्कृतिक भाषा।
विभिन्न समुदायों के बीच संचार की आदर्श भाषा हो सकती है।
वह हिंदू और मुसलमानों को उत्तर और दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है।
लेकिन 19वीं सदी में माहौल बदलने लगा।
जैसे जैसे सांप्रदायिक टकराव गहरे होते जा रहे थे।
हिंदी और उर्दू एक दूसरे से दूर जा रही थी।
एक तरफ तो फारसी और अरबी मूल के सारे शब्दों को हटाकर हिंदी को संस्कृतनिस्ठ बनाने की कोशिश की जा रही थी।
दूसरी तरफ उर्दू लगातार फारसी के नजदीक होती जा रही थी।
नतीजा यह हुआ कि भाषा भी धार्मिक पहचान की राजनीति का हिस्सा बन गई।
लेकिन हिंदुस्तानी के साझा चरित्र में महात्मा गांधी की आस्था कम नहीं हुई।

हिंदी की हिमायत
संविधान सभा के शुरुआती सत्र में संयुक्त प्रांत के कांग्रेसी सदस्य आर. वी. धूलेकर ने इस बात के लिए पुरजोर शब्दों में आवाज उठाई।
कि हिंदी को संविधान निर्माण की भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाए।
जब किसी ने कहा कि सभी सदस्य हिंदी नहीं समझते।
तो धूलेकर ने पलटकर कहा, इस सदन में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे और हिंदुस्तानी नहीं जानते।
वे इस सभा की सदस्यता के योग्य नहीं है, उन्हें चले जाना चाहिए।
जब इन टिप्पणियों के कारण सभा में हंगामा खड़ा हुआ।
तो धूलेकर हिंदी में अपना भाषण देते रहे।
नेहरू के हस्तक्षेप के चलते आखिरकार सदन में शांति बहाल हुई।
भाषा का सवाल अगले 3 साल तक बार-बार कार्रवाइयों में बाधा डालता रहा।
करीबन 3 साल बाद 12 सितंबर 1947 को राष्ट्र की भाषा के सवाल पर धूलेकर के भाषण ने एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया।
तब तक संविधान सभा की भाषा समिति अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी थी।
समिति ने राष्ट्रीय भाषा के सवाल पर हिंदी के समर्थकों और विरोधियों के बीच पैदा हो गए गतिरोध को तोड़ने के लिए फार्मूला निकाला।
समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी भारत की राजकीय भाषा होगी।
परंतु इस फार्मूले को समिति ने घोषित नहीं किया था।
समिति का मानना था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए।
पहले 15 साल तक सरकारी कामों में अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा।
प्रत्येक प्रांत को अपने कामों के लिए कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।
संविधान सभा की भाषा समिति ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाय राजभाषा कहकर विभिन्न पक्षों की भावनाओं को शांत करने और सर्व स्वीकृत समाधान पेश करने का प्रयास किया।
धूलेकर बीच-बचाव की ऐसी मुद्रा से राजी होने वाले नहीं थे।
वे चाहते थे कि हिंदी को राजभाषा नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा बनाया जाए।
उन्होंने ऐसे लोगों की आलोचना की जिन्हें लगता था हिंदी को उन पर थोपा जा रहा है।
धूलेकर ने ऐसे लोगों का मजाक उड़ाया।
“जो महात्मा गांधी का नाम लेकर
हिंदी की बजाय हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं “।
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वर्चस्व का भय
धूलेकर के बोलने के बाद मद्रास की सदस्य श्रीमती जी. दुर्गाबाई ने इस चर्चा पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
अध्यक्ष महोदय,
अभी हाल तक भारत की राष्ट्रीय भाषा का जो सवाल लगभग सहमति तक पहुंच गया था।
अचानक बेहद विवादास्पद मुद्दा बन गया है चाहे यह सही हुआ हो या गलत।
गैर- हिंदी भाषी इलाकों के लोगों को यह एहसास कराया जा रहा है।
कि यह झगड़ा, या हिंदी भाषी इलाकों का यह रवैया।
असल में इस राष्ट्र की साँझा संस्कृति पर, भारत के अन्य शक्तिशाली भाषाओं के स्वाभाविक प्रभाव को रोकने की लड़ाई है।
दुर्गा बाई ने सदन को बताया कि दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध बहुत ज्यादा है।
विरोधियों का मानना है कि हिंदी के लिए हो रहा यह प्रचार प्रांतीय भाषाओं की जड़े खोजने का प्रयास है।
इसके बावजूद बहुत सारे अन्य सदस्यों के साथ-साथ उन्होंने भी महात्मा गांधी की बातो का पालन किया।
और दक्षिण में हिंदी का प्रचार जारी रखा, विरोध का सामना भी करना पड़ा ।
हिंदी के स्कूल खोले और कक्षाएं चलाई।
अब इस सब का क्या नतीजा निकलता है ?
दुर्गा बाई ने पूछा सदी के शुरुआती सालों में हमने जिस उत्साह से हिंदी को अपनाया था।
मैं उसके विरुद्ध यह आक्रामकता देख कर सकते में हूं।
दुर्गाबाई हिंदुस्तानी को जनता की भाषा स्वीकार कर चुके थे।
मगर अब उस भाषा को बदला जा रहा था ।
उर्दू तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को से निकाला जा रहा था।
उनका मानना था कि हिंदुस्तानी के समावेशी और साँझा स्वरूप को कमजोर करने वाले किसी भी कदम से विभिन्न भाषा ही समूहों के बीच बेचैनी और भय पैदा होना निश्चित है।
जैसे-जैसे चर्चा तीखी होती गई।
बहुत सारे सदस्यों ने सहयोग और सम्मान की भावना का आह्वान किया।
मुंबई के सदस्य श्री शंकरराव देव ने कहा कि कांग्रेस तथा महात्मा गांधी का अनुयाई होने के नाते हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर चुके हैं।
मद्रास के श्री टी. ए . रामलिंगम चेटीआर ने इस बात पर जोर दिया।
जो कुछ भी किया जाए एहतियात के साथ किया जाए।
यदि आक्रामक होकर काम किया गया तो हिंदी का कोई भला नहीं हो पाएगा। Class 12th History Chapter 15 Sanvidhan ka nirman Notes

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13. Mahatma Gandhi aur Rashtriya Andolan | महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ तेरह महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन (Mahatma Gandhi aur Rashtriya Andolan) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

अध्याय 13- महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

गांधी जी की भारत वापसी
मोहनदास करमचंद गांधी :-
गाँधी जी विदेश में 2 दशक तक रहे और जनवरी 1915 में भारत वापस आ गए।
गांधी जी ने इन वर्षों का ज्यादातर हिस्सा अफ्रीका में गुज़ारा था।
वहां वे एक वकील के रूप में गए थे और बाद में वे उस क्षेत्र के भारतीय समुदाय के नेता बन गए।
दक्षिण अफ्रीका ने ही गाँधी जी को ‘महात्मा’ बनाया, और  दक्षिण अफ्रीका में ही गाँधी जी ने पहली बार सत्याग्रह के रूप में जानी गई अहिंसात्मक विरोध की अपनी विशिष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया।
उन्होंने विभिन्न धर्मों के बीच एकता को बढ़ाने का प्रयास किया।
उच्च जाति वाले भारतीयों को निम्न जाति वाले लोगों और महिलाओं के प्रति भेदभाव वाले व्यवहार के लिए चेतावनी दी।
1915 में जब गांधी जी भारत आए तो उस समय का भारत 1893 में जब वे गए थे तब के समय से अलग था।
भारत अभी भी ब्रिटिश उपनिवेश था/
लेकिन भारत राजनीतिक दृष्टि से काफी सक्रिय हो चुका था।
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स्वदेशी आन्दोलन (1905-07) :-
कुछ प्रमुख नेता : बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्र)
विपिन चन्द्र पाल (बंगाल)
लाला लाजपत राय (पंजाब)
लाल, बाल,पाल
इन लोगो ने अंग्रेजी शासन के प्रति लड़ाकू विरोध का समर्थन किया।
गोपाल कृष्ण गोखले, मोहम्मद अली जिन्ना।
वहीं कुछ उदारवादी समूह जो लगातार प्रयास करते रहने का हिमायती था।
महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु- गोपाल कृष्ण गोखले थे।
इन्होंने गांधी जी को एक वर्ष तक ब्रिटिश भारत यात्रा करने की सलाह दी।
जिससे कि वह इस भूमि और यहां के लोगों को जान सकें।
यहां के लोगों की समस्याओं को समझ सकें।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय उदघाटन समारोह
फरवरी 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित व्यक्तियों में राजा और मानवप्रेमी थे।
जिनके द्वारा दिए गये दान से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान दिया।
समारोह में एनी बेसेंट जैसे कांग्रेस के कुछ महत्वपूर्ण नेता भी उपस्थित थे।
जब गाँधी जी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने मजदूर, गरीबों की ओर ध्यान न देने के कारण भारतीय विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथो लिया।
उन्होंने कहा की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना भले ही शानदार है।
किन्तु उन्होंने वहां धनी और अमीर लोगों को देखकर गरीब लोगों के लिए चिंता प्रकट की।
उन्होंने कहा की भारत के लिए मुक्ति तब तक संभव नहीं।
जब तक आप अपने आप को इन अलंकरणों से ,मुक्त न कर ले।
उन्होंने कहा की “हमारे लिए स्वशासन का तब तक कोई अभिप्राय नहीं है।
जबतक हम किसानों से उनके श्रम का लगभग सम्पूर्ण लाभ स्वयं तथा अन्य लोगों को ले लेने की अनुमति देते रहेगे”
हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है न तो वकील, न डॉक्टर और न ही जमींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।
गाँधी जी ने स्वयं को बधाई देने के सुर में सुर मिलाने की अपेक्षा लोगों को उन किसानों और कामगारों की याद दिलाना चुना।
जो भारतीय जनसंख्या के अधिसंख्य हिस्से के निर्माण करने के बावजूद वहां श्रोताओं में अनुपस्थित थे।
1917 का वर्ष चंपारण में गांधीजी का किसानों को अपनी पसंद की फसल उगाने की आजादी दिलाने में बीता।
1918 में गांधीजी गुजरात में दो अभियानों में संलग्न रहे।
पहला- अहमदाबाद में कपड़े की मीलों में काम करने वालों के लिए काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग की।
दूसरा- खेड़ा में फसल चौपट होने पर राज्य से किसानों का लगान माफ करने की मांग की।
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असहयोग आन्दोलन की शुरुआत
चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा में की गई पहल से गांधी जी एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में उभरे जिनमे गरीबों के लिए गहरी सहानुभूति थी।
1914-18 के महान युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया और बिना जांच के कारावास की अनुमति दे दी।
अब ‘सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति की संस्तुतियों के आधार पर इन कठोर उपायों को जारी रखा गया।
उत्तरी और पश्चिमी भारत में चारों तरफ बंद का समर्थन किया गया।
स्कूल और दुकान के बंद होने के कारण जीवन ठहर सा गया।
गाँधी जी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ पूरे देश में अभियान चलाया।
पंजाब में विशेष रूप से भारी विरोध हुआ।
पंजाब के बहुत से लोगों ने युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में सेवा की थी।
यह लोग अपनी सेवा के बदले इनाम की अपेक्षा कर रहे थे।
लेकिन अंग्रेजों ने इन्हें इनाम की जगह रॉलेक्ट एक्ट दे दिया।
पंजाब जाते समय गांधी जी को कैद कर लिया गया।
स्थानीय कांग्रेस नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया।
स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण हो गई।
अप्रैल 1919 में अमृतसर में खून खराबा अपने चरम पर पहुंच गया।
यहां एक अंग्रेज ब्रिगेडियर ने एक राष्ट्रवादी सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया।
इस जलियांवाला बाग हत्याकांड में 400 से अधिक लोग मारे गए।
रोल्ट सत्याग्रह से ही गांधी जी एक सच्चे राष्ट्रीय नेता बन गए।
उसके बाद उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ ‘असहयोग अभियान’ की मांग कर दी।
भारतीयों से आग्रह किया गया की स्कूल, कॉलेज और न्यायलय न जाएं तथा कर न चुकाएं।
गांधीजी ने कहा अगर असहयोग का सही तरह से पालन हुआ तो एक साल में भारत स्वराज प्राप्त कर लेगा।
अपने संघर्ष का विस्तार करते हुए गांधी जी ने खिलाफत आन्दोलन के साथ हाथ मिला लिए।
गाँधी जी को ये उम्मीद थी कि असहयोग आन्दोलन और हिन्दू मुस्लिम एकता इससे अंग्रेजी शासन का अंत हो जाएगा।
असहयोग आंदोलन में निम्‍नलिखित कार्यक्रम अपनाए गए—
विद्यार्थियों द्वारा स्कूल / कॉलेजों का बहिष्कार।
वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार।
श्रमिकों द्वारा हडतालें।
किसानों ने कर चुकाना बंद कर दिया.
1921 में 396 हड़तालें हुई, जिसमें 6 लाख मजदूर शामिल थे.
उत्तरी आंध्र की पहाड़ियों में जनजातियों ने वन्य कानून मानने से मना किया।
अवध के किसानों ने कर नहीं चुकाए।
कुमाऊं के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने से मना किया।

1857 के विद्रोह के बाद
पहली बार असहयोग आंदोलन से अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।
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चौरी चौरा
फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के चौरी चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण करके उसमें आग लगा दी।
इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई, हिंसा की इस कार्यवाही से गांधी जी को यह आन्दोलन वापस लेना पड़ा।
असहयोग आंदोलन के दौरान हज़ारों भारतीयों को जेल में डाल दिया गया।
गांधी जी को भी मार्च 1922, में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
जज जस्टिस सी.एन ब्रूमफील्ड ने सजा सुनाते समय एक महत्वपूर्ण भाषण दिया—
इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि मैंने आज तक जिनकी जांच की है अथवा करूंगा उनसे भिन्न श्रेणी के हैं आपके लाखों देशवासियों की दृष्टि में आप एक महान देशभक्त और नेता है क्योंकि गांधी जी ने कान की अवहेलना की थी उस न्याय पीठ के लिए गांधीजी को 6 वर्षों की जेल की सजा सुनाया जाना आवश्यक था लेकिन जज ब्रूमफील्ड ने कहा कि यदि भारत में घट रही घटनाओं की वजह से सरकार के लिए सजा के इन वर्षों में कमी और आप को मुक्त करना संभव हुआ तो इससे मुझसे ज्यादा कोई प्रश्न नहीं होगा।
जन नेता के रूप में गांधी जी ने आन्दोलन में आम जनता को भी शामिल किया।
अब आन्दोलन में केवल अमीर लोग नहीं थे।
बल्कि आन्दोलन में आम लोगों की भी हिस्सेदारी थी।
जैसे : किसान, श्रमिक तथा अन्य कारीगर।
1922 तक गांधी जी ने भारतीय राष्ट्रवाद को बिल्कुल बदल कर रख दिया।
1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जो उन्होंने भाषण दिया था।
उस भाषण में किए गए वायदे को उन्होंने पूरा किया।
अब यह आंदोलन केवल अमीर व्यवसायिकों, बुद्धिजीवियों का ही नहीं था।
अब इसमें गांधी जी ने आम जनता को भी शामिल किया।
हजारों की संख्या में किसान, श्रमिक और कारीगर आंदोलन में भाग लेने लगे।
इनमें से कई गांधीजी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उन्हें महात्मा कहने लगे।
सामान्य जन के साथ इस तरह की पहचान उनके वस्त्रों में विशेष रूप से देखी जा सकती थी।
जहाँ अन्य नेता पश्चिमी शैली के सूट तथा औपचारिक वस्त्र पहनते थे ।
वहीं गाँधी जी एक साधारण धोती पहना करते थे।
गाँधी जी जहाँ भी गए वहीं उनकी चामत्कारिक शक्तियों की अफवाहें फ़ैल गई।
कुछ स्थानों गांधी जी को गांधी बाबा तथा महात्मा गाँधी कहकर पुकारा जाने लगा।
तथा गांधी महाराज जैसे शब्द भी उनके लिए प्रयोग किए जाने लगे।

जन नेता के रूप में गांधी जी
गाँधी जी हमेशा से ही गरीब किसानों के साथ खड़े रहे तथा गरीब किसानो के हमदर्द तथा मसीहा के रूप में देखे जाने लगे।
गांधी जी ने आन्दोलन का प्रचार प्रसार मातृभाषा में किया।
महात्मा गांधी जी ने हिन्दू मुस्लिम की एकता पर बल देने का प्रयास किया जिससे आन्दोलन का स्वरूप बदलने लगा।
रजवाड़ों को समझाने हेतु प्रजामंडल का गठन किया गया।
गाँधी जी के आकर्षक व्यक्तित्व के कारण बड़े बड़े नेता उनसे आकर जुड़ने लगे।
गांधी जी ने चरखे का प्रचार एवं प्रसार किया।
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अफवाहें
कुछ स्थानों पर यह कहा गया कि उन्हें राजा के द्वारा किसानों के दुख तकलीफों में सुधार के लिए भेजा गया है।
उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत करने की शक्ति है।
गांधी जी की शक्ति अंग्रेज बादशाह से अधिक है।
उनके आने से औपनिवेशिक शासक जिले से भाग जाएंगे।
गांधी जी की आलोचना करने वाले गांव के लोगों के घर रहस्यात्मक रूप से गिर गए और उनकी फसल भी चौपट हो गई।
1) बस्ती गांव के सिकंदर साहू ने 15 फरवरी को कहा कि वह महात्मा जी में तब विश्वास करेगा ‘जब उसके कारखाने जहां गुड़ का उत्पादन होता है’ में गन्ने के रस से भरा कड़हा (उबलता हुआ) दो भागों में टूट जाएगा तुरंत ही कड़हा वास्तव में बीच में से दो हिस्सों में टूट गया।
2) आजमगढ़ के किसान ने कहा कि वह महात्मा जी की प्रमाणिकता में तो विश्वास करेगा जब उसके खेत में लगाए गए गेहूं तिल में बदल जाएंगे अगले दिन उस खेत का सारा गेहूं तिल में बदल गया।
महात्मा गांधी जाति से एक व्यापारी तथा पेशे से वकील थे।
लेकिन उनका सादगी भरा जीवन तथा उनकी जीवनशैली और हाथों से काम करने के प्रति उनके लगाव की वजह से गरीब मजदूरों के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति रखते थे।
कांग्रेस की कई नई शाखाएं खोली गई।
रजवाड़ा में राष्ट्रवादी सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए प्रजामंडल की श्रृंखला स्थापित की जा रही थी।
महात्मा गांधी ने राष्ट्रवादी संदेश अंग्रेजी भाषा की जगह मातृभाषा में करने को प्रोत्साहित किया।
गांधी के प्रशंसकों में गरीब किसान और धनी उद्योगपति दोनों ही थे।
1917 से 1922 के बीच भारतीयों के बहुत ही प्रतिभाशाली वर्ग ने स्वयं को गांधी से जोड़ लिया।
इनमें महादेव देसाई, वल्लभ भाई पटेल, जे.बी कृपलानी, सुभाष चंद्र बोस,
अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविंद बल्लभ पंत
तथा सी. राजगोपालाचारी शामिल थे।
महात्मा गांधी को 1924 में जेल से रिहा कर दिया गया।
अब उन्होंने अपना ध्यान घर में बने कपड़े (खादी) को बढ़ावा देने तथा छुआछूत समाप्त करने पर लगाया।
गांधीजी केवल राजनीतिक नेता नहीं।
बल्कि एक समाजसेवी, समाज सुधारक भी थे।
उनका मानना था कि भारतीयों को बाल विवाह और छुआछूत जैसी सामाजिक.
बुराइयों से मुक्त करना होगा।

नमक सत्याग्रह
असहयोग आन्दोलन समाप्त होने के कई वर्ष बाद तक महात्मा गाँधी ने अपने को समाज सुधार के कार्यो पर केन्द्रित रखा।
1928 में उन्होंने पुनः राजनीति में प्रवेश करने का सोची।

साइमन कमीशन
1919 में भारत सरकार अधिनियम लाया गया था।
इसे मोंटेक्यू चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से भी जाना जाता है।
इसमें यह कहा गया था को दस वर्ष बाद इन सुधारो की जांच की जायेगी।
भारतीय जनता तथा कांग्रेस भी इसकी मांग कर रहे थे।
क्योंकि भारतीय इस सुधार से संतुष्ट नहीं थे।
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साइमन कमीशन का विरोध
साइमन कमीशन का गठन – 1927
साइमन कमीशन भारत आया – 1928
साइमन आयोग का अध्यक्ष – जॉन साइमन था
इसमें सात सदस्य थे।
सभी सदस्य अंग्रेज थे।
इसका भारतीयों ने विरोध किया।
विरोध- बंबई तथा कलकत्ता में विरोध हुआ, साइमन वापस जाओ के नारे लगाए गए।
सुभाष चंद्र बोस ने कलकत्ता में विरोध किया।
लखनऊ में- जवाहरलाल नेहरू, जीबी पंत ने विरोध किया।
लाहौर- भगत सिंह
(नौजवान भारत सभा)
नेतृत्व- लाला लाजपत राय कर रहे थे।
पुलिस ने लाला लाजपत राय पर लाठी से हमला किया।
लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई.
मुस्लिम लीग ने जिन्ना के नेतृत्व में साइमन कमीशन का विरोध किया।
1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ।
जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष चुना गया।
इसी अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई।
26 जनवरी 1930 को अलग-अलग स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और देशभक्ति के गीत गाकर स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।

नमक सत्याग्रह (दांडी)
स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के तुरंत बाद गाँधी जी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिशों द्वारा बनाये गये कानून जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है।
तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेगे।
गाँधी जी का मानना था की हर घर में नमक का उपयोग अपरिहार्य था और अंग्रेज ऊंचे दामों में खरीदने के लिए लोगों को बाध्य कर रहे थे।
इसी को निशाना बनाते हुए गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कदम उठाया।
स्वतंत्रता दिवस मनाये जाने के तुरंत बाद गाँधी जी ने घोषणा की कि वे ब्रिटिशों द्वारा बनाये गये कानून जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है।
तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेगे।
गाँधी जी का मानना था की हर घर में नमक का उपयोग अपरिहार्य था और अंग्रेज ऊंचे दामों में खरीदने के लिए लोगों को बाध्य कर रहे थे।
इसी को निशाना बनाते हुए गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कदम उठाया।
नमक सत्याग्रह में लोग गांधी जी के साथ हो गए।
आंदोलन को बड़ा देख अंग्रेजों ने लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया।
महात्मा गांधी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
समुद्र तट की ओर गांधी जी की यात्रा की प्रगति की जानकारी उन पर नजर रखने वाले पुलिस अफसरों द्वारा भेजी गई रिपोर्ट से पता लगती है।
इन रिपोर्ट में गांधी जी द्वारा दिए गए भाषण भी शामिल है।
जिसमें उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से भी आंदोलन में जुड़ने की बात कही है।
वसना नामक गांव में गांधीजी ने ऊंची जाति वालों को संबोधित करते हुए कहा कि “यदि आप स्वराज के हक में आवाज उठाते हैं तो आपको अछूतों की सेवा करनी पड़ेगी, सिर्फ नमक कर या अन्य करो कि खत्म हो जाने से आपको स्वराज नहीं मिल पाएगा। स्वराज के लिए आपको अपनी उन गलतियों का प्रायश्चित करना होगा जो अछूतों के साथ की है।
स्वराज के लिए हिंदू, मुस्लिम, पारसी, सिख सब को एकजुट होना पड़ेगा।
एक साथ आना पड़ेगा यह स्वराज की सीढ़ियां हैं।
गांधीजी के आंदोलन में तथा उनकी सभाओं में तमाम जातियों की औरत-मर्द शामिल हो रहे थे।
हजारों वॉलिंटियर राष्ट्रवादी उद्देश्य के लिए सामने आ रहे थे।
कई सरकारी अफसरों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।
एक अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम को गांधीजी के कद काठी पर हंसी आती थी।
पत्रिका ने उनका मजाक उड़ाया। पत्रिका ने कहा तकुए जैसे शरीर और मकड़ी जैसे पेडू का खूब मजाक उड़ाया था।
इस यात्रा के बारे में अपनी पहली रिपोर्ट में ही टाइम ने नमक यात्रा के मंजिल तक पहुंचने पर शक जाहिर किया।
उनका दावा था कि दूसरे दिन पैदल चलने के बाद गांधीजी जमीन पर पसर गए थे।
पत्रिका को इस बात पर विश्वास नहीं था कि मरियल साधु के शरीर में और आगे जाने की ताकत बची है।
एक हफ्ते में ही पत्रिका की सोच बदल गई।
टाइम ने लिखा कि इस यात्रा को जो भारी जनसमर्थन मिल रहा है।
उसने अंग्रेज शासकों को गहरे तौर पर बेचैन कर दिया है।
अब वे भी गांधीजी को ऐसा साधु और राजनेता कह कर सलामी देने लगे।
जो ईसाई के खिलाफ ईसाई तरीकों का ही हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
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संवाद
नमक यात्रा तीन कारण से उल्लेखनीय है
1) इस यात्रा से गाँधी दुनिया की नज़र में आ गए।
इस यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक कवरेज दी।
2) इसके द्वारा औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी।
यह पहली राष्ट्रवादी गतिविधि थी।
जिसमें महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
एक समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गांधीजी को समझाया कि वह अपने आंदोलन को पुरुषों तक ही सीमित ना रखें।
3) अंग्रेजो में डर
इस नमक यात्रा के कारण अंग्रेजों को एहसास हुआ कि अब उनका राज बहुत दिनों तक नहीं टिक सकेगा।
उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा।

गोल मेज सम्मेलन
पहला गोल मेज सम्मेलन- 1930
इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने लन्दन में गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन करना शुरू किया।
पहला गोलमेज सम्मेलन नवम्बर 1930 में हुआ।
इसमें देश के प्रमुख नेता शामिल नहीं थे।
जनवरी 1931 में गांधी जी जेल से रिहा हुए।
अगले महीने वायसराय से उनकी बैठक हुई जिसके बाद गांधी-इरविन समझौते पर सहमती बनी।
जिसकी शर्तों में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेना था।
सारे कैदियों की रिहाई करनी थी।
तटीय इलाकों में नमक उत्पादन की अनुमति देना शामिल था।
लेकिन इस समझौते का रेडिकल राष्ट्रवादी ने विरोध किया।
क्योंकि गांधीजी वायसराय से भारतीयों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन हासिल नहीं कर पाए थे।
Class 12th History Chapter 13 Mahatma Gandhi aur Rashtriya Andolan Notes
दूसरा गोल मेज सम्मेलन – 1931
दूसरा गोलमेज सम्मेलन 1931 के आखिर में लन्दन में आयोजित किया गया।
जिसमे गांधी जी कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे।
गांधी जी का कहना था की उनकी पार्टी पूरे भारत का नेतृत्व करती है।
पर इस दावे को 3 पार्टियों ने चुनौती दी मुस्लिम लीग, रजवाड़े, अम्बेडकर।
इस सम्मेलन का कोई नतीजा नहीं निकला और गाँधी जी को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
भारत लौटने पर उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन फिर शुरू कर दिया।
नए वायसराय लार्ड विलिंग्डन को गांधी जी से बिलकुल हमदर्दी नहीं थी।
अपनी बहन को लिखे एक निजी खत में विलिंगडन ने लिखा था कि अगर गांधी ना होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती।
सितंबर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया।
महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू दोनों ही हिटलर और नात्सियों के कट्टर आलोचक रहे हैं।
उन्होंने फैसला किया कि अगर अंग्रेज युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को आजादी दे, तो कांग्रेस उनके युद्ध प्रयासों में सहायता दे सकती है।
सरकार ने उनका प्रस्ताव खारिज कर दिया।
इसके विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडल ने अक्टूबर 1939 में इस्तीफा दे दिया।
मार्च 1940 में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए कुछ स्वायत्ता की मांग का प्रस्ताव पेश किया।
अब यह संघर्ष तीन धुरियों का हो गया (कांग्रेस, मुस्लिम लीग, ब्रिटिश सरकार)
1942 में चर्चिल ने गांधी जी और कांग्रेस के साथ समझौते का रास्ता निकालने के लिए अपने एक मंत्री स्टेफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।
इसी समय ब्रिटेन में एक सर्वदलीय सरकार सत्ता में थी।
जिसमे शामिल लेबर पार्टी के सदस्य भारतीयों के प्रति हमदर्दी रखते थे।
लेकिन सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक कट्टर साम्राज्यवादी थे।
1942 में चर्चिल ने गांधी और कांग्रेस के साथ समझौते का रास्ता निकालने के लिए अपने एक मंत्री स्टेफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।
क्रिप्स के साथ बात करते हुए कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया की अगर धुरी शक्तियों से भारत की रक्षा के लिए ब्रिटिश शासन कांग्रेस का समर्थन चाहता है।
तो वायसराय को सबसे पहले अपने कार्यकारी परिषद् में किसी भारतीय को एक रक्षा सदस्य के रूप में नियुक्त करना चाहिए।
पर इसी बात पर वार्ता टूट गयी।

भारत छोड़ो आन्दोलन
क्रिप्स मिशन के सफल न होने के बाद गाँधी जी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आन्दोलन छेड़ने का फैसला लिया।
अगस्त 1942 में शुरू हुए इस आन्दोलन को “अंग्रेजों भारत छोडो” का नाम दिया गया।
गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों तथा तोड़फोड़ करते रहे।
कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य सबसे ज्यादा सक्रीय थे।
पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में स्वतंत्र सरकार की स्थापना कर दी गई।
अंग्रेजों ने आन्दोलन के प्रति सख्त रवैया अपनाया फिर भी इस विद्रोह को दबाने में साल भर का समय लग गया।
इस आन्दोलन में लाखों आम हिन्दुस्तानी शामिल थे इस आन्दोलन में युवाओं ने कॉलेज को छोड़ कर जेल का रास्ता अपनाया।
जिस समय कांग्रेस के नेता जेल में गए उसी समय जिन्ना तथा मुस्लिम लीग ने अपना प्रभाव फ़ैलाने की कोशिश की।
जब विश्वयुद्ध समाप्त होने वाला था तो गाँधी जी को रिहा कर दिया गया जेल से निकलने के बाद उन्होंने कांग्रेस और जिन्ना के साथ बहुत बातें की।
गाँधी जी द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया गया।
1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी।
यह सरकार भारत को स्वतंत्रता देने के पक्ष में थी।
इस समय वायसराय लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच मीटिंग का आयोजन किया।
1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए।
कांग्रेस को सामान्य श्रेणी में भारी सफलता मिली।
मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को बहुमत प्राप्त हुआ।
राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका था।
1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया।
इस मिशन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने का प्रयास किया।
लेकिन कैबिनेट मिशन इस प्रयास में सफल नहीं हो पाया।
वार्ता टूट जाने के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए लीग के मांग के समर्थन में एक प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का आह्वान किया।
इसके लिए 16 अगस्त 1946 का दिन तय किया गया था।
उसी दिन कोलकाता में खूनी संघर्ष शुरू हो गए।
यह हिंसा कोलकाता से शुरू होकर ग्रामीण बंगाल, बिहार और संयुक्त प्रांत व पंजाब में फैल गई।
जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग में एक “प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस” का फैसला किया, उसी दिन कोलकाता में बहुत खून खराबा हुआ।
फरवरी 1947 में वावेल की जगह लार्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाया गया।
तब उन्होंने ऐलान किया की ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी।
लेकिन उसका विभाजन भी होगा।
15 अगस्त 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में महात्मा गाँधी ने हिस्सा नहीं लिया।
उस समय वो कलकत्ता में थे।
लेकिन उन्होंने वहां भी न तो किसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया और न ही कहीं झंडा फहराया।
गाँधी जी उस दिन 24 घंटे के उपवास पर थे।
उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया वो बेकार हो गया।
क्योंकि हिन्दू और मुस्लिम एक दूसरे को मार रहे थे।
उनका राष्ट्र अब विभाजित हो चुका था।
30 जनवरी की शाम को गांधी जी की दैनिक प्रार्थना सभा में एक युवक ने उनको गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया।
उनके हत्यारे ने कुछ समय बाद आत्मसमर्पण कर लिया।
वह नाथूराम गोडसे था, वह एक चरमपंथी हिंदुत्ववादी अखबार का संपादक था और वह गांधी जी को मुसलामानों का खुशामदी कहकर उनकी निंदा करता था।
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महात्मा गांधी को जानने के स्त्रोत
निजी लेखन / भाषण :

  • हरिजन अखबार में गांधी उन पत्रों को शामिल करते हैं जिन लोगों से उन्हें मिलते थे तथा भाषणों से भी हमें गांधी जी के बारे में पता चलता है।
  • नेहरू संकलन – Bunch Of Old Letters
  • विभिन्न समाचार पत्र : अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में छपने वाले अखबार भी राष्ट्रीय आंदोलन का एक स्त्रोत थे तथा ये अखबार गांधी जी की प्रत्येक गतिविधियों पर नजर रखते थे।
  • सरकारी रिकॉर्ड : औपनिवेशिक शासक ऐसे तत्वों पर सदा कड़ी नजर रखते थे जिन्हें वे अपने विरुद्ध मानते थे तथा पुलिस रिपोर्टों में भी हमें गांधी जी के संदर्भ में जानकारियां मिलती है।
  • आत्मकथाएं : आत्मकथाएं उस अतीत का ब्यौरा देते हैं जो समृद्ध होता है यह कथाएं स्मृति के आधार पर लिखी जाती है जिनसे पता चलता है कि लिखने वाले को क्या याद रहा एवं क्या महत्वपूर्ण लगा तथा हमें पढ़ते समय यह ध्यान रखना चाहिए यह लेखक ने क्या नहीं लिखा। Class 12th History Chapter 13 Mahatma Gandhi aur Rashtriya Andolan Notes

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12. Aupniveshik shahar | औपनिवेशिक शहर

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ बारह औपनिवेशिक शहर (Aupniveshik shahar) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

12. औपनिवेशिक शहर

नगरीकरण, नगर-योजना, स्थापत्य
इस पाठ में हमलोग तीन बड़े औपनिवेशिक शहरों- मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई के विकासक्रम को गहनता से पढ़ेंगे। कम्पनी के एजेंट 1639 में मद्रास तथा 1690 में कलकत्ता में बस गए। 1661 में बम्बई को ब्रिटेन के राजा ने कम्पनी को दे दिया गया था, जिसे उसने पुर्तगाल के शासक से अपनी पत्नी के दहेज के रूप में प्राप्त किया था। कम्पनी ने इन तीन बस्तियों में व्यापरिक तथा प्रशासनिक कार्यालय स्थापित किए।

कस्बों को उनका चरित्र कैसे मिला?
कस्बा ग्रामीण अंचल में एक छोटे नगर को कहा जाता है जो सामान्यतया स्थानीय विशिष्ट व्यक्ति का केन्द्र होता है।
गंज एक छोटे स्थायी बाजार को कहा जाता है। कस्बा और गंज दोनों कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध उत्पादों से संबंध थे।
धीर-धीरे पूराने महानगरों का पतन होने लगा और नए राजधानीयां बनने लगी।
व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार तथा अन्य लोग पुराने मुग़ल केन्द्रों से इन नयी राजधानियों की ओर काम तथा संरक्षण की तलाश में आने लगे। नए राज्यों के बीच निरंतर लड़ाइयों का परिणाम यह था कि भाड़े के सैनिकों को भी यहाँ तैयार रोजगार मिलता था। कुछ स्थानीय विशिष्ट लोगों तथा उत्तर भारत में मुग़ल साम्राज्य से सम्बधित अधिकारियों ने भी इस अवसर का उपयोग ‘कस्बे’ और ‘गंज’ जैसी नयी शहरी बस्तियों को बसाने में किया।
उत्तर भारत में सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने का कार्य कोतवाल नामक राजकीय अधिकारी का होता था जो नगर में आंतरिक मामलों पर नजर रखता था और कानून-व्यवस्था बनाए रखता था।
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अठारहवीं शताब्दी में परिवर्तन
पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी में, डचों ने 1605 में मछलीपट्नम में, अंग्रेजों ने मद्रास में 1639 में तथा फ्रांसिसियों ने 1673 में पांडीचेरी में व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार किया। इसके आस-पास कई नगर बसने लगे। 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों ने राजनीतिक नियंत्रण हासिल किया।
इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापार फैला, मद्रास, कलकत्ता तथा बम्बई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह शहर तेजी से नयी आर्थिक राजधानियों के रूप में उभरे। ये औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केन्द्र भी बन गए। नए भवनों और संस्थानों का विकास हुआ, तथा शहरी स्थानों को नए तरीकों से व्यवस्थित किया गया। नए रोजगार विकसित हुए और लोग इन औपनिवेशिक शहरों की ओर उमड़ने लगे। लगभग 1800 तक ये जनसंख्या के लिहाज से भारत के विशालतम शहर बन गए थे

औपनिवेशिक शहरों की पड़ताल
औपनिवेशिक रिकॉर्ड्स और शहरी इतिहास
उन्नीसवीं सदी के आख़िर से अंग्रेजों ने नगर पालिका कर वसूली के जरिए शहरों के रख-रखाव के वास्ते पैसा इकट्ठा करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं।
शहरों के फैलाव पर नजर रखने के लिए नियमित रूप से लोगों की गिनती की जाती थी।
अखिल भारतीय जनगणना का पहला प्रयास 1872 में किया गया। इसके बाद, 1881 से दशकीय; हर 10 साल में होने वाली, जनगणना एक नियमित व्यवस्था बन गई।

बदलाव के रुझान
सन् 1800 के बाद हमारे देश में शहरीकरण की रफ्तार धीमी रही। पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के पहले दो दशकों तक देश की कुल आबादी में शहरी आबादी का हिस्सा बहुत मामूली और स्थिर रहा।
नए व्यावसायिक एवं प्रशासनिक केंद्रों के रूप में इन तीन शहरों के पनपने के साथ-साथ कई दूसरे तत्कालीन शहर कमजोर भी पड़ते जा रहे थे। औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का केंद्र होने के नाते ये शहर भारतीय सूती कपड़े जैसे निर्यात उत्पादों के लिए संग्रह डिपो थे। मगर इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद इस प्रवाह की दिशा बदल गई और इन शहरों में ब्रिटेन के कारखानों में बनी चीजे़ं उतरने लगीं। भारत से तैयार माल की बजाय कच्चे माल का निर्यात होने लगा।
1853 में रेलवे की शुरुआत हुई। इसने शहरों की कायापलट दी। रेलवे के विस्तार से शहरों का विकास तेजी से हुआ तथा व्यापार भी तेजी से बढ़ा। नए शहरों की स्थापना हुई।
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नए शहर कैसे थे?
बंदरगाह, किले और सेवाओं के केंद्र
अठारहवीं सदी तक मद्रास, कलकत्ता और बम्बई महत्वपूर्ण बंदरगाह बन चुके थे। यहाँ जो आबादियाँ बसीं वे चीजों के संग्रह के लिए काफी उपयोगी साबित हुईं। ईस्ट इंडिया वंफपनी ने अपने कारख़ाने; यानी वाणिज्यिक कार्यालय- इन्हीं बस्तियों में बनाए और यूरोपीय वंफपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण सुरक्षा के उद्देश्य से इन बस्तियों की किलेबंदी कर दी।
यूरोपीयों और भारतीयों के लिए शुरू से ही अलग क्वार्टर बनाए गये थे। उस समय के लेखन में उन्हें व्हाइट टाउन (गोरा शहर) और ब्‍लैक टाउन (काला शहर) के नाम से पुकारा जाता था।
1850 के दशक के बाद भारतीय व्यापारियों और उद्यमियों ने बम्बई में सूती कपड़ा मिलें लगाईं।

पहला हिल स्टेशन
छावनियों की तरह हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह) भी औपनिवेशिक शहरी विकास का एक ख़ास पहलू थी। हिल स्टेशनों की स्थापना और बसावट का संबंध सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से था। सिमला की स्थापना गुरखा युद्ध (1815-1816) के दौरान की गई। अंग्रेज-मराठा युद्ध (1818) के कारण अंग्रेजों की दिलचस्पी माउंट आबू में बनी जबकि दार्जीलिंग को 1835 में सिक्किम के राजाओं से छीना गया था। ये हिल स्टेशन फौजियों को ठहराने, सरहद की चौकसी करने और दुश्मन के ख़िलाफ हमला बोलने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।
हिल स्टेशन ऐसे अंग्रेजों और यूरोपीयनों के लिए भी आदर्श स्थान थे जो अपने घर जैसी मिलती-जुलती बस्तियाँ बसाना चाहते थे। उनकी इमारतें यूरोपीय शैली की होती थीं।
रेलवे के आने से ये पर्वतीय सैरगाहें बहुत तरह के लोगों की पहुँच में आ गईं। अब भारतीय भी वहाँ जाने लगे। उच्च और मध्यवर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर-सपाटे के लिए इन स्थानों पर जाने लगे।
हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण थे। पास के हुए इलाकों में चाय और कॉफी बगानों की स्थापना से मैदानी इलाकों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ आने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि अब हिल स्टेशन केवल यूरोपीय लोगों की ही सैरगाह नहीं रह गए थे

पृथक्करण, नगर नियोजन और भवन निर्माण
मद्रास, कलकत्ता और बम्बई, तीनों औपनिवेशिक शहर पहले के भारतीय शहरों और कस्‍बों से अलग थे।
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मद्रास में बसावट और पृथक्करण
कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधीयों का केंद्र सबसे पहले पश्चिमी तट पर सूरत के सुस्थापित बंदरगाह को बनाया था। बाद में वस्त्र उत्पादों की खोज में अंग्रेज व्यापारी पूर्वी तट पर जा पहुँचे। 1639 में उन्होंने मद्रासपटम में एक व्यापारिक चौकी बनाई।
फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ प्रतिद्वंद्विता (1746-63) के कारण अंग्रेजों को मद्रास की किलेबंदी करनी पड़ी और अपने प्रतिनिधीयों को ज्यादा राजनीतिक व प्रशासकीय जिम्मेदारियाँ सौंप दीं। 1761 में फ्रांसीसियों की हार के बाद मद्रास और सुरक्षित हो गया।

कलकत्ता में नगर नियोजन
1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर हमला किया और अंग्रेज व्यापारियों द्वारा माल गोदाम के तौर पर बनाए गए छोटे किले पर कब्जा कर लिया।
1757 में प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला की हार हुई। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक ऐसा नया किला बनाने का फैसला लिया जिस पर आसानी से हमला न किया जा सके।
1798 में लॉर्ड वेलेजली गवर्नर जनरल बने। उन्होंने कलकत्ता में अपने लिए गवर्नमेंट हाउस के नाम से एक महल बनवाया।
लॉटरी कमेटी ने शहर का एक नया नक्शा बनवाया जिससे कलकत्ता की एक मुकम्मल तसवीर सामने आ सके। कमेटी की प्रमुख गतिविधि‍यों में शहर के हिंदुस्तानी आबादी वाले हिस्से में सड़क-निर्माण और नदी किनारे से अवैध कब्‍जे हटाना शामिल था। शहर के भारतीय हिस्से को साफ-सुथरा बनाने की मुहिम में कमेटी ने बहुत सारी झोंपड़ियों को साफ कर दिया और मेहनतकश गरीबों को वहाँ से बाहर निकाल दिया। उन्हें कलकत्ता के बाहरी किनारे पर जगह दी गई।
जैसे-जैसे ब्रिटिश साम्राज्य फैला, अंग्रेज कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे शहरों को शानदार शाही राजधानियों में तब्दील करने की कोशिश करने लगे। उनकी सोच से ऐसा लगता था मानो शहरों की भव्यता से ही शाही सत्ता की ताकत प्रतिबिंबित होती है।

बम्बई में भवन निर्माण
शुरुआत में बम्बई सात टापुओं का इलाका था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी सातों टापु एक हो गए। लोगों ने उसे भरकर पूरे शहर को एक साथ मिला दिया।
पश्चिमी तट पर एक प्रमुख बंदरगाह होने के नाते यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था। जैसे-जैसे बम्बई की अर्थव्यवस्था फैली, उन्नीसवीं सदी के मध्य से रेलवे और जहाजरानी के विस्तार तथा प्रशासकीय संरचना विकसित करने की जरूरत भी पैदा होने लगी। उस समय बहुत सारी नयी इमारतें बनाई गईं।
1869 में स्‍वेज नहर खुल जाने के कारण बम्‍बई का जुड़ाव विश्‍व के साथ बढ़ गया। जिससे बम्‍बई का विकास हुआ।
1860 के दशक में सूती कपड़ा उद्योग की तेजी के समय बनाई गयी बहुत सारी व्यावसायिक इमारतों के समूह को एल्फिंस्‍टन सर्कल कहा जाता था। बाद में इसका नाम बदलकर हॉर्निमान सर्कल रख दिया गया था। यह नाम भारतीय राष्ट्रवादियों की हिमायत करने वाले एक अंग्रेज संपादक के नाम पर पड़ा था। यह इमारत इटली की इमारतों से प्रेरित थी। इसमें पहली मंजिल पर भीड़-भाड़ की वजह से बम्बई में ख़ास तरह की इमारतें भी सामने आईं जिन्हें चॉल का नाम दिया गया। ये बहुमंजिला इमारतें होती थीं जिनमें एक-एक कमरे वाली आवासीय इकाइयाँ बनाई जाती थीं।
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इमारतें और स्थापत्य शैलियाँ क्या बताती हैं
इमारतें उन लोगों की सोच और नजर के बारे में भी बताती हैं जो उन्हें बना रहे थे। इमारतों के जरिए सभी शासक अपनी ताकत का इजहार करना चाहते हैं। इस प्रकार एक ख़ास वक्त की स्थापत्य शैली को देखकर हम यह समझ सकते हैं कि उस समय सत्ता को किस तरह देखा जा रहा था और वह इमारतों और उनकी विशिष्टताओं – ईंट-पत्थर, खम्भे और मेहराब, आसमान छूते गुम्बद या उभरी हुई छतों के जरिए किस प्रकार अभिव्यक्त होती थी। Class 12th History Chapter 12 Aupniveshik shahar Notes

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11. Vidrohi or raj | विद्रोही और राज

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ ग्‍यारह विद्रोही और राज (Vidrohi or raj) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

11. विद्रोही और राज

10 मई 1857 की दोपहर को मेरठ छावनी में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया।
इसकी शुरुआत भारतीय सैनिकों से बनी पैदल सेना से हुई थी।
जल्दी ही इसमें घुड़सवार फौज भी शामिल हो गई और यह पूरे शहर तक फैल गई।
शहर और आसपास के लोग सिपाहियों के साथ जुड़ गए।
सिपाहियों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया।
शस्त्रागार- हथियार और गोला बारूद।
इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों पर निशाना साधा और उनके बंगलो, साजो सामान को तहस-नहस कर जला दिया।
रिकॉर्ड दफ्तर, अदालत, जेल, डाकखाने, सरकारी खजाने जैसी सरकारी इमारतों को लूट कर तबाह कर दिया।
अंधेरा होते ही सिपाहियों का एक जत्था घोड़ों पर सवार होकर दिल्ली की तरफ चला।
यह जत्था 11 मई को तड़के लाल किले के फाटक पर पहुंचा।
रमजान का महीना था।
मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर नमाज पढ़कर सहरी खाकर उठे थे।
तभी उन्हें फाटक पर हल्ला सुनाई दिया।
सिपाहियों ने उन्हें जानकारी दी कि हम मेरठ के सभी अंग्रेज पुरुषों को मार कर आए हैं।
क्योंकि वह हमें गाय और सुअर की चर्बी में लिपटे कारतूस दांतों से खींचने के लिए मजबूर कर रहे थे।
इससे हिंदू और मुस्लिम का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
दिल्ली के अमीर लोगों पर भी हमला किया गया और उन्हें लूटा गया।
दिल्ली अंग्रेजों के नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी।
इन सिपाहियों की मांग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें तथा उनके विद्रोह को वैधता मिले।
बहादुर शाह जफर के पास कोई चारा नहीं था।
इसलिए उन्होंने सिपाहियों का साथ दिया।
अब यह विद्रोह मुगल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था।
Class 12th History Chapter 11 Vidrohi or raj Notes
विद्रोह का ढर्रा
विद्रोह की तारीख को ध्यान से देखा जाए तो ऐसा पता लगा है कि जैसे-जैसे विद्रोह की खबर एक शहर से दूसरे शहर में पहुंचती गई।
वैसे-वैसे सिपाही हथियार उठाते गए।

सैन्य विद्रोह कैसे हुआ
सिपाहियों ने विशेष संकेत के साथ अपनी कार्यवाही शुरू की।
जैसे- कई जगह शाम को तोप का गोला दागा गया।
कहीं बिगुल बजाकर संकेत दिया गया।
सबसे पहले उन्होंने शस्त्रागार पर कब्जा किया।
फिर सरकारी खजाने को लूटा।
उसके बाद जेल, सरकारी खजाने, टेलीग्राफ दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, बंगले तथा सरकारी इमारतों पर हमला किया और सारे रिकॉर्ड जला दिए।
अंग्रेज तथा अंग्रेजों से संबंधित हर चीज हर शख्स हमले का निशाना था।
हिंदुओं और मुसलमानों तथा तमाम लोगों को एकजुट करने के लिए हिंदी, उर्दू और फारसी में अपील जारी होने लगी।
विद्रोह में आम लोग भी शामिल होने लगे।
जिसके साथ हमलों का दायरा बढ़ने लगा।
विद्रोहियों ने लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे शहरों में साहूकार और अमीर लोगों को भी निशाना बनाया।
किसान इन लोगों को उत्पीड़न मानते थे और अंग्रेजों का पिट्ठू भी मानते थे।
मई, जून के महीनों में अंग्रेजों के पास विद्रोहियों का कोई जवाब नहीं था।
अंग्रेज अपनी जिंदगी और अपना घर बार बचाने में फंसे हुए थे।
एक ब्रिटिश अफसर ने लिखा ब्रिटिश शासन ताश के किले की तरह बिखर गया।
Class 12th History Chapter 11 Vidrohi or raj Notes
संचार के माध्यम ?
अलग अलग स्थानों पर विद्रोह का ढर्रा एक समान था इस से एक बात साबित हो जाती है कि विद्रोह नियोजित था।
विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छा संचार बना हुए था।
जब सातवीं अवध इरेगुलर कैवेलरी ने मई की शुरुवात में कारतूस के इस्तेमाल से मना किया तो उन्होंने 48 नेटिव इन्फेंट्री को लिखा कि, हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतजार कर रहे हैं।

योजनाएं कैसे बनाई गई ? /योजनाकार कौन थे ?
विद्रोह के दौरान अवध मिलिट्री पुलिस के कैप्टन हियर्से की सुरक्षा का जिम्मा भारतीय सिपाहियों पर था।
जहां कैप्टन हियर्से तैनात थे वहां की 41 वी नेटिव इन्फेंट्री की तैनाती थी।
इन्फेंट्री की दलील थी कि क्योंकि वह अपने तमाम गोरे अफसरों को जड़ से खत्म कर चुके हैं।
इसलिए अवध मिलिट्री का फर्ज बनता है।
कि वह कैप्टन हियर्से को भी मौत की नींद सुला दे या उसे गिरफ्तार करके 41 नेटिव इन्फेंट्री के हवाले कर दे।
मिलिट्री पुलिस ने दोनों दलीलें खारिज कर दी।
अब यह तय किया गया कि इस मामले को हल करने के लिए रेजीमेंट के देसी अफसरों की पंचायत बुलाई जाए।
इस विद्रोह की शुरुआत के इतिहासकारों में से एक चार्स बोल ने लिखा है–
कि यह पंचायत रात को कानपुर सिपाही लाइनों में जुटती थी।
इसका मतलब है कि सामूहिक रूप से कुछ फैसले जरूर लिए जा रहे थे।
क्योंकि सिपाही लाइनों में रहते थे और सभी की जीवनशैली एक जैसी थी।
क्योंकि उनमें बहुत सारे एक ही जाति के होते थे इसलिए इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वह इकट्ठा बैठकर भविष्य के बारे में फैसले ले रहे होंगे।
यह सिपाही अपने विरोध के कर्ताधर्ता खुद थे।

नेता और अनुयाई ?
अंग्रेजो लोहा लेने के लिए नेतृत्व और संगठन जरूरी थे।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विद्रोहियों ने कई बार ऐसे लोगों की शरण ली।
जो अंग्रेजों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे।
दिल्ली में – मुगल बादशाह बहादुर शाह।
कानपुर में – पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहेब।
बिहार – आरा के स्थानीय जमीदार कुंवर सिंह।
अवध – नवाब वाजिद अली शाह।
लखनऊ – बिज रिस कद्र।
अक्सर विद्रोह का संदेश आम पुरुषों एवं महिलाओं के जरिए तो कुछ स्थानों पर धार्मिक लोगों के जरिए भी फैल रहा था।
मेरठ में कुछ ऐसी खबर आ रही थी कि वहां हाथी पर सवार एक फकीर को देखा गया था।
जिससे सिपाही बार-बार मिलने जाते थे।
लखनऊ में अवध पर कब्जे के बाद बहुत सारे धार्मिक नेता और स्वयंभू, पैगंबर प्रचारक ब्रिटिश राज के नेस्तनाबूद करने का अलख जगा रहे थे।
अन्य स्थानों पर किसान, जमींदार और आदिवासियों को विद्रोह के लिए उकसाते हुए, कई स्थानीय नेता सामने आ रहे थे।
उत्तर प्रदेश में बड़ोत इलाके के गांव वालों को  संगठित किया।
छोटानागपुर स्थित सिंहभूम के एक आदिवासी काश्तकार गोनू ने इलाके के कोल आदिवासियों का नेतृत्व संभाला हुआ था।
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अफवाहें और भविष्यवाणियां
इस समय तरह-तरह की अफवाहों और भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को उकसाया जा रहा था।
सिपाहियों ने एनफील्ड राइफल के उन कारतूस का विरोध किया।
जिसे इस्तेमाल करने से पहले उन्हें मुंह से खींचना पड़ता था।
अंग्रेजों ने सिपाहियों को बहुत समझाया कि ऐसा नहीं है।
लेकिन यह अफवाह उत्तर भारत के छावनियों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी।
अफवाह का स्रोत खोजा जा सकता है।
रएफल इंस्डिट्पोरक्शन डिपो के एक कैप्टन ने अपनी रिपोर्ट लिखा था कि दम दम स्थित शस्त्रागार में काम करने वाले नीची जाति के एक खलासी ने जनवरी 1857 में एक ब्राह्मण सिपाही से पानी पिलाने के लिए कहा था।
ब्राह्मण सिपाही ने यह कह कर उसे अपने लोटे से पानी पिलाने से मना कर दिया कि नीची जाति के छूने से उसका लोटा अपवित्र हो जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, इस पर खलासी ने जवाब दिया कि जल्दी ही तुम्हारी जाति भी भ्रष्ट होने वाली है। क्योंकि अब तुम्हें गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूस को मुंह से खींचना पड़ेगा।

अन्य अफवाह
अंग्रेज सरकार ने हिंदू और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक साजिश रची है।
अंग्रेजों ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की हड्डियों का चूरा मिलवा दिया है।
इस अफवाह के बाद शहरों और छावनियों में सिपाहियों और आम लोगों ने आटे को छूने से भी मना कर दिया।
चारों तरफ यह डर और शक बना हुआ था कि अंग्रेज हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
अंग्रेजों ने लोगों को यकीन दिलाने का बहुत प्रयास किया। लेकिन अंग्रेज नाकाम रहे।
एक अफवाह यह भी थी कि प्लासी के जंग के 100 साल बाद देश आजाद हो जाएगा। 23 जून 1857 को अंग्रेजी शासन खत्म हो जाएगा।
उत्तर भारत के विभिन्न गांवों से चपातिया बांटने की भी रिपोर्ट आ रही थी।
ऐसा बताया जाता है कि रात में एक आदमी आकर गांव के चौकीदार को एक चपाती तथा पांच और चपाती बनाकर अगले गांव में पहुंचाने का निर्देश दे जाता था।
चपाती बांटने का मतलब और मकसद उस समय भी स्पष्ट नहीं था और आज भी स्पष्ट नहीं है।
लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि लोग इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रहे थे।
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लोग अफवाहों पर विश्वास क्यों कर रहे थे ?
गवर्जनर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार ने पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचारों और पश्चिमी संस्थानों के जरिए भारतीय समाज को सुधारने के लिए खास तरह की नीतियां लागू की।
भारतीय समाज के कुछ तबकों की सहायता से अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय स्थापित किए गए थे।
इनमें पश्चिमी विज्ञान और उदार कलाओं को पढ़ाया जाता था।
अंग्रेजों ने सती प्रथा को खत्म करने और हिंदू विधवा विवाह को वैधता देने के लिए कानून बनाए थे।
शासकीय दुर्बलता (कुशासन) और दत्तकता (गोद लिए हुए बच्‍चे) को अवैध घोषित करने के बहाने से अंग्रेजों ने कई क्षेत्रों के शासकों को हटाकर उनकी रियासतों पर कब्जा कर लिया।
जैसे ही अंग्रेजों का कब्जा हुआ अंग्रेजों ने अपने ढंग से शासन व्यवस्था चलानी शुरू कर दी।
नए कानून लागू कर दिए, भूमि विवादों के निपटारे तथा भू राजस्व वसूली की व्यवस्था
लागू कर दी।
उत्तर भारत के लोगों पर इन सब कार्यवाइयों का गहरा असर हुआ था।
लोगों को लगता था कि अब तक जिन चीजों की कद्र करते थे।
जिनको वह पवित्र मानते थे।
चाहे राजे रजवाड़े हो या धार्मिक रीति रिवाज हो।
इन सभी को खत्म करके अंग्रेज एक दमनकारी नीति लागू कर रहे हैं।

अवध में विद्रोह ?
1851 में गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने अवध की रियासत के बारे में कहा था कि ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुंह में आकर गिरेगा।
पांच साल बाद 1856 में इस रियासत को ब्रिटिश शासन का अंग घोषित कर दिया हुआ।
अवध रियासत पर कब्जे का सिलसिला लंबा चला।
(1801 में अवध में सहायक संधि थोपी गई )
इस संधि में शर्त थी कि—
नवाब अपनी सेना खत्म कर दे।
रियासत में अंग्रेजों की सेना की तैनाती की इजाजत दे।
दरबार में मौजूद ब्रिटिश रेजिडेंट की सलाह पर अमल करें।
जब नवाब अपनी सैनिक ताकत से वंचित हुआ।
उसके बाद नवाब रियासत में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजो पर निर्भर हुआ।
अब विद्रोही मुखिया, तालुकदार पर भी नवाब का नियंत्रण नहीं रहा।
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सहायक संधि
सहायक संधि की शुरुआत 1798 में लॉर्ड वेलेजली द्वारा की गई।
यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें अंग्रेजों के साथ संधि करने वालों को कुछ शर्तें माननी पड़ती थी।

शर्तें
1) अंग्रेज अपने सहयोगी की बाहरी और आंतरिक चुनौतियों से रक्षा करेंगे।
2) सहयोगी पक्ष के भूक्षेत्र में ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी तैनात रहेगी।
3) सहयोगी पक्ष को इस टुकड़ी के रखरखाव की व्यवस्था करनी होगी।
4) सहयोगी पक्ष ना तो किसी और शासक के साथ संधि कर सकेगा और ना ही अंग्रेजों की अनुमति के बिना किसी युद्ध में शामिल हो सकेगा।

अंग्रेजो अवध में दिलचस्पी क्यों थी ?
1) अवध की जमीन नील और कपास की खेती के लिए अच्छी थी।
2) इस इलाके को उत्तरी भारत के एक बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता है।
3) 1850 के दशक के शुरुआत तक अग्रेज देश के ज्यादातर बड़े हिस्सों को जीत चुके थे।
4) मराठा भूमि दोआब, कर्नाटक, पंजाब और बंगाल, सब जगह अंग्रेजों की झोली में थे।
6) अवध के अधिग्रहण के साथ ही विस्तार की नीति मुकम्मल हो जाने वाली थी।

”देह से जान जा चुकी है”
लार्ड डलहोजी द्वारा किए गए अवध में अधिग्रहण से तमाम इलाकों और रियासतों में गहरा असंतोष था।
सबसे अधिक गुस्सा अवध में देखा गया।
अवध को उत्तर भारत की शान कहा जाता था।
अंग्रेजों ने यहां के नवाब वाजिद अली शाह को यह कहकर गद्दी से हटा कर कलकत्ता भेजा कि वह अच्छी तरह से शासन नहीं चला रहे थे।
अंग्रेजों ने यह भी कहा कि वाजिद अली शाह लोकप्रिय नहीं थे।
मगर सच यह था कि लोग उन्हें दिल से चाहते थे।
जब वह अपने प्यारे लखनऊ से विदा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग रोते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए।
अवध के नवाब के निष्कासन से पैदा हुए दुख और अपमान को उस समय बहुत सारे प्रेक्षकों ने दर्ज किया।
एक ने तो यह लिखा कि देह से जान जा चुकी थी, शहर की काया बेजान थी।
कोई सड़क, कोई बाजार और घर ऐसा नहीं था।
जहां से जान-ए-आलम से बिछड़ने पर विलाप का शोर ना गूंज रहा हो।
नवाब को हटाए जाने से दरबार और उसकी संस्कृति भी खत्म हो गई।
संगीतकार, कवियों ,कारीगरों, वाबर्चीयों,सरकारी कर्मचारियों और बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी चली गई।
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फिरंगी राज का आना और एक दुनिया का खात्मा
अवध में विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं ने राजकुमारों, तालुकदार, किसानों, सिपाहियों को एक दूसरे से जोड़ दिया था।
यह सभी फिरंगी राज के आने को एक दुनिया की समाप्ति के रूप में देखने लगे थे।
अब इन्हें गुलामी की जिंदगी जीनी पड़ रही थी।
अवध के अधिग्रहण से केवल नवाब की गद्दी नहीं छीनी थी।
बल्कि इस इलाके के तालुकदारों को भी लाचार कर दिया था।
तालुकदारों की जागीर है और किले बिखर चुके थे।
अंग्रेजों के आने से पहले तालुकदारों के पास हथियारबंद सिपाही होते थे।
अपने किले होते थे।
अगर यह तालुकदार नवाब की संप्रभुता को स्वीकार कर ले तो कुछ राजस्व चुका कर काफी स्वायत्तता प्राप्त होती थी।
कुछ बड़े तालुकदारों के पास 12000 तक पैदल सिपाही होते थे।
छोटे तालुकदारों के पास 200 सिपाहियों की टुकड़ी होती थी।
अंग्रेज इन तालुकदारों की सत्ता को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं थे।
अधिग्रहण के फौरन बाद तालुकदारों की सेनाओं को भी बंद कर दिया।
इनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।
ब्रिटिश भू राजस्व अधिकारियों का मानना था कि तालुकदारों को हटाकर वे जमीन असली मालिकों के हाथ में सौंप देंगे।
इससे किसानों के शोषण में भी कमी आएगी और राजस्व वसूली में भी इजाफा होगा।
लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ।
भू-राजस्व वसूली में बढ़ोतरी हुई।
लेकिन किसानों के भोज में कोई कमी नहीं आई।
तालुकदार अधिकारी समझ गए थे कि अवध के बहुत सारे इलाकों का मूल्य निर्धारण बहुत बड़ा चढ़ाकर किया गया है।
कुछ स्थानों पर तो राजस्व मांग में 30 से 70% तक इजाफा हो गया।
इससे ना तो तालुकदार को कोई फायदा था, ना ही किसानों को कोई फायदा था।
ताल्‍लुकदारों की सत्ता छीनने का नतीजा यह हुआ कि पूरी सामाजिक व्यवस्था भंग हो गई।
अंग्रेजों से पहले तालुकदार किसानों का शोषण करते थे।
लेकिन जरूरत पड़ने पर तालुकदार किसानों को पैसा देकर उनकी सहायता भी करते थे।
बुरे वक्त में उनकी मदद करते थे।
अब अंग्रेजों के राज में किसानों से मनमाना राजस्व वसूला जा रहा है।
जिसमें किसान बुरी तरह से पिसने लगे हैं।
अब इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि बुरे वक्त में या फसल खराब हो जाने में अंग्रेजी सरकार के द्वारा कोई रियायत बरती जाएगी।
या किसी प्रकार की कोई सहायता इनको मिल पाएगी।
या त्यौहार पर कोई कर्ज या मदद इन्हें मिल पायेगा।
जो पहले तालुकदार से मिल जाती थी।
अवध में किसानों और तालुकदारों में ब्रिटिश शासन के प्रति जो गुस्सा था।
वह 1857 के विद्रोह में देखने को मिला।
अवध के तालुकदारों ने 1857 की लड़ाई की बागडोर अपने हाथ में ले ली।
और यह नवाब की पत्नी बेगम हजरत महल के खेमे में शामिल हो गए।
फौज में दशकों से सिपाहियों को कम वेतन और छुट्टी नहीं मिलती थी जिससे उनमें भारी असंतोष था।
1857 के जन विद्रोह से पहले के सालों में सिपाहियों ने अपने गोरे अफसरों के साथ रिश्ते काफी बदल चुके थे।
1820 के दशक में अंग्रेज अफसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात रखने पर खासा जोर देते थे।
वह उनकी मौज मस्ती में शामिल होते थे।
उनके साथ मल युद्ध करते थे उनके साथ तलवारबाजी करते थे।
और उनके साथ शिकार पर जाते थे।
उनमें से बहुत सारे हिंदुस्तानी बोलना भी जानते थे।
और यहां की रीति रिवाज और संस्कृति से वाकिफ थे।
1840 के दशक में यह स्थिति बदलने लगी अंग्रेजों में श्रेष्ठता कि भाव पैदा होने लगा।
और वे सिपाहियों को कम स्तर का मानने लगे।
वे उनकी भावनाओं की जरा सी भी फिक्र नहीं करते थे।
गाली गलौज करते, शारीरिक हिंसा यह सामान्य बात बन गई थी।
सिपाहियों और अफसरों के बीच फासला जो था वह बढ़ गया था।
भरोसे की जगह अब संदेह ने ले ली थी।
उत्तर भारत में सिपाहियों और ग्रामीण जगत के बीच गहरे संबंध थे।
बंगाल आर्मी के सिपाहियों में से बहुत सारे अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव से भर्ती होकर आए थे।
इनमें बहुत सारे ब्राह्मण ऊंची जाति के भी थे।
अवध को बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा जाता था।
सिपाहियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार का असर गांव में भी दिखने लगा था।
अब सिपाही अपने अफसरों की अवज्ञा करने लगे थे।
उनके खिलाफ हथियार उठाने लगे थे।
ऐसे में गांव वाले भी उन्हें समर्थन देते थे।
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विद्रोही क्या चाहते थे ?
अंग्रेज विद्रोहियों को एहसान फरामोश और बर्बर लोगों का झुंड मानते थे।
कुछ विद्रोहियों को इस घटनाक्रम के बारे में अपनी बात दर्ज करने का मौका मिला।
ज्यादातर विद्रोही सिपाही और आम लोग थे, जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे।
इस प्रकार अपने विचारों का प्रसार करने और लोगों को विद्रोह में शामिल करने के लिए जारी की गई, कुछ घोषणाओं और इश्तहारों के अलावा हमारे पास ऐसी ज्यादा चीजें नहीं है।
जिनके आधार पर विद्रोहियों के नजरियों को समझ सके।
इसलिए 1857 के विद्रोह में जो भी हुआ।
इसके बारे में जानकारी के लिए अंग्रेजों के दस्तावेजों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इन दस्तावेजों से अंग्रेज अफसरों की सोच का पता चलता है।
लेकिन विद्रोही क्या चाहते थे यह पता नहीं चलता।

एकता की कल्पना ?
1857 के विद्रोह में विद्रोहियों के द्वारा जारी की गई घोषणा में जाति और धर्म का भेदभाव समाप्त करते हुए एक साथ सभी तबकों को आने को कहा जाता था।
बहुत सारी घोषणाएं मुस्लिम राजकुमार या नवाबों की तरफ से या उनके नाम से जारी की गई थी।
इसमें हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल रखा जाता था।
इस विद्रोह को ऐसे युद्ध के रूप में पेश किया जा रहा था।
जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का फायदा और नुकसान बराबर था।
इश्तहारों में अंग्रेजों से पहले के हिंदू-मुस्लिम अतीत की ओर संकेत किया जाता था।
अंग्रेज शासन ने दिसंबर 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने के लिए ₹50000 खर्च किए।
उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।
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उत्पीड़न के प्रतीकों के खिलाफ ?
विद्रोहियों ने ब्रिटिश राज्य से संबंधित हर चीज को पूरी तरह से खारिज किया।
देसी रियासतों पर कब्जा किए जाने की निंदा की।
विद्रोही नेताओं का कहना था कि अंग्रेजों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
लोग इस बात से भी नाराज थे।
कि अंग्रेजों ने भू राजस्व व्यवस्था लागू करके छोटे-बड़े भू-स्वामियों को जमीन से बेदखल कर जमीन हड़प ली है।
विदेशी व्यापार ने दस्तकार और बुनकरों को तबाह कर डाला था।
फिरंगियों ने भारतीयों की जीवन शैली को नष्ट किया।
विद्रोही अपनी उसी दुनिया को दोबारा बहाल करना चाहते थे।
विद्रोही घोषणाओं में इस बात का डर दिखता था कि अंग्रेज हिंदू और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने पर तुले हैं।
अंग्रेज भारतीयों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
इसी डर के कारण लोग अफवाहों पर भरोसा करने लगे थे।
लोगों को प्रेरित किया जा रहा था कि वह इकट्ठे मिलकर अपने रोजगार, धर्म, इज्जत और अस्मिता के लिए लड़े।
कई दफा विद्रोहियों ने शहर के संभ्रात को जानबूझकर बेइज्जत किया।
गांव में सूदखोरों के बहीखाते जला दिए और उनके घर तोड़फोड़ डालें।
इससे पता चलता है कि विद्रोही उत्पीड़न के भी खिलाफ थे।

वैकल्पिक सत्ता की तलाश
ब्रिटिश शासन ध्वस्त हो जाने के बाद लखनऊ, कानपुर, दिल्ली. जैसे स्थानों पर विद्रोहियों ने एक प्रकार की सत्ता और शासन संरचना स्थापित करने का प्रयास किया।
यह विद्रोही अंग्रेजों से पहले की दुनिया को पुनर्स्थापित करना चाहते थे।
इन नेताओं ने पुरानी दरबारी संस्कृति का सहारा लिया।
विभिन्न पदों पर नियुक्तियां की गई।
भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन का इंतजाम किया गया।
लूटपाट बंद करने का हुक्म जारी किया गया।
इसके साथ अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध जारी रखने की योजनाएं भी बनाई गई।
इन सारे प्रयासों में विद्रोही 18वीं सदी के मुगल जगत से ही प्रेरणा ले रहे थे।
विद्रोहियों द्वारा स्थापित किए गए शासन संरचना का पहला उद्देश्य युद्ध की जरूरतों को पूरा करना था।
यह शासन संरचना अधिक दिनों तक अंग्रेजों की मार बर्दाश्त नहीं कर पाई।

दमन
अंग्रेजो के द्वारा विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया गया।
लेकिन यह आसान साबित नहीं हुआ।
उत्तर भारत को दोबारा जीतने के लिए टुकड़ियों को रवाना करने से पहले अंग्रेजों ने उपद्रव शांत करने के लिए फौजियों की आसानी के लिए कई कानून पारित कर दिए।
मई, जून 1857 में पारित कानून के जरिए पूरे उत्तर भारत में “मार्शल लॉ“ लागू कर दिया गया।
“मार्शल लॉ“ के तहत फौजी अफसरों को तथा आम अंग्रेजों को भी ऐसे हिंदुस्तानियों पर मुकदमा चलाने और उनको सजा देने का अधिकार दे दिया।
जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था।
“मार्शल लॉ“ लागू होने के बाद सामान्य कानून की प्रक्रिया रद्द कर दी गई।
अंग्रेजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि विद्रोह की केवल एक ही सजा हो सकती है— सजा-ए-मौत।
नए कानूनों के द्वारा तथा ब्रिटेन से मंगाई गई नई टुकड़ियों से अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को कुचलने का काम शुरू कर दिया।
अंग्रेजों ने दोतरफा हमला बोल दिया।
एक तरफ कलकत्ता से दूसरी तरफ पंजाब से दिल्ली की तरफ हमला हुआ।
दिल्ली में कब्जे की कोशिश जून 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई।
लेकिन सितंबर के आखिर में जाकर अंग्रेज दिल्ली को अपने कब्जे में ले पाए।
दोनों तरफ से हमले हुए दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
विद्रोही दिल्ली को बचाने के लिए आ चुके थे।
अंग्रेजों को दोबारा सभी गांव जीतने थे।
लेकिन इस बार उनकी लड़ाई केवल सिपाहियों से नहीं थी।
बल्कि गांव के आम लोग भी विद्रोहियों के साथ थे।
अवध में एक अंग्रेज अफसर ने अनुमान लगाया कि कम से कम तीन चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी।
इस इलाके को लंबी लड़ाई के बाद 1858 के मार्च में अंग्रेज दोबारा अपने नियंत्रण में ले पाए।
अंग्रेजों ने सैनिक ताकत का भयानक पैमाने पर इस्तेमाल किया।
उत्तर प्रदेश के काश्तकारों तथा बड़े भू-स्वामियों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया।
ऐसे में अंग्रेजों ने इनकी एकता को तोड़ने के लिए जमीदारों को यह लालच दिया कि उन्हें उनकी जागीर लौटा दी जाएंगी और विद्रोह का रास्ता अपनाने वाले जमींदार को जमीन से बेदखल कर दिया गया।
और जो वफादार थे, उन्हें इनाम दिए गए।
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विद्रोह की छवियां
विद्रोहियों की सोच को समझने के लिए दस्तावेज काफी कम मिले है।
विद्रोहियों की कुछ घोषणाएं, अधिसूचनाएं, नेताओं के पत्र है।
लेकिन ज्यादातर इतिहासकार अंग्रेजों द्वारा लिखे गए।
दस्तावेजों को ध्यान में रखकर ही विद्रोहियों की कार्यवाही पर चर्चा करते हैं।
जबकि अंग्रेजों के दस्तावेजों में अंग्रेजों की सोच का पता लगता है।
सरकारी ब्योरो की कोई कमी नहीं है।
औपनिवेशिक प्रशासक और फौजी अपनी चिट्ठियों, अपनी डायरियों, आत्मकथा और सरकारी इतिहासों में अपने-अपने विवरण दर्ज कर गए हैं।
असंख्य रिपोर्ट, नोट्स, परिस्थितियों के आकलन एवं विभिन्न रिपोर्टों के जरिए भी हम सरकारी सोच और अंग्रेजों के बदलते रवैया को समझ सकते हैं।
इनमें बहुत सारे दस्तावेजों को सैनिक विद्रोह, रिकॉर्ड्स पर केंद्रीय खंडों में संकलित किया जा चुका है।
इन दस्तावेजों में हमें अफसरों के भीतर मौजूद भय और बेचैनी तथा विद्रोहियों के बारे में उनकी सोच का पता लगता है।
ब्रिटिश अखबारों में तथा पत्रिकाओं में विद्रोह की घटनाओं को इस प्रकार से छापा जाता था।
कि वहां के नागरिकों में प्रतिशोध एवं सबक सिखाने की भावना पनपती थी।
अंग्रेजों और भारतीयों द्वारा तैयार की गई कई तस्वीरें सैनिक विद्रोह का एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड रही है।

रक्षकों का अभिनंदन
विद्रोह के दौरान अंग्रेजों को चुन-चुन कर मारा जा रहा था।
ऐसे में अंग्रेजों द्वारा बनाई तस्वीरों को देखने पर तरह तरह की भावनाएं और प्रतिक्रियाएं नजर आती हैं।
अंग्रेजों को बचाने और विद्रोहियों को कुचलने वाले अंग्रेज नायकों का गुणगान किया गया।
उदाहरण– 1859 में टॉमस जॉन्स बार्कर द्वारा बनाया गया चित्र।

रिलीज़ ऑफ़ लखनऊ
जब विद्रोहियों की टुकड़ी ने लखनऊ पर घेरा डाल दिया।
तो ऐसे समय में लखनऊ के कमिश्नर हेनरी लॉरेंस ने ईसाइयों को इकट्ठा किया और सुरक्षित रेजीडेंसी में जाकर पनाह ले ली।
लेकिन बाद में हेनरी लॉरेंस मारा गया।
लेकिन कर्नल इंग्लिश के नेतृत्व में रेजीडेंसी सुरक्षित रहा।
25 सितंबर को जेम्स औटरम और हेनरी हैवलॉक वहां पहुंचे।
उन्होंने विद्रोहियों को तितर-बितर कर दिया और ब्रिटिश टुकड़ियों को नई मजबूती दी।
20 दिन बाद अंग्रेजों का नया कमांडर कॉलिंग कैंपबेल भारी तादाद में सेना लेकर वहां पहुंचा।
उसने ब्रिटिश रक्षक सेना को घेरे से छुड़ाया।
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अंग्रेज औरतें तथा ब्रिटेन की प्रतिष्ठा
भारत में औरतों और बच्चों के साथ हुई हिंसा की खबरों को ब्रिटेन के लोग पढ़कर प्रतिशोध और सबक सिखाने की मांग करने लगे।
अंग्रेज अपनी सरकार से मासूम औरतों की इज्जत बचाने और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने की मांग करने लगे।
चित्रकारों ने भी सदमे और दुख की अपनी चित्रात्मक अभिव्यक्तियों के जरिए इन भावनाओं को आकार प्रदान किया।
जोसेफ नोतल पैटन ने सैनिक विद्रोह के 2 साल बाद (इन मेमोरियल) चित्र बनाया।
इस चित्र में अंग्रेज औरतें और बच्चे एक घेरे में एक दूसरे से लिपटे दिखाई देते हैं।
यह बिल्कुल लाचार और मासूम दिख रहे हैं।
जैसे कोई भयानक घड़ी की आशंका में है।
वह अपनी बेज्जती हिंसा और मृत्यु का इंतजार कर रहे हैं।
(इन मेमोरियल) में भीषण हिंसा नहीं दिखती।
उसकी तरफ सिर्फ एक इशारा है।
कुछ अन्य चित्रों में औरतें अलग तेवर में दिखाई देती हैं।
इनमें वे विद्रोहियों के हमले से अपना बचाव करती हुई नजर आती है।
इन्हें वीरता की मूर्ति के रूप में दर्शाया गया है।
इन चित्रों में विद्रोहियों को दानवों के रूप में दर्शाया गया है।
जहां चार कद्दावर आदमी हाथों में तलवार और बंदूक लिए एक अकेली औरत के ऊपर हमला कर रहे हैं।
इस चित्र में इज्जत और जिंदगी की रक्षा के लिए औरतों के संघर्ष की आड़ में एक गहरे धार्मिक विचार को प्रस्तुत किया गया है।
यह ईसाइयत की रक्षा का संघर्ष है।
इस चित्र में धरती पर पड़ी किताब बाइबल है।

प्रतिशोध और सबक
न्याय की एक रूपात्मक स्त्री छवि दिखी।
जिसके एक हाथ में तलवार, दूसरे हाथ में ढाल है।
उसकी मुद्रा आक्रामक है।
उसके चेहरे पर भयानक गुस्सा और बदला लेने की तड़प दिखाई देती है।
वह सिपाहियों को अपने पैरों तले कुचल रही है।
जबकि भारतीय औरतों और बच्चों की भीड़ डर से कांप रही है।

दहशत का प्रदर्शन
प्रतिशोध और सबक सिखाने की चाह इस बात से भी पता लगती है।
कि किस प्रकार, तथा कितने निर्मम तरीके से विद्रोहियों को मौत के घाट उतारा गया।
उन्हें तोपों के मुहाने पर बांधकर उड़ा दिया गया या फिर फांसी से लटका दिया गया।
इन सजाओ की तस्वीरें पत्र-पत्रिकाओं के जरिए दूर-दूर तक पहुंच रही थी।
दया के लिए कोई जगह नहीं
इस समय बदला लेने के लिए शोर मच रहा था।
अगर ऐसे में कोई नरम सुझाव दे तो उसका मजाक बनना लाजमी है।
विद्रोहियों के प्रति अंग्रेजों के मन में गुस्सा बहुत अधिक था।
इस समय गवर्नर जनरल कैनिंग ने ऐलान किया।
कि नरमी और दया भाव से सिपाहियों की वफादारी हासिल किया जा सकता है।
उस पर व्यंग करते हुए ब्रिटिश पत्रिका पंच के पन्नों में एक कार्टून प्रकाशित हुआ।
जिसमें कैनिंग को एक भव्य नेक बुजुर्ग के रूप में दर्शाया गया।
उसका हाथ एक सिपाही के सिर पर है।
जो अभी भी नंगी तलवार और कटार लिए हुए हैं।
दोनों से खून टपक रहा है।
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राष्ट्रवादी दृश्य कल्पना
20 वीं सदी में राष्ट्रवादी आंदोलन को 1857 के घटनाक्रम से प्रेरणा मिल रही थी।
1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था।
जिसमें देश के हर तबके के लोगों ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी थी।
इतिहास लेखन की तरह, कला और साहित्य ने भी 1857 की यादों को जीवित रखने में योगदान दिया।
विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में पेश किया जाता था जो देश के लिए लड़े थे।
उन्होंने लोगों को, अंग्रेजों के दमनकारी शासन के खिलाफ उत्तेजित किया।
रानी लक्ष्मीबाई, एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में घोड़े की रास लिए मातृभूमि की मुक्ति के लिए लड़ने वाली महिला थी।
उनकी वीरता का गौरवगान करते हुए कविताएं लिखी गई।
रानी झांसी को एक मर्दाना शख्सियत के रूप में चित्रित किया जाता था।
जो दुश्मनों को मौत की नींद सुलाते हुए आगे बढ़ रही थी। Class 12th History Chapter 11 Vidrohi or raj Notes

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10. Upniveshvad or dehat | उपनिवेशवाद और देहात

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ दस उपनिवेशवाद और देहात (Upniveshvad or dehat) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

तिसरी किताब
10. उपनिवेशवाद और देहात

इस्तमरारी बंदोबस्त
1793 में इस्तमरारी बंदोबस्त लागू कर दिया था।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्व की राशि निश्चित कर दी थी।
यह राशि प्रत्येक जमींदार को अदा करनी होती थीं।
अगर जमीदार अपनी निश्चित राशि नहीं चुका पाता। तो उससे राजस्व वसूल करने के लिए उसकी संपदा को नीलाम कर दिया जाता था।

बंगाल और वहां के जमींदार
सबसे पहले औपनिवेशिक शासन बंगाल में स्थापित किया गया था।
ईस्ट इंडिया कम्पनी व्यापार के लिए बंगाल में स्थापित की गई थी।
बंगाल में सबसे पहले ग्रामीण समाज को पुनर्व्यवस्थित किया गया तथा यहां भूमि संबंधी अधिकारों की नई व्यवस्था लागू की गई।
यहां एक नई राजस्व प्रणाली स्थापित करने का प्रयत्न किया गया।
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बर्दवान में की गई एक नीलामी की घटना
1797 में बर्धवान में एक नीलामी की गई।
यह एक बड़ी सार्वजनिक घटना थी।
बर्दवान के राजा की भू-संपदाए बेची जा रही थी।
राजा- इस शब्‍द का इस्‍तेमाल शक्तिशाली जमींदारों के लिए किया जाता था।
बर्दवान के राजा ने राजस्व की राशि नहीं चुकाई थी।
इसलिए उनकी संपत्तियों को नीलाम किया जा रहा था।
नीलामी में बोली लगाने के लिए अनेक खरीदार आए थे और संपदा सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेच दी गई।
लेकिन कलेक्टर को तुरंत ही इस सारी कहानी में एक अजीब पेंच दिखाई दिया।
ज्यादातर खरीदार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट थे।
उन्होंने राजा की ओर से जमीन को खरीदा था।
नीलामी में 95% से अधिक फर्जी बिक्री थी
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राजस्व अदा करने में आने वाली समस्याएं
अकेले बर्दवान राज के जमीनें ही ऐसी संपदाएं नहीं थी। जो 18वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में बेची गई थी।
इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद लगभग 75% से अधिक जमींदारीयां हस्तांतरित कर दी गई थी।
अंग्रेज अधिकारी यह आशा कर रहे थे कि इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद वह सभी समस्याएं हल हो जाएंगी।
जो बंगाल की विजय के समय उनके सामने उपस्थित थी।
1770 के दशक तक आते-आते बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजरने लगी थी।
ऐसा बार-बार अकाल पड़ने के कारण हो रहा था।
खेती की पैदावार घट रही थी।
अधिकारी लोग ऐसा सोचते थे कि खेती व्यापार और राज्य के राजस्व संसाधन तभी विकसित किए जा सकेंगे। जब कृषि में निवेश को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
ऐसा तभी किया जा सकेगा जब संपत्ति के अधिकार प्राप्त कर लिए जाएंगे।
और राजस्व की मांग की दरों को स्थाई रूप से तय किया जाएगा।
यदि राजस्व की मांग स्थाई रूप से निर्धारित कर दी गई तो कंपनी को नियमित राजस्व प्राप्त होगा।
अधिकारियों को ऐसा लग रहा था कि इस प्रक्रिया से छोटे किसान और धनी भू-स्वामियों का एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो जाएगा।
जिसके पास खेती में सुधार करने के लिए पूंजी भी होगी और उद्यम भी होगा।
ब्रिटिश शासन के पालन पोषण और प्रोत्साहन पाकर यह वर्ग कंपनी के प्रति वफादार भी रहेगा।
अब समस्या यह है कि कौन से व्यक्ति हैं जो कृषि सुधार करने के साथ-साथ राज्य को निर्धारित राजस्व अदा करने का ठेका ले सकेंगे।
कंपनी के अधिकारियों के बीच लंबा वाद विवाद चला इसके बाद यह फैसला लिया गया कि बंगाल के राजा और तालुकदार के साथ इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किया जाएगा।
अब उन्हें जमीदारों के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।
उन्हें सदा के लिए एक निर्धारित राजस्व मांग को अदा करना था।
इस प्रकार जमीदार गांव में भूस्वामी नहीं था। बल्कि वह राज्य का संग्राहक था।
जमीदारों के नीचे अनेक गांव होते थे।
कभी-कभी जमीदारों के नीचे 400 तक गांव होते थे।
जमीदारों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह कंपनी को नियमित रूप से राजस्व राशि अदा करेगा।
यदि वह ऐसा करने में असफल हुआ तो उसकी संपदा को नीलाम कर दिया जाएगा।
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राजस्व के भुगतान में जमींदार चूक क्यों करते थे ?
कंपनी को ऐसा लग रहा था की राजस्व की दर निश्चित करने से कंपनी को निश्चित आय प्राप्त होने लग जाएगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जमींदार अपनी राजस्व मांग को अदा करने में बराबर कोताही करते रहे।
जिससे उनकी बकाया रकम बढ़ती गई।

इसके पीछे कई कारण थे—
प्रारंभिक मांगे बहुत ऊंची थी।
यह ऊंची मांग 1790 के दशक में लागू की गई थी।
जब कृषि की उपज की कीमत बहुत कम थी।
जिससे किसानों के लिए जमींदार को उनकी राशि चुकाना मुश्किल था।
जब जमींदार को किसान राजस्व देगा ही नहीं तो जमींदार आगे कंपनी को राजस्व कैसे दे सकता था।
राजस्व निर्धारित था फसल अच्छी हो या खराब राजस्व ठीक समय पर देना जरूरी था।
सूर्यास्त विधि कानून के अनुसार निश्चित तारीख को सूर्य अस्त होने से पहले भुगतान जरूरी था।
इस्बंतमरारी बंदोबस्त ने जमींदार की शक्ति को किसान से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी जमींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दिया था।
कंपनी जमीदारों को नियंत्रित रखना चाहती थी उनकी स्वायत्तता को सीमित करना चाहती थी।
जमींदार की सैन्य टुकड़ियों को भी भंग कर दिया।
उनकी कचहरी को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया।
जमीदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई।
जमींदारों के अधिकार पूरी तरीके से सीमित कर दिए गए।
राजस्व इकट्ठा करने के समय जमींदार का एक अधिकारी जिसे अमला कहा जाता था।
वह गांव में आता था लेकिन राजस्व संग्रहण में कई समस्याएं आती थी।
कभी कभी खराब फसल और नीची कीमतों के कारण किसान के लिए राजस्व की राशि चुका पाना बहुत कठिन हो जाता था।
कभी-कभी किसान जान बूझकर भुगतान में देरी करते थे।
धनवान किसान और गांव के मुखिया-जोतदार और मंडल – जमीदार को परेशानी में देखकर बहुत खुश होते थे।क्योंकि जमींदार आसानी से उन पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकता था।
जमींदार बाकीदारों पर मुकदमा तो चला सकता था।
लेकिन कानूनी प्रक्रिया लंबी होती थी।
1798 में बर्दवान जिले में ही राजस्व भुगतान के लगभग 30,000 से अधिक मामले लंबित थे।
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जोतदारो का उदय
अठारहवीं शताब्दी के अंत में जहां एक तरफ जमींदार संकट की स्थिति से गुजर रहे थे।
वहीं दूसरी तरफ कुछ धनी किसानों के समूह गांव में अपने स्थिति मजबूत कर रहे थे।
इन्हें जोतदार कहा जाता था।
फ्रांसिस बुकानन ने जब उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर जिले का सर्वेक्षण किया।
तब उसने धनी किसानों के इस वर्ग (जोतदार) के बारे में विवरण लिखा।
19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक जोतदार ने जमीन के बड़े-बड़े हिस्सों पर कभी-कभी तो कई हजार एकड़ में फैली जमीन अर्जित कर ली थी।
स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भी जोतदार का नियंत्रण था।
जोतदारों द्वारा गरीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति का प्रयोग किया जाता था।
इनकी जमीन का बड़ा हिस्सा बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था।
जो खुद अपने हल लाते, मेहनत करते और फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।
गांव में जोतदारों की शक्ति जमीदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी।
जमींदार शहरी इलाकों में रहते थे लेकिन जोतदार गांव में ही रहते थे।
जोतदार का नियंत्रण ग्रामवासियों के काफी बड़े हिस्से पर था।
जमींदार द्वारा गांव की लगान को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले प्रयास को वह विरोध करते थे।
जमीदारों को अपने कर्तव्य के पालन से भी रोकते थे।
जो किसान जोतदारों पर निर्भर थे उन्हें वे अपने पक्ष में एकजुट रहते थे।
जोतदार किसानों को जानबूझकर राजस्व ना जमा करने या देरी करने को कहते थे।
क्योंकि राजस्व का समय पर भुगतान ना करने से जमींदार के जमींदारी नीलाम की जाती थी।
ऐसे में जोतदार उन जमीनों को खुद खरीद लेते थे।
उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे।
धनी किसान और गांव के मुखिया लोग भी बंगाल के अन्य भागों में प्रभावशाली बन कर उभरे।
कुछ जगह पर इनको हवलदार कुछ स्थान पर गान्टीदार या मंडल कहा जाता था।
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जमींदार की ओर से प्रतिरोध
जमीदार किस प्रकार से अपने जमीदारी को नीलाम होने से बचाते थे ?
फर्जी बिक्री एक ऐसी तरकीब थी जिसे जमींदार अपनी जमींदारी बचा लेते थे।
उदाहरण – बर्दवान के राजा ने पहले तो अपनी जमींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माता को दे दिया क्योंकि कंपनी स्त्रियों की संपत्ति को नहीं छीनती थी।
उसके बाद जमींदार की संपत्ति के नीलामी के समय अपने ही आदमियों से ऊंची बोली लगवा कर संपत्ति को खरीद लिया।
आगे चलकर उन्होंने खरीद की राशि देने से इनकार कर दिया।
फिर उनकी भू संपदा को दोबारा बेचना पड़ा।
एक बार फिर से जमींदार के एजेंटों ने जमीन खरीद लिया और पैसे देने से इनकार कर दिया।
एक बार फिर नीलामी करनी पड़ी।
जब बार-बार यही प्रक्रिया दोहराई गई तो ऐसे में किसी ने बोली नहीं लगाई।
अंत में कम दाम में जमींदार को ही बेचना पड़ा।
जब कोई बाहरी व्यक्ति नीलामी में कोई जमीन खरीद लेता था।
तब उन्हें हर मामले में उसका कब्जा नहीं मिलता था।
कभी-कभी तो पुराने जमींदार के लठयाल नए खरीदार के लोगों को मारपीट कर भगा देते थे।
पुराने रैयत बाहरी लोगों को जमीन में घुसने ही नहीं देते थे।
क्योंकि वह अपने आपको पुराने जमींदा से जुड़ा महसूस करते थे।
उसके प्रति वफादार रहते थे।
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पांचवी रिपोर्ट
1813 में ब्रिटिश संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई।
इस रिपोर्ट में भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन तथा क्रियाकलाप के विषय में जानकारी थी।
यह उन रिपोर्टों में से पांचवी रिपोर्ट थी।
जो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन के बारे में थी।
अक्सर इसे पांचवी रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।
यह रिपोर्ट 1002 पन्नों की थी।
जिनमें जमीदार और रैयत की अर्जियां, अलग-अलग जिलों के कलेक्टर की रिपोर्ट, राजस्व विवरण से संबंधित सांख्यिकी तालिका और अधिकारियों द्वारा बंगाल और मद्रास के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखित टिप्पणियां आदि शामिल की गई थी।
कंपनी ने 1760 के दशक के मध्य में जब से बंगाल में अपने आपको स्थापित किया था।
तभी से इंग्लैंड में उसके क्रियाकलापों पर बारीकी से नजर रखी जाने लगी थी।
उस पर चर्चा की जाती थी।
ब्रिटेन में ऐसे बहुत से समूह है जो भारत तथा चीन के साथ व्यापार पर ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार का विरोध करते थे।
क्योंकि वहां निजी व्यापारियों की संख्या बढ़ती जा रही थी जो भारत के साथ होने वाले व्यापार में हिस्सा लेना चाहते थे।
क्योंकि ब्रिटेन के उद्योगपति, ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए भारत का बाजार खुलवाने के लिए उत्सुक थे।
कई राजनीतिक समूह का यह कहना था कि बंगाल पर मिली विजय का लाभ केवल ईस्ट इंडिया कंपनी को मिल रहा है पूरे ब्रिटेन को नहीं।
कंपनी के कुशासन और अव्यवस्थित प्रशासन के विषय में प्राप्त सूचना पर ब्रिटेन में बहस छिड़ गई।
कंपनी के अधिकारियों के लालच और भ्रष्टाचार की घटनाओं को ब्रिटेन के समाचार पत्रों में छापा जाता था।
इसके बाद ब्रिटिश संसद ने भारत में कंपनी के शासन को नियंत्रित करने के लिए 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में कई अधिनियम पारित किए।
कंपनी को मजबूर किया गया कि वह भारत के प्रशासन के विषय में नियमित रूप से अपनी सारी रिपोर्ट भेजा करें।
और कंपनी के कामकाज की जांच करने के लिए कई समितियां भी बनाई गई।
पांचवी रिपोर्ट एक ऐसी ही रिपोर्ट है जो एक प्रवर समिति द्वारा तैयार की गई थी।
यह रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन के स्वरूप पर ब्रिटिश संसद में गंभीर बाद विवाद का आधार बनी।
पांचवी रिपोर्ट में उपलब्ध साक्ष्य बहुमूल्य है।
लेकिन फिर भी इस रिपोर्ट पर पूरा भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।
क्योंकि यह जानना जरूरी है कि रिपोर्ट किसने और किस उद्देश्य से लिखे।
पांचवी रिपोर्ट लिखने वाले कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने पर तुले हुए थे।
जमींदारी नीलाम होना, जमींदारी बचाने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाना।
यह सभी बातें इस रिपोर्ट में थी.
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कुदाल और हल
19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बुकानन ने राजमहल की पहाड़ियों का दौरा किया था।
बुकानन ने इन पहाड़ियों को अभेद् बताया।
उसके अनुसार यह एक खतरनाक इलाका था।
यहां बहुत कम यात्री जाने की हिम्मत करते थे।
बुकानन जहां भी गया वहां उसके निवासियों के व्यवहार को शत्रुता पूर्ण पाया।
यह लोग कंपनी के अधिकारियों के प्रति आशंकित रहते थे।
और उनसे बातचीत करने को तैयार नहीं थे।
बुकानन जहां भी जाता वहां के बारे में अपनी डायरी में लिखता था।
जहां जहां उसने भ्रमण किया।
वहां के लोगों से मुलाकात की उनके रीति-रिवाज को देखा था।
राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग पहाड़ी कहलाते थे।
यह जंगल की उपज से अपनी गुजर बसर करते थे।
पहाड़ी लोग झूम खेती करते थे।
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झूम खेती
यह जंगल के छोटे से हिस्से में झाड़ियों को काटकर और घास- फूस को जलाकर जमीन साफ कर लेते थे।
राख पोटाश से उपजाऊ बनी जमीन पर यह लोग तरह – तरह की दालें और ज्वार, बाजरा उगा लेते थे।
यह अपने कुदाल से जमीन को थोड़ा खुर्च लेते थे।
कुछ वर्षों तक उस जमीन पर खेती करते थे।
फिर उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़कर नए इलाके में चले जाते थे।
जिससे यह जमीन अपनी खोई हुई उर्वरता दुबारा प्राप्त कर लेती थी।
उन जंगलों से पहाड़ी लोग खाने के लिए महुआ के फूल इकट्ठे करते थे।
बेचने के लिए रेशम के कोया (रेशम के कीड़े का कोश या घर) और राल (जंगलों में पाया जानेवाला एक प्रकार का सदाबहार पेड़) और काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियां इकट्ठी करते थे।
हरी घास वाला इलाका पशुओं के लिए चारागाह बन जाता था।
शिकार करने वाले, झूम खेती करने वाले, खाद्य बटोरने वाले, काठकोयला बनाने वाले, रेशम के कीड़े पालने वाले के रूप में पहाड़ी लोग की जिंदगी जंगल से घनिष्ठ रुप से जुडी थी।
वह इमली के पेड़ों के बीच बनी अपने झोपड़ियों में रहते थे।
आम के पेड़ के छांव में आराम करते थे।
पूरे प्रदेश को यह अपनी निजी भूमि मानते थे।
बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे।
इनके मुखिया समूह में एकता बनाए रखते थे।
आपसी लड़ाई झगड़े को निपटा लेते थे।
अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ने पर अपनी जनजाति का नेतृत्व करते थे।
यह पहाड़ी लोग अक्सर मैदानी इलाकों पर आक्रमण करते थे।
मैदानी इलाकों में किसान स्थाई कृषि करते थे।
पहाड़ी लोगो द्वारा आक्रमण ज्यादातर अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे।
तथा यह हमले मैदान में बसे समुदायों को अपनी ताकत दिखाने के लिए भी किए जाते थे।
मैदानी इलाकों में रहने वाले जमींदारों को अक्सर पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देकर उनसे शांति खरीदनी पड़ती थी।
इसी प्रकार व्यापारी लोग भी पहाड़ियों द्वारा नियंत्रित रास्तों का इस्तेमाल करने की अनुमति प्राप्त करने हेतु उन्हें कुछ पथकर दिया करते थे।
यह कर (tax) लेकर पहाड़ी मुखिया इन व्यापारियों की रक्षा करते थे।
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में जब स्थाई कृषि के क्षेत्र की सीमा में विस्तार होने लगा था।
अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई सफाई के काम को प्रोत्साहन दिया।

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जमींदारों तथा जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया।
खेती के विस्तार से अंग्रेजों को लाभ था क्योंकि उन्हें राजस्व अधिक मिलता था।
वे जंगलों को उजाड़ मानते थे।
और जंगल में रहने वालों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी समझते थे।
जिन पर शासन करना उनके लिए कठिन था।
इसलिए अंग्रेजों ने यह महसूस किया कि जंगलों का सफाया कर के वहां स्थाई कृषि स्थापित करनी होगी और जंगली लोगों को पालतू व सभ्य बनाना होगा।
उनसे शिकार का काम छुड़वाना होगा, खेती का धंधा अपनाने के लिए उन्हें राजी करना होगा।
जैसे-जैसे स्थाई कृषि का विस्तार हुआ।
जंगल तथा चरागाह की जमीन कम होने लगी।
इससे पहाड़ी लोगों तथा स्थाई खेतीहरों के बीच झगड़ा तेज हो गया।
पहाड़ी लोग पहले से अधिक नियमित रूप से बसे हुए गांवों में हमला करने लगे।
गांव वालों के अनाज और पशु छीन झपट कर ले जाने लगे।
अंग्रेजों ने इन पर काबू करने का प्रयास किया परंतु असफल रहे।
1770 के दशक में अंग्रेज अधिकारियों ने पहाड़ी लोगों को मारने तथा इनका संहार करने की क्रूर अपना ली।
1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर अगस्टस क्वींसलैंड ने शांति स्थापना की। नीति प्रस्तावित की।
इसके अनुसार पहाड़ी मुखिया को वार्षिक भत्ता दिया जाना था।
बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल चलन ठीक करने की जिम्मेदारी लेनी थी।
लेकिन बहुत से पहाड़ी मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया।
और जिन्होंने भत्ता लिया, वे अपने समुदाय में सत्ता खो बैठे।
जब शांति स्थापना के अभियान चलाए जा रहे थे।
तब पहाड़ी लोग अपने आप को सैन्यबलों से बचाने के लिए और बाहरी लोगों से लड़ाई
चालू रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भाग में चले गए।
इसी कारण जब 1810-11 में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी।
तो यह स्वाभाविक था कि पहाड़िया लोग बुकानन को संदेह और अविश्वास की नजर से देखते।
पहाड़ी लोग अंग्रेजों को एक ऐसी शक्ति के रूप में देखते थे।
जो जंगलों को नष्ट करके उनकी जीवन शैली को बदलना चाहते है।
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पहाडी लोगों के लिए नया खतरा ?
उन्हीं दिनों एक नए खतरे की सूचनाएं मिलने लगी थी।
वह था संथाल लोगों का आगमन।
संथाल लोग वहां के जंगलों का सफाया करते हुए।
इमारती लकड़ी को काटते हुए, जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास उगाते हुए, उस इलाके में बड़ी संख्या से घुसे चले आ रहे थे।
संथाल लोगों ने निचली पहाड़ियों में अपना कब्ज़ा जमा लिया था।
इसलिए पहाड़ी लोगों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा।
पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे।
इसलिए यदि कुदाल को पहाड़ी जीवन का प्रतीक माना जाए।
तो हल को संथालो का प्रतीक माना जा सकता है।
कुदाल और हल की यह लड़ाई काफी लंबे समय तक चली।
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संथाल
संथालगुंजारिया जो कि राज महल श्रृंखलाओं का एक भाग था।
यहां संथाल लोग 1800 में आए थे।
इन्होंने यहा के जंगलों को काटकर खेती क्षेत्र को बढ़ाया था।
1810 में अंत में बुकानन गुंजारिया इलाके में आया।
उसने देखा कि आसपास की जमीन खेती के लिए अभी-अभी जुताई की गई थी।
वहां के भू-दृश्य को देखकर बुकानन अचंभित रह गया।
बुकानन ने लिखा कि मानव श्रम के समुचित प्रयोग से इस क्षेत्र की तो काया ही पलट गई।
उसने लिखा गूंजरिया में अभी-अभी कॉफी जुताई की गई है।
जिससे यह पता चलता है कि इसे कितने शानदार इलाके में बदला जा सकता है।
मैं सोचता हूं इसकी सुंदरता और समृद्धि विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है।
यहां की जमीन चट्टानी है, लेकिन बहुत ही ज्यादा बढ़िया है।
बुकानन ने इतनी बढ़िया तंबाकू और सरसों और कहीं नहीं देखी।
बुकानन ने जब इस जमीन के बारे में पूछा तो उसे पता लगा कि संथाल लोग ने कृषि क्षेत्र की सीमाएं बढ़ाई है।
संथालों के आने से पहाड़ी लोगों को नीचे के ढालों पर भगा दिया, जंगलों का सफाया किया और फिर वहां बस गए।
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संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में कैसे पहुंचे ?
संथाल 1780 के दशक के आसपास बंगाल में आने लगे थे।
जमींदार लोग खेती के लिए नई भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए संथालों को भाड़े पर रखते थे।
ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया।
क्योंकि अंग्रेजों ने पहाड़ी लोगों को स्थाई कृषि के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था।
जिसमें वह असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया।
जहां एक ओर पहाड़ी लोग जंगल काटने के लिए तथा हल को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं थे।
पहाड़ी लोग उपद्रवी व्यवहार करते थे।
वहीं दूसरी तरफ संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए।
क्योंकि इन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई हिचक नहीं थी।
यह लोग हल का प्रयोग भी करते थे।
स्थाई कृषि भी करते थे तथा भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे।
संथालों को जमीन देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया।
1832 तक जमीन के काफी बड़े इलाके को दामिन– इ – कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया।
इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया।
संथालों को इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थाई किसान बनना था।
संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान पत्र में एक शर्त रखी गई थी।
संथालों को दी गई भूमि के कम से कम दसवें भाग को साफ करके पहले 10 वर्षों के भीतर जोतना था।
इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया और नक्शा तैयार किया गया।
इसके चारों ओर खंभे गाड़ कर इसकी सीमा निर्धारित कर दी गई।
दामिन–इ-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियां बड़ी तेजी से बढ़ने लगी।
संथालों के गांव की संख्या जो 1838 में 40 थी।
तेजी से बढ़कर 1851 में 1473 तक पहुंच गई।
इसी अवधि में संथालों की जनसंख्या भी 3000 से बढ़कर 82000 से भी अधिक हो गई।
जैसे-जैसे संथालों की वजह से खेती का विस्तार हुआ।
वैसे- वैसे कंपनी की तिजोरीयों में राजस्व की वृद्धि होने लगी।
जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहाड़ी लोगों के जीवन पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा।
क्योंकि अब पहाड़ी लोगों को मजबूर होकर पहाड़ियों के भीतर की तरफ जाना पड़ा।
यहां इन्हें उपजाऊ भूमि नहीं मिल पा रही थी।
क्योंकि यह झूम खेती करते थे तो इसके लिए नई जमीन इनके पास नहीं थी।
जिस जमीन पर यह पहले खेती किया करते थे।
वह अब संथालों के हाथ में चली गई थी।

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ऐसे में इनका जीवन बुरी तरीके से प्रभावित हुआ।
और यह झूम खेती को आगे नहीं चला पाए।
पहाड़ी शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
इसके विपरीत संथालों की जिंदगी पहले से अच्छी हो गई।
क्योंकि वह अपनी खानाबदोश जिंदगी को छोड़ चुके थे और एक जगह बस कर स्थाई कृषि कर रहे थे।
संथाल लोग बाजार के लिए कई तरह के वाणिज्यिक फसलों की खेती करने लगे थे और व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेनदेन करने लगे थे।
संथालो ने जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है।
संथालों ने जिस जमीन को साफ करके खेती शुरू की थी।
उस पर सरकार ने भारी कर लगा दिया।
साहूकार लोग भी ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे।
जब कोई संथाल कर्ज अदा नहीं कर पाता तो ऐसे में उसकी जमीन पर कब्जा हो जाता था।
जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपना नियंत्रण का दावा कर रहे थे।
1850 के दशक तक संथाल लोग ऐसा महसूस करने लगे थे।
कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए जहां उनका अपना शासन हो।
जमींदार, साहूकार, औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध विद्रोह का समय आ गया है।
1855- 56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगना का निर्माण कर दिया गया।
जिसके लिए 5500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों में से लिया गया।
औपनिवेशिक राज्य को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बनाने और उनसे कुछ विशेष कानून लागू करने से संथाल लोग संतुष्ट हो जाएंगे। Class 12th History Chapter 10 Upniveshvad or dehat Notes

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8. Kishan jamindar or rajya | किसान, जमींदार और राज्‍य

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ आठ किसान, जमींदार और राज्‍य (Kishan jamindar or rajya) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

8. किसान, जमींदार और राज्‍य

16 वीं-17 वीं शताब्‍दी में  85% लोग गाँव में रहते थे।
कृषि उत्‍पादन छोटे किसान और बड़े अमीर किसान दोनों करते थे।
नाहरी ताकते गाँवों में दाखिल हुई अर्थात नहर का विस्‍तार हो रहा था।
मुगल राज्‍य में आमदनी का बड़ा हिस्‍सा था— कृषि उत्‍पादन में Tax लेना, गाँव पर नियंत्रण रखना।
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किसान और कृषि उत्‍पादन
खेतिहर समाज की बुनीयादी इकाई गाँव थी जिसमें किसान रहते थे।
किसान साल भर खेतों में काम करते थे तथा अलग-अलग मौसम में फसल उगाते थे। वे लोग खेतों में जुताई, बीज बोना, कटाई जैसे कार्य करते थे।
कृषि आधारित वस्‍तुओं का उत्‍पादन करते थे। जैसे:– शक्‍कर, तेल।
सुखी जमीन वाले पहाड़ी इलाको में खेती नहीं हो सकती थी ।
सिर्फ मैदानी इलाके में खेती होती थी।

स्रोतो की तलाश
किसानों के बारे में जानकारी ऐतिहासिक ग्रंथ व दास्‍तावेज से मिलते हैं जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे।
आइन–ए–अकबरी (संक्षेप में इसे आइन कहा जाता है।) अबुल फजल (अकबर के दरबारी इतिहासकार) ने लिखा। इस पुस्‍तक में जुताई, Tax  इकट्ठा करना, राज्‍य व जमींदारो के रिश्‍ते का लेखा-जोखा है।
आइन का उद्देश्‍य था अकबर के शासन काल का लेखा-जोखा प्रस्‍तुत करना।
यह स्रोत (आइन) मुगलों की राजधानी से दूर लिखे गए। गुजरात, महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान से मिले।
जो सरकार की आमदनी का विवरण देते हैं।
ईस्‍ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्‍तावेज हैं जो कृषि के बारे में जानकारी देते हैं।

किसान और उनकी जमीन
किसान को रैयत या मुजरियान भी कहा जाता था।
17वीं शताब्‍दी में किसान दो तरह के होते थे— 1. खुद काश्‍त, 2. पाहि काश्‍त
खुद काश्‍त– उन्‍ही गाँव में रहतें थें जहाँ उनकी जमीन थी।
पाहि काश्‍त– बाहर से आकर ठेके पर खेती करते थे।
पाहि काश्‍त किसान उच्‍च लगान के कारण दूसरे जगह जाकर खेति करते थे।
उत्तर भारत के किसान गरीब होते थे।
किसानों के पास 1 जोड़ी बैल 2 हल से ज्‍यादा नहीं होता था।
गुजरात में एक औसत किसान के पास 6 एकड़ जमीन, बंगाल में 5 एकड़ जमीन होती थी।
10 एकड़ जमीन वाला किसान अमीर माना जाता था।
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सिंचाई और तकनिक
खेती का प्राथमिक उद्देश्‍य लोगों का पेट भरना था।
चावल, गेहूँ, ज्‍वार फसलें ज्‍यादा उगाई जाती थी।
जहाँ 40 सेमी या ज्‍यादा बारिश होती थी वहाँ चावल की खेती होती थी। कम बारिश वाले इलाके में गेहूँ, ज्‍वार, बाजरा इत्‍यादि की खेती होती थी।
सिंचाई कार्य में राज्य मदद करता था।
राज्यों के द्वारा कई नहरें और नालें खुदवाए जाते थें। शाहजहाँ के समय में पंजाब में शाह नहर का निर्माण सिंचाई के लिए किया गया था। खेतों को जोतने के लिए लकड़ी के हल, लोहे की नुकिली फाल तथा बैलों का प्रयोग किया जाता था।

फसलों की भरमार
मौसम के दो मुख्य चक्रों के दौरान खेती की जाती थी; एक खरीफ पतझड़ में और दूसरी रबी; वसंत में।
साल में दो फसले उगाई जाती थी और जहाँ बारिश होती थी या सिंचाई के अन्य साधन मौजूद थे वहाँ साल में तीन फसलें उगाई जाती थी। आइन बताती है कि दोनों मौसम मिलाकर आगरा में 39 किस्म की फसलें उगाई जाती थी जबकि दिल्ली में 43 फसलों की पैदावार होती थी और बंगाल में चावल की सिर्फ 50 किस्में पैदा होती थी। मध्यकालीन भारत में गुजारे के लिए फसलें उगाई जाती थी पर कुछ फसल फायदे के लिए भी उगाई जाती थी जिसमें ज्यादा टैक्स मिले।
सर्वोतम फसलों को जिन्स-ए-कामिल कहा जाता था, जिसमें कपास और गन्ने आते हैं।
मध्यभारत और दक्कनी पठार में बड़े-बड़े खेतों में कपास उगाई जाती थी, जबकि बंगाल में चीनी की खेती व्यापक पैमाने पर की जाती थी। तिलहन और दलहन नगदी फसलें थी।
भारती में मक्का अफ्रिका होते हुए स्पेन के रास्ते आया।
आलू, टमाटर, मिर्च जैसी सब्जियाँ नयी दुनिया (अमेरिका) से लाई गई।

ग्रामीण समुदाय
किसान की अपनी जमीन पर व्यक्ति मिलकियत होती थी।
ग्रामीण समुदाय का हिस्सा किसान थे।
ग्रामीण समुदाय के तीन घटक थे- खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया।
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जाति और ग्रामीण माहौल
जातिगत भेदभाव के कारण खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बँटे हुए थे। खेतों की जुताई करने वाले अधिकतर लोग नीच जाति के थे। खेतों में मजदूरी करने वालों को भी नीच समझा जाता था। ये गरीब थे।
इनकी हालत बहुत ही दयनिय थी। आधुनिक भारत में जैसे दलितों की स्थिति थी वैसे ही इनलोगों की स्थिति थी।
मुसलमानों में भी जातिगत भेदभाव थी। इस समुदाय में हलालखोरान (मैला या कुड़ा साफ करने वाला) जैसे नीच कामों से जुड़े समुह थे जिन्हें गाँवों की हदों से बाहर रहना पड़ता था।

पंचायतें और मुखिया
गाँव की पंचायत में बुजुर्गों का जमावड़ा होता था।
जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अकसर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी।
छोटे-मोटे और नीच काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के लिए इसमें कोई जगह नहीं होती होगी। पंचायत का फैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था।
पंचायत का सरदार एक मुखिया होता था जिसे मुकद्दम या मंडल कहते थे।
मुखिया का चुनाव गाँव के बुजुर्गों की आम सहमति से होता था और इस चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंजुरी जमींदार से लेनी पड़ती थी। मुखिया अपने ओहदे पर तभी तक बना रहता था जब तक गाँव के बुजुर्गों को उस पर भरोसा था। ऐसा नहीं होने पर बुजुर्ग उसे बख़ार्स्त कर सकते थे। गाँव के आमदनी व खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना मुखिया का मुख्य काम था।
पंचायत का खर्चा गाँव के उस आम ख़जाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था।
इस ख़जाने से उन कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी का ख़र्चा भी किया जाता था जो समय-समय पर गाँव का दौरा किया करते थे। दूसरी ओर, इस कोष का इस्तेमाल बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी होता था। मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध और नहर बनाते थे।
पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे ज्‍यादा गंभीर दंड देने के अधिकार थे।
ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी।

ग्रामीण दस्तकार
अलग-अलग तरह के उत्पादन कार्य में जुटे लोगों के बीच फैले लेन-देन के रिश्ते गाँव का एक और रोचक पहलू था। अंग्रेजी शासन के शुरुआती वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी अच्छी तादाद में रहते थे। कहीं-कहीं तो कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे।
कभी-कभी किसानों और दस्ताकारों के बीच फ़र्क करना मुश्किल होता था क्योंकि कई ऐसे परवाही समूह थे जो दोनों किस्म के काम करते थे। खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य कई तरह की वस्तुओं के उत्पादन में शिरकत करते थे।
मसलन रंगरेज़ी कपडे़ पर छपाई मिट्टी के बरतनों का पकाना, बनाना या उनकी मरम्मत करना। उन महीनों में जब उनके पास खेती के काम से फुरसत होती-जैसे कि बुआई आर तुलार के बीच या सहाई और कटाई के बीच-उस समय ये खेतिहर दस्तकारी का काम करते थे।
कुम्हार, लोहार, बढई, नाई, यहाँ तक कि सुनार जैसे ग्रामीण दस्तकार भी अपनी सेवाएँ गाँव के लोगों को देते थे जिसके बदले गाँव वाले उन्हें अलग-अलग तरीकों से उन सेवाओं की अदायगी करते थे। आमतौर पर या तो उन्हें फ़सल का एक हिस्सा दे दिया जाता था या फिर गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने के बावजूद बेकार पड़ी थी। अदायगी की सूरत क्या होगी ये शायद पंचायत ही तय करती थी। महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई जिस पर दस्तकारों का पुश्तैनी अधिकार होता था।
यही व्यवस्था कभी-कभी थोड़े बदले हुए रूप में भी पायी जाती थी जहाँ दस्तकार और हरेक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत करके अदायगी की किसी एक व्यवस्था पर राजी होते थे। ऐसे में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। उदाहरण के तौर पर, अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार उनकी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।” इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालांकि यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। ये सबूत मज़ेदार हैं क्योंकि इनसे पता चलता है कि गाँव के छोटे स्तर पर फेर-बदल के रिश्ते कितने पेचीदा थे। ऐसा नहीं है कि नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद था।
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एक छोटा गणराज्य
19वीं शताब्दी में अंग्रजों ने भारतीय गाँवों को एक ‘छोटे गणराज्य‘ के रूप में देखा, जहाँ लोग भाइचारे के साथ रहते थे।
ताकतवर लोग गाँव के कमजोर लोगों का शोषण करते थे।
काम करने वाले लोगों की मजदूरी या निर्यात करने वाले दस्तकारों की मजदूरी नगद मिलती थी।

कृषि समाज में महिलाएँ
कृषि कार्य में महिलाएँ मर्द के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती थी।
सूत कातने, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने और गूँधने और कपड़ों पर कढ़ाई का काम महिलाएँ ही करती थी।
बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक्त महिलाओं की संख्या कम रहती थी।
जिसके कारण ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए ‘दुलहन की कीमत‘ अदा करने की जरूरत होती थी, न कि दहेज की।
घर का मुखिया मर्द होता था।
राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि पश्चिमी भारत में मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि पत्नियां अपने पति के बेवफाई की शिकायत ग्राम पंचायत में करती थी।
बच्चों का पालन पोषण न करने पर पति पर आरोप लगाती थी।
महिलाओं को पुश्तैनी संपति में हक मिलता था। हिंदू और मुस्लमान दोनों धर्मों में महिलाओं को संपति रखने, उसे बेचने का अधिकार था।

जमींदार
मुगल काल में जमींदार को ग्रामीण समाज में ऊँची हैशियत मिली हुई थी। वे काफी समृद्ध होते थे। उसने पास काफी जमीन होती थी जिसे मिलकीयत थे यानी संपति कहते थे।
इस जमीन पर जमींन पर दिहाड़ी के मजदूर काम करते थे। जमींदार अपनी मर्जी के मुताबिक इन जमींनों को बेचन सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या उन्हें गिरवी रख सकते थे।
जमींदार राज्य की ओर से कर वसुल कर सकते थे, जो उसके ताकत को दिखाता है।
जमींदार ऊँची जाति के हुआ करते थे।
ये बाजार भी स्थापित करते थे जहाँ किसान अपनी फसल बेचने आते थे।
जमींदार गाँव के कमजोर लोगों का शोषन करते थे।
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भू-राजस्व प्रणाली
जमीन से मिलने वाला राजस्व मुगल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी।
लोगों पर कर का बोझ निर्धारित करने से पहले मुगल राज्य ने जमीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में खास किस्म की सूचनाएँ इकऋा करने की कोशिश की।
हर प्रांत में जुती हुई जमीन और जोतने लायक जमीन दोनों की नपाई की गई। अकबर के शासन काल में अबुल फजल ने आइन में ऐसी जमींनों के सभी आंकड़ों को संकलित किया।

अकबर के शासन में भूमि का वर्गीकरण
आइन में वर्गीकरण के मापदंड की निम्नलिखित सूची दी गई हैः अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ जमींनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की जमीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया। पोलज वह जमीन है जिसमें एक के बाद एक हर फसल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है। परौती वह जमीन है जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके। चचर वह जमीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है। बंजर वह जमीन है जिस पर पाँच या उससे ज्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई हो। पहले दो प्रकार की जमीन की तीन किस्में हैं, अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की जमीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है। जिसे राजा राजस्‍व के रूप में प्राप्‍त करता था।

अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी
आइन-ए-अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण के एक बहुत बड़े ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी जिसका जिम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फजल ने उठाया था। अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोध्नों के बाद, इसे पूरा किया गया।
आइन इतिहास लिखने के एक ऐसे बृहत्तर परियोजना का हिस्सा थी जिसकी पहल अकबर ने की थी। इस परियोजना का परिणाम था अकबरनामा जिसे तीन जिल्दों में रचा गया। पहली दो जिल्दों ने ऐतिहासिक दास्तान पेश की।
तीसरी जिल्द, आइन-ए-अकबरी, को शाही नियम कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र की सूरत में संकलित किया गया था।
आइन कई मसलों पर विस्तार से चर्चा करती है : दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन, राजस्व के स्रोत और अकबरी साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल, और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक व धर्मिक रिवाज। Class 12th History Chapter 8 Kishan jamindar or rajyat Notes

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9. Shasak or itivrit | शासक और इतिवृत्त

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ नौ शासक और इतिवृत्त (Shasak or itivrit) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

9. शासक और इतिवृत्त

मुगल साम्राज्य के शासक स्वयं को एक विशाल और विजातीय जनता पर शासन के लिए नियुक्त मानते थे।
मुगल शासकों ने अपना राजवंश का इतिहास दरबारी इतिहासकारों द्वारा लिखवाया।
इन विवरणों से बादशाह के समय की घटनाओं का लेखा जोखा मिलता है।
इन लेखकों ने उपमहाद्वीप के अन्य क्षेत्रों की कई जानकारी।
इकठ्ठा की यह जानकारी शासक के लिए शासन में मदद करती थी।
अंग्रेजी में लिखने वाले आधुनिक इतिहासकारों ने इस शैली को
क्रॉनिकल्स (इतिहास या इतिवृत) नाम दिया।
मुगल काल के इतिहास को लिखने में यह इतिवृत्त काफी सहायक स्रोत है।

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मुगल शासक और उनका साम्राज्य
मुगल नाम मंगोल से उत्पन्न हुआ है।
मुगल शासकों ने स्वयं के लिए यह नाम नहीं चुना है।
शासक स्वयं को तैमूरी कहा करते थे।
क्योंकि मुगल शासक पित्रपक्ष से तुर्की शासक तैमुर के वंशज थे।
बाबर मातृ पक्ष से चंगेज खान से संबंधित था।
अर्थात बाबर के पिता तैमुर के वंशज तथा माता चंगेज खान से संबंधित थे।
वह तुर्की बोलता था।
उसने मगोलों को बर्बर गिरोह में हुए उनका उपहास किया।
16वीं शताब्दी के दौरान यूरोपियों ने इन शासकों को वर्णन के लिए मुगल शब्द का प्रयोग किया।
तभी से मुगल शब्द लगातार प्रयोग होता रहा है।
रडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक के युवा नायक मोगली का नाम भी इसी से उत्पन्न हुआ है।
मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 में जहीरूद्दीन बाबर के द्वारा की गई।
बाबर मध्य एशिया में फरगना से उसके प्रतिद्वंदी उजबेक ओ द्वारा भगा दिया गया था।
उसके बाद में काबुल में स्थापित हुआ।
उसके बाद वह भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आगे बढ़ा।
बाबर (1526-1530)
21 April 1526 में पानीपत का प्रथम युद्ध इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ।
इसमें बाबर जीता।
पहली बार तोप का प्रयोग हुआ।
बाबर का उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन हुमायूं था।

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हुमायूं
इसका शासन काल (1530-40, 1555-56)
हुमायूं भारत पर दो चरणों में शासन किया। पहला चरण 1530 से 1540 तथा दूसरा चरण 1555 से 1556 तक किया।
अफगान नेता शेरशाह सूरी ने हुमायूं को पराजित किया और ईरान भाग गया।
1555 में हुमायूं ने सूर को पराजित किया लेकिन 1 वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।

हुमायूं के बाद उसका उत्तराधिकार जलालुद्दीन अकबर बना।
अकबर (1556- 1605)
अकबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया.
अकबर ने अपने साम्राज्य को मजबूत और समृद्ध राज्य बनाया।
इसका साम्राज्य हिंदूकुश पर्वत तक फैल गया।
अकबर ने ईरान के सफावी और तूरान के उजबेक की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाए रखें।
अकबर के बाद जहांगीर (1605- 27) शासक बना।
शाहजहां (1628-58)
औरंगजेब (1658 – 1707)
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजवंश की शक्ति घटने लगी।
दिल्ली, आगरा, लाहौर जैसे राजधानी नगरों में क्षेत्रीय शक्तियों का विस्तार होने लगा।
1857 में इस वंश के अंतिम शासक बहादुरशाह जफर द्वितीय को अंग्रेजों ने उखाड़ फेंका।

इतिवृत्त की रचना
मुगल बादशाहों द्वारा तैयार कराए गए इतिवृत्त मुगल साम्राज्य तथा उनके दरबार के अध्ययन के महत्वपूर्ण स्रोत है।
शासक यह चाहते थे कि भावी पीढ़ियों के लिए उनके शासन का विवरण उपलब्ध रहे।

दरबारी इतिहासकार
मुगल इतिवृत्त को लिखने वाले लेखक दरबारी लेखक होते थे।
इन्होंने जो इतिहास लिखा उसके केंद्र बिंदु में.
शासक या शासक से जुड़ी घटनाएं, शाही परिवार. दरबार, अभिजात वर्ग, युद्ध, प्रशासनिक व्यवस्थाएं होती थी।
अकबरनामा, शाहजहानमा, आलमगिरनमा
तुर्की से फारसी की ओर, मुगल दरबारी इतिहासकार फारसी भाषा में लिखे गए थे।
लेकिन जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों का शासन था।
उस काल में उत्तर भारतीय भाषा विशेषकर हिंदवी एवम् फारसी में लिखे गए।
बाबर के ने अपनी कविताएं एवम् संस्मरण तुर्की भाषा में लिखी।
अकबर ने फारसी को दरबार की मुख्य भाषा बनाया।
अकबर के समय में फारसी को दरबार की भाषा का ऊंचा स्थान दिया गया।
उन लोगों को शक्ति और प्रतिष्ठा प्रदान की गई जिनकी इस भाषा पर अच्छी पकड़ थी।
राजा तथा शाही परिवार के लोग और दरबार के विशेष सदस्य यही भाषा बोलते थे।
आगे चलकर यह सभी स्तरों पर प्रशासन की मुख्य भाषा बन गई।
इसे लेखाकारों ने, लिपिकों ने और अन्य अधिकारियों ने भी सीख लिया।
लेकिन जहां पर फारसी प्रत्यक्ष प्रयोग में नहीं थी।
वहां पर राजस्थानी मराठी एवं तमिल भी फारसी के मुहावरे एवं शब्दावली ने प्रभावित किया।
17 वीं शताब्दी तक फारसी बोलने वाले लोग अलग-अलग क्षेत्रों में आ गए थे।
वह अन्य भारतीय भाषा भी बोलते थे।
इस तरह स्थानीय मुहावरों का समाविष्ट करने में फ़ारसी का भी भारतीय करण हो गया।
फारसी एवं हिंदवी के साथ पारस्परिक संपर्क से उर्दू के रूप में एक नई भाषा निकल आई।
अकबरनामा फारसी भाषा में लिखा गया है।
जबकि बाबरनामा तुर्की भाषा में था।
लेकिन बाबरनामा का भी फारसी में अनुवाद किया गया।
मुगल बादशाहों ने महाभारत और रामायण जैसे संस्कृत के ग्रंथों को भी फारसी भाषा में अनुवादित किए जाने का आदेश दिया।
महाभारत का अनुवाद रज्मनामा (युद्धों की पुस्तक) के रूप में हुआ।

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पांडुलिपियों की रचना
पांडुलिपि (manuscript)- हाथ से लिखी पुस्तक होती है।
मुगल भारत की सभी पांडुलिपियों के रूप में मिली हैं।
पांडुलिपि की रचना का मुख्य केंद्र शाही किताब खाना था।
शाही किताब खाने में पांडुलिपियों को लिखा जाता था।
एवं उनको संग्रह कर के रखा जाता था।
नई पांडुलिपियों की रचना की जाती थी।
पांडुलिपि की रचना में अलग-अलग प्रकार के कार्य करने वाले बहुत से लोग शामिल होते थे।
जैसे– कागज बनाने वाले, पांडुलिपि के पन्ने तैयार करने वाले, सुलेख की पाठ की नकल तैयार करना, कोफ्तगार की पृष्ठ को चमकाने के लिए, चित्रकार, जिल्दसाज़
एक पांडुलिपि को तैयार करने में कई वर्ष लग जाते थे।
तैयार पांडुलिपि को एक बहुमूल्य वस्तु, बौद्धिक संपदा और सौंदर्य के कार्य के रूप में देखा जाता था।
एक पांडुलिपि को बनाने में कई प्रकार के लोग मेहनत करते थे।
परंतु पदवी और पुरस्कार कुछ ही लोगों को मिलता था।
जैसे–
सुलेखक और चित्रकारों को उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा मिली।
जबकि अन्य जैसे कागज बनाने वाले जिल्दसाज यह गुमनाम कारीगर बनकर ही रह गए।
सुलेखन हाथ से लिखने की कला अत्यंत महत्वपूर्ण कौशल माना जाता था।
इसका प्रयोग अलग-अलग शैलियों में होता था।
अकबर को नास्तलिक शैली पसंद थी।

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नास्तिलिक शैली
शैली इसमें लंबे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था।
इसे पांच से 10 मिली मीटर की नोक वाले छंठे हुए सरकंडे जिसको कलम कहा जाता था।
कलम के टुकड़े को स्याही में डुबो कर लिखा जाता था।
कलम की नोक के बीच में छोटा सा चीरा लगाया जाता था।
ताकि यह स्याही आसानी से सोख लें।

रंगीन चित्र
मुगल पांडुलिपियों की रचना में चित्रकार भी शामिल थे।
जब इतिहास लिखते समय घटनाओं से संबंधित चित्रों को रखना होता था।
तो सुलेखक उसके आसपास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे।
उसी स्थान में बाद में चित्रकार चित्र बनाते थे।
चित्रों से न केवल पुस्तक का सौंदर्य बढ़ता था।
बल्कि चित्रों के माध्यम से किसी घटना को सजीव बनाया जा सकता था।
इतिहासकार अबुल फजल ने चित्रकारी को एक जादुई कला के रूप में वर्णन किया है।
अबुल फजल कहता है कि चित्रकला निर्जीव वस्तु को इस रूप में प्रस्तुत कर सकती है जैसे उसमें जीवन हो।
बादशाह तथा उसके दरबार तथा उसमें हिस्सा लेने वाले लोगों का चित्रण करने वाले चित्रों की रचना को लेकर शासकों और मुसलमान रूढ़िवादी वर्ग के प्रतिनिधि अर्थात उलमा के बीच में कई बार तनाव हो जाता था।
उलमा वर्ग ने कुरान के साथ-साथ हदीस जिसमें पैगंबर मोहम्मद के जीवन से एक ऐसा प्रश्न वर्णित है।
जिसमें मानव रूपों के चित्रण पर इस्लामी प्रतिबंध का आह्वान किया है।
इतिहासकार अबुल फजल बादशाह को यह कहते हुए उद्धत करता है “कई लोग ऐसे हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं पर मैं ऐसे व्यक्तियों को नापसंद करता हूं। मुझे ऐसा लगता है कि कलाकार के पास खुदा को पहचानने का बेजोड़ तरीका है। क्योंकि कहीं ना कहीं उसे यह महसूस होता है कि खुदा की रचना को वह जीवन नहीं दे सकता।
कुछ वर्गों को ऐसा लगता है कि कलाकार रचना की शक्ति को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है।
यह एक ऐसा कार्य था जो केवल ईश्वर का ही है।
लेकिन बाद में शरिया की व्याख्या में बदलाव आया।
और ईरान के सफावी राजाओं के दरबार में भी कलाकारों को संरक्षण दिया गया।

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अकबरनामा और बादशाहनामा
अकबरनामा और बादशाहनामा दोनों ही पांडुलिपियों में अधिक चित्र मिलते है।
प्रत्येक पांडुलिपि में औसतन 150 पूरे या दोहरे पृष्ठों पर लड़ाई, शिकार, इमारत-निर्माण, घेराबंदी , दरबारी दृश्य आदि के चित्र मिलते हैं।
अकबरनामा के लेखक अबुल फजल हैं।
अबुल फजल को अरबी, फारसी, यूनानी दर्शन और सूफीवाद की जानकारी थी।
अबुल फजल एक प्रभावशाली स्वतंत्र चिंतक था।
उसने लगातार दकियानूसी उलमा के विचारों का विरोध किया।
अबुल फजल के इन गुणों से अकबर बहुत प्रभावित हुआ।
उसने अबुल फजल को अपना सलाहकार और अपनी नीतियों के प्रवक्ता के रूप में उपयुक्त पाया।
दरबारी इतिहासकार के रूप में अबुल फजल ने अकबर के शासन से जुड़े विचारों को लिखा।
अबुल फजल ने अकबरनामा की शुरुआत 1589 में की।
और इस पर 13 वर्षों तक कार्य किया इसमें कई सुधार भी किये।
अकबरनामा को 3 जिल्द ( भाग ) में विभाजित किया गया।
जिनमें से प्रथम दो इतिहास है और तीसरी जिल्द आईन – ए- अकबरी है।
पहली जिल्द में आदम से लेकर अकबर के जीवन के एक खगोलीय कालचक्र तक का मानव जाति का इतिहास है।
दूसरी जिल्द अकबर के 46 वें शासन वर्ष 1601 पर खत्म होती है।
उसके बाद अबुल फसल की हत्या अकबर के बेटे सलीम द्वारा तैयार किए गए षड्यंत्र के
द्वारा बीर सिंह बुंदेला द्वारा की जाती है।

अकबरनामा
राजनीतिक घटनाओं की जानकारी।
अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक, सभी पक्षों का विवरण।

आईन-ए- अकबरी
मुगल साम्राज्य को एक मिश्रित संस्कृति वाले साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यहां हिंदू, जैन, बौध, मुसलमान रहते थे।
अबुल फजल की भाषा बहुत अलंकृत थी।
इस भाषा के लिए पथों को ऊंची आवाज में पढ़ा जाता था।
अतः इस भाषा में लय और कथन-शैली को बहुत महत्व दिया जाता था।
इस भारतीय फारसी शैली को दरबार में संरक्षण मिला।
बादशाह नामा के लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी है।
अब्दुल हमीद लाहौरी अबुल फजल का शिष्य था।
इसकी योग्यता के बारे में सुनकर शाहजहां ने इसे अकबरनामा के नमूने पर अपने शासन का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया।
बादशाहनामा भी सरकारी इतिहास है।
इसकी तीन जिल्दें हैं—
प्रत्येक जिल्द 10 चंद्र वर्षों का ब्यौरा देती है।
लाहौरी ने बादशाह के शासनकाल के पहले दो दशकों पर पहला और दूसरा दफ्तर लिखा है।
इन जिल्दों में बाद में शाहजहां के वजीर सादुल्लाह खान ने सुधार किया।
जब अंग्रेज आए, तो उन्होंने भारतीय साम्राज्य को समझने के लिए यहां के इतिहास का बेहतर ढंग अध्ययन किया।
1784 में सर विलियम जॉन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की।
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल में कई भारतीय पांडुलिपियों के संपादन, प्रकाशन और अनुवाद का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया।
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में हेनरी बेवरिज द्वारा अकबरनामा का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया।

Class 12th History Chapter 9 Shasak or itivrit Notes

आदर्श राज्य एक देवीय प्रकाश
दरबारी इतिहासकारों ने ऐसे कई साक्ष्यों का हवाला दिया और यह दिखाया कि मुगल राजाओं को सीधे ईश्वर से शक्ति मिली थी।

दंतकथा
मंगोल रानी अलांकुआ जो अपने शिविर में आराम करते समय सूर्य कर रही थी, एक किरण द्वारा गर्भवती हुई थी।
उसके द्वारा जन्म लेने वाली संतान पर दैवीय प्रकाश का प्रभाव था।
यह प्रकाश एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होता रहा।
ईश्वर से प्रकाश को ग्रहण करने वाली बात को अबुल फजल ने सबसे ऊंचे स्थान पर रखा।
इस प्रकार का विचार सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी ने सबसे पहले प्रस्तुत किया।

सुलह- ए- कुल
मुगल इतिवृत साम्राज्य को हिन्दुओं, जैनों, जरथूष्टियों और मुसलमानों जैसे अनेक अलग-अलग धार्मिक समुदायों को समाविष्ट किए हुए, साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत करता है।
बादशाह इन सभी धार्मिक समूहों से ऊपर होता था।
इन समूहों के बीच मध्यस्थता कराता था।
यह सुनिश्चित करता था कि न्याय और शांति बनी रहे।
सुलह ए कुल पूर्ण शांति के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताता है।
सुलह ए कुल में सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी।
सुलह ए कुल का आदर्श राज्य नीतियों के जरिए लागू किया गया।
मुगलों के अधीन अभिजात वर्ग मिश्रित किस्म का था।
जैसे उसमें ईरानी, तूरानी, अफगानी, राजपूत, दखनी सभी शामिल थे।
इन सभी को दिए गए पद एवं पुरस्कार पूरी तरह से राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा पर आधारित होते थे।
अकबर ने 1563 में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 में जजिया को समाप्त कर दिया।
सभी मुगल बादशाहों ने उपासना स्थलों के निर्माण और रखरखाव के लिए अनुदान दिए।
औरंगजेब ने अपने शासनकाल में गैर मुसलमान पर जजिया फिर से लगा दिया।

सामाजिक अनुबंध के रूप में न्यायपूर्ण सत्ता
अबुल फजल कहता है कि बादशाह अपनी प्रजा के चार तत्वों की रक्षा करता है—
1) जीवन
2) धन
3) सम्मान
4) विश्वास
उसके बदले में वह आज्ञा पालन और संसाधनों में हिस्से की मांग करता है।

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राजधानियां और दरबार राजधानी नगर
मुगल साम्राज्य का हृदय उसका राजधानी नगर था। जहां पर दरबार लगता था।
राजधानी कई बार बदली गई थी।
लोदी वंश की राजधानी आगरा थी जिस पर बाबर ने अधिकार कर लिया था।
बाबर के शासन के 4 वर्षों तक दरबार अलग अलग स्थान पर लगाए गए।
1560 के दशक में अकबर ने आगरा के किले का निर्माण कराया।
इसे बलुआ पत्थर से बनाया गया।
1570 के दशक में फतेहपुर सीकरी में नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया।
सीकरी अजमेर जाने वाली सीधे सड़क पर स्थित था।
अजमेर में शेख मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी। जो महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन गई थी।
अकबर ने सीकरी की जुम्मा मस्जिद के बगल में शेख सलीम चिश्ती के लिए सफेद संगमरमर का एक मकबरा बनाने का आदेश दिया।
1585 में राजधानी को लाहौर स्थापित किया गया।
अकबर के बाद शाहजहां का शासनकाल महत्वपूर्ण है।
शाहजहां को इमारतें बनवाने का शौक था।
इसमें इमारत निर्माण के लिए पर्याप्त धन जमा किया।
इमारत निर्माण कार्य राजवंशीय सत्ता, धन तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक था।
1648 में दरबार, सेना, शाही परिवार नई राजधानी शाहजहांनाबाद चले गए।
दिल्ली के प्राचीन रिहायशी नगर में शाहजनाबाद एक नई, शाही आबादी थी।
यहां लाल किला, जामा मस्जिद, चांदनी चौक के बाजार तथा अभिजात वर्ग के घर थे।

मुगल दरबार
मुगल शासन में केंद्र में शासक (बादशाह) होता था।
उसका पूरी व्यवस्था पर नियंत्रण होता था।
राजसिंहासन को एक ऐसे स्तंभ के रूप में देखा जाता था। जिस पर धरती टिकी थी।
इतिवृत ने मुगल संभ्रांत वर्ग के बीच हैसियत को निर्धारित करने वाले नियम को सामने रखा।
दरबार में किसी की हैसियत इस बात से निर्धारित होती थीं कि वह शासक के कितना पास और दूर बैठा है।
किसी दरबारी को शासक द्वारा दिया गया
स्थान महत्वपूर्ण होता था।
एक बार जब बादशाह सिंघासन पर बैठ जाता था तो किसी को भी अपनी जगह से कहीं जाने की अनुमति नहीं थी।
दरबार में बोलने के नियम, शिष्टाचार निर्धारित थे।
अगर कोई शिष्टाचार का उल्लघंन करता था तो उस दंड दिया जाता था।
अभिवादन के तरीके से भी हैसियत का पता लगता।
जैसे— जिस व्यक्ति के सामने ज्यादा झुककर अभिवादन किया जाता था। उस व्यक्ति की हैसियत ज्यादा ऊंची मानी जाती थीं।
आत्मनिवेदन सबसे उच्चतम रूप सिजदा था।
सिज़दा या दंडवत लेटना।
शाहजहां के शासनकाल में इन तरीकों के स्थान पर चार तस्लीम तथा जमीनबोसी (जमीन को चूमना) तरीका अपनाया गया।
मुगल दरबार में राजदूत से भी यही अपेक्षा की जाती थीं। कि वह शासक के सामने झुककर या जमीन चूमकर, छाती के सामने हाथ बांधकर अभिवादन करे।
जेम्स के दूत टोमस रो ने यूरोपीय रिवाज के अनुसार जहांगीर के सामने केवल झुककर अभिवादन किया।
उसके बाद बैठने के लिए कुर्सी की मांग की जिससे सभी अचंभित हो गए।
बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ व्यक्तिगत धार्मिक प्रथाओं से करता था।
उसके बाद पूर्व की तरह मुंह करके एक छोटे से छज्जे (झरोखे) में आता था।
इसके नीचे लोगों की भीड़ बादशाह की झलक पाने का इंतजार करती थीं।
लोग, सैनिक, शिल्पकार, किसान, बच्चे आदि।
अकबर द्वारा शुरू की गई झरोखा दर्शन की प्रथा का उद्देश्य जनता के मन में विश्वास के रूप में शाही सत्ता की स्वीकृति को और विस्तार देना था।
झरोखे में एक घंटा बिताने के बाद बादशाह अपनी सरकार के प्राथमिक कार्य के लिए सार्वजनिक सभा भवन (दीवान ए आम) में जाता था।
फिर वहां राज्य के अधिकारी रिपोर्ट प्रस्तुत करते थे।
2 घंटे बाद बादशाह दीवान-ए-खास में निजी सभाएं और गोपनीय मुद्दों पर चर्चा करता था।
राज्य के वरिष्ठ मंत्री शासक के सामने अपनी याचिका में प्रस्तुत करते थे।
और कर अधिकारी हिसाब का ब्यौरा देते थे।
बादशाह उच्च प्रतिष्ठित कलाकारों के कार्य तथा वास्तुकारों द्वारा बनाई गई इमारतों के नक्शे को देखता था।
त्योहारों के अवसर में दरबार का माहौल जीवंत तो होता था।
चारों ओर सजावट की जाती थी।
मुगल शासक वर्ष में तीन मुख्य त्यौहार मनाते।
शासक का जन्मदिन, वसंत आगम, नवरोज।
जन्मदिन पर शासक को विभिन्न वस्तुओं से तोला जाता था।
तथा बाद में यह वस्तुएं दान में बांट दी जाती थी।

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पदवियां, उपहार और भेंट
पदवियां
राज्यभिषेक समय या किसी शत्रु पर विजय के बाद मुगल बादशाह विशाल पदवी या ग्रहण करते थे।
मुगल सिक्कों पर बादशाह की पूरी पदवी होती थी।
योग्य व्यक्तियों को पदवी देना मुगल राज्य तंत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष था।
किसी व्यक्ति की उन्नति उसके द्वारा धारण की जाने वाली पदवी से जानी जा सकती थी।
उच्चतम मंत्रियों में से एक को दी जाने वाली आसिफ खां की पदवी का उद्भव पैगंबर शासक सुलेमान के मंत्री से हुआ था।
औरंगजेब ने अपने दो उच्च पदस्थ अभिजात जय सिंह और जसवंत सिंह को मिर्जा राजा की पदवी प्रदान की।
पदवी या तो अर्जित की जा सकती थी या उन्हें पाने के लिए पैसे दिए जा सकते थे।
मीर खान ने अपने नाम में अ अक्षर लगाकर उसे अमीर खान करने के लिए औरंगजेब को ₹100000 देने का प्रस्ताव किया था।
अन्य पुरस्कारों में जामा भी शामिल था।
जिसे पहले कभी ना कभी बादशाह द्वारा पहना गया हुआ होता था।
यह राजा के आशीर्वाद का प्रतीक था।
सरप्पा एक अन्य उपहार था।
सरप्पा – सर से पांव तक।
इस उपहार के तीन हिस्से हुआ करते थे।
जामा, पगड़ी और पटका कई बार बादशाह द्वारा रत्न जड़ित आभूषण भी उपहार में दिए जाते थे।
बहुत खास परिस्थितियों में बादशाह कमल की मंजरियों वाला रत्न जड़ित गहनों का सेट भी उपहार में देता था।
एक दरबारी भाषा के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाता था।
वह या तो नज्र के रूप में थोड़ा सा धन या पेशकश के रूप में मोटी रकम बादशाह को पेश करता था।

शाही परिवार
हरम शब्द का प्रयोग मुगलों की घरेलू दुनिया की ओर संकेत करने के लिए होता है।
यह शब्द फारसी से निकला है जिसका तात्पर्य है – पवित्र स्थान।
मुगल परिवार में बादशाह की पत्नियां और उपपत्नियां नजदीकी एवं दूर के रिश्तेदार व महिला एवं गुलाम होते थे।
माता, सौतेली माँ, बहन, पुत्री ,बहू, चाची, मौसी, बच्चे आदि।
शासक वर्ग में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी।
राजपूत परिवार एवं मुगल दोनों के लिए।
विवाह राजनीतिक संबंध बनाने एवं मैत्री संबंध स्थापित करने का एक तरीका था।
विवाह में पुत्री को भेंट स्वरूप सामान्यत: एक क्षेत्र भी उपहार में दे दिया जाता था।
मुगल परिवार में शाही परिवारों से आने वाली स्त्रियों (बेगम) और अन्य स्त्रियों (अगहा) जिनका जन्म कुलीन परिवार में नहीं हुआ था। इनमें अंतर रखा जाता था।
दहेज (मेहर) के रूप में अच्छा खासा नगद और बहुमूल्य वस्तुएं लेने के बाद विवाह करके आई बेगमों को अपने पतियों के स्वाभाविक रूप से अगहा की तुलना में अधिक ऊंचा दर्जा और सम्मान मिलता था।
उपपत्नियो (अगाचा) की स्थिति सबसे निम्न थी।
इन सभी को नगद मासिक भत्ता तथा अपने अपने दर्जे के हिसाब से उपहार मिलते थे।
यदि पति की इच्छा हो और उसके पास पहले से ही 4 पत्नियां ना हो।
तो अगहा और अगाचा भी बेगम की स्थिति पा सकती थी।
मुगल परिवार में अनेक महिला तथा पुरुष गुलाम भी होते थे।
वे साधारण से साधारण कार्य से लेकर कौशल, बुद्धिमत्ता वाले कार्य में निपुण होते थे।
नूरजहाँ के बाद मुगल रानी और राजकुमारियों ने महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया था।
शाहजहां की पुत्रियों, जहांआरा और रोशनआरा को ऊंचे शाही मनसबदारों के समान वार्षिक आय होती थी।
इसके अलावा जहांआरा को सूरत के बंदरगाह नगर जो कि विदेशी व्यापार का केंद्र था।
वहां से राजस्व प्राप्त होता था।
संसाधनों पर नियंत्रण ने मुगल परिवार की महत्वपूर्ण स्त्रियों को इमारत एवं बागों का निर्माण का अधिकार दे दिया।
जहांआरा ने शाहजहां की नई राजधानी शाहजहानाबाद की कई वस्तुकलात्मक परियोजनाओं में हिस्सा लिया।
शाहजहानाबाद के हृदय स्थल चांदनी चौक की रूपरेखा जहाँआरा ने बनाई थी।
गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा लिखी।
हुमायूंनामा में हमें मुगलों की घरेलू दुनिया की जानकारी मिलती है।
गुलबदन बेगम बाबर की पुत्री, हुमायूं की बहन तथा अकबर की चाची थी।
गुलबदन तुर्की एवं फारसी भाषा में धाराप्रवाह लिख सकती थी।
अकबर ने जब अबुल फजल को अपने शासन का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया।
उस समय अपनी चाची से बाबर और हुमायूं के समय के संस्मरण को लिपिबद्ध करने का आग्रह किया।

शाही नौकरशाही
भर्ती की प्रक्रिया तथा पद
मुगल साम्राज्य में शासक केंद्र में होता था।
उसका पूरी सत्ता पर नियंत्रण होता था।
लेकिन शासक अपने साम्राज्य को चलाने के लिए नौकरशाही पर भी निर्भर था।
मुगल साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ इसके अधिकारियों का दल था।
जिससे इतिहासकार सामूहिक रूप से अभिजात वर्ग भी कहते हैं।
अभिजात वर्ग में भर्ती विभिन्न नृजातीय तथा धार्मिक समूहों से होती थी।
इसमें यह सुनिश्चित किया जाता था कि कोई भी दल इतना बड़ा ना हो जाए कि वह राज्य की सत्ता को चुनौती दे।
मुगलों के अधिकारी वर्ग को गुलदस्ते के रूप में वर्णित किया गया है।
जो वफादारी से बादशाह के साथ जुड़े हुए थे।
अकबर के समय में भी ईंरानी, तूरानी अभिजात वर्ग थे।
इनमें से कुछ हुमायूं के साथ चले गए थे।
1560 से आगे राजपूतों एवम् भारतीय मुसलमानों ने शाही सेवा में प्रवेश किया।
इनमें नियुक्त होने वाला प्रथम व्यक्ति एक राजपूत मुखिया अंबेर का राजा भारमल कछवाहा था।
जिसकी पुत्री से अकबर का विवाह हुआ।
शिक्षा की ओर झुकाव वाले हिंदू जातियों के सदस्यों को भी पदोन्नत किया जाता था।
उदाहरण- अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल जो खत्री जाति का था।
जहांगीर के शासनकाल में ईरानियों को उच्च पद प्राप्त हुए।
जहांगीर की राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रानी नूरजहां (ईरानी) थी।
औरंगजेब ने राजपूतों को उच्च पदों पर नियुक्त किया।
फिर भी शासन में अधिकारियों के समूह में मराठे काफी संख्या में थे।
सभी सरकारी अधिकारियों के दर्जे और पद में दो तरह के ओहदे होते थे।

जात और सवार
जात शाही पदानुक्रम में अधिकारी (मनसबदार) के पद और वेतन का सूचक था
सवार यह सूचित करता था कि उससे सेवा में कितने घुड़सवार रखना अपेक्षित था।
सैन्य अभियानों में यह अभिजात अपनी सेनाओं के साथ भाग लेते थे।
प्रांतों में वे साम्राज्य के अधिकारियों के रूप में कार्य करते थे।
प्रत्येक सेना कमांडर घुड़सवारों की भर्ती करता था।
उन्हें हथियार एवं प्रशिक्षण देता था।
घुड़सवारी फौज मुगल सेना का महत्वपूर्ण अंग था।
घुड़सवार सिपाही शाही निशान से दागे गए उत्कृष्ट श्रेणी के घोड़े रखते थे।
निम्न पदों को छोड़कर बादशाह स्वयं सभी अधिकारियों के ओहदे, पदवियों का निरीक्षण और बदलाव करता था।
मनसबप्रथा की शुरुआत अकबर ने की।
अभिजात वर्ग के सदस्यों के लिए शाही सेवा शक्ति, प्रतिष्ठा, धन प्राप्त करने का एक जरिया थी।
सेवा में आने का इच्छुक व्यक्ति एक अभिजात के जरिए याचिका देता था।
जो बादशाह के सामने प्रस्तुत की जाती थी।
अगर याचिकाकर्ता योग्य व्यक्ति है तो उसे मनसब प्रदान किया जाता था।
मिरबक्शी दरबार में बादशाह के दाएं और खड़ा होता था।
तथा नियुक्ति और पदोन्नति के सभी उम्मीदवारों को प्रस्तुत करता था।
जबकि उसका कार्यालय उसकी मुहर व हस्ताक्षर के साथ-साथ बादशाह की मुहर व हस्ताक्षर वाले आदेश तैयार करता था।
केंद्र में अन्य महत्वपूर्ण मंत्री भी थे।
दीवान ए आला – वित्तमंत्री
सद्र – उस – सुदूर – अनुदान का मंत्री
स्थानीय न्यायाधीश या कार्यों की नियुक्ति का प्रभारी
तैनात ए रकाब दरबार में नियुक्त अभिजातों का एक ऐसा सुरक्षित दल था। जिससे किसी भी प्रांत या सैन्य अभियान में नियुक्त किया जा सकता था।
यह बादशाह और उसके घराने की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाते थे तथा दिन में दो बार सुबह और शाम सार्वजनिक सभा भवन में बादशाह के प्रति आत्म निवेदन करने के कर्तव्य से बंधे थे।

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सूचना तथा साम्राज्य
सटीक और विस्तृत आलेख तैयार करना मुगल प्रशासन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था।
मीरबक्शी दरबारी लेखकों के समूह का निरीक्षण करता था।
यह लेखक ही दरबार में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी अर्जियों व दस्तावेजों तथा सभी आदेश, फरमान का आलेख तैयार करते थे।
दरबार की सभी कार्यवाइयों का विवरण रखते थे।
अखबारात तैयार करते थे इसमें हर तरह की सूचनाएं होती थी।
जैसे – दरबार की उपस्थिति, पद, पदवियों का, दान, राजनयिक शिष्टमंडल, उपहार इत्यादि।
समाचार वृतांत और महत्वपूर्ण शासकीय दस्तावेज शाही डाक व्यवस्था के जरिए मुगल शासन के अधीन क्षेत्रों में एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाए जाते थे।
बांस के डिब्बों में लपेट कर रखे कागजों को लेकर हरकारों के दल एक जगह से दूसरी जगह दिन रात दौड़ते रहते थे।

केंद्र से परे : प्रांतीय प्रशासन
केंद्र में स्थापित कार्यों के विभाजन को प्रांतों में दोहराया गया था।
यहां भी केंद्र के समान मंत्रियों के अनुरूप अधीनस्थ दीवान, बक्शी और सद्र होते थे।
प्रांतीय शासन का प्रमुख गवर्नर या सूबेदार होता था।
जो सीधा बादशाह को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था।
प्रत्येक सूबे कई सरकारों में बंटा था।
इन इलाकों में फौजदारों की विशाल घुड़सवार फौज और तोपचियों के साथ रखा जाता था।
परगना स्तर (उप-जिला) पर स्थानीय प्रशासन की देखरेख तीन अधिकारियों की जिम्‍मेवारी कानूनगो (राजस्व आलेख रखने वाला)
चौधरी (राजस्व संग्रह प्रभारी) तथा काजी (जज) द्वारा की जाती थी।
शासन के हर विभाग के पास लिपिकों का एक बड़ा सहायक समूह, लेखाकार, लेखा परीक्षक, संदेशवाहक और अन्य कर्मचारी होते थे। जो दक्ष अधिकारी थे।
यह काफी संख्या में लिखित आदेश और वृतांत तैयार करते थे।
फारसी शासन की भाषा बनी थी।
लेकिन ग्राम लेखा के लिए स्थानीय भाषाओं का प्रयोग होता था।
मुगल इतिहासकारों ने बादशाह और उसके दरबार को ग्राम स्तर तक के संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र का नियंत्रण करते हुए प्रदर्शित किया।

स्थानीय जमींदार और मुगल साम्राज्य के प्रतिनिधियों के बीच के संबंध
कई बार संसाधनों और सत्ता के बंटवारे को लेकर संघर्ष का रूप ले लेते थे।
सीमाओं के परे इतिवृत्त के लेखकों ने मुगल बादशाहों द्वारा धारण की गई पदवियों को इतिवृत्त में लिखा।
जैसे-
शहंशाह – राजाओं का राजा
जहांगीर – विश्व पर कब्जा करने वाला
शाहजहां – विश्व का राजा
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सफावी और कंधार
भारतीय उपमहाद्वीप को जीतने के इक्षुक व्यक्ति को मध्य एशिया से होते हुए उत्तर भारत तक पहुंचने के लिए हिंदूकुश को पार करना होता था।
मुगल नीति का हमेशा यह प्रयास रहा कि सामरिक महत्व की चौकियां विशेषकर काबुल और कंधार पर नियंत्रण के द्वारा इसे खतरे से बचाया जा सके।
सफावी, कंधारों और मुगलों के बीच झगड़े का जड़ था।
यह किला नगर शुरू में हुमायूं के अधिकार में था।
1595 में अकबर ने इसे दोबारा जीत लिया।
सफावी दरबार ने मुगलों के साथ अपने राजनयिक संबंध बनाए रखें।
लेकिन कंधार पर दावा करते रहे।
1613 में जहांगीर ने शाह अब्बास के दरबार में कंधार को मुगल अधिकार में रहने देने की वकालत करने के लिए एक दूत भेजा लेकिन यह सफल नहीं हुए।
1622 में सर्दियों में एक फारसी सेना ने कंधार पर घेरा डाल लिया।
मुगल रक्षक सेना पूरी तरह से तैयार नहीं थी इसलिए वे पराजित हुई।
मुगल सेना को किला तथा नगर सफाविओं को सौंपना पड़ा।
ऑटोमन साम्राज्य : तीर्थ यात्रा और व्यापार
ऑटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों ने अपने संबंध इस प्रकार से बनाएं कि वह ऑटोमन नियंत्रण वाले क्षेत्र में अपने व्यापारियों व तीर्थ यात्रियों के स्वतंत्र आवागमन को बरकरार रखवा सकें।
ऑटोमन क्षेत्र की तरफ मक्का, मदीना जैसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल थे।
क्षेत्र के साथ अपने संबंधों में मुगल बादशाह धर्म और वाणिज्य के मुद्दों को मिलाने की कोशिश करता था।
व्यापार से अर्जित आय को इस इलाके के धर्मस्थल और फकीरों में दान में बांट देता था।

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मुगल दरबार में जेसुईट धर्म प्रचारक
यूरोप को भारत के बारे में जानकारी जेसुईट धर्म प्रचारकों, यात्रियों, व्यापारियों के विवरणों से हुई।
मुगल दरबार के यूरोपीय विवरण में जेसुईट वृतांत सबसे पुराने हैं।
15 वीं शताब्दी के अंत में भारत में पुर्तगाली व्यापारी आए।
पुर्तगाली राजा भी सोसाइटी ऑफ़ जीसस के धर्म प्रचारकों की मदद से ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार में रुचि रखता था।
अकबर ईसाई धर्म के विषय में जानने को उत्सुक था।
उसने जेसुईट पादरियों को आमंत्रित करने के लिए एक दूतमंडल गोवा भेजा।
पहला जेसुईट शिष्टमंडल फतेहपुर सीकरी के मुगल दरबार में 1580 में पहुंचा।
लगभग यहां 2 वर्ष रहा।
लाहौर के मुगल दरबार में दो और शिष्टमंडल 1591 और 1595 में भेजे गए।
अकबर के सिंहासन के काफी नजदीक जेसुईट लोगों को स्थान दिया जाता था।

औपचारिक धर्म पर प्रश्न उठाना
जेसुईट शिष्टमंडल के सदस्य के प्रति अकबर ने उच्च आदर प्रदर्शित किया।
उससे वह बहुत प्रभावित हुए।
धार्मिक ज्ञान के लिए अकबर की तलाश ने फतेहपुर सीकरी के इबादतखाने में विद्वान मुस्लिम, हिंदू, जैन, पारसी और ईसाइयों के बीच अंतर-धर्मीय विवादों को जन्म दिया।
धीरे-धीरे अकबर रूढ़ीवादी तरीकों से दूर
प्रकाश और सूर्य पर केंद्रित देवी उपासना के स्व- कल्पित विभिन्न दर्शन ग्राही रूप की ओर बढ़ा। Class 12th History Chapter 9 Shasak or itivrit Notes

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7. Ek samrajya ki rajdhani vijayanagar | एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ सात एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर ( Ek samrajya ki rajdhani vijayanagar) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

विजयनगर का अर्थ – विजय का शहर
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना दो भाइयों हरिहर और बुक्का ने 1336 में की थी।
इस साम्राज्य में अलग-अलग भाषा बोलने वाले तथा अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग रहते थे।
यह साम्राज्य में उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर सुदूर दक्षिण तक फैला था।
1565 में इस पर आक्रमण किया गया और उसको लूटा गया। इसके बाद यह उजड़ गया।
17-18वीं शताब्दी तक यह पूरी तरह नष्ट हो चुका था।
लेकिन फिर भी कृष्णा और तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र के निवासियों की यादों में यह जीवित रहा।
उन्होंने इसे हम्पी नाम से याद रखा।
हम्पी में यहां की स्थानीय मातृदेवी पंपादेवी के नाम से आया है।
जब विद्वानों ने इसकी खोज की तो मौखिक परंपरा तथा पुरातात्विक खोज, स्थापत्य के नमूने, अभिलेख, दस्तावेज काफी सहायक सिद्ध हुए।

हम्पी की खोज
हम्पी के भग्नावशेष (खंडहर) 1800 ई० में एक अभियंता तथा पुराविद् कर्नल कोलिन मैकेंजी द्वारा प्रकाश में लाए गए।
मैकेंजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में कार्यरत थे।
मैकेंजी ने इस क्षेत्र का पहला सर्वेक्षण कर मानचित्र बनाया।
इनके द्वारा हासिल की गई जानकारी विरुपाक्ष मंदिर तथा पंपा देवी के पूजा स्थल के पुरोहितों की स्मृति पर आधारित थी।
1856 में छायाचित्रकार ने यहां के भवनों के चित्र संकलित करने आरंभ किए।
शोधकर्ताओं ने इन चित्रों का अध्ययन किया।
1836 अभिलेख कर्ताओं ने यहां और हम्पी के अन्य मंदिरों से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए।
इतिहासकारों ने विजयनगर साम्राज्य के इतिहास के पुनर्निर्माण के प्रयास में इन स्रोतों का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतो एवं तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में लिखे गए साहित्य से मिलान किया।
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना दो भाई हरिहर और बुक्का द्वारा 1336 में की गई।
विजयनगर साम्राज्य के शासकों का अपने समकालीन राजाओं जैसे- दक्कन के सुल्तान, उड़ीसा के गजपति शासक से संघर्ष चलता रहता था।
संघर्ष – उर्वर नदी घाटी ऊपर अधिकार तथा
विदेशी व्यापार से उत्पन्न संपदा पर अधिकार के कारण संघर्ष चलता रहा।
विजयनगर के शासकों ने भवन निर्माण की तकनीक को ग्रहण किया और इसे आगे विकसित किया।
इन्होंने तमिलनाडु के चोल सम्राट, कर्नाटक के होयसल शासक के राज्यों का विकास देखा था।
इन क्षेत्रों के शासक वर्ग ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर तथा बेलूर के चन्नकेशव मंदिर को संरक्षण दिया था।
विजयनगर के शासकों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
विजयनगर के शासक स्वयं को राय कहते थे।

Class 12th History Chapter 7 Ek samrajya ki rajdhani vijayanagar Notes

कॉलिन मैकेंजी
कॉलिंग मैकेंजी का जन्म 1754 ई. में हुआ था।
यह एक अभियंता, सर्वेक्षक, मानचित्र कार के रूप में प्रसिद्ध थे।
1815 में उन्हें भारत का पहला सर्वेयर जनरल बनाया गया और 1821 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे।
भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए उन्होंने इतिहास से संबंधित स्थानीय परंपराओं का संकलन तथा ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण करना शुरू कर दिया।

शासक तथा व्यापारी
इस काल में युद्धकला अश्वसेना पर निर्भर रहती थीं।
इसलिए राज्य अरब तथा मध्य एशिया से घोड़ों का आयात करते थे।
शुरु में यह व्यापार अरब के व्यपारियों द्वारा नियंत्रित था।
व्यापारियों के स्थानीय समूह कुदिरई चेट्टी या घोड़ों के व्यापारी कहा जाता था।
यह भी इन विनिमय में भाग लेते थे।
1498 में पुर्तगाली पश्चिमी तट पर आए और व्यापारिक तथा सामरिक केंद्र शासित करने का प्रयास करने लगे।
पुर्तगालियों की सामरिक तकनीक बेहतर थी।
इनके पास बंदूक थी।
जिसे यह महत्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरे।
विजयनगर मसालों, वस्त्रों, रत्नों के बाजार के लिए प्रसिद्ध था।
यहां की जनता समृद्ध थी।
यहां की जनता महंगी विदेशी वस्तुओं की मांग करती थी।
विशेष रत्नों और आभूषणों की व्यापार से राजस्व प्राप्त होता था।
जो कि राज्य की समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देता था।

राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन
राजनीति में सत्ता के दावेदारों में शासक वंश के सदस्य और सैनिक कमांडर शामिल थे।
विजयनगर साम्राज्य में सबसे पहला राजवंश संगम वंश था।
1) संगम वंश का शासन
2) सुलुव वंश का शासन
3) तुलुव वंश का शासन
4) अराविदू वंश शासन
पहले राजवंश संगम वंश को सुलुव ने उखाड़ फेंका
सुलुव सैनिक कमांडर थे।
उसके बाद तुलुव ने इनको उखाड़ फेंका।
कृष्ण देव राय तुलुव वंश से संबंधित थे।
यह विजयनगर साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा थे।

कृष्णदेवराय
कृष्णदेवराय ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
इन्होंने साम्राज्य को मजबूत बनाया।
इसी काल में तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र हासिल किया (1512)
1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन किया गया तथा बीजापुर के सुल्तान को बुरी तरह पराजित किया गया था।
राज्य हमेशा सामरिक रूप से तैयार रहता था।
राज्य अतुलनीय शांति और समृद्धि में फला फूला।
कई मंदिरों निर्माण किया गया।
दक्षिण भारत के मंदिरों में भव्य गोपुरम को जोड़ने का श्रेय कृष्णदेव राय को ही जाता है।
उन्होंने अपने माताजी के नाम पर विजयनगर के पास ही नगलपुराम नामक उपनगर की स्थापना की।
कृष्णदेवराय की मृत्यु 1529 में हुई।
उसके बाद शासन कमजोर होने लगा।
उनके उत्तराधकारियों को विद्रोही नायकों और सेनापतियो से चुनौती का सामना करना पड़ा।
1542 तक केंद्र पर शासन अराविदू के हाथों में चला गया।

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राक्षसी-तांगडी का युद्ध या तलीकोटा के युद्ध
1565 में विजयनगर की सेना प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में राक्षसी-तांगडी का युद्ध हुआ।
इसे तलीकोटा के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।
इस युद्ध में बीजापुर, अहमदनगर ,गोलकुंडा की संयुक्त सेना ने विजयनगर पर धावा बोल दिया।
इसमें विजयनगर की सेना हार गई।
कुछ वर्षों के बाद यह शहर उजड़ने लगा।
विजयी सेना ने विजयनगर को खूब लूटा।
यह शासन पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गया।
अब अराविदु राजवंश ने पेनुकोंडा से और बाद में चंदगिरी से शासन किया।

राय तथा नायक
राय – विजयनगर के शासक
नायक – सेना प्रमुख
सेना प्रमुख नायक कहलाते थे।
यह साम्राज्य में शक्ति का प्रयोग करते थे।
नायक किलो पर नियंत्रण रखते थे
इनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे
यह आमतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमणसील रहते थे
नायक कई बार बसने के लिए उपजाऊ भूमि की तलाश में जाते थे
किसान भी इनका साथ देते थे
यह आमतौर पर तेलुगु या कन्नड़ भाषा बोलते थे
कई नायकों ने विजयनगर शासक की प्रभुसत्ता के आगे समर्पण किया था
यह अक्सर विद्रोह कर देते थे
इन्हें सैनिक कार्यवाही के द्वारा ही वश में किया जाता था

अमर नायक प्रणाली
अमर नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख राजनीतिक खोज थी।
यह प्रणाली दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली जैसे ही थी।
अमर नायक सैनिक कमांडर थे।
इनको राय द्वारा प्रशासन के लिए क्षेत्र दिए जाते थे।
अमर नायक उन क्षेत्रों में किसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू-राजस्व तथा अन्य कर वसूल करते थे।
अमर नायक राजस्व का कुछ भाग अपने व्यक्तिगत उपयोग में तथा घोड़ों और हाथियों के दल के रखरखाव के लिए अपने पास रख लेते थे।
यह दल विजय नगर शासक को एक प्रभावी सैनिक शक्ति प्रदान करने में सहायक होते थे।
इनकी मदद से इन्होंने दक्षिण भारत पर नियंत्रण किया।
राजस्व का कुछ हिस्सा मंदिर और सिंचाई के साधन के रखरखाव के लिए खर्च किया जाता था।
अमर नायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजा करते थे। और अपनी स्वामी भक्ति प्रकट करने के लिए दरबार में उपहारों के साथ खुद उपस्थित होते थे।
राजा कभी-कभी इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करते थे।
17वीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।

जल संपदा
विजयनगर की जल आवश्यकता को किस प्रकार पूरा किया जाता था ?
विजय नगर की भौगोलिक स्थिति सबसे अधिक चौंकाने वाला तथ्य तुंगभद्रा नदी से निर्मित एक प्राकृतिक कुंड है।
यह नदी उत्तर पूर्व दिशा में बहती है।
आसपास का भू दृश्य ग्रेनाइट की पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
यह पहाड़ियां शहर के चारों ओर करधनी (पहाड़ों के से घिरा हुआ) का निर्माण करती है।
इन पहाड़ियों से कई जलधाराएं आकर नदी से मिल जाती हैं।
लगभग सभी धाराओं के साथ-साथ बांध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज बनाए गए।
यह क्षेत्र शुष्क क्षेत्र था।
इसलिए यहां पानी का संचयन तथा इसके प्रबंधन की आवश्यकता भी थी।
इसलिए एक महत्वपूर्ण हौज का निर्माण 15वी शताब्दी के आरंभिक वर्षों में हुआ।
जिसे आज कमलपुरम जलाशय कहा जाता है।
इस हौज के पानी से आसपास के खेतों की सिंचाई की जाती थी।
और एक नहर के माध्यम से राजकीय केंद्र तक पानी भी ले जाया जाता था।
एक और महत्वपूर्ण जल संरचना हिरिया नहर के साक्ष्य भी मिले हैं।
इस नहर को आज भी भग्नावेशों के बीच देखा जा सकता है।
इस नहर में तुंगभद्रा पर बने बांध से पानी लाया जाता था।
इस जल का प्रयोग सिंचाई में भी किया जाता था।
संभवत इसका निर्माण संगम वंश के राजाओं ने कराया होगा।

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किलेबंदी और सड़कें
विजयनगर साम्राज्य में किलेबंदी का काफी महत्व था।
किलेबंदी के बारे में जानकारी हमें फारस से आए दूत अब्दुर रज्जाक के विवरण से प्राप्त होती है।
अब्दुर रज्जाक 15 वीं शताब्दी में कालीकट आया था।
वह यहां की किलेबंदी को देखकर हैरान हो गया।
विजयनगर में ना केवल शहर की किलेबंदी की गई थी।
बल्कि यहां खेतों और जंगलों की भी किलेबंदी की गई थी।
सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी।
पत्थर के टुकड़े फानाकार थे। इसलिए एक दूसरे पर टिक जाते थे।
इन्हें जोड़ने के लिए गारे का प्रयोग नहीं किया गया था।
अब्दुल रज्जाक लिखता है कि पहली, दूसरी ओर तीसरी दीवारों के बीच जुते खेत, बगीचे, आवास थे।
पे लिखता है कि जहां वो धान उगाते थे।
वहां कई उद्यान और जल था।
जल दो झीलों से लाया जाता था।

खेतों को क्यों किलेबंद किया गया ?
खेतों को किलेबंद इसलिए किया जाता था ताकि शत्रु से अनाज एवम् खाद्य सामग्री की रक्षा की जा सके।
अन्नागार भी इसीलिए बनाए गए थे।
ताकि लंबे समय तक अनाज, खाद्य सामग्री को सुरक्षित रख सकें।
विजयनगर शासक ने साम्राज्य को तथा कृषि भूभाग को बचाने के लिए अधिक महंगी एवम् व्यापक नीति अपनाई थी।
दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर बनी हुई थी।
तीसरी किलेबंदी से शासकीय केंद्र को घेरा गया था।
दुर्ग में प्रवेश के लिए अच्छी तरह से सुरक्षित प्रवेश द्वार बनाए गए थे।
ये प्रवेशद्वार शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे।
प्रवेश द्वार विशिष्ट स्थापत्य के नमूने थे।
किलेबंद बस्ती में बने प्रवेश द्वार पर मेहराब और साथ ही द्वार के ऊपर बनी गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के तत्व माने जाते थे।
इस कला शैली  को इतिहासकार indo-islamic कहते हैं।
पुरातत्विदों ने शहर के अंदर की और वहां से बाहर जाने वाली सड़क का अध्ययन किया।
सड़कें ज्यादातर पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर ही इधर-उधर घूमती थी।
सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में से कई मंदिर के प्रवेश द्वारों से आगे बढ़ी हुई थी।
इनके दोनों ओर बाजार भी लगते थे।

शहरी केंद्र
शहरी केंद्र की ओर जाने वाली सड़कों पर सामान्य लोगों के आवास के कम साक्ष्य मिले हैं।
पुरातत्वविदों को कुछ स्थान पर परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली है।
ऐसा अनुमान लगाया गया है कि इन स्थानों पर धनी व्यापारी लोग रहते थे
यह मुस्लिम रिहाईसी मोहल्ला भी था।
यहां कुछ मस्जिदें और मकबरे भी मिले हैं
इनका स्थापत्य हंपी में मिले मंदिरों के मंडप के स्थापत्य से मिलता जुलता है।
पुर्तगाली यात्री बरबोसा का वर्णन में कहता है कि लोगों के अन्य आवास छप्पर के है।
लेकिन फिर भी सुदृढ़ (मजबूत) है और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थान वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित है।
क्षेत्र के सर्वेक्षण से पता लगा कि इस क्षेत्र में बहुत से पूजा स्थल और छोटे मंदिर थे।
यंहा कई जलाशय भी मिले हैं।

राजकीय केंद्र
राजकीय केंद्र बस्ती के दक्षिण पश्चिम भाग में स्थित थे।
यहां 60 से अधिक मंदिर सम्मिलित थे।
शासक मंदिर और संप्रदाय को संरक्षण देते थे।
लगभग 30 संरचनाओं की पहचान महल के रूप में की गई है।
यह काफी बड़ी संरचनाएं हैं जिनका संबंध अनुष्ठानिक कार्यों से नहीं है।
इस क्षेत्र में कुछ विशिष्ट संरचना का नामकरण भवनों के आकार तथा उनके कार्यों के आधार पर किया गया था।
इस क्षेत्र ने एक विशाल संरचना पाई गई है।
इसका नाम राजा का भवन है।
परंतु ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले की यह राजा का आवास था।
इसके दो प्रभावशाली मंच थे।
जिन्हें सभा मंडप तथा महनवमी डिब्बा कहा जाता है।

सभा मंडप
पूरा क्षेत्र ऊंची दोहरी दीवारों से घिरा है और इनके बीच में एक गली है।
सभा मंडप एक ऊंचा मंच है।
जिसमें पास-पास तथा निश्चित दूरी पर लकड़ी के स्तंभों के लिए छेद बने हुए हैं।
इसकी दूसरी मंजिल जो इन स्तंभों पर टिकी थी।
दूसरी मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां बनाई हुई थी।
स्तंभों के एक दूसरे से बहुत पास पास होने से बहुत कम खुला स्थान बचता होगा।
इसलिए यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह मंडप किस कार्य के लिए बनाया गया था।

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महानवमी डिब्बा
शहर के सबसे ऊंचे स्थानों पर स्थित महानवमी डिब्बा एक विशालकाय मंच है।
यह लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊंचाई तक जाता है।
इस पर एक लकड़ी की संरचना बनी थी।
मंच का आधार पर कुछ चित्र मिले हैं।
इस संरचना से जुड़े अनुष्ठान सितंबर और अक्टूबर के शरद मास में मनाए जाने वाले
10 दिन के हिंदू त्यौहार जिसे दशहरा (उत्तर भारत), दुर्गा पूजा (बंगाल) तथा नवरात्रि या महनावमी नाम से जाना जाता है।
इस अवसर पर विजयनगर के शासक अपने रुतबे ताकत का प्रदर्शन करते थे।
इस अवसर पर धर्म अनुष्ठान में मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा की जाती थी।
भैंस और अन्य जानवर की बलि दी जाती थी।
नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा तथा घोड़े, हाथी और रथों तथा सैनिकों की शोभायात्रा निकाली जाती थी और साथ ही प्रमुख नायकों और अधीनस्थ राजाओं द्वारा राजा और उसके अतिथियों को दी जाने वाली औपचारिक भेंट इस अवसर का मुख्य आकर्षण थी।
त्यौहार के अंतिम दिन में राजा अपने नायकों की सेना का खुले मैदान में आयोजित समारोह में निरीक्षण करता था।

राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन
राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में एक कमल महल है
इसका नामकरण 19वीं शताब्दी में अंग्रेज यात्रियों ने किया।
यह नहीं पता लग पाया कि यह भवन किस कार्य के लिए बना था।
मैकेंजी ने एक मानचित्र बनाया उसमें यह सुझाव दिया गया है कि यह परिषदीय सदन था।
यहां पर राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था
ज्यादातर मंदिर धार्मिक केंद्र में स्थित है
लेकिन कुछ मंदिर राजकीय केंद्र में भी मिले हैं
इनमें एक अत्यंत दर्शनीय को हजार राम मंदिर कहा जाता है
संभवत इसका प्रयोग केवल राजा या उनके परिवार के द्वारा किया जाता था
दीवारों पर कुछ मूर्तियां बनाई गई थी
अंदरूनी दीवारों पर रामायण के कुछ चित्र मिल जाते हैं
जब इस शहर पर आक्रमण हुआ तो कई संरचनाएं नष्ट हो गई

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धार्मिक केंद्र
स्थानीय मान्यता है कि तुंगभद्रा नदी के तट से लगे चट्टानी भाग तथा पहाड़ियों का उल्लेख रामायण में बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं।
एक स्थानीय मान्यता यह भी है-
कि यहां की स्थानीय मातृदेवी पंपादेवी ने इन पहाड़ियों में भगवान विरुपाक्ष से विवाह के लिए तपस्या की थी।
विरुपाक्ष राज्य के संरक्षक देवता एवं शिव का ही रूप माने जाते हैं
आज भी यह विवाह विरुपाक्ष मंदिर में हर साल धूमधाम से आयोजित किया जाता है
इन पहाड़ियों में विजयनगर साम्राज्य से पहले के जैन मंदिर भी मिले है।
यह क्षेत्र कई धार्मिक मान्यताओं से संबंधित है।
क्षेत्र में मंदिर निर्माण का एक लंबा इतिहास रहा है।
पल्लव शासक, चालुक्य शासक, होयसाल तथा चोल वंश तक के शासकों ने मंदिर के निर्माण कराए हैं।
आमतौर पर शासक अपने आप को ईश्वर से जोड़ने के लिए मंदिर निर्माण को प्रोत्साहन देते थे।
मंदिर शिक्षा के केंद्रों के रूप में कार्य करते थे।
शासन तथा अन्य लोग, मंदिर के रखरखाव के लिए भूमि तथा संपत्ति दान में देते थे।
विजयनगर के शासक विरुपाक्ष भगवान की ओर से शासन करने का दावा करते थे।
सभी राजकीय आदेशों पर कन्नड़ में श्री विरूपाक्ष शब्द अंकित होता था।
विजयनगर शासकों ने पूर्वकालिक परंपराओं को अपनाया तथा उसमें कुछ नवीनता भी लाए।
और उन्हें आगे विकसित किया

गोपुरम और मंडप
गोपुरम बहुत ऊंचे होते थे।
गोपुरम मंदिर के प्रवेशद्वार थे।
गोपुरम लंबी दूरी से ही मंदिर होने का संकेत देते थे।
केंद्रीय देवालय की मीनार इनके सामने छोटी थीं।
इससे शासक की ताकत का पता लगता है
की शासक ने इतनी ऊंची मीनार के निर्माण के लिए आवश्यक साधन तकनीक और कौशल जुटाया है।
अन्य विशिष्ट स्थापत्य के नमूने मंडप तथा लंबे स्तंभ वाले गलियारे थे
जो अक्सर मंदिर परिसर में स्थित देव स्थलों के चारों ओर बने थे।

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विरूपाक्ष तथा विटठल मंदिर
विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण कई शताब्दियों में हुआ था।
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद इससे अधिक बड़ा किया गया
मुख्य मंदिर के सामने बना मंडप कृष्णदेव राय ने अपने राज्यरोहण के  उपलक्ष में बनवाया था।
पूर्वी गोपुरम के निर्माण का श्रेय भी कृष्णदेव राय को ही दिया जाता है।
केंद्रीय देवालय पूरे परिसर के एक छोटे भाग तक सीमित रह गया था।
मंदिर के सभागारों का प्रयोग विविध प्रकार के कार्यों के लिए होता था।
जैसे– देवताओं की मूर्तियां, संगीत, नृत्य और नाटक के कार्यक्रम को देखने के लिए रखी जाती थी।
अन्य सभागारों का प्रयोग देवी देवताओं के विवाह के उत्सव पर आनंद मनाने
और कुछ अन्य का प्रयोग देवी देवताओं को झूला झुलाने के लिए भी किया जाता था।
इन अवसरों पर विशेष मूर्तियों का इस्तेमाल होता था
छोटे केंद्रीय देवालय में स्थापित मूर्तियों से यह मूर्तियां अलग होती थी

विट्ठल मंदिर
यहां के प्रमुख देवता विट्ठल थे
इन्हें महाराष्ट्र क्षेत्र में पूजे जाने वाले विष्णु के रूप हैं।
इस देवता की पूजा को कर्नाटक में भी आरंभ किया गया।
इससे पता लगता है कि विजयनगर के शासकों ने अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया।
अन्य मंदिरों की तरह इसमें भी कई सभागार थे।
इसमें रथ के आकार का एक अनूठा मंदिर भी है।
मंदिर परिसरों की एक चारित्रिक विशेषता रथ गलियां है।
जो मंदिर के गोपुरम में सीधी रेखा में जाती हैं
इन गलियों का फर्श पत्थर के टुकड़ों से बनाया गया था ।
इनके दोनों तरफ स्तंभ वाले मंडप थे।
जिनमें व्यापारी अपनी दुकानें लगाया करते थे

महलों, मंदिरों तथा बाजारों का अंकन
बीसवीं शताब्दी में इस स्थान का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग द्वारा किया गया।
1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्व के स्थल के रूप में मान्यता मिली।
उसके उपरांत 1980 के दशक के आरंभ में अलग-अलग प्रकार के अभिलेखन प्रयोग से, सर्वेक्षणों के माध्यम से विजयनगर से मिले अवशेषों का सूक्ष्म अध्ययन की महत्वपूर्ण योजना शुरू की गई।
लगभग 20 साल के काल में पूरी दुनिया के दर्जनों विद्वानों ने इस जानकारी को इकट्ठा किया और संरक्षित करने का कार्य किया।
इस विस्तृत प्रक्रिया के सिर्फ एक हिस्से को बारीकी से देखते है यह है –
मानचित्र निर्माण
इसका पहला चरण था
पूरे क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया
हर वर्ग को वर्णमाला के 1 अक्षर का नाम दिया गया
फिर छोटे वर्गों को दोबारा और भी छोटे समूह में बांटा गया
आगे फिर छोटे वर्गों को और छोटी इकाईयों में बांटा गया
यह गहन सर्वेक्षण बहुत मेहनत से किए गए और हजारों संरचनाओं के अंशों छोटे देवस्थल और आवासों से लेकर बड़े-बड़े मंदिरों तक को पुनः उजागर किया गया।
जॉन एम. फ्रीटस जॉर्ज मिशेल तथा एम. एस. नागराज राव जिन्होंने इस स्थान पर वर्षों तक कार्य किया, ने जो लिखा वह याद रखना महत्वपूर्ण है ” विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुएं- टैंक, धरन, भीतरी छत लटकते हुए छज्जो के अंदरूनी भाग तथा मीनारों की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।
हालांकि लकड़ी की संरचनाएं अब नहीं है और केवल पत्थर की संरचनाएं अस्तित्व में है यात्रियों द्वारा पीछे छोड़े गए विवरण उस समय के स्पंदन से पूर्ण जीवन के कुछ आयामों को पूर्ण निर्मित करने में सहायक होती है। Class 12th History Chapter 7 Ek samrajya ki rajdhani vijayanagar Notes

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6. Bhakti sufi parampara | भक्ति सूफी परम्परा

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 इतिहास का पाठ छ: भक्ति सूफी परम्परा ( Bhakti sufi parampara) के सभी टॉपिकों के व्‍याख्‍या को पढ़ेंगें, जो परीक्षा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है। इस पाठ को पढ़ने के बाद इससे संबंधित एक भी प्रश्‍न नहीं छूटेगा।

 

6. भक्ति सूफी परम्परा

भक्ति आंदोलन
भक्ति आंदोलन की शुरूआत द० भारत में नयनार संतों ने किया। बाद में अलवार संतों ने भी शुरू कर दिया।
भारत देश में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं।
प्राचीन धर्म– सनातन वैदिक धर्म।
1) जैन
2) बौध
3) ईसाई
4) इस्लाम

धर्म में कुरीतियां
1) जाति प्रथा
2) सती प्रथा
3) भेदभाव
4) अस्पृश्यता
5) वर्ण व्यवस्था
लोग जैन और बौध धर्म की ओर आकर्षित हुए।
संतों ने धर्म से आडम्बर हटाने का प्रयास किया।
आडम्बर और भेदभाव को चुनौती दी।
दक्षिण भारत में इसका विस्तार अलवार और नयनार संतो ने किया।
अलवार- विष्णु
नयनार – शिव
भक्ति – ईश्वर की आराधना

भक्ति के मार्ग / भक्ति परम्परा
भक्ति दो भागों में बँट गया—
1) सगुण
2) निर्गुण

Class 12th History Chapter 6 Bhakti sufi parampara Notes

सगुण-
मूर्ति पूजा- शिव, विष्णु, उनके अवतार, देवी की आराधना। (जैसे-रामानंद, मीराबाई, सूरदास)
सगुण भक्त्‍िा को मानने वाले लोग मूर्ति पूजा, कर्मकाण्‍ड और अवतार को मानते थे।

निर्गुण-
मूर्ति पूजा का विरोध- निराकार ईश्वर की पूजा। ( गुरुनानक देव, रैदास, कबीर )
निर्गुण भक्ति के मानने वाले लोग कर्मकाण्‍ड, मूर्ति पूजा और ईश्‍वर की अवतार को नहीं मानते थे। यह ईश्‍वर को निराकार (जिसका आकार न हो) मानते थे।

धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा जमुनी बनावट
इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता है।
साहित्य और मूर्तिकला में अनेक तरह के देवी देवता का आगमन हुआ।
विभिन्न देवताओं के विभिन्न रूपों की आराधना इस समय बढ़ने लगी थी।

पूजा प्रणालियों का समन्वय
इतिहासकारों का मानना है उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराए और पूजा पद्धतियां थी।

ब्राहमण विचारधारा
इसका प्रसार पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन द्वारा हुआ है।
यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में थे।
इन ग्रंथों का ज्ञान शूद्र तथा महिला
दोनों द्वारा ग्रहण किया जा सकता था।
इसी काल में स्त्री, शूद्र तथा अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों ने स्वीकृति दी थी।

महान तथा लघु परंपराएँ
समाजशास्त्री रॉबर्ट रेडफील्ड ने भारत देश में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का गहन विश्लेषण किया।
जो परंपराएँ राजा और पूरोहित के द्वारा पालन किया जाता था उस परंपरा को महान परंपरा नाम दिया गया।
जो परंपराएँ किसानों के द्वारा पालन किया जाता था, उसे लघु परंपरा कहा गया।
इसके लिए उन्होंने महान तथा लघु परंपरा का नाम दिया।

महान परंपरा मानने वाले लोग
1) अभिजात
2) प्रभुत्वशाली
3) राजा
4) पुरोहित

लघु परंपरा को मानने वाले लोग
1) सामान्य कृषक
2) निरक्षर

देवी पूजा
देवी की पूजा ज्यादातर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में की जाती थी।
इन देवी को मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता मिली थी।
जैसे- विष्णु भगवान की पत्नी– लक्ष्मी
शिव भगवान की पत्नी- पार्वती
देवी की आराधना पद्धति को तांत्रिक नाम से जाना जाता है।
तांत्रिक पूजा पद्धति देश में कई हिस्सों में होती थी।
इसे स्त्री एवं पुरुष दोनों ही कर सकते थे।
इस पूजा पद्धति से शैव और बौद्ध दर्शन भी प्रभावित हुआ।
वैदिक काल में अग्नि, इंद्र, सोम जैसे देवता मुख्य देवता थे।
लेकिन पौराणिक समय में यह गौण होते गए।
साहित्य तथा मूर्तिकला दोनों में ही इन देवताओं का निरूपण नहीं दिखता।
वैदिक मंत्रों में विष्णु, शिव और देवी की झलक मिलती है।
वैदिक पद्धति तथा तांत्रिक पद्धति में कभी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती थीं।
वैदिक पद्धति
यज्ञ एवं मंत्रो का उच्चारण
तांत्रिक पद्धति
वैदिक सत्ता की अवहेलना
भक्त अपने इष्ट देव विष्णु या शिव को भी कई बार सर्वोच्च बताते हैं।

उपासना की कविताएं
प्रारंभिक भक्ति परंपरा
कुछ संत कवि ऐसे नेता बनकर उभरे जिनके आसपास भक्तजनों का पूरा समुदाय गठित हो गया।
कई परंपराओं में ब्राह्मण देवता और भक्तों के बीच बिचौलिए बने रहे।
कुछ संतो ने स्त्रियों और निम्न वर्णों को भी स्वीकृत स्थान दिया।

तमिलनाडु के अलवार और नयनार संत
प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी में अलवारों और नयनारो के नेतृत्व में हुआ।
अपनी यात्रा के दौरान इन संतों ने कुछ पवित्र स्थलों को अपने ईश्वर का निवास स्थल घोषित किया।
इन स्थलों पर बाद में विशाल मंदिर बनवाए गए।
इन स्थलों को तीर्थ स्थल माना जाने लगा।
संतों के भजनों को इन मंदिरों में अनुष्ठान के समय गाया जाता था।
इन संतों की मूर्तियां भी लगवाई जाती थी।

Class 12th History Chapter 6 Bhakti sufi parampara Notes

जाति के प्रति दृष्टिकोण
अलवार और नयनार संतो ने जाति प्रथा का विरोध किया।
ब्राह्मण व्यवस्था का विरोध किया।
भक्ति संत अलग-अलग समुदायों से थे।
जैसे-
ब्राह्मण, किसान शिल्पकार, निम्न जाति (अस्पृश्य)
अलवार और नयनार संतो की रचनाओं को वेदों जितना महत्वपूर्ण बताया।
अलवार संतों के एक मुख्‍य काव्‍य संकलन नलयिरादिव्यप्रबन्ध का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था। इस ग्रंथ का महत्‍व चारों वेदों जितना बताया गया।

स्त्री भक्त
इस परंपरा के अनुसार स्त्रियों को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला था।
अंडाल नामक अलवार स्त्री की भक्ति गीत व्‍यापक स्‍तर पर गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं।
अंडाल अपने आपको विष्णु की प्रेयसी (प्रेमिका) मानकर अपनी प्रेम भावना को छंदों में व्यक्त करती थी।
करइक्काल अम्मइयार नामक नयनार स्त्री ने अपने उद्देश्‍य प्राप्ति के लिए घोर तपस्या का रास्ता अपनाया।
इन स्त्रियों की रचनाओं ने पितृसत्तात्मकता को चुनौती दी।

राज्य के साथ संबंध
जैन, बौद्ध धर्म के प्रति विरोध तमिल भक्ति रचना में देखने को मिलता है।
विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा होती थीं।
चोल शासक ( 9-13 शताब्दी ) ने ब्राह्मण और भक्ति परंपरा को समर्थन दिया।
इन्होंने भगवान विष्णु और शिव के मंदिरों का निर्माण के लिए भूमि अनुदान दी।
चोल सम्राट की मदद से बनाए गए विशाल शिव मंदिर चिदंबरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलूरम में निर्मित हुए।
इसी काल में कस्य की शिव की मूर्ति का निर्माण हुआ।
अलवार और नयनार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित होते थे।
इसलिए शासकों ने इनका समर्थन पाने का प्रयास किया।
चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया।
अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुंदर विशाल मंदिरों का निर्माण कराया।
जिनमें पत्थर और धातु से बनी बड़ी-बड़ी मूर्तियां सुसज्जित की गई।
चोल सम्राटों के द्वारा तमिल भाषा के शैव भजन का गायन मंदिरों में प्रचलित करवाया।
भजनों का संग्रह एक ग्रंथ के रूप में कराने का जिम्मा उठाया।
945 AD के एक अभिलेख से पता चला चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार संबंदर और सुंदरार की धातु की प्रतिमा शिव मंदिर में स्थापित करवाई।

वीरशैव परंपरा ( कर्नाटक )
12 वीं शताब्दी में कर्नाटक में बासवन्ना नामक ब्राह्मण के नेतृत्व में एक नया आंदोलन चला।
बासवन्ना एक चालुक्य राजा के दरबार मंत्री थे।
यह प्रारम्भ में जैन मत को मानने वाले थे।
इनके अनुयाई वीरशैव या लिंगायत कहलाते है।
वीरशैव का अर्थ – शिव के वीर
लिंगायत का अर्थ – लिंग धारण करने वाले
लिंगायत शिव की आराधना लिंग के रूप में करते है।
इस समुदाय के पुरुष वाम स्कंध पर चांदी के एक पिटारे में लघु लिंग धारण करते हैं।
जिन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता।

लिंगायत का विश्वास
1) जाति प्रथा का विरोध
2) अस्पृश्यता को नहीं माना
3) पुनर्जन्म को नहीं माना
4) मूर्ति पूजा नहीं करते
5) शिव भक्त
6) अन्तिम संस्कार में दफनाया
7) ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद को नहीं माना
8) जन्म पर आधारित श्रेष्ठता को अस्वीकार किया
9) वयस्क विवाह को माना।
10) विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दी

उत्तरी भारत में धार्मिक उफान
इसी काल में उत्तर भारत में विष्णु और शिव जैसे देवताओं की उपासना मंदिर में की जाती थी।
यह मंदिर शासकों की सहायता से निर्मित किए गए थे।
जिस प्रकार से दक्षिण भारत में अलवार और नयनार संतों की रचनाएं मिली है।
ऐसी उत्तर भारत में 14 वीं शताब्दी तक कोई रचना नहीं मिली।
इस काल में उत्तरी भारत में राजपूत राज्यों का शासन था।
इन राज्यों में ब्राह्मणों का महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
इसी समय कुछ ऐसे धार्मिक नेता उभरे।
जिन्होंने रूढ़िवादी ब्राह्मण परंपरा का विरोध किया।
ऐसे नेताओं में नाथ, जोगी और सिद्ध शामिल थे।
इनमें बहुत से लोग शिल्पी समुदाय (हस्‍तकला, दस्‍तकारी- बाँस से निर्मित वस्‍तु बनाने वाले या कपड़ा बुनने वाले तथा कढ़ाई करनेवाले) से थे।
जिनमें जुलाहे भी शामिल थे।
अनेक नए नए धार्मिक नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी।
इन्होंने अपने विचार आम लोगों की भाषा में सामने रखें।
नवीन धार्मिक नेता लोकप्रिय जरूर थे लेकिन शासक वर्ग का प्रशय हासिल नहीं कर सके।
तेरहवीं शताब्दी में तुर्कों द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई।
इस प्रकार से भारत में इस्लाम का प्रवेश हुआ।
इस्लामी परंपराएं अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिम भारत के बंदरगाह तक आए।

इस्‍लामी परंपराएँ
शासकों एवं शासितों के धार्मिक विश्वास
711 AD में मोहम्मद बिन कासिम नामक अरब सेनापति ने सिंध क्षेत्र पर हमला किया।
उसे जीतकर खलीफा के क्षेत्र में शामिल किया।
13 वीं शताब्दी में तुर्क और अब उन्होंने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी है।
धीरे-धीरे सीमा का विस्तार दक्कन के क्षेत्र में भी हुआ।
बहुत से क्षेत्रों में शासकों का धर्म इस्लाम था।
यह स्थिति 16वीं शताब्दी में मुगल सल्तनत की स्थापना के साथ बरकरार रही।
मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था।
उलमा – इस्लाम धर्म का ज्ञाता।
उलमा से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे शासन में सरिया का पालन करवाएं।
शरिया – मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून।
उपमहाद्वीप में एक बड़ी जनसंख्या इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी।
मुसलमान शासकों के क्षेत्र में रहने वाले अन्य धर्म के लोग जैसे- ईसाई, यहूदी, हिंदू यह जजिया नामक कर चुकाते थे।
कुछ शासक जनता की तरफ की लचीली नीति अपनाते थे।
जैसे- बहुत से शासकों ने भूमि अनुदान एवं कर की छूट।
हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई, यहूदी, धर्म संस्थाओं को दी।
गैर मुस्लिम धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त किया।

लोक प्रचलन में इस्लाम
इस्लाम के आने से पूरे उपमहाद्वीप में परिवर्तन देखने को मिले।
जिन्होंने इस्लाम धर्म कबूल किया उन्हें सैद्धांतिक रूप से पांच मुख्य बातें माननी थी।
1) अल्लाह एकमात्र ईश्वर है, पैगंबर मोहम्मद उनके दूत है।
2) दिन में 5 बार नमाज
3) खैरात बांटना ( दान – जकात )
4) रोजे रखना
5) हज के लिए मक्का जाना
पैगंबर मोहम्मद आखरी पैगंबर थे, इनके बाद खलीफा पद शुरू हुआ।
खलीफा – धार्मिक गुरु
हज़रत मु. की मृत्यु 632 ई. हुआ, जिसके बाद इस्‍लाम धर्म दो समूहों में बँट गया—
सुन्नी और शिया
अरब मुसलमान व्यापारी मालाबार तट (केरल) के किनारे आकर बसे।
इन्होंने स्थानीय मलयालम भाषा भी सीख ली।
स्थानीय नियमों को भी अपनाया।
उदहारण – इन्होंने मातृ गृहता को अपनाया।
मातृ गृहता एक ऐसी परंपरा थी।
जिसमें स्त्री विवाह के बाद अपने मायके ही रहती है।
उनके पति उनके साथ आकर रह सकते है।

Class 12th History Chapter 6 Bhakti sufi parampara Notes

समुदायों के नाम
आठवीं से चौदहवी शताब्दी के मध्य इतिहासकारों ने संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों का अध्ययन किया।
इनमें मुसलमान शब्द का प्रयोग नहीं था।
लोगों का वर्गीकरण उनके जन्म के स्थान के आधार पर होता था।
उदाहरण-
तुर्की में जन्मे तुरुष्क कहलाते थे
तजाकिस्तान के लोग ताजिक कहलाते थे
फारस के लोग पारसीक कहलाते थे
तुर्क और अफगानों को शक एवम् यवन भी कहा गया
इन प्रवासी समुदायों के लिए एक अधिक सामान्य शब्द मलेच्छ था।
मलेच्छ का अर्थ ?
असभ्य भाषा बोलने वाले
अनार्य – जो आर्य परम्परा के ना हों, जो वर्ण व्यवस्था का पालन ना करें।
ऐसी भाषा बोलने वाले जो संस्कृत से नहीं उपजी हो। ऐसे शब्दों में हीन भावना निहित थी।
सूफीवाद के लिए इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ शब्द का इस्तेमाल होता है।
यह सूफ से निकला है जिसका अर्थ होता है ऊन।
कुछ विद्वानों का मानना है की सूफी की उत्पत्ति सफा से हुई है।
जिसका अर्थ है – साफ / पवित्र।
इस्लाम में कुछ संतो का रूढ़ीवादी परंपराओं से बाहर निकलकर रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुकाव बढ़ा यह सूफी कहलाए।
इन्होंने रूढ़ीवादी परिभाषा और धार्मिक गुरुओं द्वारा दी गई कुरान की व्याख्या की आलोचना की।
इन्होंने मुक्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर अधिक बल दिया।
इन्होंने पैगंबर मोहम्मद को इंसान- ए- कामिल (पूरी तरह मनुष्‍य, परिपूर्ण मानव) बताया।
पैगंबर मो. के अनुसरण की बात कही।
सूफियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभव के आधार पर की।

खानकाह और सिलसिला
खानकाह- सूफी संतों, धर्म प्रचारकों के रहने का स्थान
खानकाह का नियन्त्रण शेख, पीर, मुर्शीद के हाथ में होता था।
संतो (सूफी) के अनुयाई मुरीद कहलाते थे।
शेख अपने मुरीदों की भर्ती करते थे।
आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करते थे।
12 वीं शताब्दी के आसपास इस्लामिक दुनिया में सूफी सिलसिला का गठन होने लगा।
सिलसिला का अर्थ – जंजीर।
शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की ओर संकेत।
दीक्षा के विशेष अनुष्ठान विकसित किए गए।
दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था।
सिर मुंडाकर थेगडी वाले कपड़े पहनने पड़ते थे।
पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह, उसकी मुरीदो के लिए भक्ति का स्थान बन जाती थी।
पीर की दरगाह पर जियारत के लिए जाने की परंपरा चल निकली।
जियारत – दर्शन करना, तीर्थयात्रा
इस परंपरा को ऊर्स कहा जाता था।
लोग ऐसा मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर में एकीभूत हो जाते हैं।
लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे।

खानकाह के बाहर
कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की व्याख्या के आधार पर नए आंदोलन की नींव रखी।
इन्होंने खानकाह का तिरस्कार किया।
यह रहस्यवादी फकीर की जिंदगी बिताते थे।
निर्धनता और ब्रह्मचर्य को इन्होंने गौरव प्रदान किया।
इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है.
कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी
यह शरिया की अवहेलना करते थे।
इसीलिए इन्हें बे शरिया कहा जाता था।
इन्हें शरिया के पालन करने वाले सूफियों से अलग करके देखा जाता था।

उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला
12 वीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली थे

कारण
इन्होंने अपने आप को स्थानीय परिवेश में ढाल लिया।
भारतीय भक्ति परंपरा की विशेषताओं को भी अपनाया।

चिश्ती खानकाह में जीवन
शेख निजामुद्दीन औलिया कि खानकाह दिल्ली में थी।
यहां कई छोटे छोटे कमरे और एक बड़ा हॉल था।
यहां अतिथि रहते तथा उपासना करते थे।
यहां रहने वालों में से शेख का परिवार उनके सेवक तथा उनके अनुयाई थे।
शेख एक छोटे से कमरे में छत पर रहते थे।
जहां वह मेहमानों से सुबह-शाम मिला करते थे।
आंगन एक गलियारे से घिरा होता था।
खानकाह के चारों ओर दीवार का घेरा था।
यहां एक सामुदायिक रसोई ( लंगर ) चलता था।
यहां सुबह से दर रात तक सभी तबकों के लोग अनुयाई बनने और ताबीज लेने आते थे।
अमीर हसन सिजजी, अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी। इन सब ने शेख के बारे में लिखा।
शेख निजामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिसों को चुना और उन्हें अलग-अलग भागों में खानकाह स्थापित करने के लिए भेजा।
इस प्रकार चिश्तियों के उपदेश तथा शेख का प्रसिद्धी चारों ओर फैल गया।
इनकी पूर्वजों की दरगाह पर तीर्थयात्री आने लगे।

चिश्ती उपासना : जियारत और कव्वाली
सूफी संतों की दरगाह पर लोग जियारत के लिए आते थे।
पिछले 700 सालों में अलग-अलग संप्रदायों के लोग पांच महान चिश्ती संतों की दरगाह पर आते रहे हैं।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की है।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर (राजस्‍थान) में है।
जिसे गरीब नवाज कहा जाता है।
यह दरगाह शेख की सदाचारीता और धर्मनिष्ठा तथा उनके वारिश और राजसी मेहमानों द्वारा दिए गए प्रशय के कारण बहुत लोकप्रिय थी।
मोहम्मद बिन तुगलक पहला सुल्तान था जो इस दरगाह पर आया था।
पहली इमारत सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने बनवाई।
अकबर यहां 14 बार आया था।
प्रत्येक यात्रा पर बादशाह दान भेंट दिया करते थे।
इसका ब्यौरा शाही दस्तावेजों में दर्ज है।
नाच और संगीत भी जियारत का हिस्सा थे।

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भाषा और संपर्क
चिश्तीयो ने स्थानीय भाषा को अपनाया।
दिल्ली में चिश्ती सिलसिला के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे।
बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य की रचना की इसका संकलन गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है।
कुछ सूफियों ने लंबी कविताएं मसनवी लिखें।
मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत रानी पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतन सेन की प्रेम कथा के इर्द-गिर्द घूमता है।
दक्कन में कर्नाटक के आसपास दक्खनी में लिखी छोटी कविताएं थी।
यह 17-18 वीं शताब्दी में यहां बसने वाले चिश्ती संतों द्वारा रची गई।

सूफी और राज्य
चिश्ती संप्रदाय के लोग संयम और सादगी भरा जीवन बिताते थे।
सत्ता से खुद को दूर रखने पर बल देते थे।
सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग अगर बिना मांगे भेंट देता था। तो सूफी संत उसे स्वीकार करते थे।
सुल्तानों ने खानकाह को कर मुक्त भूमि अनुदान में दी।
चिश्ती धन और सामान के रूप में दान स्वीकार करते थे।
इस धन को इकट्ठा करके रखा नहीं जाता था।
बल्कि इससे खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था, महफिल आदि पर खर्च कर देते थे।
आम लोगों में चिश्ती बहुत प्रसिद्ध थे।
इसीलिए शासक भी उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे।
जब तुर्को द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना की गई।
तब उलमा द्वारा शरिया लागू की जाने की मांग को ठुकराया गया।
क्योंकि अधिकतर जनता इस्लाम को नहीं मानती थी।
ऐसे में सुल्तानों ने सूफी संतों का सहारा लिया।
सूफियों और सुल्तानों के बीच तनाव के उदाहरण भी मौजूद हैं।
दोनों अपनी सत्ता का दावा करने के लिए कुछ आचारों पर बल देते थे।
उदाहरण-
झुककर प्रणाम करना।
कदम चूमना।
कभी-कभी सूफी शेख को आडंबरपूर्ण पदवी से संबोधित किया जाता था।
उदाहरण-
शेख निजामुद्दीन औलिया के अनुयाई उनको सुल्तान –उल- मशेख ( शेखों में सुल्तान ) कहकर संबोधित करते थे।

नवीन भक्ति पंथ
उत्तरी भारत में संवाद और असहमति
मीराबाई
मीराबाई भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवियत्री हैं।
लगभग – 15 वी – 16 वी शताब्दी में मीराबाई का जन्म राजस्थान में हुआ था।
पिता – रतन सिंह
मीराबाई बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन हो गई।
मीराबाई का विवाह इनकी मर्जी के खिलाफ मेवाड़ के सिसोदिया कुल में किया गया।
विवाह के बाद पति की आज्ञा की अवहेलना करते हुए।
मीराबाई ने पत्नी और मां के दायित्वों को निभाने से इनकार किया।
क्योंकि मीराबाई श्रीकृष्ण को अपना एकमात्र पति स्वीकार किए कर चुकी थी।
एक बार उनके ससुराल वालों ने उन्हें जहर देने का प्रयत्न किया।
लेकिन मीराबाई राजभवन से निकलकर भागने में सफल हुई।
वह एक घुमक्कड़ गायिका बन गई।
उन्होंने अपने अंतर्मन की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अनेक गीतों की रचना की।
मीरा के गुरु रैदास थे जो कि एक चर्मकार थे।
इससे यह ज्ञात होता है कि मीरा ने जातिवादी परंपरा का विरोध किया।
मीराबाई ने राज महल के ऐश्वर्य को त्याग दिया। और एक विधवा के रूप में सफेद वस्त्र धारण कर सन्यासी की जिंदगी बिताई।

गुरुनानक
गुरु नानक का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था।
इनका जन्म स्थल पंजाब का ननकाना गांव था जो रावी नदी के पास था।
मृत्यु – करतारपुर
सिख धर्म के संस्थापक (ये निर्गुण भक्ति को मानते थे)
इनका विवाह छोटी आयु में हो गया था।
इन्होंने अपना अधिकतर समय सूफी और भक्त संतों के बीच गुजारा।
देश भर की यात्रा इन्होने निर्गुण भक्ति का प्रचार के लिए किया।
धर्म के सभी बाहरी आडंबर को अस्वीकार किया।
जैसे- यज्ञ, अनुष्ठानिक स्ना, मूर्ति पूजन, कठोर तपस्या।
हिंदू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी नकारा।
परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं था।
रब (ईश्‍वर) की उपासना का सरल नियम स्मरण करना व नाम का जाप का उपाय बताया।
इन्होंने अपने विचार पंजाबी भाषा में शबद के माध्यम से सामने रखें।
नानक जी यह यह शबद अलग अलग राग में गाते थे।
उनके सेवक मरदाना रबाब बजाकर उनका साथ देते थे।
गुरु नानक ने अपने अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया।
सामुदायिक उपासना के नियम निर्धारित किए।
यहां सामूहिक रूप से पाठ होता था।
गुरु नानक ने अपने अनुयाई अंगद को अपने बाद गुरु पद पर आसीन किया।
यह परंपरा लगभग 200 वर्षों तक चलती रही।
गुरु नानक जी कोई नया धर्म की स्थापना नहीं करना चाहते।
लेकिन इनकी मृत्यु के बाद इनके अनुयायियों ने अपने आचार विचार इस प्रकार से बनाए जिस से ही अपने आप को हिंदू और मुसलमान दोनों से अलग चिन्हित करते थे।
पाचवे गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक तथा उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास, कबीर की वाणी को आदि ग्रंथसाहिब में संकलित किया।
इनको गुरबाणी कहा जाता है।
सिख सम्‍प्रदाय के 10 गुरू आए, जो निम्‍नलिखित है—
1) गुरु नानक
2) गुरु अंगद
3) गुरु अमरदास
4) गुरु रामदास
5) गुरु अर्जुन देव
6) गुरु हरगोबिन्द
7) गुरु हरराय
8) गुरु हरकिशन
9) गुरु तेग बहादुर
10) गुरु गोबिंद सिंह
17 वीं शताब्दी में गुरु गोविंद सिंह ने नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी इसमें शामिल किया।
इस ग्रंथ को गुरु ग्रंथसाहिब कहा गया।
गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की।
खालसा पंथ – पवित्रों की सेना
उनके पांच प्रतीक (जिसे करवार भी कहा जाता है)—
1) बिना कटे केस
2) कृपाण
3) कच्छा
4) कंघा
5) लोहे का कड़ा

Class 12th History Chapter 6 Bhakti sufi parampara Notes
कबीर
कबीर एक महान संत एवं समाज सुधारक कवि माने जाते हैं।
इनका जन्म वाराणसी में हुआ।
इनका जन्म एक विधवा महिला के द्वारा हुआ।
इनकी माताजी ने इन्हें लहरतारा नदी के पास छोड़ दिया।
उसके बाद इन्हें एक जुलाहा दम्पत्ति नीरू और नीमा ने पालन पोषण किया।
उन्होंने परम सत्य को वर्णित करने के लिए कई तरीको का सहारा लिया।
कबीर इस्लामी दर्शन की तरह सत्य को अल्लाह, खुदा, हजरत और पीर कहते हैं।
वेदांत दर्शन से प्रभावित कबीर सत्य को अलख (अदृश्य), निराकार कहते है।
कुछ कविताएं इस्लामी दर्शन के एकेश्वरवाद और मूर्तिभंजन का समर्थन करता है।
हिंदू धर्म में बहुईश्वरवाद और मूर्ति पूजा का खंडन करती है।
कबीर पहले और आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत है।
जो सत्य की खोज में रूढ़िवादी धार्मिक सामाजिक परंपराओं विचारों को प्रश्नवाचक के नजरिए से देखते हैं।
कबीर को भक्ति मार्ग दिखाने वाले गुरु रामानंद थे।
ऐसा माना जाता है कि यह हिंदू परिवार में जन्मे थे।
लेकिन इनका पालन पोषण मुस्लिम परिवार में हुआ।
यह पढ़े लिखे नहीं थे।
कबीर की वाणी को बीजक नामक ग्रंथ में लिखा गया।
बीजक कबीरपंथियों द्वारा वाराणसी और उत्तर प्रदेश के स्थानों में संरक्षित है।
कबीर ग्रंथावली का संबंध राजस्थान के दादूपंथीयों (कबीर की तरह दादूदयाल के अनुयायी) से हैं।
इसके अलावा कबीर के कई पद आदि ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं।
इन सब का संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद किया गया। Class 12th History Chapter 6 Bhakti sufi parampara Notes

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