कक्षा 12 हिन्‍दी तुमुल कोलाहल कलह में | tumul kolahal kalah class 12

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ छ: ‘तुमुल कोलाहल कलह में (tumul kolahal kalah me class 12)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bseb class 12th Hindi Poetry Chapter 6 तुमुल कोलाहल कलह में

कवि- जयशंकर प्रसाद
लेखक-परिचय
जीवनकाल : 1889-1937
जन्मस्थान : वाराणसी, उत्तरप्रदेश
पिता : देवी प्रसाद साह

शिक्षा : आठवीं तक | संस्कृत, हिन्दी, फारसी, उर्दू की शिक्षा घर पर नियुक्त शिक्षकों द्वारा

विशेष परिस्थिति : बारह वर्ष की अवस्था में पितृविहीन, दो वर्ष बाद माता की मृत्यु

कृतियाँ : इंदु 1909 में प्रकाशित जिसमें कविता, कहानी, नाटक इत्यादि शामिल है।

प्रमुख काव्‍य संकलन : झरना (1918), आँसू (1925), लहर (1933)

महाराणा का महत्त्व, करुणालय, प्रेम पथिक, कामायनी, छाया, इंद्रजाल, कंकाल, इत्यादि

यह एक छायावाद के कवि हैं।

कामायनी कुल 15 सर्ग हैं।

पात्र : मनु = मनुष्य का मन, श्रद्धा = मनुष्य की हृदय, इड़ा = मनुष्य की बुद्धि

कामायनी

मन यज्ञ करते हैं। उसके बाद मन की श्रद्धा से शादी होती है। मन कृषि कार्य और गोपालन करते है। श्रद्धा माँ बनने वाली होती है। श्रद्धा को एक बेटा होता है। बेटा के जन्‍म के बाद अधिकतर समय वह अपने बेटे को देने के कारण मन को समय नहीं दे पाती है। मन को लगता है कि श्रद्धा हमसे अब प्‍यार नहीं करती है। जिससे मन श्रद्धा को छोड़ कर चले जाते हैं। मन की इड़ा से मुलाक़ात होती है और मन इड़ा से प्यार करने लगते है। मन जब इड़ा से ज़ोर-जबरदस्ती करते है तो इड़ा के राज्‍य की प्रजा इसका विरोध करती है और मन को पीटकर घायल कर देती है।

श्रद्धा मन को खोजते हुए इड़ा के राजमहल में अपने बच्चे मानव के साथ निर्वेद सर्ग पहुँचती है।

श्रदधा मनु को प्राप्त करके आनंद-विभोर हो जाती है और गाती है। मन को लगता है कि उन्होंने दोनों के साथ गलत किया है और वो श्रद्धा और इड़ा को छोड़कर दूसरे जगह चले जाते हैं। श्रद्धा अपने पुत्र को इड़ा के पास छोड़कर मनु को खोजने जाती है और अंतत : दोनों मिलते है।

tumul kolahal kalah me class 12 Hindi Chapter 6

तुमुल कोलाहल कहल में
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन!

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। जिसमे श्रद्धा मन को पाकर कहती है कि इस अत्यंत कोलाहल में मैं हृदय के बात की तरह हैं।

विकल होकर नित्य चंचल,
खोजती जब नींद के पल
चेतना थक सी रही तब,
मैं मलय की वात रे मन !

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। इन पंक्तियों में श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हई कहती है।

पुरुष जब दिनभर की भाग-दौर और मन की चंचलता के कारण थक जाता है और व्याकुल होकर आराम करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में श्रद्धा (नारी का हृदय) मलय पर्वत से चलने वाली सुगंधित हवा की तरह शांति और विश्राम देती है। कवि कहना चाहते हैं कि मन चंचल है और मन की चंचलता के कारण शरीर थक कर आराम खोजता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति का हृदय ही उसको आराम देता है।

tumul kolahal kalah me class 12 Hindi Chapter 6

चिर-विषाद विलीन मन की
इस व्यथा के तिमिर वन की
मैं उषा सी ज्योति रेखा,
कुसुम विकसित प्रात रे मन !

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। इन पंक्तियों में श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हुई कहती है।

मन अंधकाररूपी दुख के वन में दीर्घ काल के लिए दबा हुआ है। मैं उसमें सुबह की किरणों की तरह हुँ। मैं इस अंधकार से पूर्ण वन में पुष्प से भरे हुए सुबह के समान हूँ।

जहां मरु ज्वाला धधकती
चातकी कन को तरसती
उन्हीं जीवन घाटियों की
मैं सरस बरसात रे मन!

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। इन पंक्तियों में श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हुई कहती है।

हे मन् ! उस धधकते हए मरुस्थल में जहां चातकी पानी के बुंदों के लिए तरसती है मैं जीवन की घाटी में सरस बरसात की तरह हूँ। कवि कहते है कि जब मानव जीवन कष्ट की अग्नि में मरुस्थल की तरह धधकता है तब आनंद रूपी बारिश ही उसके चित रूपी चातकी को सुख प्रदान करती है।

पवन की प्राचीर में रुक
जला जीवन जा रहा झुक
इस झुलसते विश्व-वन की
मैं कुसुम ऋतु रात रे मन !

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। इन पंक्तियों में श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हुई कहती है।

हे मन ! जब जीवन पवन की ऊंची चहारदीवारी में बंद होकर झुक जाता है | जब मानव जीवन झुलस जाता है। ऐसी स्थिति में मैं वसंत की रात की तरह हूँ। जो इस झुलसे हुए मन को हरा-भरा कर सकती है।

चिर निराशा नीरधर से
प्रतिच्छायित अश्रु सर में
मधुप मुखर मरंद मकुलित
मैं सजल जलजात रे मन !

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य कामायनी के निर्वेद सर्ग से ली गई है। इन पंक्तियों में श्रद्धा पुरुष के जीवन में नारी के महत्व को रेखांकित करती हई कहती है।

हे मन ! गहरी निराशा के बादलों से घिरे हुए आसुओं के तालाब में मैं करुणा से भरी हुई कमल के समान हूँ जिसपर भौंरे गुजते रहते है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी कवित्त | Kavit class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ पाँच ‘कवित्त (Kavit class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bseb Class 12th Hindi Chapter 5 कवित्त

कवि – भूषण
लेखक-परिचय
जीवनकाल : (1613-1715)
जन्मस्थान : टिकवापुर कानपुर उत्तरप्रदेश
पिता : रत्नाकर त्रिपाठी

उपनाम : कवि भूषण (चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रसाह द्वारा इन्‍हें ‘कवि भूषण’ की उपाधी प्राप्‍त)

आश्रयदाता : छत्रपति शिवाजी, शिवाजी के पुत्र शाहजी और पन्ना के बुंदेला राजा छत्रसाल

विशेष :- रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि चिंतामणि त्रिपाठी और मतिराम भूषण के भाई के भाई के रूप में जाने जाते हैं।

कृतियाँ : शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक, भूषण हजारा, भूषण उल्लास, दूषण उल्लास,

यह रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हैं इनका हिंदी जनता में बहुत सम्मान है। यह एक वीर रस के कवि हैं।

कवित्त (1)

इन्द्र जिमि जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर,
रावन सदंभ पर रघुकुल राज है

Kavit class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ में कवि भूषण शिवाजी के शौर्य का बखान करते हुए कहते हैं कि शिवाजी का मलेच्छ पर उसी प्रकार राज हैं जिस प्रकार इंद्र का यम पर, समुन्द्र की अग्नि का पानी पर और राम का दंभ से भरे रावण पर है। इन पंक्तियों में भूषण ने शिवाजी के शौर्य की तुलना इंद्र समुन्द्र अग्नि और राम के साथ की है।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाहू पर राम द्विज राज है।

प्रस्तत पंक्तियाँ में कवि भूषण शिवाजी के शौर्य का बखान करते हैं कि शिवाजी का मलेच्छ पर उसी प्रकार राज हैं जिस प्रकार हवाओं का बादल पर भगवान शिव का रति के पति पर (कामदेव पर) और परशुराम का सहस्रबाहु पर है। इन पंक्तियों में भूषण ने शिवाजी के शौर्य की तुलना हवाओं, शिव और परशुराम के साथ की है।

दावा द्रुम-दंड पर चीता मृग-झुंड पर,
भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है।

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प्रस्तत पंक्तियाँ में कवि भूषण शिवाजी के शौर्य का बखान करते हए कहते हैं कि शिवाजी का मलेच्छ पर उसी प्रकार राज हैं जिस प्रकार जंगल की आग का वृक्ष की डालों पर, चीता का हिरणों के झूंड पर और हाथी पर सिंह का राज है। इन पंक्तियों में भूषण ने शिवाजी के शौर्य की तुलना जंगल की आग, चीता और सिंह के साथ की है।

तेज तम अंस पर कान्ह जिमि कंस पर,
यौ मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज है।

प्रस्तुत पंक्तियाँ में कवि भूषण शिवाजी के शौर्य का बखान करते हए कहते हैं कि शिवाजी का मलेच्छ पर उसी प्रकार राज हैं जिस प्रकार उजाले का अंधेरे पर, कृष्ण का कंस पर राज है। इन पंक्तियों में भूषण ने शिवाजी के शौर्य की तुलना उजाले और कृष्ण के साथ की है।

कवित्त (2)

निकसत म्यान ते मयूखैं, प्रलै-भानु कैसी
फारै तम-तोम से गयंदन के जाल को।

प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर भूषण द्वारा रचित ‘कवित्त’ शीर्षक पाठ से अवतरित है जिनमें कवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता, धीरता और पौरुष का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि छत्रसाल की तलवार म्यान से इसप्रकार निकलती है जैसे प्रलयंकारी सूर्य से उसकी किरणें निकलती है तथा वह गयंद अर्थात हाथियों के जाल को इसप्रकार तितर-बितर कर देती है जैसे सूर्य की किरणें अंधेरे को।

लागति लपकि कंठ बैरिन के नागिनि सी
रुद्रहि रिझावै दै दै मुंडन की माल को।

Kavit class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि भूषण द्वारा रचित कवित्त शीर्षक पाठ से अवतरित है जिनमें कवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता, धीरता और पौरुष का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि हे राजन ! आपकी तलवार शत्रुओं के गर्दन से नागिन की तरह लिपट जाती है और रुद्र (शिव) को प्रसन्न करने के लिए उन्हे मुंडो (सिर) की माला अर्पित कर रही है।

लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाह बली,
कहाँ लौं बखान करौ तेरी करवाल को।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर भूषण द्वारा रचित ‘कवित्त’ शीर्षक पाठ से अवतरित है जिनमें कवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता, धीरता और पौरुष का वर्णन किया है। कवि कहते है कि हे बलिष्ठ और विशाल भुजावाले महाराज छत्रसाल ! मैं आपकी तलवार का कहाँ तक बखान करूँ ? आपकी तलवार अत्यंत प्रलयंकारी है जो शत्रुओं के समूह को नष्ट कर रही है।

प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि
कालिका सी किलकि कलेऊ देति काल को

प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर भूषण दवारा रचित ‘कवित्त’ शीर्षक पाठ से अवतरित है जिनमें कवि भूषण ने छत्रसाल की वीरता, धीरता और पौरुष का वर्णन किया है | कवि कहते हैं कि हे राजन ! आपकी तलवार अत्यंत प्रलयंकारी है जो शत्रुओं के दल का संहार करती है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे काली को प्रसन्न करने के लिए प्रसाद देती हो।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी छप्‍पय | Chhappay class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ चार ‘तुलसीदास (Chhappay class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bihar Board Class 12 Hindi Chapter 4 छप्‍पय

कवि-परिचय
लेखक- नाभादास
जन्म : 1570-1600(अनुमानित)
जन्मस्थान : दक्षिण भारत में
माता-पिता : शैशव में पिता की मृत्यु और अकाल के कारण माता के साथ जयपुर (राजस्थान) में प्रवास
दीक्षा गुरु : स्वामी अग्रदास (अग्रअली)
शिक्षा :- गुरु की देख-रेख में स्वाध्याय, सत्संग द्वारा ज्ञानार्जन

कृतियाँ : भक्तमाल, अष्टयाम (ब्रजभाषा गद्य में)

गोस्वामी तुलसीदास के समकालीन – वैष्णव संप्रदाय मे दीक्षित

कबीर

भगति विमुख जे धर्म सो सब अधर्म करि गाए।
योग यज्ञ व्रत दान भजन बिन तुच्छ दिखाए।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल से उद्धृत है जिसके माध्यम से नाभदास ने कबीरवाणी की विशेषता पर प्रकाश डाला है

कवि कहते है कि जो व्यक्ति भक्ति से विमुख हो जाता है वह अधर्म में लिप्त व्यक्तियों की तरह कार्य करता है | कबीर ने भक्ति के अतिरिक्त अन्य सभी क्रियाओं जैसे योग, यज्ञ, व्रत, दान, भजन सभी को तुच्छ कहा है।

हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी।
पक्षपात नहिं बचन सबहिके हितकी भाषी।।

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कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल से उद्धृत है जिसके माध्यम से नाभदास ने कबीरवाणी की विशेषता पर प्रकाश डाला है।

नाभादास कहते है कि कबीर ने हमेशा हिन्दू और मुसलमान को प्रमाण और सिद्धांत की बात कही है | कबीर ने कभी भी पक्षपात नहीं किया है उन्होंने हमेशा सबके हित की बात कही है।

आरूढ़ दशा ह्वै जगत पै, मुख देखी नाही भ।
कबीर कानि राखी नहीं, वर्णोश्रम षट दर्शनी।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास दवारा रचित भक्तमाल से उदधत है जिसके माध्यम से नाभदास ने कबीरवाणी की विशेषता पर प्रकाश डाला है।

नाभादास कहते है कि कबीर ने कभी भी मुख देखी बात नहीं कही अर्थात कभी भी पक्षपातपूर्ण बात नहीं कही। कबीर ने कभी भी कही सुनाई बातों को महत्व नहीं दिया। उन्होंने हमेशा आंखों देखी बातों को ही कहा है। कबीर ने चार वर्ण, चार आश्रम और छ: दर्शन किसी की आनि-कानी नहीं की अर्थात किसी को भी महत्व नहीं दिया।

सूरदास

उक्ति चौज अनुप्रास वर्ण अस्थिति अतिभारी।
वचन प्रीति निर्वेही अर्थ अद्भुत तुकधारी।।

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कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल से उदधृत है जिसके माध्यम से नाभदास ने सूरदास के विशेषताओं को बताया है। नाभादास कहते हैं कि सुरदास कि कविताएं युक्ति, चमत्कार अनुप्रास वर्ण से भरी हई होती है। सूरदास की कविताएँ लयबद्ध और संगीतात्मक होती है। सूरदास अपनी कविता की शुरुआत जिन प्रेम भरी वचनों से करते है उसका अंत भी उन्ही वचनों से करते है।

पद प्रतिबिंबित दिवि दृष्टि हृदय हरि लीला भासी।
जन्म कर्म गुन रूप सबहि रसना परकासी।।

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प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल से उद्धृत है जिसके माध्यम से नाभदास ने सूरदास के विशेषताओं को बताया है। नाभदास कहते है कि सुरदास की दृष्टि दिव्य है। सूरदास ने अपनी कविताओं मे श्री कृष्ण की लीला का वर्णन किया है। सूरदास ने प्रभु के जन्म कर्म गुण रूप सभी को अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर अपने वचनों से प्रकाशित किया

विमल बुद्धि हो तासुकी, जो यह गुन श्रवननि धरै।
सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं शिरचालन करै।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ नाभादास द्वारा रचित भक्तमाल से उद्धृत है जिसके माध्यम से नाभदास ने सूरदास के विशेषताओं को बताया है। नाभदास कहते है कि जो भी व्यक्ति सूरदास द्वारा कही गई भगवान के गुणों को सुनता है उसकी बुद्धि विमल हो जाती है। नाभादास कहते हैं कि ऐसा कोई कवि नहीं हैं जो सूरदास की कविताओं को सुनकर सिर चालन ना करें अर्थात उनकी बातों में हामी ना भरें।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी तुलसीदास | Tulsidas class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ तीन ‘तुलसीदास (Tulsidas class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bihar Board Class 12 Hindi Chapter 3 तुलसीदास

कवि-परिचय
कवि का नाम – तुलसीदास
जन्म : 1543 निधन : 1623
जन्मस्थान : राजापुर, बाँदा, उत्तरप्रदेश
मूल-नाम : रामबोला
माता-पिता : हुलसी और आत्माराम दुबे

दीक्षा गुरु : नरहरि दास, सुकरखेत के वासी, गुरू ने विद्यारंभ करवाया।
शिक्षा गुरु : शेष सनातन, काशी के विद्वान।
शिक्षा : चारों वेद, षड्दर्शन, इतिहास, पुराण, स्मृतियाँ, काव्य आदि की शिक्षा काशी में पंद्रह वर्षों तक प्राप्‍त की।
स्थाई निवास : काशी

मित्र : अब्‍दुर्रहीम खानखाना, महाराजा मानसिंह, नाभादास, टोडरमल, मधुसूदन सरस्वती,

कृतियाँ : रामलला नहछू, वैराग्य संदीपिनी, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामज्ञाप्रश्न, दोहावली कवितावली, गीतावली, श्री कृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका, रामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के मध्यकालीन उत्तर भारत भक्ति काव्य की सगुण भक्तिधारा की रामभक्ति शाखा के प्रधान कवि है।

पद

कबहुँक अंब अवसर पाइ ।
मेरिओ सुधि द्याइबी कछु करून-कथा चलाइ ।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका के सीता स्तुति खंड से ली गई है जिसमे महाकवि तुलसीदास सीता को माँ कहकर संबोधित करते हुए कहते है कि हे माँ कभी उचित अवसर पा के आप प्रभु से कोई कारुणिक प्रसंग छेड़ कर मेरी भी याद प्रभु को दिला देना।

दीन, सब अंगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ।।

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कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका के सीता स्तुति खंड से ली गई है जिसमें महाकवि तुलसीदास सीता को माँ कहकर संबोधित करते हए कहते है कि हे माँ प्रभू को कहना कि आपकी दासी का दास बहत ही दीन दशा में हैं। उसके अंग भी अब ठीक से काम नहीं कर रहे है। वह बहत दुर्बल है तथा स्वच्छ भी नहीं रहता। वह पूर्णतः पापों में लिप्त है और आपके नाम का स्मरण करता हुआ किसी प्रकार से अपनी उदर पूर्ति करता है।

बझिहैं “सो है कौन” कहिबी नाम दसा जनाइ।
सुनत रामकृपालु के मेरी बिगारिऔ बनि जाइ।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका के सीता स्तुति खंड से ली गई है जिसमें महाकवि तुलसीदास सीता को माँ कहकर संबोधित करते हए कहते है कि हे माँ जब आप मेरी बात प्रभु से करेंगी तो वो पूछेंगे कि आप किसकी बात कर रही है। आप प्रभू को मेरा नाम और मेरी दशा बता देना क्योंकि अगर मेरी स्थिति प्रभू को पता चल गई तो मेरे बिगड़े हुए काम भी बन जाएंगे।

जानकी जगजननि जन की किए बचन-सहाइ।
तरै तुलसीदास भव तव-नाथ-गुन-गन गाइ।।

(2)

दवार हौं भोर ही को आज।
रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ।।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका से ली गई है जिसमे महाकवि तुलसीदास अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हए कहते है कि हे प्रभ ! मैं आपके द्वार पर भोर से(सुबह से) ही बैठा हूँ और भीख मांगने वाले की तरह रिरिहा(गिरगिड़ा) रहा हूँ । हे प्रभु ! मुझे आपसे बहत कुछ नहीं चाहिए मैं आपकी कृपा का एक कौर(निवाला) ही मांग रहा हूँ।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका के सीता स्तुति खंड से ली गई है जिसमें महाकवि तुलसीदास सीता को माँ कहकर संबोधित करते हए कहते है कि हे माँ ! वैसे तो आप पूरे संसार की माँ है। आप अपनी कृपा पूरे संसार पर बरसाती है लेकिन इसके बावजूद अगर आप मेरी सहायता करेंगी तो मैं आपके नाथ का गुण-गान करके भवसागर को पार कर जाऊंगा।

कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभांति कुसाजु।
नीच जन, मन ऊंच, जैसी कोढ़ में की खाजु।।

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प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका से ली गई है जिसमें महाकवि तुलसीदास अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हए कहते है कि हे प्रभू ! इस कलयुग मे भयंकर अकाल पड़ा है और जो भी मोक्ष को प्राप्त करने का मार्ग है वो पापों से भरा हुआ है। प्रत्येक चीज मे दुर्व्यस्थता ही दिखाई पड़ रही है । हे प्रभु मैं एक नीच जीव हैं जिसकी अभिलाषाएं ऊंची है जो मुझे उसी प्रकार कष्ट देती है जैसे कोंढ़ में खाज दुख दिया करती है। अतः हे प्रभु मेरी विनती स्वीकार करें और मुझे अपनी कृपा का मात्र एक निवाला प्रदान करें।

हहरि हिय में सदय बूझयो जाइ साधु-समाजु।
मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ, तिन्ह कहयो कोसलराजु।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका से ली गई है जिसमे महाकवि तुलसीदास अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हए कहते है कि हे प्रभु ! हृदय में अत्यंत पीड़ा के साथ मैंने दयाशील साधू समाज से यह बात पूछा कि क्या मेरे जैसे पापी, दरिद्र के लिए कोई शरण है और उन्होने कृपा के सागर श्रीराम का नाम बताया।

दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाज ।
दानि दसरथरायके, तू बानइत सिरताजु।।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका से ली गई है जिसमे महाकवि तुलसीदास अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हए कहते है कि हे कृपासिंधु ! आपके अतिरिक्त कौन मेरी दीनता और दरिद्रता को दूर कर सकता है। हे दशरथ पुत्र श्रीराम ! आपके द्वारा ही मेरी बात बन सकती है।

जनमको भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु।
पेट भरि तलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु।।

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प्रस्तुत पंक्तियाँ विनय पत्रिका से ली गई है जिसमे महाकवि तुलसीदास अपनी दीन-हीन अवस्था का वर्णन करते हुए कहते है कि हे कृपासिन्धु ! हे गरीबों का दुख दूर करने वाले मैं जन्म से ही भूखा भिखारी हैं और आप दीनों के नाथ है। तुलसी जैसा भूखा भक्त आपके द्वार पर बैठा है मुझे अपनी भक्तिरूपी पिलाकर मेरे ज्ञानरूपी भूख को शांत करें।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी शिक्षा | Shiksha Class 12 Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी दिगंत भाग 2 के गद्य भाग के पाठ 13 ‘शिक्षा (Shiksha Class 12 Hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bihar Board Class 12 Hindi Chapter 13 शिक्षा

लेखक- जे. कृष्णमूर्ति

लेखक परिचय
जन्‍म- 12 मई 1895 मृत्‍यु- 17 फरवरी 1986
जन्‍म स्‍थान- मदनपल्‍ली, चित्तूर, आंध्र प्रदेश।
पूरा नाम- जिद्दू कृष्‍णमूर्ति।

माता-पिता : संजीवम्‍मा एवं नारायणा जिद्दू।
बचपन- दस वर्ष की अवस्‍था में ही माँ की मृत्‍यु। स्‍कूलों में शिक्षकों और घर पर पिता के द्वारा बहुत पीटे गए। बचपन से ही विलक्षण मानसिक अनुभव।
कृतियाँ- द फर्स्‍ट एंड लास्‍ट फ्रीडम, द ऑनली रिवॉल्‍यूशन और कृष्‍णमूर्तिज नोट बुक आदि।

Shiksha Class 12 Hindi Explanation

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ जे. कृष्णमूर्ति का एक संभाषण है। वह प्रायः लिखते नहीं थे। वे बोलते थे, संभाषण करते थे, प्रश्नकर्ताओं का उत्तर देते थे।

इस पाठ में उसने शिक्षा के अर्थ को बताया है। लेखक कहते हैं कि शिक्षा का अर्थ कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेना और गणित, रसायणशास्त्र अथवा अन्य किसी विषय में प्रवीणता प्राप्त कर लेना नहीं है, बल्कि जीवन को अच्छी तरह से समझना ही शिक्षा है।

शिक्षा का कार्य है कि वह संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया को समझने में हमारी सहायता करें, न कि कुछ व्यवसाय या ऊँची नौकरी के योग्य बनाए।

लेखक कहते हैं कि बच्चों को हमेशा ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। अधिकांश व्यक्ति त्यों-ज्यों बड़ा होते जाते हैं, त्यों-त्यों ज्यादा भयभीत होते जाते हैं, हम सब जीवन से भयभीत रहते हैं, नौकरी छूटने से, परंपराओं से और इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी, पत्नी या पति क्या कहेंगे, हम मृत्यु से भयभीत रहते हैं।

हम बचपन से ऐसे वातावरण में रहें जहाँ स्वतंत्रता हो- ऐसे कार्य की स्वतंत्रता जहाँ आप जीवन की संपर्ण प्रक्रिया को समझ सकें। जीवन की ऐश्वर्य की, इसकी अनंत गहराई और इसके अद्भुत सौंदर्य की धन्यता को तभी महसुस कर सकेंगे जब आप प्रत्येक वस्तु के खिलाफ विद्रोह करेंगे-संगठित धर्म के खिला, परंपरा के खिलाफ और इस सड़े हुए समाज के खिलाफ ताकि आप एक मानव की भाँति अपने लिए सत्य की खेज कर सकें।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

जिंदगी का अर्थ है अपने लिए सत्य की खोज और यह तभी संभव है जब स्वतंत्रता हो। आज पूरा विश्व अंतहीन युद्धों में जकड़ा हुआ है। यह दुनिया वकीलों, सिपाहीयों और सैनिकों की दुनिया है। यह उन महत्वाकांक्षी स्त्री-पुरूषों की दुनिया है जो प्रतिष्ठा के पीछे दौड़ रहे हैं और इसे पाने के लिए एक दूसरे के साथ संघर्षरत है। प्रत्येक मनुष्य किसी-न-किसी के विरोध में खड़ा है।

कवि कहते हैं कि इस सड़े हुए समाज के ढाँचे के बदलने के लिए प्रत्येक मनुष्य को स्वतंत्रतापूर्वक सत्य की खोज करना चाहिए नहीं तो हम नष्ट हो जाऐंगें। बच्चों में ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे एक नूतन भविष्य का निर्माण हो सके।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

लेखक कहते हैं कि हम अपना संपूर्ण जीवन सीखते हैं। तब हमारे लिए कोई गुरू नहीं रहता है। प्रत्येक वस्तु हमको कुछ-न-कुछ सिखाती है-एक सुखी पत्ता, एक उड़ती हुई चिड़िया, एक खुशबु, एक आँसु, एक धनी, वे गरीब जो चिल्ला रहे हैं, एक महिला की मुस्कुराहट, किसी का अहंकार। हम प्रत्येक वस्तु से सिखते हैं, उस समय मेरा कोई मार्गदर्शक नहीं, कोई दार्शनिक नहीं, कोई गुरू नहीं होता है। तब मेरा जीवन स्वयं गुरू है और हम सतत सिखते हैं।

अंत में, लेखक कहते हैं कि हमें ऐसे कार्य करना चाहिए जिससे सचमुच प्रेम हो क्योंकि नूतन समाज के निमार्ण के लिए एकमात्र मार्ग है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी तिरिछ | Tirichh class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ बारह
‘तिरिछ (Tirichh class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

tirichh
Bseb Class 12th Hindi Chapter 12 तिरिछ

लेखक- उदय प्रकाश
लेखक परिचय
जन्‍म- 1 जनवरी 1952
जन्‍म स्‍थान : सीतापुर, अनूपपुर, मध्‍य प्रदेश

माता-पिता : बी. एससी. एम.ए. (हिंदी), सागर विश्‍वविद्यालय, सागर, मध्‍य प्रदेश।
कृतियाँ- दरियाई घोड़ा, तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्‍कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा-परेबा, सुनो कारीगर (कविता संग्रह), ईश्‍वर की आँख। (निबंध)

कड़‍बक कविता का अर्थ

लेखक उदय प्रकाश अनेक धारावाहिकों और टी.वी. फिल्‍मों के स्क्रिप्‍ट लिखे।

तिरिछ क्या है ?

यह एक जहरीला छिपकली की एक प्रजाती है। जिसे काटने पर मनुष्य का बचना नामुमकिन हो जाता है। जब उससे नजर मिलता है तब वह काटने के लिए दौड़ता है।

प्रस्तुत पाठ में कवि एक घटना की जिक्र करते हैं जिसका संबंध लेखक के पिताजी से है। लेखक के सपने और शहर से भी है। शहर के प्रति जो एक जन्मजात भय होता है, उससे भी है।

उस समय इनकी पिता की उम्र 55 साल था। दुबला शरीर। बाल बिल्कुल सफेद जैसे सिर पर सुखी रूई रख दी गई हो। दुनिया उनको जानती थी और उन्हें सम्मान करती थी। कवि को उनके संतान होने का गर्व था।

साल में एकाध बार लेखक को उनके पिताजी टहलाने बाहर ले जाते थे। चलने से पहले वह तंबाकू मुँह में भर लेते थे। तंबाकू के कारण वे कुछ बोल नहीं पाते थे। वे चुप रहते थे।

मेरी और माँ की, दोनों की पूरी कोशिश रहती कि पिजाजी अपनी दुनिया में सुख-चैन से रहें वह दुनिया हमारे लिए बहुत रहस्यपूर्ण थी, लेकिन हमारे घर की और हमारे जीवन की बहुत सी समस्याओं का अंत पिताजी रहतु हुए करते थे।

लेखक अपने पिता पर गर्व करते थे, प्यार करते थे, उनसे डरते थे और उनके होने का अहसास ऐसा थ जैसे हम किसी किले में रह रहे हों।

पिताजी एक मजबूत किला थे। उनके परकोटे पर हम सब कुछ भूलकर खेलते थे, दौड़ते थे। और, रात में खुब  गहरी नींद मुझे आती थी।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

लेकिन उस दिन, शाम को, जब पिताजी बाहर से टहलकर आए तो उनके टखने में पट़टी बँधी थी। थोड़ी देर में गाँव के कई लोग वहाँ आ गए। पता चला कि पिताजी को जंगल में तिरिछ (विषखापर, जहरीला लिजार्ड) ने काट लिया है।

लेखक कहते हैं कि एक बार मैंने भी तिरिछ को देखा है जब वह तालाब के किनारे दोपहर में चट्टानों की दरार से निकलकर वह पानी पीने के लिए तालाब की ओर जा रहा था।

लेखक के साथ थानू था। मोनु के लेखक को बताया कि तिरिछ काले नाग से अधिक खतरनाक होता है। उसी ने बताया कि साँप के ऊपर जब पैर पड़ता है या उसे जब परेशान किया जाता है तब वह काटता है। लेकिन तिरिछ तो नजर मिलते ही दौड़ता है और पिछे पड़ जाता है। थानू ने बताया कि जब तिरिछ पीछे पड़े तो सीधे नहीं भागना चाहिए। टेढ़ा-मेढ़ा चक्कर काटते हुए, गोल-मोल भागना चाहिए।

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जब आदमी भागता है तो जमीन पर वह सिर्फ अपने पैरों के निशान ही नहीं छोड़ता, बल्कि साथ-साथ वहाँ की धूल में, अपनी गंध भी छोड़ जाता है। तिरिछ इसी गंध के सहारे दौड़ता है। थानू ने बताया कि तिरिछ को चकमा देने के लिए आदमी को यह करना चाहिए कि पहले तो वह बिलकुल पास-पास कदम रखकर, जल्दी-जल्दी कुछ दूर दौड़े फिर चार-पाँच बार खूब लंबी-लंबी छलाँग दे। तिरिछ सूँघता हुआ दौड़ता आएगा, जहाँ पास-पास पैर के निशान होंगे, वहाँ उसकी रफ्तार खूब तेज हो जाएगी-और जहाँ से आदमी ने छलाँग मारी होगी, वहाँ आकर उलझन में पड़ जाएगा। वह इधर-उधर तब तक भटकता रहेगा जब तक उसे अगले पैर का निशान और उसमें बसी गंध नहीं मिल जाती।

लेखक को तिरिछ के बारे में और दो बातें पता थी। एक तो यह कि जैसी ही वह आदमी को काटता है वैसे ही वहाँ से भागकर पेशाब करता है और उस पेशाब में लोट जाता है। अगर तिरिछ ऐसा कर लिया तो आदमी बच नहीं सकता। अगर उसे बचना है तो तिरिछ के पेशाब करके लोटने से पहले ही खुद को किसी नदी, कुएँ या तालाब में डुबकी लगा लेनी चाहिए या फिर तिरिछ को ऐसा करने से पहले ही मार देना चाहिए।

दूसरी बात है कि तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है, जब उससे नजर टकरा जाए। अगर तिरिछ को देखो तो कभी आँख मत मिलाओ।

लेखक कहते हैं कि मैं तमाम बच्चों की तरह उस समय तिरिछ से बहुत डरता था। मेरे सपने में दो ही पात्र थे-एक हाथी और दूसरा तिरिछ। हाथी तो फिर भी दौड़ता-दौड़ता थक जाता था और मैं बच जाता था लेकिन तिरिछ कहीं भी मिल जाता है। इसके लिए कोई निश्चित स्थान नहीं था। कवि सपने में उससे बचने की कोशिश करते जब बच नहीं पाते तो जोरों से चिखते, चिल्लाते, रोने लगते। पिताजी को, थानू को या माँ को पूकारता और फिर जान जाता कि यह सपना है।

लेखक की माँ बतलाती कि उन्हें सपने में बोलने और चिखने की आदत है। कई बार लेखक को उनकी माँ ने निंद में रोते हुए देखा था।

लेखक को शक होता है कि पिताजीको उसी तिरिछ ने काटा था, जिसे मैं पहचानता था और जो मेरे सपने में आता था।

लेकिन एक अच्छी बात यह हुई की जैसे ही वह तिरिछ पिताजी को काटकर भागा, पिताजी ने उसका पीछा करके उसे मार डाला था। तय था कि अगर वे फौरन उसे नहीं मार पाते तो वह पेशाब करके उसमें जरूर लोट जाता। फिर पिताजी किसी हाल में नहीं बचते। कवि निश्चिंत थे कि पिताजी को कुछ नहीं होगा तथा इस बात से भी खुश थे कि जो मेरे सपने में आगर मुझे परेशान करता था, उसे पिताजी ने मार दिया है। अब मैं बिना किसी डर के सपने में सीटी बजाता घूम सकता था।

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उस रात देर तक लेखक के घर में भीड़ थी। झाड़फूँक चलती रही और जख्म को काटकर खून भी बाहर निकाला गया तथा जख्म पर दवा भी चढ़ाया गया।

अगली सुबह पिताजी को शहर जाना था। अदालत में पेशी थी। उनके नाम सम्मन आया था। हमारे गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर निकलनेवाली सड़क से शहर के लिए बसें जाती थी। उनकी संख्या दिन भर में दो से तीन ही थी। पिताजी जैसे ही सड़क तक पहुँचे, शहर जानेवाला पास के गाँवका एक टै्रक्टर मिल गया। टै्रक्टर में बैठे हुए लोग पहचान के थे।

रास्ते में तिरिछ वाली बात चली। पिताजी ने अपना टखना उन लोगों को दिखाया। उसी में बैठे पंडित राम औतार ने बताया कि तिरिछ का जहर 24 घंटे बाद असर करती है। इसलिए अभी पिताजी को निश्चिंत नहीं होना चाहिए। कुछ ने कहा कि ठिक किया कि उसे मार दिया लेकिन उसी वक्त उसे जला भी देना चाहिए। उनलोगों का कहना था कि बहुत से कीड़े-मकोड़े रात में चंद्रमा की रोशनी में दुबारा जी उठते हैं। ट्रैक्टर के लोगों को शक था कि कहीं ऐसा न हो कि रात में जी उठने के बाद तिरिछ पेशाब करके उसमें लोट गया हो।

अगर पिताजी उस तिरिछ की लाश को जलाने के लिए ट्रैक्टर से उतरकर, वहीं से, गाँव लौट आतेतो गैर-जमानती वारंट के तहत वे गिरफ्तार कर लिए जाते और हमारा घर हमसे छिन जाता। अदालत हमारे खिलाफ हो जाती।

लेकिन पंडित राम और एक वैद्य भी थे। उसने सुझाया कि एक तरीका है, जिससे वह पेशी में हाजिर भी हो सकते हैं ओर तिरिछ की जहर से बच भी सकते हैं। उसने कहा कि विष ही विष की औषधी होता है। अगर धतूरे के बीज कहीं मिल जाएँ तो वह तिरिछ के जहर की काट तैयार कर सकते हैं।

अगले गाँव सुलतानपुर में ट्रैक्टर रोका गया तथा एक खेत से धतूरे के बीजों को पीसकर उन्हें पिलाया गया। लेखक के पिजाती को चक्कर आने लगा तथा गला सुखने लगा।

ट्रैक्टर ने पिताजी को दस बजकर पाँच-सात मिनट के आस-पास शहर छोड़ा। लेखक के पिताजी को लगातार गला सुख रहा था। रास्ते में एक होटल पड़ता था वहाँ वह पानी नहीं पीये क्योंकि होटल वाले ने पिछली बार उन्हें गाली दिया था। इसलिए वह गाँव के एक लड़का रमेश दŸा के पास गए, जो भूमि विकास सहकारी बैंक में क्लर्क था। कवि कहते हैं कि हो सकता है कि पिताजी के दिमाग में केवल बैंक रहा होगा, इसलिए वह अचानक स्टेट बैंक देखकर रूक गए होंगें। पिताजी ने सोचा होगा कि उससे पानी भी माँग लेंगें और अदालत जाने का रास्ता भी पूछ लेंगें।

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पिताजी ने सीधा कैशियर के पास पहुँच गए। उनका चेहरा धतुरा के काढा पीने के कारण डरावना हो गया था। बैंक के कैशियर डर कर चिल्लाया उसी बीच सुरक्षा गार्ड आ गए तथा पिताजी को मारते हुए बाहर निकले तथा उनके पैसे और अदालत के कागज छीन लिए। इसलिए पिताजी ने सोचा कि अब अदालत जाकर क्या होगा। अतः उसने शहर से बाहर निकलने का सोचा।

लगभग सवा एक बजे वह पुलिस थाना पहुँचे थे जो शहर के बाहरी छोर पर पड़ता था। बैंक में गार्ड ने उनका कपड़ा फाड़ दिया था। उनके शरीर पर कमीज नहीं थी, पैंट फटी हुई थी।

पिताजी थाने के एस. एच. ओ. के पास पहुँचे तो उसने पागल समझकर सिपाही से कहकर बाहर फेंकवा दिया। सिपाही ने उन्हें घसीटते हुए बाहर फेंका। बाद में एस. एच. ओ. को कहना था कि हम जानते वह रामस्थरथ प्रसाद भूतपूर्व हेडमास्टर थे तो अपने थाने में दो चार घंटा जरूर बैठा लेते।

सवा दो बजे पिताजी को सबसे संपन्न कोलोनी इतवारी कोलोनी में घसीटते हुए देखे गए। लड़के पागल और बदमास समझकर उन्हें तंग कर रहे थे। इतवारी कोलोनी के लड़कों का कुछ झुंड उनके पीछे पड़ गया था। पिताजी ने एक गलती यह की थी कि उसने एक ढेला उठाकर भीड़ पर चला दी थी जिससे एक 7-8 साल के लड़के को लग गई थी। उसको कई टाँके भी लगे थे। तब से भीड़ और उग्र हो गई थी तथा उनको पत्थरों से मार रही थी।

ढाबा के सामने ही पिताजी को झुंड मार रही थी। ढाबा का मालिक सतनाम सिंह ने पंचनामा और अदालत से बचने के लिए जल्दी ही अपना ढाबा बन्द करके फिल्म देखने चला गया।

साम लगभग छः बजे थे जब सिविल लाइंस की सड़क की पटरियों पर एक कतार में बनी मोचियों की दुकानों में से एक मोची गणेशवा की गुमटी में पिताजी ने अपना सर घुसेड़ा। उस समय तक उनके शरीर पर चड्डी भी नहीं रही थी, वे घुटनों के बल किसी चौपाये की तरह रेंग रहे थे। शरीर पर कालिख और कीचड़ लगी हुई थी और जगह-जगह चोटें आई थी। गणेशवा लेखक के गाँव के बगल का मोची था। उसने बताया कि मैं बहुत डर गया था और मास्टर साबह को पहचान ही नहीं पाया। उनका चेहरा डरावना हो गया था और चिन्हाई में नहीं आता था। मैं डर कर गुमटी से बाहर निकल आया और शोर मचाने लगा।

लोगों ने जब गणेशवा की गुमटी के अंदर झाँका तो गुमटी के अंद , उसके सबसे अंतरे-कोने में, टूटे-फूटे जूतों, चमड़ों के टुकड़ों, रबर और चिथड़ों के बीच पिताजी दुबके हुए थे। उनकी साँसे थोड़ी-थोड़ी चल रही थीं। उन्हें खींच कर बाहर निकाला गया तभी गणेशवा ने उन्हें पहचान लिया। गणेशवा ने उनके कान में कुछ आवाज लगाई लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहे थे। बहुत देर बात उसने ‘राम स्वारथ प्रसाद‘ और ‘बकेली‘ जैसा कुछ कहा था। फिर चुप हो गए थे।

पिताजी की मृत्यु सवा छह बजे के आसपास तारीख 17 मई, 1972 को हुई थी।

पोस्टमार्टम में पता चला कि उनकी हड्डियों में कई जगह फ्रैक्चर था, दाईं आँख पूरी तरह फूट चूकी थी, कॉलर बोन टूटा हुआ था। उनकी मृत्यु मानसिक सदमे और अधिक रक्तस्त्राव के कारण हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार उनका अमाशय खाली था, पेट में कुछ नहीं था। इसका मतलब यही हुआ कि धतूरे के बीजों का काढ़ा उल्टियों द्वारा पहले ही निकल चुका था।

लेखक को तिरिछ का सपना अब नहीं आता है। वह इस सवाल को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं कि आखिककार अब तिरिछ का सपना मुझे क्यों नहीं आता है।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

कक्षा 12 हिन्‍दी हँसते हुए मेरा अकेलापन | Haste Huwe Mera Akelapan class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ ग्यारह ‘हँसते हुए मेरा अकेलापन (Haste Huwe Mera Akelapan class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

haste huwe mera akelapan
Bseb Class 12th Hindi Chapter 11 हँसते हुए मेरा अकेलापन

लेकख- मलयज
लेखक परिचय
जन्‍म- 1935 मृत्‍यु 26 अप्रैल 1982
जन्‍म स्‍थान- महूई, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
मूलनाम- भरतजी श्रीवास्‍तव।
माता- प्रभावती और पिता- त्रिलोकी नाथ वर्मा।
शिक्षा- एम. ए. (अंग्रेजी), इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय, उत्तर प्रदेश।

विशेष: छात्र जीवन में क्षयरोग से ग्रसित। ऑपरेशन में एक फेफड़ा काटकर निकालना पड़ा। शेष जीवन में दुर्बल स्‍वास्‍थ्‍य और बार-बार अस्‍वस्‍थता के कारण दवाओं के सहारे जीते रहे।

कृतियाँ- कविता : जख्‍म के धूल, अपने होने को अप्रकाशित करता हुआ।

आलोचना : कविता से साक्षात्‍कार, संवाद और एकालाप।

सर्जनात्‍मक गद्य : हँसते हुए मेरा अकेलापन।

Haste Huwe Mera Akelapan class 12 hindi

हँसते हुए मेरा अकेलापन

पाठ परिचय- प्रस्‍तुत पाठ हँसते हुए मेरा अकेलापन एक डायरी है, जिसे मलयज के द्वारा लिखा गया है। मलयज अत्यंत आत्‍मसजग किस्‍म के बौध्दिक व्‍यक्ति थे। डायरी लिखना मलयज के लिए जीवन जीने के कर्म के जैसा था। डायरी की शुरूआत 15 जनवरी 1951 से शुरू होती है, जब उनकी आयु केवल 16 वर्ष की थी। डायरी लिखने का यह सिलसिला 9 अप्रैल 1982 तक चलता रहा, जब उन्‍होंने अंतिम साँस ली। अर्थात 47 साल तक के जीवन में 32 साल तक मलयज ने डायरी लिखी है। डायरी के ये पृष्‍ठ कवि-आलोचक मलयज के समय की उथल-पुथल और उनके निजी जीवन की तकलीफों-बेचैनियों के साथ एक गहरा रिश्‍ता बनाते हैं। इस डायरी में एक औसत भारतीय लेखक के परिवेश को आप उसकी समस्‍त जटिलताओं में देख सकते हैं।

मलयज ने डायरी के माध्‍यम से तारिख के माध्‍यम से विभिन्‍न जगहों का यर्थाथ चित्रण किया है। लेखक ने तारिख के साथ अपने जीवन के सभी घटनाओं का चित्रण किया है। यह पाठ में लेखक की डेढ़ हजार पृष्‍ठों में फैली हुई डायरीयों की एक छोटी सी झलक है।

रानीखेत

14 जुलाई 56

Haste Huwe Mera Akelapan class 12 hindi

कड़‍बक कविता का अर्थ

सुबह से ही पेड़ काटे जा रहे हैं। मिलिट्री की छावनी के लिए ईंधन-पूरे सीजन और आगे आनेवाले जाड़े के लिए भी।

मौसम एकदम ठंडा हो गया है। बूँदा-बाँदी और हवा। एक कलाकार के लिए यह यह जरूरी है कि उसमें ‘आग‘ हो और और वह खुद ठंडा हो।

18 जून 57

एक खेत की मेड़पर बैठी कौआ को देखकर कवि कहते हैं कि-

उम्र की फसल पककर तैयार-सोपानों का सुहाना रंग अब जर्द पड़ चला है। एक मधुर आशापूर्ण फल जिसने अनुभव की तिताई के छिलके उतार फेंके हैं।

4 जुलाई 62: कौसानी

आज भी कोई चिट्ठी नहीं। तबियत किस कदर बेजार हो उठी है। दोपहर तक आशा रहती है कि कोई चिट्ठी आएगी पर भारी-भारी सी दोपहर बीत जाती है और कुछ नहीं होता। अजब सी बेचैनी मन में होती है।

दिल्ली 30 अगस्त 76

Haste Huwe Mera Akelapan class 12 hindi

सेब बेचती लड़की उसकी कलाइयों में इतना जोर न था कि वह चाकू से सेब की एक फाँक काटकर ग्राहक को चखाती। दो-चार बार उसने कोशिश की, फिर एक खिसियाई हुई हँसी हँसकर चाकू मेरे हाथ में थमा दिया और कहा खुद ही चख लो मिठे हैं सेब। सेब तो वैसे ही मिठे थे-उनका रेग और खुशबू देखकर उनकी किस्म पहले ही जान चुका था।

9 दिसम्बर 78

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

जो कुछ लिखता हूँ वह सबका सब रचना नहीं होती । पृष्ठ तो और भी नहीं। जितना कुछ मैं भेगता हूँ उस सबमें रचना के बीज नहीं होते।

25 जुलाई 80

इधर-पता नहीं कितने सालों से-मेरो जीवन का केंद्रीय अनुभव लगता है कि डर हैं मैं भीतर से बेतरह डरा हुआ व्यक्ति हुँ। इस डर के कई रूप हैं।

बुरी-बुरी बीमारीयों का डर-घर का जब भी कोई आदमी बीमार पड़ता है मुझे डर लगता है कि कहीं उसे कोई भयंकर बीमारी न लग गई हो और तब मैं क्या करूँगा-से किस अस्पताल में ले जाऊँगा, इलाज की कैसे व्यवस्था करूँगा।

इस डर से कितने-कितने घंटे मैंने तनाव में गुजारे हैं- एक पŸो कि तरह काँपते हुए, होठों में प्राथनाएँ बुदबुदाते हुए कि किसी तरह संकट का यह क्षण कटे।

मन इतना कमजोर हो गया है कि उसमें डर बड़ी आसानी से घुस जाता है।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

कक्षा 12 हिन्‍दी जूठन | Joothan class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ दस ‘जूठन (Joothan class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

joothan
Bseb Class 12th Hindi Chapter 10. जूठन

 लेखक-ओम प्रकाश नरायण

लेखक परिचय
जन्म- 30 जून 1950
जन्म स्थान- बरला मुजफरनगर उत्तरप्रदेश
माता-पिता – मकुंदी देवी और छोटनलाल
शिक्षा- अक्षरज्ञान का प्रारम्भ मास्टर सेवक राम मसीही के खुले, बिना कमरे बिना टाट-चटाईवाले स्कूल से |
उसके बाद बेसिक प्राथमिक स्कूल से दाखिला |
11वीं की परीक्षा बरला इंटर कॉलेज, बरला से उत्तीर्ण । लेकिन 12वीं की पढ़ाई में अनुतीर्ण।

Joothan class 12 hindi

कड़‍बक कविता का अर्थ

पाठ परिचय

जूठन नामक आत्मकथा हिन्दी में दलित आंदोलन से जुड़े महत्वपूर्ण रचनाकार

ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रेरणात्मक रचना है। वास्तविकता का माटी और पानी सरीखा रंग ही इसके रचनात्मक गद्य की विशेषता है। लेखक दलित समाज से है। स्कूल के हेडमास्टर ने उनसे दो दिन तक पूरे स्कूल में झाडू लगवाया। तीसरे दिन वह चुपचाप कक्षा में बैठ गया। स्कूल के हेडमास्टर ने उनकी काफी पिटाई की तथा फिर से झाडू लगाने के लिए भेजा। वह रोते हुए झाडू लगाने लगा। संयोगवश लेखक के पिताजी वहाँ आ गये। वे सारी कहानी सुनने के बाद हेडमास्टर को खड़ी-खोटी सुनाने लगे।

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लेखक के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। लेखक की माँ, बहने भाई और भाभी दूसरे के घरों में उनके जानवरों के देखभाल का काम करते थे। काम बड़ा ही तकलीफदेह था किन्तु काम के बदले अनाज बड़ा ही कम। शादी-व्याह के अवसर पर मेहमानों के पत्तलों के जूठन ही नसीब होते थे। पत्तलों के जूठन से पूरियों को सुखाकर रखना तथा सर्दियों में उन्हे पानी में भींगोकर नमक-मिर्च मिलाकर खाना यही नसीब होता था। लेखक हमेशा सोचा करता था कि उसे अच्छा खाना क्यों नहीं मिलता है ?

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

पिछली वर्ष सुखदेव सिंह त्यागी का पोता सुरेन्द्र सिंह किसी इंटरव्यू के सिलसिले शहर आया था तो उनके घर रात में रुका और खाना खाया । खाने की तारीफ भी की। तारीफ सुनकर पत्नी खुश हुई लेकिन लेखक के बचपन की यादें ताजी हो गई। सुखदेव सिंह त्यागी की लड़की की शादी थी। शादी से दस-बारह दिन पहले से ही पूरी तैयारियां चल रही थी। बारात आई। बारात खाना खा रही थी। लेखक की माँ एक टोकरी लिए दरवाजे के बाहर बैठी थी। साथ में लेखक और छोटी बहन भी थी। उस समय सुरेन्द्र पैदा भी नहीं हुआ था यह तब की बात है। लेखक उसकी माँ और बहन इस उम्मीद में बैठे थे कि उन्हे भी खाने को मिलेगा किन्तु मिठाई और पकवान की जगह डांट मिली। उन्हें वहाँ से भगाया गया।

लेखक का अगला संस्मरण से भरा है। लेखक उस समय नौवीं कक्षा में पढ़ता था। घर की आर्थिक स्थिति दयनीय थी। पशुओं के मरने पर उठाकर ले जाना तथा उनके चमड़े उतारना लेखक के परिवार का कार्य था । एक दिन गाँव में एक बैल मर गया। लेखक के पिताजी घर पर नहीं थे। लेखक की माँ ने लेखक को चाचा जी के साथ इस काम के लिए भेजा। चाचा बैल का खाल उतारने लगे पर लेखक को छुरी चलाने का भी ढंग नहीं था । एक छुरी चाचा के पास थी। चाचा ने दूसरी छुरी लेखक को थमा दी । लेखक के हाथ कांपने लगे। चाचा ने छुरी चलाने का ढंग सिखाया । लेखक एक अजीब संकट में फंसा हुआ था। जिन चीजों को वह उतारना चाहता था हालात उसे उसी दलदल में घसीटे जा रहे थे। चाचा के साथ तपती दुपहरी की यह यातना आज भी जख्मों की तरह तन पर ताजा है।

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लेखक इस घटना से पढ़ाई के प्रति संकल्पित हो गया। वह ध्यान लगाकर पढ़ाई करने लगा। जीवन में सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचकर अपनी एक खास ख्याति अर्जित की।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

कक्षा 12 हिन्‍दी प्रगीत और समाज | Prageet or Samaj class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ नौ ‘प्रगीत और समाज (Prageet or Samaj class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bseb Class 12th Hindi Chapter 9 प्रगीत और समाज

लेखक– नामवर सिंह

लेखक परिचय
जन्‍म- 28 जूलाई 1927
जन्‍म-स्‍थान : जीअनपुर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश।
माता- वागेश्‍वरी देवी, पिता- नागर सिंह (शिक्षक)
शिक्षा- प्राथमिक शिक्षा- उत्तर प्रदेश के आवाजापुर और कमालपुर गाँवों में, हीवेट क्षत्रिय स्‍कूल, बनारस से हाई स्‍कूल, उदय प्रताप कॉलेज बनारस से इंटर, बी.ए. और एम.ए. बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय से किया।

Prageet or Samaj class 12 hindi

कड़‍बक कविता का अर्थ

सम्‍मान- 1971 में ‘कविता के नए प्रतिमान’ पर साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार।

कृतियाँ- दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद, कहना न होगा, पृथ्‍वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, कविता के नए प्रतिमान।

प्रस्तुत निबंध में नामवर सिंह पर गीत के उदय के ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों की पड़ताल करते हैं। कविता संबंधी प्रश्न कविता पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है । प्रगीत काव्य समाज शास्त्रीय विश्लेषण और सामाजिक व्याख्या के लिए सबसे कठिन चुनौती है । लेकिन प्रगीतधर्मी कविताएं सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है । स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य सिद्धांत के आदर्श भी प्रबंधकाव्य ही थें, क्योंकि प्रबंधकाव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है।

Prageet or Samaj class 12 hindi

मुक्तिबोध के कविताओं नई कविता के अंदर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिसकी  सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए व्यापक काव्य सिद्धांत की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं की आवश्यकता थी। लेकिन मुक्तिबोध ने केवल लंबी कविताएं ही नहीं लिखी बल्कि उनकी अनेक कविताएं छोटी भी है जो की कम सार्थक नहीं है। मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है । रचना विन्यास में वह कहीं नाट्यधर्मी है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाट्यकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। आत्मपरकता तथा भावमयता मुक्तिबोध का शक्ती है जो उनकी प्रत्येक कविता को गति और उर्जा प्रदान करती है।

विभिन्न कवियों द्वारा प्रगीतों का निर्माण यद्यपि हमारे साहित्य के मापदंड प्रबंधकाव्यों के आधार पर बने हैं। लेकिन यहां कविता का इतिहास मुख्यत: प्रगीत मुक्तको का है। कबीर , सूर , तुलसी , मीरा , रैदास आदि संतों ने प्राय: गेय काव्य ही लिखें । विद्यापति को इस हिन्‍दी का पहला कवि माना जाए तो हिंदी कविता का उदय ही गीत से हुआ, जिसका विकास आगे चलकर संतों और भक्‍तों की वाणी में हुआ।

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कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

समाजिकता पर आधारित काव्य अकेलेपन के बाद कुछ लोगों ने जनता की स्थिति को काव्य-जवार बनाया जिससे कविता नितांत सामाजिक हो गई। फिर कुछ ही समय बाद नयें कवियों ने कविता में हृदयगत स्थितियों का वर्णन करने लगे। इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब अनेक कवियों ने अपने हृदय का दरवाजा तोड़कर एकदम से बाहर निकल आए और व्यवस्था के विरोध के जुनून में उन्होंने ढ़ेर सारी सामाजिक कविताएं लिख डाली, लेकिन यह दौर जल्द ही समाप्त हो गया।

नई प्रगीतनात्मक का उभार युवा पीढ़ी के कवियों द्वारा हुआ और कविता के क्षेत्र में कुछ परिवर्तन हुए। आज कवि को अपने अंदर झांकने या बाहरी यथार्थ सामना करने में कोई हिचक नहीं है। उसकी नजर छोटी-छोटी स्थिति वस्तु आदि पर है। इसी प्रकार उसके अंदर छोटी-छोटी उठने वाली लहर को पकड़कर शब्दों में बांध लेने का उत्साह भी है। कवि और समाज के रिश्ते के बीच साधने का कोशिश कर रहा है। लेकिन यह रोमैंटिक गीतों को समाप्त करने या व्यक्तित्व कविता को बढ़ाने का प्रयास नहीं है। अपितु इन कविताओं से इस बात की पुष्टि हो जाती है की मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति है और कभी-कभी ठंडे स्वर का प्रभाव गर्म भी होता है। यह नए ढंग की प्रगीत के उभार का संकेत है !!!

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

कक्षा 12 हिन्‍दी सिपाही की माँ | Sipahi ki Maa class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ आठ ‘सिपाही की माँ (Sipahi ki Maa class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

sipahi ki maa
Bseb Class 12th Hindi Chapter 8 सिपाही की माँ

लेखक- मोहन राकेश
लेखक परिचय
जन्‍म- 8 जनवरी 1925 मृत्‍यु- 3 दिसंबर 1972

जन्‍म स्‍थान- जंडीवाली गली, अमृतसर, पंजाब
बचपन का नाम- मदन मोहन गुगलानी।
माता-पिता : बच्‍चन कौर और करमचंद गुगलानी।
शिक्षा- एम.ए.(संस्‍कृत) लाहौर। ओरिएंटल कॉलेज, जालंधर से एम.ए. (हिंदी)
वृति– दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में अध्‍यापन।
कृतियाँ- इंसान के खंडहर, नए बादल, जानवर और जानवर, एक और जिंदगी, फौलाद का आकाश, वारिस, आसाढ़ का एक दिन, न आनेवाला कल।

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कड़‍बक कविता का अर्थ

पाठ का सारांश

‘सिपाही की माँ’ शीर्षक एकांकी के एकांकीकार मोहन राकेश द्वारा लिखित “अंडे के छिलके तथा अन्य एकांकी” से ली गई है।  इस एकांकी में एक माँ (नाम-बिशनी) अपनी एकमात्र बेटी (नाम-मुन्नी) की शादी के लिए पैसे के लिए परेशान है। एकमात्र बेटा (नाम-मानक) कमाने गया है । लड़ाई में उसके मारे जाने का भी भय है । मोहन राकेश की इस मार्मिक रचना में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की एक ऐसी माँ-बेटी की कथावस्तु प्रस्तुत है जिनके घर का इकलौता लड़का सिपाही के रूप में द्वितीय विश्व युद्ध के मोर्चे पर बर्मा में लड़ने गया है । वह अपनी माँ का इकलौता बेटा और विवाह के लिए तैयार अपनी बहन का इकलौता भाई है । उसी पर घर की पूरी आशा टिकी हुई है । वह लड़ाई के मोर्चे से कमाकर लौटे तो बहन के हाथ पीले हो सकें अर्थात बहन की शादी हो सकेगी। माँ एक देहाती भोली स्त्री है, वह यह भी नहीं जानती कि बर्मा उसके गाँव से कितनी दूर है और लड़ाई कैसी और किनसे किसलिए हो रही है। उसका अंजाम ऐसा भी हो सकता है कि सब कुछ खत्म हो जाए ऐसा वह सोच भी नहीं सकती। लेकिन माँ को अपने बेटे के चिट्ठी का इन्तेजार दिन रात रहता है|

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कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

लेकिन माँ को बेटा का चिट्ठी भी प्राप्त नही होता है| सपने में बिशनी को मानक देखाई देता है| वह उससे बातचीत करती है| वह बुरी तरह घायल है और बताता है कि दुश्मन उसके पीछे लगा है| बिशनी उसे लेटने को कहती है पर वह पानी मांगता है| तभी वहां एक सिपाही आता है और वह उसे मरा हुआ बताता है| यह सुनकर बिशनी सहम जाती है लेकिन तभी मानक कहता है कि मैं मरा नहीं हूंवह सिपाही मानक को मारने की बात कहता है लेकिन बिशनी कहती है कि मैं इसकी मां हूं और इससे मरने नहीं दूंगी सिपाही मानक को वहशी तथा खूनी बताता है लेकिन बिशनी उसकी बात को नकार देती हैवह कहती है कि यह बुरी तरह घायल है और इसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है इसलिए तू इसे मारने का विचार त्याग दें जवाब में सिपाही कहता है कि अगर मैं इसे नहीं मारूंगा तो यह मुझे मार देगा बिशनी विश्वास दिलाती है की यह तुझे नहीं मारेगा तभी मानक खड़ा होता है और उस सिपाही को मारने की बात कहता है बिशनी उसे समझाती है लेकिन वह नहीं मानता है और उसकी बोटी-बोटी करने की बात कहता है| यह सुन बिशनी चिल्लाकर बैठती है| वह जोर-जोर से मानक ! मानक ! कहती है उसकी आवाज सुनकर मुन्नी आती है मां की स्थिति देखकर वह कहती है कि तुम रोज भैया के सपने देखती हो जब कि मैंने तुमसे कहा था कि भैया जल्दी आएंगे फिर वह अपने मां की गले लग जाती है बिशनी उसका माथा चूमकर उसे सो जाने को कहती है और मन ही मन कुछ गुनगुनाने लगती है

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था