14. पारिस्थितिक यंत्र | Paristhitik Yantra objective Biology chapter 14 Class 12th

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 12 जीव विज्ञान के पाठ चाैदह जीव एवं समष्टियाँ (Paristhitik Yantra objective) के महत्‍वपूर्ण ऑब्‍जेक्टिव प्रश्‍नों को पढ़ेंगे।

Paristhitik Yantra objective

14. पारिस्थितिक यंत्र

प्रश्‍न 1. पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह आहार श्रृंखलागत होता है :
(A) एकदिशीय
(B) द्विदिशीय
(C) बहुदिशीय
(D) निर्दशीय

Ans. (A)

प्रश्‍न 2. बाघ उपभोक्ता है :
(A) द्वितीय श्रेणी का
(B) प्रथम श्रेणी का
(C) तृतीय श्रेणी का
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B)

प्रश्‍न 3. तालाब द्वारा निरूपित पारिस्थितिक तंत्र हैं :
(A) लेन्टिक
(B) लोटिक
(C) जेरिक
(D) वेन्थिक

Ans. (A)

प्रश्‍न 4. समुद्र तल पर रहने वाले जन्तु कहलाते हैं :
(A) पेलाजिक
(B) लेण्टिक
(C) वेन्थिक
(D) लोटिक

Ans. (C)

प्रश्‍न 5. वायुमण्डलीय आर्द्रता को किससे मापा जाता है ?
(A) हाइग्रोमीटर
(B) ऑक्सेनोमीटर
(C) पोटोमीटर
(D) फोटोमीटर

Ans. (A)

प्रश्‍न 6. सल्फर का सबसे बड़ा संग्राहक है :
(A) वायुमण्डल
(B) चट्टानें
(C) महासागर
(D) झील

Ans. (B)

प्रश्‍न 7. पादपों में सर्वाधिक पाए जाने वाले तत्व है :
(A) नाइट्रोजन
(B) मैग्नीज
(C) आयरन
(D) कार्बन

Ans. (D)

प्रश्‍न 8. द्वितीयक नग्न क्षेत्र में अनुक्रमण कहलाता है :
(A) प्राइमोसीयर
(B) सबसीयर
(C) मरुक्रमक
(D) कार्बन

Ans. (B)

Paristhiti Yantra objective

प्रश्‍न 9. पारितन्त्र की दो वनस्पतियों के बीच का संक्रमण भाग कहलाता है :
(A) इकोटोन
(B) इकोक्लाइन
(C) इकोसिस्टम
(D) इकेसिस

Ans. (A)

प्रश्‍न 10. किसी पारितंत्र में सर्वाधिक विभिन्नतायुक्त जीव है
(A) उत्पादक
(B) अपघटक
(C) उपभोक्ता
(D) माँसाहारी

Ans. (B)

प्रश्‍न 11. जलीय पारितंत्र में ऊर्जा का पिरैमिड कैसा होता है ?
(A) हमेशा सीधा
(B) घण्टीनुमा
(C) हमेशा उल्टा
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A)

प्रश्‍न 12. एक पोषक स्तर से दूसरे पोषक स्तर पर स्थानान्तरित ऊर्जा है :
(A) 5%
(B) 10%
(C) 15%
(D) 20%

Ans. (B)

प्रश्‍न 13. एक पारिस्थितिक तंत्र में हरे पौधे हैं :
(A) उत्पादक
(B) उपभोक्ता
(C) अपघटक
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A)

प्रश्‍न 14. नये प्रजातियों के निर्माण का मुख्य कारक है :
(A) प्रतियोगिता
(B) उत्परिवर्तन
(C) विलगन
(D) निरन्तर विविधता

Ans. (C)

प्रश्‍न 15. निम्न में से कौन आहार श्रृंखला सही है ?
(A) घास, गेहूँ और आम
(B) घास, बकरी और शेर
(C) बकरी, गाय और घास
(D) घास, मछली और बकरी

Ans. (B)

प्रश्‍न 16. ‘पारिस्थितिक तंत्र’ शब्द के उपयोग का श्रेय दिया जाता है :
(A) गार्डनर को
(B) टॉनसेली को
(C) ओडम को
(D) वार्मिंग को

Ans. (B)

प्रश्‍न 17. द्वितीयक उत्पादकता से सम्बन्धित है:
(A) उत्पादक
(B) शाकाहारी
(C) माँसाहारी
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B)

प्रश्‍न 18. निम्न में से कौन कीटभक्षी पौधा है ?
(A) ड्रॉसेरा
(B) नेपेन्थीस
(C) ‘A’ और ‘B’ दोनों
(D) हाइड्रिला

Ans. (C)

प्रश्‍न 19. पारिस्थितिकी शब्द किसके द्वारा दिया गया ?
(A) लिनियस
(B) रेटर
(C) ओडम
(D) अरस्तू

Ans. (B)

Paristhitik Yantra objective

प्रश्‍न 20. पादप वृद्धि के लिए सबसे अच्छी मृदा है :
(A) कंकड़
(B) बलुई
(C) मृतिका
(D) दोमट

Ans. (D)

प्रश्‍न 21. मृदा के कण किस लक्षण को निर्धारित करते हैं ?
(A) संगठन
(B) जीव भार
(C) क्षेत्र क्षमता
(D) मृदा पौधें

Ans. (A)

प्रश्‍न 22. जल निमग्न पौधों में जल का विनिमय किसके द्वारा होता है ?
(A) रन्ध्र
(B) सामान्य सतह
(C) हाइडेथोड
(D) लेन्टीसेल

Ans. (B)

प्रश्‍न 23. जलनिमग्न जड़ युक्त जलोद्भिद है :
(A) यूटि कुलेरिया
(B) ट्रेपा
(C) निमफिया
(D) वेलिसनेरिया

Ans. (D)

24. जल धारण क्षमता इनमें से किसका गुण है ?
(A) मृदा का
(B) जल का
(C) पौधों का
(D) जन्तुओं का

Ans. (A)

प्रश्‍न 25. जिरोफाइट रखते हैं
(A) गहरी जड़ें
(B) छिपे हुए रध
(C) मोटी क्यूटिकल
(D) उपर्युक्त सभी

Ans. (D)

प्रश्‍न 26. खाद्य श्रृंखला के दौरान अधिकतम ऊर्जा संचित होती है :
(A) उत्पादक में
(B) शाकाहारी में
(C) अपघटक में
(D) माँसाहारी में

Ans. (A)

प्रश्‍न 27. पारिस्थितिकी पिरामिड सर्वप्रथम किसने प्रस्तावित किए ?
(A) चार्ल्स एल्टन ने
(B) आर. हीज ने
(C) आर. ए. लिण्डमैन ने
(D) जे. वी. लिविंग ने

Ans. (A)

प्रश्‍न 28. जलधारण क्षमता अधिकतम किसमें होती है ?
(A) क्ले में
(B) बालू में
(C) सिल्ट में
(D) इनमें से सभी में

Ans. (A)

Paristhitik Yantra objective

प्रश्‍न 29. फॉस्फोरस चक्र में अपक्षरण द्वारा उत्पन्न फॉस्फेट सर्वप्रथम उपलब्ध होती है :
(A) उत्पादकों को
(B) अपघटकों को
(C) उपभोक्ताओं को
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (A)

प्रश्‍न 30. निम्नलिखित में से कौन-सा पिरामिड कभी उल्टा नहीं होता :
(A) ऊर्जा का पिरामिड
(B) संख्या का पिरामिड
(C) जैवभार का पिरामिड
(D) शुष्क भार का पिरामिड

Ans. (A)

प्रश्‍न 31. जैवमण्डल का अर्थ है :
(A) वायुमण्डल
(B) एटमॉस्फीयर, लिथोस्फीयर एवं हाइड्रोस्फीयर
(C) हाइड्रोस्फीयर, लिथोस्फीयर एवं आयनोस्फीयर
(D) लिथोस्फीअर एवं आयनोस्फीयर

Ans. (C)

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जनन स्वास्थ्य | Janan Swasthya objective question chapter 4 Class 12th Biology

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 12 जीवविज्ञान के पाठ चार जनन स्वास्थ्य (Janan Swasthya objective question) के महत्‍वपूर्ण ऑब्‍जेक्टिव प्रश्‍नों को पढ़ेंगे।

4. जनन स्वास्थ्य

प्रश्‍न 1. जनसंख्या अधिक होने से :
(A) प्रति व्यक्ति आयु कम हो जाएगी
(B) प्रति व्यक्ति आयु ज्यादा हो जाएगी
(C) जनसाधारण का स्वास्थ्य अच्छा हो जाएगा
(D) उपर्युक्त में से सभी

Ans. (A)

प्रश्‍न 2. वर्तमान समय में भारत में गर्भनिरोध की सर्वाधिक मान्य विधि है :
(A) ट्यूबेक्टॉमी
(B) डायफ्राम्स
(C) अन्तःगर्भाशयी युक्तियाँ
(D) सर्वाइकल कैप

Ans. (C)

प्रश्‍न 3. गर्भाशय में कॉपर-टी के एक प्रभावी एवं अंतः गर्भाशयी युक्ति होने का मुख्य कारण है :
(A) शुक्राणुओं की निषेचन क्षमता में कमी
(B) गर्भाशय में कॉपर आयन मोचित होने के कारण शुक्राणुओं की भक्षकाणु क्रिया में वृद्धि
(C) शुक्राणुओं की गतिशीलता में कमी
(D) उपर्युक्त में से सभी

Ans. (D)

प्रश्‍न 4. भारत में प्रथम जनगणना प्रारंभ हुई:
(A) 1851 में
(B) 1891 में
(C) 1921 में
(D) 1951 में

Ans. (B)

प्रश्‍न 5. उच्च मत्यु दर के कारण जनसंख्या में तीव्र ह्रास कहलाता है :
(A) जनसंख्या घनत्व
(B) जनसंख्या अवनपन
(C) जनसंख्या विस्फोट
(D) इनमें सभी

Ans. (B)

प्रश्‍न 6. एम्नीओसेन्टेसिस एक प्रक्रिया है :
(A) हृदय में विकार जानने की
(B) दिमाग में कमी ज्ञात करने की
(C) भ्रूण में आनुवंशिक विकार ज्ञात करने की
(D) उपरोक्त सभी

Ans. (C)

प्रश्‍न 7. ‘सहेली’ जो कि मादा गर्भनिरोधक पुटिका (गोली) है प्रयोग की जाती है :
(A) रोजाना
(B) साप्ताहिक
(C) तिमाही
(D) मासिक

Ans. (B)

Janan Swasthya objective question

प्रश्‍न 8. कॉपर-टी का कार्य क्या है ?
(A) युग्मनज निर्माण को रोकना
(B) गर्भधारण को रोकता है
(C) निषेचन को रोकना
(D) उत्परिवर्तन का जाँच करना

Ans. (C)

प्रश्‍न 9. जन्म नियंत्रण की सर्वाधिक उपयुक्त विधि है :
(A) गर्भपात
(b) मुखीय गोलियाँ
(C) वीर्यसेचन
(D) बंध्याकरण

Ans. (D)

प्रश्‍न 10. केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान द्वारा कौन-सी गर्भनिरोधक गोली तैयार की गई है ?
(A) माला-D
(B) संयुक्त गोली
(C) सहेली
(D) निरोध

Ans. (C)

प्रश्‍न 11. किसी खास समय एवं स्थान में किसी खास आबादी में मृत्यु की संख्या को क्या कहते हैं ?
(A) नैटेलिटी
(B) मोर्टलिटी
(C) माइग्रेटरी
(D) इन्टेग्रिटी

Ans. (B)

प्रश्‍न 12. निम्न में से कौन रिट्रोवाइरस द्वारा उत्पन्न होता है
(A) सुजाक
(B) एड्स
(C) ट्राइकोमोनिएसिस
(D) सिफलिस

Ans. (B)

प्रश्‍न 13. परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया
(A) 1920
(B) 1930
(C) 1950
(D) 1951

Ans. (D)

प्रश्‍न 14. बढ़ रही मानव भ्रूण का पहला संकेत क्या है ?
(A) भ्रूण के आंदोलन
(B) स्टेथोस्कोप द्वारा हृदय ध्वनि को सुनकर
(C) अंगों का विकास.
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (B)

प्रश्‍न 15. ‘सहेली’ क्या है ?
(A) गर्भधारण की मुखीय गोली
(B) नॉन-स्टेरॉयडल गोली
(C) मानव मादा के लिए मुखीय गर्भ निरोधक
(D) (B) तथा (C) दोनों

Ans. (D)

प्रश्‍न 16.परखनली शिशु के संबंध में सत्य है :
(A) मादा के जननांग में निषेचन तथा परखनली में वृद्धि
(B) जन्मपूर्व शिशु को इन्क्यूबेटर में रखना
(C) जननांगों से बाहर निषेचन तथा गर्भाशय में परिवर्धन
(D) निषेचन तथा परिवर्धन गर्भाशय के बाहर

Ans. (C)

प्रश्‍न 17. निम्न में से कौन-सी जन्म नियंत्रण युक्ति स्वी द्वारा प्रयोग नहीं की जाती है ?
(A) डायफ्राम
(B) मुखीय गोली
(C) निरोध
(D) कॉपर-टी

Ans. (C)

Janan Swasthya objective question

प्रश्‍न 18. जननांग मस्सा निम्नांकित में किसके द्वारा फैलता है ?
(A) हेपेटाइटिस-A
(B) हर्पिस विषाणु
(C) ट्राइकोमोनास
(D) पैपोलोमा विषाणु

Ans. (D)

प्रश्‍न 19. परखनली शिशु एक तकनीकी है जिसमें :
(A) अण्डवाहिनी से युग्मनज लेकर संवर्धित किया जाता है, फिर इसे रोपित करते है
(B) अण्डाणु लेकर फिर इसे निषेचित कराकर रोपित करते हैं
(C) शुक्राणु एवं अण्डाणु का संलयन होता है और युग्मनज का विकास परखनली में होता है।
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं

Ans. (B)

प्रश्‍न 20. गर्भनिरोधक पुटिका में प्रोजेस्ट्रॉन :
(A) अण्डोत्सर्ग को रोकता है
(B) इस्ट्रोजन का दमन करता है।
(C) युग्मनज के एण्डोमीट्रियम में व्यवस्थित होने को रोकता है
(D) उपर्युक्त सभी

Ans. (A)

प्रश्‍न 21. जन्म नियंत्रण की एक विधि है :
(A) GIFT
(B) HJF
(C) IVF-T
(D) IUDs

Ans. (D)

प्रश्‍न 22. कौन-सी तकनीकी पुरुषों से संबंधित है।
(A) मुखीय गोली
(B) ट्यूबेक्टोमी
(C) वासेक्टोमी
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (C)

प्रश्‍न 23. कॉपर-टी रोकता है:
(A) निषेचन को
(B) अण्डजनन को
(C) यूटेरस की दीवारों पर इम्ब्रियों के बनने को
(D) रिप्रोडक्टिव डक्ट में रुकावट को

Ans. (B)

प्रश्‍न 24. स्तनपान अनार्तव संबंधित है :
(A) गर्भनिरोधन की अस्थाई विधि
(B) आर्तव का अभाव
(C) गर्भनिरोधन की स्थाई विधि
(D) एक यौन संचारित रोग

Ans.  (A)

प्रश्‍न 25. जनसंख्या का अध्ययन कहलाता है:
(A) केलोग्राफी
(B) मनो जीवविज्ञान
(C) बायोग्राफी
(D) डेमोग्राफी

Ans. (D)

प्रश्‍न 26. मानव जनसंख्या वृद्धि है :
(A लॉग
(B) स्थिर
(C) एक्स पोटेन्शियल
(D) इनमें से कोई नहीं

Ans. (D)

प्रश्‍न 27. मानव द्वारा कौन-सी सबसे बड़ी कठिनता का सामना किया जा रहा है ?
(A) जनसंख्या विस्फोट
(B) ओजोन परत का क्षरण
(C) प्राकृतिक स्रोतों का क्षरण
(D) मृदा अपरदन

Ans. (A)

प्रश्‍न 28. संतानोत्पत्ति नियंत्रण के क्या उपाय हैं ?
(A) हॉर्मोनल विधियाँ
(B) प्राकृतिक विधियाँ
(C) यांत्रिक विधियाँ
(D) इनमें सभी विधियाँ

Ans. (D)

प्रश्‍न 29. प्रथम मानव जनसंख्या विस्फोट का कारण हुआ
(A) कृषि
(B) औद्योगिकीकरण
(C) तकनीक
(D) सभ्यता में परिवर्तन

Ans. (A)

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9. Prabhat Varnam class 9 sanskrit | कक्षा 9 प्रभातवर्णनम्

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ नौ ‘प्रभातवर्णनम्’ (Lokgeetam class 9 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Prabhat Varnam class 9 sanskrit

9. प्रभातवर्णनम्

पाठ-परिचय–  प्रस्तुत पाठ ‘प्रभात वर्णनम’ में सुबह के समय प्रकृति में होने वाले परिवर्तन के विषय में वर्णन किया गया है। पौ फटते ही सारे संसारे में नवचेतना का संचार हो जाता है। पक्षीगण कलरव करने लगते हैं। तालाब में कमल के फूल खिल उठते हैं । भक्त ईश्वर-भक्ति में लीन हो जाते हैं। मंदिरों में घंटा-ध्वनि होने लगती है।

कोयल की कूक से वातावरण गुंजित हो जाता है तो किसान कृषि कार्य में तल्लीन हो । जाते हैं। तात्पर्य यह कि हर जीव अपने कर्म में लीन हो जाता है।

सूर्यः पूर्वदिशायामधुना,
विकसति दिव्यः किरणावलिना ।
तस्य समुदये परितः विश्वम्,
लभते नव-नव जीवनतत्त्वम् ।। 1 ।।

अर्थ- प्रभात के समय पूरब दिशा में सूर्य की किरणों के उगते ही संसार में चारी तरफ दिव्य आलोक फैल जाता है तथा सारी प्रकृति एवं जीव-जन्तुओं में नवजीवन का संचार हो जाता है। अर्थात् सारा संसार अपने-अपने कर्म में लीन हो जाता है।

विकसति कमलदलं तु तडागे,
कूजति कोकिलगा: सुरागे ।
चरितं पशुः वनं प्रति याति
शिशुरपि निद्रातः जागर्ति ।। 2 ।।

अर्थ- प्रभात के समय सूर्योदय होते ही तालाब में कमल के फूल खिल जाते हैं। कोयल अपनी मधुर आवाज से वातावरण में मधुर रस घोलने लगती है। पशु चरने के लिए जंगल की ओर प्रस्थान कर जाते हैं तथा बच्चे नींद से जाग जाते हैं। यानी हर कोई अपने कर्म से सांसारिक सौन्दर्य बढ़ाने में लीन हो जाता है। Prabhat Varnam class 9 sanskrit

ऋषयो ध्यानरता दृश्यन्ते,
मल्ला इन्द्रयुधि प्रयतन्ते ।
प्राणायाममहो कुर्वन्तः
दृश्यन्ते सम्प्रति ते सन्तः ।। 3 ।।

अर्थ– प्रभात के समय ऋषिगण ध्यानमग्न दिखाई पड़ते हैं तो पहलवान द्वन्द्वयुद्ध . में एक-दूसरे को पराजित करने का प्रयत्न करते हैं। इस समय मुनिगण प्राणायाम करते हुए दिख पड़ते हैं। तात्पर्य यह कि इसी प्रभात बेला को ऋषि-मुनि भी ईश्वर भक्ति अथवा ध्यान-प्राणायाम के लिए उपयुक्त मानते हैं क्योंकि इस समय वातावरण शान्त एट स्वच्छ रहता है।

खादयति स्ववृषभं कृषक:
हलं कर्षति क्षेत्रे कृषकः ।
सिञ्चति वारिधारया शस्यम्,
रोपयति नवपादपवृन्दम् ।। 4 ।।

अर्थ-किसान अपने बैल को खिलाते हैं तथा खेत में हल चलाते हैं। अपन फसलों को जल की धारा से सींचते हैं और नये-पौधों को खेत में लगाते हैं । इस श्लोक में किसान के विषय में कहा गया है कि किस प्रकार किसान इस प्रभातवेला में स्वकमें लीन रहते हैं।

घण्टाध्वनिः मन्दिरे जातः,
देवः प्रीतमना सञ्जातः ।
भक्तो वरदानं कामयते
शुभाशिषं तु पूजको दत्ते ।। 5 ।।

अर्थ- इस प्रभातवेला में मन्दिरों में घण्टे की आवाज ध्वनित होती है। भक्तों के पूजा से देवता (ईश्वर) प्रसन्न होते हैं। लोग अपनी मनोकामनाएँ प्रभु के समक्ष प्रकट करते हैं। आराधना अथवा पूजा करने वालों को पुजारी आशीर्वाद देते हैं। Prabhat Varnam class 9 sanskrit

छात्रः निजगृहकार्यं कुरुते
माता शिशवे दुग्धं दत्ते ।
वीथ्यां गमनागमने जाते
दृश्यमिदं चित्रं तु प्रभाते ।। 6 ।।

अर्थ- इस प्रभातवेला में छात्र अपने गृह-कार्य बनाने में लग जाते हैं। माँ अपने छोटे बच्चे को दूध पिलाती है। रास्ते पर लोगों का आना-जाना शुरू हो जाता है। तात्पर्य यह कि सूर्योदय का आगमन होते ही लोग अपना आलस्य त्यागकर कर्मपथ पर आरूढ़ हो जाते हैं।

यो जागरणं कुरुते अत्र,
साफल्यं लभते सर्वत्र ।
प्रकृतेः नियमं यः पालयति
विध्नदलं हत्वा सो जयति ।।7।।

अर्थ- इन पंक्तियों के द्वारा समय के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। कवि का कहना है कि जो व्यक्ति सवेरे बिछावन छोड़कर अपने कार्य में लग जाता है, उसे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती ही है। नियमानुसार कार्य करने से बाधाएँ अपनेआप दूर हो जाती हैं। यानी कर्मवीर ही विपत्तियों पर विजय पाता है।

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8. Amritam Balbhashitam class 9th sanskrit | कक्षा 9 अमृतं बालभाषितम्

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के पाठ आठ ‘अमृतं बालभाषितम् (Amritam Balbhashitam class 9th sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Amritam Balbhashitam class 9th sanskrit

18. अमृतं बालभाषितम्

प्रस्तुत पाठ- ‘अमृतं बालभाषितम्’ में लोगों की दूषित मानसिकता पर प्रकाश डाला गया है। आज भारतीय अपनी आदर्श-संस्कृति की उपेक्षा करके पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति को अपनाना गौरव की बात समझने लगे हैं, जबकि लेखक ने एक अबोध बालिका के माध्यम से सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारतीय संस्कृति अपने आप में महान है। इसकी किसी अन्य संस्कृति से तुलना करना ‘सूरज को दीपक’ दिखाने के समान है।

पापा ! कोऽर्थः पापाशब्दस्य ?” काचित्पञ्चवर्षीया कन्या स्वपितरमपृच्छत् – “यो हि पापं करोति स पापा इत्येव मया गृहीतम्।” “मा मैवं वद गुड्डि !” तस्याः पितोवाच – “पापा तु आंग्लभाषायाः पितृसम्बोधनशब्द एवं ज्ञातव्यस्त्वया ।“परन्तु भारतीया वयं, तदत्र तत्सम्बोधनपदस्य न कश्चिदभावो वर्तते ।” “गुड्डि ! सभ्यानां लोकानामेवं सम्बोधनं समीचीनम् ।” “नाहं गुड्डीति तात ! न मे मातापि मम्मीति । ममी तु संग्रहालये मयाऽवलोकिता । ममाम्बा कथं ममीति कथ्यते ?”

अर्थ- पिताजी! पापा शब्द का क्या अर्थ है ? कोई पाँच वर्ष की (अबोध) बालिका ने अपने पिता से पूछा- “जो पाप करता है, वह पापा कहलाता है, ऐसा मेरे द्वरा जाना गया है। ऐसा मत बोलो-गुड्डी। उसके पिता ने कहा-पापा तो आंग्ल भाषा का शब्द है (जो) पिता के अर्थ में संबोधन किया जाता है, ऐसा तुम्हें समझना चाहिए। लेकिन हम तो भारतीय हैं, इसलिए यहाँ उस शब्द का कोई भाव नहीं है। अरी गुडि! सभ्य लोगों का ऐसा कहना उचित है। हे पिताजी! न तो मैं गुड्डी हूँ और न मेरी माताजी ममी हैं। ममी तो संग्रहालय में मेरे द्वारा देखा गया। मेरी माँ को ममी कैसे कहा जाता है ? Amritam Balbhashitam class 9th sanskrit 

“का वार्ताऽत्र चलिताऽस्ति ? अहमपि श्रोतुमभिलषामि ।” माता पृच्छति ।
“डार्लिंग! एषा आवयोः दुहिता ‘पापा पापं करोति, मम्मी च संग्रहालयस्य ममीति कथयति । न जाने केन कारणेन भ्रमितोऽस्याश्चित्तक्रमः । प्रतीयते यदस्य चत्वरस्य बालकानां कुप्रभावेण ग्रस्तेयम् ।”
“महोदय ! किन्न विचारयसि यत्क्वचिद् क्वचिदल्पवयस्केनापि कस्यचित् सत्यस्योद्घाटनं क्रियते । अमृतं बालभाषितमिति प्रसिद्धोक्तिरपि ज्ञातव्या । अतोऽद्यप्रभृति अहमम्बा, त्वञ्च पिता, इत्येवं सम्बोधनं भविष्यति । भारतीयां संस्कृति प्रति संकेतोऽस्याः सर्वभावेन ग्राह्यः ।

अर्थ- माता पूछती है.—“कैसी बातें हो रही हैं ? मैं भी सुनना चाहती हूँ।” प्रिये ! हमारी यह बेटी कहती है.—पापा पाप करता है और ममी संग्रहालय में होती है। पता नहीं, इसका विचार ऐसा कैसे हो गया है ? लगता है कि चारों लड़कों के कुप्रभाव से । यह ग्रस्त हो गई है।

श्रीमान् ! क्या आप नहीं जानते हैं कि कभी-कभी अबोध बच्चों द्वारा किसी सत्य का _ उद्घाटन किया गया है। बच्चों की वाणी को अमृत (अकाट्य) कहा गया है। इसलिए आज के बाद मैं माता और आप पिता के नाम से पुकारे जाएँगे। भारतीय संस्कृति के , प्रति इसका संकेत हर प्रकार से ग्रणीय है। Amritam Balbhashitam class 9th sanskrit 

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7. Lokgeetam class 9 sanskrit | कक्षा 9 ‘लोकगीतम्’

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ सात ‘लोकगीतम्’ (Lokgeetam class 9 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Lokgeetam class 9 sanskrit

7. ‘लोकगीतम्’

पाठ-परिचय प्रस्तुत पाठ ‘लोकगीतम्’ में क्षेत्रविशेष में गाए जाने वाले गीतों के विषय में बताया गया है। लोकगीत क्षेत्र विशेष में गाए जाने वाले गीत को कहते हैं। हर क्षेत्र की बोली अलग प्रकार की होती है। इसलिए गीतों में भी भिन्नता पाई जाती है। मगध क्षेत्र के लोकगीत मगही में, भोजपुर के लोकगीत भोजपुरी में तो मिथिला के

लोकगीत मैथिली में गाए जाते हैं। इन लोकगीतों के माध्यम से उस क्षेत्र की सभ्यता, -संस्कृति की झलक मिल जाती है। अत: लोकगीतों का अपना खास महत्त्व होता है जो पर्व-त्योहारों तथा उत्सवों के अवसर पर गाये जाते हैं। लोग इन गीतों के माध्यम से अपने सुख-दुःख का भाव प्रकट करते हैं।

क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।।
प्रात: उत्थाय नित्यं-2
गृहीत्वा च वृषभौ,
क्षेत्रं गच्छति कृषाणः
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।

अर्थ- किसान खेत जोतता है। किसान खेत जोतता है। वह प्रतिदिन सवेरे उठकर अपने दोनों बैलों को लेकर खेत में जाता है तथा खेत को जोतता है। Lokgeetam class 9 sanskrit

प्रस्तुत गीत में एक किसान के जीवन का वर्णन किया गया है कि वह किस प्रकार प्रतिदिन कृषि कार्य करता है।

अग्रे-अग्रे बलीवी द्वौ – 2
पृष्ठे कृषीवल,
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।।

अर्थ आगे-आगे बैल तथा पीछे से हल लेकर किसान खेत पर जाता है तथा खेत को जोतता है, कृषि कार्य करता है। . .

एक-हस्ते रज्जु धृत्वा
द्वितीये तु दण्डम्,
वृषभं प्राजति कृषाणः
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।

अर्थ- किसान बैलों को हाँकते समय एक हाथ में दोनों बैलों की रस्सी को पकड़े रहता है तो दूसरे हाथ में पैना लेकर बैलों को हाँकता है। इस प्रकार किसान खेत जोतता है। हल चलाते समय किसान की स्थिति कैसी होती है, उसी के विषय में कहा गया है।

 स्कन्धे तु बीजपात्रम्
नीत्वा करेण,
बीजम् उप्यते रे तेन
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः।

उत्तर-इन पंक्तियों में खेतों में बीज लगाने के बारे में कहा गया है कि किसान बीज बोते समय बीज के पात्र को अपने कंधे पर रखता है और हाथ से बीजों को खेतों में डालता है। इस प्रकार बुआई का काम किसान करता है। खेत को किसान जोतता है।

दिवा मध्ये आगतः सः
पीपलच्छायायाम्,
क्रियते भोजनं रे तेन
क्षेत्रं कर्षति कृषाणः ।

अर्थ- दोपहर के समय किसान पीपल की छाया में बैठकर भोजन करता है। अर्थात् – इन किसानों द्वारा दिन का भोजन दोपहर में पीपल की छाया में किया जाता है। इस प्रकार हमारे देश के किसान खेती करते हैं। वे सुबह से शाम तक अपने खेतों में काम करते – हैं। वे अपने हर काम को समयानुसार करते हैं। Lokgeetam class 9 sanskrit

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6. Sanmpurnviswratnam class 9 sanskrit | कक्षा 9 संपूर्णविश्वरत्नं (राष्ट्रियगीतम्)

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ छ: ‘संपूर्णविश्वरत्नं (राष्ट्रियगीतम्)’ (Sanmpurnviswratnam class 9 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Sanmpurnviswratnam class 9 sanskrit

6. संपूर्णविश्वरत्नं (राष्ट्रियगीतम्)

पाठ-परिचय प्रस्तुत पाठ ‘सम्पूर्णविश्वरत्नम्’ राष्ट्रीय गीत है जिसमें भारत की महानता का गान किया गया है। सम्पूर्ण विश्व में भारत की अपनी अलग पहचान है। इसका प्राकृतिक परिदृश्य अनोखा है। यहाँ कहीं फूल-फलों के उद्यान हैं तो कहीं गगनचुम्बी पर्वतशिखर हैं। यहाँ अनेक नदियाँ बहती हैं जो अपने जल से सींचकर खेतों को हरा-भरा रखती हैं। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ यहाँ का मूलमंत्र है। हमारा धर्म कटुता तथा भेदभाव का संदेश नहीं देता। इसीलिए भारत विश्व में सबसे अलग एवं अन्यतम है।

संपूर्णविश्वरत्नं खलु भारतं स्वकीयम् – 2
पुष्पं वयं तु सर्वे, खलुदेशवाटिकीयम् ।। स्वकीयं …

अर्थ- हमारा देश भारत निश्चय ही सारे संसार में सर्वश्रेष्ठ है। हम सभी देशवासी इस देशरूपी वाटिका के खिले हुए फूल हैं । तात्पर्य यह कि देशवासियो के महान् आदर्श के कारण हमारा देश भारत सारे संसार में आदृत हुआ।

सर्वोच्चपर्वतो यो, गगनस्य भालचुम्बी
स: सैनिकः सुवीरः प्रहरी च स स्वकीयं ।। स्वकीयं …

अर्थ- हमारे भारत में विश्व का सर्वोच्च शिखर हिमालय विराजमान है, जो आकाशरूपी भाल को छूता हुआ प्रतीत होता है और वह बहादुर सैनिक के समान देश की रक्षा करता है। अर्थात् भारत ही ऐसा महान् देश है, जहाँ हिमालय जैसे गगनचुम्बी पर्वत उत्तर दिशा में प्रहरी के समान विद्यमान है। Sanmpurnviswratnam class 9 sanskrit

क्रोडे सहस्त्रधारा: प्रवहन्ति यस्य नद्यः,
उद्यानमासु पोष्यं, भुवि गौरवं स्वकीयम् ।। स्वकीयं

अर्थ- हमारे देश में हजारों नदियाँ बहती हैं जो अपने जल से खेतों तथा उद्यानों को सींचकर सालों भर हरी-भरी रखती हैं और संसार में भारतभूमि का गौरव बढ़ाती हैं। अर्थात् नदियाँ अपने जल से सींचकर देश की भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाती हैं।

धर्मस्य नास्ति शिक्षा कटुता मिथो विधेया,
एके वयं-3 तु देशः, खलु भारतं स्वकीयम् ।। स्वकीयं …
सम्पूर्णविश्वरत्नं खलु भारतं स्वकीयम् ।।

अर्थ- संसार में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ किसी से वैर या भेदभाव करने की शिक्षा नहीं देता। यानी हमारा धर्म सबको विश्वबंधुत्व की भावना की शिक्षा देता है। किसी से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए, यही सीख सबको देता है। Sanmpurnviswratnam class 9 sanskrit

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5. Vidula Putra Samvad class 9th sanskrit | कक्षा 9 विदुला-पुत्र-संवादः

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के पाठ पाँच ‘विदुला-पुत्र-संवादः’ (Vidula Putra Samvad class 9th sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Vidula Putra Samvad class 9th sanskrit

5. विदुला-पुत्र-संवादः

पाठ-परिचय प्रस्तुत पाठ विदुला-पुत्र-संवाद में क्षत्रियधर्म की विशेषता पर प्रकाश डाला गया है । क्षत्रिय प्राण रहते पीठ नहीं दिखाते । इसी के संबंध में विदुला अपने कायर पुत्र को क्षत्रिय-धर्म पालन करने का संदेश देती है। वह अपने पुत्र को बताती है कि प्रजा उसी का आदर करती है जो अपनी प्रजा की तथा राज्य की रक्षा के लिए प्राण की बाजी लगा देता है। इसलिए कायरता का त्यागकर धैर्य एवं साहस के साथ शत्रुओं का सामना करो, चाहे मृत्यु को ही वरण क्यों न करना पड़े। माता के इस उपदेश से उत्साहित होकर शत्रुओं को जीतकर उसने माता की अभिलाषा पूरी की।

विदुला एका अतिसंयमिनी तेजस्विनी च नारी । तस्याः वैदुष्यं राजसभासु विश्रुतमासीत् । एकदा तस्याः सञ्जयो नाम एकलः पुत्रः स्वप्रतिवेशिना राज्ञा सिन्धुराजेन पराजितः रणाच्च पलायितः दैन्यमुपगत आसीत् । मृत्युभीतस्य पुत्रस्य स्थितिं विज्ञाय तस्य दैन्यमपाकर्तुं सा प्रथमं तं भर्त्सयति – ‘हे शत्रुनन्दन ! त्वं न मे पुत्रः प्रतिभासि । मानविवर्जितस्य तव क्षत्रियेषु परिगणनं न कदापि भविष्यति । कुतस्तव अङ्गेषु दौर्बल्यम् आगतं, कथं तव बुद्धिः भ्रान्ता जाता, यदेवं नपुंसकायसे । शत्रु भिर्निन्दितस्य , मान विवर्जितस्य तव जीवन व्यर्थम् । वीरास्तु व्यसने ष्वपि धैर्यं न त्यजन्ति, मृत्युं सम्मुखं दृष्ट्वा अपि स्वस्थानात् न विचलन्ति । यथा वायुः निःशङ्कम् आकाशे चरति तथैव त्वमपि रणभूमौ विचर । पराभं चाभिदर्शया ।

अर्थ- विदुला नाम की एक अतिसंयमिनी तथा तेजस्विनी महिला थी। उसकी विद्वता राजसभाओं में विख्यात थी। एकबार उसका इकलौता पुत्र संजय पड़ोसी राजा सिन्धुराज से पराजित होने पर युद्धक्षेत्र से भाग गया और कायर हो गया। मृत्यु से डरनेवाले पुत्र की दशा जानकर उसने सर्वप्रथम उसकी कायरता दूर करने के लिए निंदा करते हुए कहा—हे शत्रुनन्दन । तुम्हारे अंगों में दुर्बलता कैसे आ गई, तुम्हारी बुद्धि दिग्भ्रमित क्यों हो गई कि इस प्रकार नपुंसक बन गए हो। शत्रुओं से निन्दित होने तथा सम्मान (स्वाभिमान) के बिना तुम्हारा जीना बेकार है। वीर तो विषम परिस्थिति में भी अपना धैर्य नहीं छोड़ते और मृत्यु को भी सामने देखकर अपनी जगह से नहीं हिलते हैं। जिस प्रकार हवा निर्भीक होकर आकाश में विचरण करती है, उसी प्रकार तुम भी युद्धभूमि में विचरण करो और अपना पराक्रम दिखाओ (क्योंकि)

मुहूर्त ज्वलनं श्रेयः न व गायितं चिरम् ।

अर्थ- दीर्घकाल तक धुआँते रहने की अपेक्षा क्षण भर जलते रहना ही अच्‍छा है। तात्‍पर्य यह कि क्षण भर विजयी की भाँति जीना दीर्घकाल तक अपमानित होकर जीने की अपेक्षा श्रेष्‍ठ होता है या प्रशंसनीय होता है। Vidula Putra Samvad class 9th sanskrit

विद्वांसः फलाभिलाषणो न भवन्ति । न च वैभवमिच्छन्ति केवलं पुरुषकर्म कुर्वन्ति । त्वमपि पुरुषार्थं शौर्यञ्च प्रदरय शाशो लभस्व । सत्पुरुषः स एवास्ति यः विद्यया, तपसा, ऐश्वर्येण शौर्येण च सर्वत्र चमत्कृति जग्यात; हृदयमायसं कृत्वा राज्यं धनञ्च उपार्जयति तथा शत्रुसमक्षं निर्भयं विचरति। येन केन विधिना उदरपोषणं तु सः करोति यो नैव स्त्री न पुनः पुमान् भवति। यः सिंहः सदृशं पराक्रमं प्रदर्घ्य शत्रून् विजयते अथवा वीरगतिं प्राप्नोति, तस्य बान्धवाः सुखिनः प्रसन्नाः च तिष्ठन्ति। तस्यैव जोवनं सफलम्। त्वञ्च राजपुत्रः। राजपुत्रः शत्रुञ्जयो भवति। शत्रुञ्जयस्यैव

राजपुत्रस्य गाथाः जनाः गायन्ति।

अर्थ– विद्वान फल के अभिलाषी नहीं होते और न ही धन-दौलत की इच्छा रखते । हैं, सिर्फ पराक्रम (वीरतापूर्ण) करते हैं । तुम भी पुरुषार्थ तथा शौर्य का प्रदर्शन करके यश । कमाओ। महान व्यक्ति वह होते हैं जो विद्या (ज्ञान) से, तपस्या से, पराक्रम एवं ऐश्वर्य

के द्वारा सर्वत्र चमत्कार उत्पन्न करते हैं। आत्मविश्वास के साथ राज्य तथा धन का उपार्जन करते हैं और शत्रु के समक्ष निर्भीक बनकर रहते हैं। किसी प्रकार उदरपूर्ति तो वह करता है जो न तो पुरुष होता है और न ही स्त्री । जो सिंह की भाँति अपने पराक्रम के बल पर शत्रु को पराजित करता है अथवा वीरगति को प्राप्त करता है। उसके भाई-कुटुम्ब सुख से और प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। उसका ही जीवन सफल होता है और तुम तो क्षत्रिय हो। क्षत्रिय शत्रु-विजयी होता है। शत्रु-विजयी एवं क्षत्रिय के (यश) का लोग गान गाते हैं ।

इन्द्रो वृत्रवधेनैव महेन्द्रः समपद्यत।
माहेन्द्रं च गृहं लेभे लोकानां चेश्वरोऽभवत्।
अतस्त्वं शत्रू हि अथवा वीरगतिं प्राप्नुहि।

अर्थ- विदुला अपने पुत्र को देवराज इन्द्र का उदाहरण देती हुई कहती है-हे पुत्र इन्द्र वृत्रासुर (राक्षस) का वध करके देवताओं के राजा के रूप में सम्मानित हुए और

देवलोक के सिंहासन पर अधिष्ठित होकर तीनों लोकों (धरती, आकाश तथा स्वर्ग) में ___ईश्वर के रूप में पूजे गए । इसलिए तुम भी शत्रु पर विजय प्राप्त करो अथवा वीरगति – को प्राप्त कर क्षत्रिय धर्म का पालन करो। Vidula Putra Samvad class 9th sanskrit

एवं मातुः नानाविधैः वाग्बाणप्रहारैः आहतः पुत्रः मातरं प्रोवाच – ‘मातः तव हृदयं वज्रसार निर्मितं तवोपदेशोऽपि तथैव कठिनः। त्वं मां परकीयमिव युद्धाय प्रेरयसि। अहं तव एकलः पुत्रः। मम मरणे त्वम् किं प्राप्स्यसि ? पुत्रस्य भावमभिज्ञाय माता पुनः ब्रूते – ‘हे पुत्र विज्ञैः पुरुषार्थसाधनायैव कर्माणि क्रियन्ते। एतत् सुविचिन्त्यैव युद्धाय प्रेरितोऽसि। या माता पुत्राय कर्त्तव्यं न बोधयति, कुमार्गगामिनं दृष्ट्वापि तं न प्रतिबोधयति, शुष्कप्रेमवशात् कष्टसाध्येषु कर्मसु न योजयति, सा वस्तुतः कुमाता। क्षत्रियास्तु रणशूराः भवन्ति। ते रणे योद्धं जयं मृत्यु वा लब्धं प्रजापतिना सृष्टाः। एतदर्थं त्वत्कृते युद्धकर्म एव श्रेयस्करम्। त्वमस्य राज्यस्य राजा। प्रजाः राज्ञः अनुगामिनः भवन्ति। त्वयि भीते सर्वे भीताः भविष्यन्ति। त्वयि हते राज्यं हतं भविष्यति। अतः हे पुत्र, यदा त्वं सिन्धुराजस्य सर्वान् सैनिकान् संहरिष्यसि तदैवाहं त्वाम् औरसं बोधयिष्यामि। अहं तव बाहुबलेनोपलब्धं यशोधनमेव द्रष्टुकामा। स्वरूपधनं कदापि द्रष्टुं नेच्छामि। पुनश्च पुत्रेण “अर्थहीनः सहायहीनश्चाहं कथं शत्रुभिः सह योत्स्ये” इति प्रश्ने कृते विदुलया कार्ये साफल्याधायकानां शत्रुवशीकरणोपायानां निर्देशः कृतः। तदीयेन निर्देशेन प्राप्तोत्साहेन च सञ्जयः शत्रून् विजितवान् मातरञ्चाभिनन्दितवान्।

अर्थ- इस प्रकार माता के नाना प्रकार के व्यंग्यवाणों के प्रहार से घायल पुत्र ने माता से बोला-हे माते । जिस प्रकार तुम्हारा हृदय वज के समान कठोर है उसी प्रकार तुम्हारा उपदेश भी कठोर है। तुम मुझको दूसरों के समान युद्ध करने के लिए प्रेरित करती हो। मैं तुम्हारा इकलौता बेटा हूँ। मेरे मरने पर तुम्हें क्या मिलेगा ?

पुत्र के भाव (मनोदशा) को भाँप कर माता ने कहा-हे पुत्र ! विद्वान पुरुषार्थ प्राप्ति के लिए ही कर्म करते हैं। यह सोचकर ही युद्ध करने के लिए प्रेरित करती हूँ। जो माँ पुत्र को सद्कर्तव्य का ज्ञान नहीं देती है, बुरे मार्ग पर चलते हुए देखकर भी उसको नहीं रोकती है तथा पुत्रप्रेम के कारण दुस्साध्य कार्य करने के लिए उत्साहित नहीं करती है, वह वस्तुत: माता नहीं कुमाता है । क्षत्रिय तो युद्धप्रिय (रणवीर) होते हैं। वे युद्ध में विजय प्राप्त करने अथवा वीरगति प्राप्त करने पर प्रजा द्वारा सम्मानित होते हैं। इसलिए तुम्हारे-लिए युद्ध करना ही श्रेष्ठ कार्य है। प्रजा राजा का अनुगामी होती है। तुम्हारे भयभीत होने पर सारी प्रजा भयभीत हो जाएगी। तुम्हारे मरने पर राज्य का विनाश हो जाएगा। इसलिए हे पुत्र! जब तुम सिन्धु राज्य के सारे सैनिकों का संहार करोगे, तभी तुमको मैं अपनी संतान मानूँगी। मैं तुम्हारे बाहुबल से प्राप्त यश एवं धन देखने की इच्छुक हूँ। रूप एवं धन कभी देखना नहीं चाहती और फिर, पुत्र द्वारा अर्थहीन तथा सहायहीन शत्रुओं के साथ कैसे युद्ध करूँगी, ऐसा कहकर विदुला ने सफलता प्राप्त करने तथा शत्रु पर विजय प्राप्त करने का आदेश दिया। उस आदेश से उत्साहित सञ्जय (पुत्र) ने शत्रु को जीतकर माता का अभिनन्दन किया।

इदमुद्धर्षणं भीमं तेजोवर्धनमुत्तमम् ।
राजानं श्रावयेन्मंत्री सीदन्तं शत्रुपीडितम् ।।

अर्थ-जिस प्रकार भीम को उत्साहित करने पर शक्ति बढ़ जाती थी, शत्रु भयभीत हो जाते थे, उसी प्रकार शत्रु से पीड़ित सञ्जय ने माँ से उत्साहित होकर शत्रु को पराजित किया।

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4. Yatnam bina N Ratnam class 9 sanskrit | कक्षा 9 यत्तं विना न रत्नम्

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ चार ‘यत्तं विना न रत्नम्’ (Yatnam bina N Ratnam class 9 sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Yatnam bina N Ratnam class 9 sanskrit

4. यत्तं विना न रत्नम्

पाठ-परिचय- प्रस्तुत पाठ ‘यत्नं विना न रत्नम्’ में प्रयत्न (परिश्रम) के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। लेखक का मानना है कि संसार में वही व्यक्ति महानता के पद पर आसीन होता है जो सदा प्रयत्नशील रहता है। प्रयत्नशील व्यक्ति ही समुद्र लाँध जाता है और पहाड़ की चोटी पर अपनी ध्वजा फाहराने में सफल होता है। इसीलिए प्रयत्न या परिश्रम को सफलता की जननी कहा गया है। अतएव हर बच्चों को तबतक प्रयत्न करते रहना चाहिए, जबतक जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।

कस्यचित् कृषकस्य द्वौ पुत्रौ आस्ताम् । तयोः ज्येष्ठः परमोऽलसः प्रमादी चासीत् । कनिष्ठस्तु विद्याव्रती परिश्रमी चासीत् । सुतद्वयं विद्यालये प्रवेशिकायां प्राविशत् । ज्येष्ठतनयः प्रायः क्रीडानिमग्नो दृष्टः । तस्यैवं विद्यां स्थितिमवलोक्य पित्रोक्तम् – “वत्स ! एष ते परीक्षाकालः, अतो नैवमाचरणीयम् । पश्य स्वानुजं, यः सततं अध्ययनरतोऽस्ति, अवसरं प्राप्य कृषिकर्मण्यपि योगदानं करोति । त्वं तु गृहकार्यमपि विहाय केवलं क्रीडामग्न इव दृश्यसे । अतः पुत्र ! कुरुवात्मशक्त्या प्रयत्नम् ।”

अर्थ- किसी किसान के दो पुत्र थे। उन दोनों में बड़ा पुत्र अति आलसी और घमंडी था तो छोटा पुत्र अध्ययनशील तथा परिश्रमी था। दोनों पुत्रों को विद्यालय की प्रवेशिका में नामांकन कराया। बड़ा बेटा हमेशा खेल में मग्न रहता था। पढ़ाई के प्रति उसकी ऐसी अरूचि को देखकर पिता ने पुत्र से कहा—प्रिय! यह तुम्हारा परीक्षा का समय है, इसलिए तुम्हें इस प्रकार का आचरण नहीं करना चाहिए । देखो, तुम्हारा छोटा भाई सदा पढ़ने में तल्लीन रहता है तथा समय मिलने पर कृषि कार्य में भी मदद करता है । तुम तो घर का काम छोड़कर खेलने में मस्त रहते हो। इसलिए, हे पुत्र! अपनी शक्ति के अनुसार प्रयत्न करो। Yatnam bina N Ratnam class 9 sanskrit

“तात ! एष ममानुजो मन्दबुद्धिरस्ति । तस्य स्मरणशक्तिरपि न तीक्ष्णाऽस्ति, तेनैव स वारं-वारं प्रश्नोत्तराणि रटति, क्षणदूर्य व तानि विस्मरति । मया तु तत्सर्वाणि कण्ठस्थीकृतानि ।”

अथ कतिपयदिनान्तरे पक्षाबसरोऽप्यायातः ज्येष्ठेन सुतेन परीक्षाभवने प्रश्नपत्रमालोक्य साहसमपि परित्यक्तम् । कारस्थ कमपि मार्गमदृष्ट्वा सोऽनुकरणवृत्तिधारणं कृतवान् । तस्य अनुजस्तु उत्तीर्णोऽभवत् । अथ त ज्येष्ठसुतं खिन्नवदनं वीक्ष्य तस्य पित्रोक्तम् – “पुत्र ! अवगच्छ तथ्यमिदं यद् यत्नं विना न लभ्यते रत्नं कदापि केनचित् ।”

अर्थ- “हे पित! यह मेरा छोटा भाई मन्दबुद्धि का है। उसकी स्मरण-शक्ति अति कमजोर है, इसलिए वह हमेशा प्रश्नोत्तर रटता रहता है। क्योंकि) कुछ समय बीतने पर (वह) उन उत्तरों को भूल जाता है। मैंने तो सब कुछ याद कर लिया है। इसके कुछ ही दिनों के बाद परीक्षा का समय आ गया। बड़े पुत्र ने परीक्षाभवन में अपना धैर्य (साहस) खो दिया। उत्तीर्ण (पास) होने का कोई उपाय न देखकर नकल करने लगा। उसका छोटा भाई परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ। इसके बाद बड़े पुत्र का चेहरा उदास देखकर पिता ने कहा-प्रिय! इस तथ्य (वास्तविकता) को अब भी समझने का प्रयास करो कि बिना परिश्रम के कोई भी सफलता रूपी रत्न को प्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात् परिश्रम करने पर ही सफलता मिलती है। Yatnam bina N Ratnam class 9 sanskrit

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3. Prarthana Sanskrit class 9 | कक्षा 9 प्रार्थना

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ तीन ‘प्रार्थना’ (Prarthana Sanskrit class 9)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Prarthana Sanskrit class 9

3.प्रार्थना

पाठ-परिचयप्रस्तुत पाठ ‘प्रार्थना’ में परमपिता परमेश्वर से विद्या तथा सद्गुण की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की गई है। कवि अपनी हार्दिक कामना प्रकट करते हुए कहता है कि ईश्वर की कृपा से चित्त निर्मल होता है । सद्गुणों के प्रति खिचाव होता है । सारे राग-द्वेषों से मुक्त हृदय में प्रेम की प्रबल धारा अबाध गति से प्रवाहित होने लगती है। इसीलिए कवि प्रभु से विद्या एवं सद्गुणों के सुदान की कामना करता है।

दयित्वा में हि परमात्मन् !
सुदानं देहि विद्यायाः,
दयित्वा आत्मनि प्रगुणा,
विशुद्धिः नाथ मे कार्या ।

अर्थ- कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हे परमात्मा ! मुझे विद्या का. सुदान देकर मेरे हृदय को सद्गुणों से भर दो, ताकि स्वामी का काम शुद्ध भाव से मेरे द्वारा हो सके। अर्थात् हे परमात्मा ! विद्यारूपी विशिष्ट गुण देकर मुझे स्वामी का काम शुद्ध चित्त से करने की शक्ति प्रदान करो।

मदीयं ध्यानमागच्छ,
प्रभो नेत्रद्वये तिष्ठ,
तमोमय-चित्तमागत्य,
परं ज्योतिः शुभं देयम् । दयित्वा ….

अर्थ- हे प्रभु ! मेरा ध्यान सतत् (आप) पर लगा रहे। मेरी दोनों आँखों में आप सदा विराजमान रहें । आप मेरे अन्धकारपूर्ण हृदय की अज्ञानता को मिटाकर दिव्य प्रकाश से आलोकित कर दें। तात्पर्य यह कि कवि अहर्निश प्रभु चिन्तन में मग्न रहने की कामना (प्रार्थना) व्यक्त करता है।

प्रवाह्य प्रेमगङ्गा च
हृदि त्वं स्नेहसिन्धुं च,
परस्परमेक – भावेन,
प्रभो वस्तुं च शिक्षय माम् । दयित्वा ….

अर्थ- कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसके हृदय में प्रेम की गंगा बहा दो और हृदय में तुम स्नेह रूपी सागर-सा विराजमान हो जाओ, ताकि कवि उदारचित्त होकर सारे संसार को समान भाव से देखे । अर्थात् सारे भेदभावों से ऊपर उठकर सबको समान दृष्टि से देखने का ज्ञान प्रदान करो। Prarthana Sanskrit class 9

स्वधर्मः चास्तु सेवैव,
स्वकर्माप्यस्तु सेवैव,
स्वसत्यं चास्तु सेवैव,
अहं सेवी स कर्नयः । दयित्वा ….

अर्थहे प्रभु ! मुझे ऐसा ज्ञान दो कि मैं अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखू और अपने कर्म के प्रति भी निष्ठावान रहूँ तथा अपने सत्य पर सदा आरूढ़ रहूँ। मैं सच्चे सेवक की भाँति अपने कर्तव्य (दायित्व) का पालन करता रहूँ। यानी अपने धर्म, कर्म एवं सत्य के लिए सदैव दृढ़संकल्प रहूँ।

देशाय जीवनं पूर्ण,
स्वमरणं चास्तु देशाय,
स्वप्राणान् देशरक्षायै,
प्रदातुं शिक्षय भगवन् । दयित्वा ….

अर्थ हे भगवन् ! मुझे ऐसा ज्ञान दो कि मैं अपना सारा जीवन देशसेवा में लगा दूँ। देश सेवा में ही मेरी मृत्यु हो तथा देश की रक्षा के लिए अपने प्राण का त्याग करूँ। अर्थात् मुझे ऐसे विशिष्ट गुणों से भर दो कि मैं देश के लिए ही जिऊँ-मरूँ । देशसेवा अथवा उसकी रक्षा ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो। Prarthana Sanskrit class 9

दयित्वा मे हि परमात्मन्
सुदानं देहि विद्यायाः
दयित्वा आत्मनि प्रगुणा,
विशुद्धिः नाथ में कार्या । दयित्वा ….

अर्थ- हे प्रभु! हे परमात्मा ! मुझे ऐसा ज्ञान दो कि मैं अपने विशिष्ट गुणों से संसार । को संवार सकूँ। यानी, अपने जीवन मार्ग को सदा विकसित करता रहूँ।

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2. Sarla Sanskrit Bhasha Class 9th Sanskrit | कक्षा 9 सरला संस्कृत-भाषा

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 9 संस्‍कृत भाग दो के कविता पाठ दो ‘सरला संस्कृत-भाषा’ (Sarla Sanskrit Bhasha Class 9th Sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Sarla Sanskrit Bhasha Class 9th Sanskrit

सरला संस्कृत-भाषा

पाठ-परिचयप्रस्तुत पाठ ‘सरला संस्कृत भाषा’ में संस्कृत भाषा की विशेषताओं पर प्रकश डाला गया है। संस्कृत सारी भाषाओं की जननी है। इसे देवभाषा भी कहा जाता है। यह सरल, सरस तथा भावपूर्ण है। इसका व्याकरण विशद एवं सुलभ है। धातु (क्रिया) एवं शब्द (संज्ञा, सर्वनाम) रूप तीनों लिंगों एवं तीनों पुरुषों में अपने-अपने रूप के अनुसार चलते हैं, जिससे छात्रों को अनुवाद करते समय किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। साथ ही, इसके नीतियुक्त एवं भक्ति भावपूर्ण पद्य जीवन में एक नया आयाम पैदा करते हैं।

सरला संस्कृत-भाषा, सरसा संस्कृत भाषा।
प्रियकरी च बुद्धिकरी, मधुरा संस्कृत-भाषा ।। 1 ।।

अर्थ- संस्कृत भाषा सरल, सरस, प्रिय लगनेवाली, बुद्धि विकसित करनेवाली तथा मधुर अर्थात् आनन्द प्रदान करनेवाली है।

शृणु नीतियुतं पद्यं, शृणु भक्तियुतं स्तोत्रम् ।
शृणु भावयुतं श्लोकं, शृणु मनोहारि गीतम् ।। 2 ।।

अर्थ- बच्चों को निर्देश दिया गया है कि नीतिसंबंधी (नीतिपूर्ण) पद्यों को सुनो (पढ़ो)। भक्तिभाव से पूर्ण स्तोत्रों का पाठ करो। भावपूर्ण होकर श्लोकों को सुनो तथा आनन्द प्रदान करनेवाले गीतों का गायन करो। अर्थात् ऐसे पद्यों, स्तोत्रों, श्लोकों तथा गीतों को सुनो, जिससे विशेष ज्ञान तथा आनन्द की प्राप्ति हो। Sarla Sanskrit Bhasha Class 9th Sanskrit

नहि शब्दरूपरटनम् , नहि धातुरूपरटनम् ।
प्रिय सावधानमनसा, गुरुवाक्यदिशा चलनम् ।। 3 ।।

अर्थ- पाठ में बच्चों को सलाह दी गई है कि संस्कृत भाषा में शब्द रूप एवं धातु रूप रटने की आवश्यकता नहीं है। गुरु या शिक्षक द्वारा बताई जा रही बातों को सावधानीपूर्वक ध्यान से सुनना चाहिए। अर्थात् (गुरु द्वारा) पढ़ाते समय एकाग्रचित्त से गुरु की बातों को सुनना चाहिए। गुरु के निर्देशानुसार कार्य करने पर शब्द तथा धातु रूप रटने की जरूरत नहीं पड़ती।

कुरु अभ्यासं नित्यम्, वद संस्कृतेन वाक्यम् ।
विश्वासयुतो भूत्वा, साधु व्यवहर योग्यम् ।। 4 ।।

अर्थसंस्कृत के वाक्यों का नित्य अभ्यास करना चाहिए। संस्कृत में बोलना चाहिए । विश्वासयुक्त होकर सभ्य व्यवहार करना चाहिए। अर्थात संस्कृत के सही ज्ञान के लिए संस्कृत पढ़ने, बोलने का अभ्यास करने पर संस्कृत भाषा का सम्यक् ज्ञान अति शीध्र हो जाता है। इसलिए विश्वासपूर्वक पूर्ण रूचि के साथ संस्कृत पढ़ने की जरूरत है।

अखिलं निहितं ज्ञानम्, अस्यां बहु-विज्ञानम् ।
शोधेन सिद्धमेतत्, अनुशीलय प्रज्ञानम् ।।5।।

अर्थ- संस्कृतभाषा में संसार की सारी भाषाओं का ज्ञान समाहित (विद्यमान) है। इसमें विज्ञान संबंधी बहुत सारी जानकारियाँ मिलती हैं। विद्वानों द्वारा खोज करने पर यह सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत ज्ञान वृद्धि (बौद्धिक विकास) का मुख्य साधन है।।

वेदस्य दिव्यभाषा, एषा पुराणभाषा
अधुनापि तथैव वरा, संगणक योग्यभाषा ।। 6 ।।

अर्थसंस्कृत भाषा वेद की दिव्यभाषा है। यह पुराण की भाषा है। आज भी उसी प्रकार कम्प्यूटर के लिए सबसे अधिक उपयुक्त भाषा है।

Sarla Sanskrit Bhasha Class 9th Sanskrit

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