14. Krishigeetam class 8 Sanskrit | कक्षा 8 कृषिगीतम् (कृषि संबंधी गीत)

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 8 संस्‍कृत के कविता पाठ चौदह ‘कृषिगीतम् ( कृषि संबंधी गीत )’ (Krishigeetam class 8 Sanskrit)’ के अर्थ को पढ़ेंगे।

Krishigeetam class 8 Sanskrit

14. चतुर्दशः पाठः
कृषिगीतम्
( कृषि संबंधी गीत )

पाठ-परिचयप्रस्तुत पाठ नवरचित संस्कृत गीत के रूप में है। किसानाें का विपन्नवस्था तथा जीवन के उनके मोदमय दृष्टिकोण के विषय में इस गीत में बताया गया है। यह विडम्बना है कि धरती को शस्य-श्यामला बनाने वाला अर्थात् हरे-भरे परिधान से सम्पन्न करनेवाला किसान स्वयं आवश्यक परिधान से वञ्चित रहता है। जो सबके भोजन के लिए दिन-रात परिश्रम करता है, वह स्वयं प्रायः भूखा रहता है। संतोष की मूर्ति किसान विचारों से ईमानदार है। इसे वह अपनी नियति मानकर संतुष्ट रहता है, किसी का कुछ बिगाड़ता नहीं है। यही गरीब किसानों की विशेषता है।

वयं गायाम कृषिगीतं धरा परिधानयुक्तेयम्।

अर्थ परिधान युक्त (हरी-भरी) धरती का कृषिगीत हमलोग गाते हैं।

तदासीद् या विकृतवेषा कुरूपा निर्जला चेयम् ।
इदानीं नः श्रमेणाप्ता धरा परिधानयुक्तेयम् ॥

अर्थ-पहले यह धरती फसलविहीन होने के कारण सूखी (विरान) तथा कुरूप दिखाई पड़ती थी, लेकिन अब परिश्रम के फलस्वरूप शस्य-श्यामला दिखाई देती है। Krishigeetam class 8 Sanskrit

समेषां चिन्तयास्माकं कथंचित् कर्मणा फलितम् ।
बहूनां कर्षकाणां नः श्रमैः सस्यं समाकलितम् ॥

अर्थ- सभी किसानों को इस बात की चिन्ता सता रही है कि उनका परिश्रम किस सफल होगा। हम सब किसानों ने काफी परिश्रम से फसल लगाया है।

परं ते मध्यमाः सर्वे समेषामन्नराशीनाम्।
क्रयं कृत्वाल्पमूल्येन, पुनर्नो निर्धनान् कुर्युः ॥

अर्थ –लकिन वे सब निर्धन किसानों का अनाज कम मूल्य में खरीद कर उन्हें गरीबी | में जीने के लिए मजबूर करते हैं। अर्थात् ऋणग्रस्त किसानों का बिचौलिये कम दाम में 

अन्न खरीदकर ऊँचे मूल्य में बाजार में बेचते हैं। बेचारा किसान जी तोड़ परिश्रम के | बावजूद निर्धन ही बना रहता है।

धराऽस्माकं भवेत्कामं न चान्नं नो हितायेदम ।
वयं गायाम कृषिगीतं तथापीत्थं सुखायेदम् ॥

अर्थ-निश्चय ही यह धरती हमारे कल्याण के लिए अन्न देती है। हमें यह सुख • Krishigeetam class 8 Sanskrit

प्रदान करे इसलिए परिश्रम करता हूँ, लेकिन ऐसा होता नहीं है। तात्पर्य यह कि अन्न । भले ही किसानों के हित में नहीं है फिर भी किसानों को सुख है कि उनके परिश्रम के परिणामस्वरूप लोग अपनी भूख शांत करते हैं। इसीलिए वे खुशी के गीत गाते हैं।

ऋतूनां कष्टमाघातैः वयं सर्वे समाभ्यस्ताः ।
शरीरे नास्ति परिधानं कृषिः परिधानयुक्तेयम्  ॥

अर्थ-हम किसान जाड़ा, गर्मी, वर्षा आदि से होने वाले कष्ट सहन करने के आदी हैं। यद्यपि हमारे शरीर पर वस्त्र नहीं हैं, लेकिन खेतों में लहलहाती फसल देखकर हमारा मन-मोर नाचता रहता है। ऋतु संबंधी कष्टों से हम विचलित नहीं होते।

सुखं सन्तोषवाचा यत् प्रशस्यं कल्पयामस्तत् ।
समेषामन्नभाजां सा कृषिः सुखलब्धे भूयात ॥

अर्थ-किसानों को इस बात की खुशी है कि वे अपने परिश्रम से लोगों की मिटाते हैं। अन्न खाने वालों को खुश देखकर ही उनका मन संतुष्ट हो जाता है । उन्होंने कष्ट सहकर प्रशंसनीय कार्य किया है। इसलिए खेत में खूब अन्न पैदा है।

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