कक्षा 9 हिंदी वर्णिका बिहार का लोकगायन | bihar ka lok gayan class 9 hindi

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पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘बिहार का लोकगायन’ में बिहार की संस्कृति पर प्रकाश डाला गया है। लोकगीतों की अकूत संपदा से परिपूर्ण बिहार की धरती ने अनेक गायक एवं वादक पैदा किए हैं। जन्म, व्रत-उत्सव, जनेऊ, विवाह, कुटौनी, पिसौनी, रोपनी आदि में औरतों द्वारा गाए जाने वाले गीतों में लोकगायन का असली रूप दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार सोहर, झूमर, ज्योनार, जैतसार, साँझा, पराती, रोपनी गीत, होली तथा चैता बिहार की मिट्टी की अपनी अनुगूंज हैं, अंतस् की अभिव्यक्ति है।

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बिहार में प्रचलित लोकगीतों के पाँच भेद हैं संस्कार गीत, पर्वगीत, श्रमगीत, प्रेमगीत, गाथा गीत एवं ऋतुगीत । जन्म, जनेऊ, तिलक तथा विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीत को संस्कार गीत कहते हैं। पर्वो में छठगीत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। श्रमगीतों में जँतसार, पिसौनी तथा रोपनी गीतों की लय की तरंगें वातावरण में नाद घोलती है कि सारी थकान विलीन हो जाती है। प्रेम-गीत मुख्यतः चरवाहे, हलवाहे तथा गाड़ीवान द्वारा गाए जाते हैं तो लोरिका, भरथरी और नैका गाथा गीत के रूप में गाए जाते हैं तथा होली, चैता एवं बारहमासा ऋतु गीत हैं। फिर कबीर, सूर तथा तुलसी के भक्ति के पदों ने इतनी गहराई तक प्रभावित किया है कि वे उसमें अभिन्न भाव से घुलमिल गए हैं। माली जाति के लोगों द्वारा गाए जाने वाले गीतों में इतनी तन्मयता होती है कि सुनने वाले भाव विभोर हो जाते हैं। उन विभिन्न गीतों में ढोलक, झाल, डुग्गी, डंका, हुरका आदि वाद्यों का प्रयोग आदिकाल से होता रहा है। इन बाजाओं को बजानेवालो का न तो कोई घराना है और न गुरू-शिष्य पंरपरा ही। लेकिन अनपढ़, गँवार पुरुष-औरतें कुछ इतनी कुशलता हासिल कर लेते हैं जिनके हाथों की कुशलता विस्मय में डाल देती है। इन गीतों की भाषा चाहे मगही, मैथिली या भोजपुरी कोई हो, विषय की समानता आंतरिक एकसूत्रता के प्रमाण सामने रख जाती है। प्रायः सबके संस्कार गीतों में राम, कृष्ण तथा भगवान शंकर के पारिवारिक प्रसंगों की भागीदारी प्रमुखता से पाई जाती है, जैसे-विवाह में हर दूल्हा राम या कृष्ण तथा हर दुल्हन सीता या पार्वती होती है। तात्पर्य यह कि इन लोक गीतों का स्वरूप परिवेशानुसार बदल जाता है, जैसे- स्वागत गीत में औरतें घर के वयस्क का नाम ले-लेकर अगवानी के गीत गाती हैं तो बारातियों के भोजन करते समय हास-परिहास भाव से जो गालियाँ गाई जाती हैं उनमें औरतों की उम्र तथा पद की सारी सीमाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। विदाई गीत इतने कारूणिक होते है कि उपस्थित लोगों की आँखें बरसने लगती है। पर्वगीतों में भक्ति मूलक गीतों की धुन तथा लय अलग होती है। इसमें परिवार की समर्पित भक्ति की निष्कलुष भाव की व्यंजना होती है। पर्वो के भक्तिमूलक लोकगायन में पूर्णतः पारिवारिक सामाजिक संदर्भ होता है जिसमें देव या देवी की कृपालुता, रुष्टता, लीला, स्वरूप एवं सौन्दर्य का वर्णन-चित्रण हुआ रहता है।

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कक्षा 9 हिंदी वर्णिका (Second Hindi) पाठ 1 बिहार का लोकगायन

बिहार के श्रीमगीतों में जैतसार तथा रोपनी-गीतों का विशेष महत्त्व है। जाँते में गेहूँ अथवा अन्य अनाज पीसती औरतें जँतसार गाकर श्रम में लय पैदा करती है तो धान के बिचड़ों की रोपनी करती महिलाएँ जब अपना गीत छेड़ती हैं तो उसकी लय सम्पूर्ण वातावरण में एक उर्वर मिठास घोल देती है।

होली और चैता बिहार के उत्सव तथा ऋतुगीत हैं। बसंत पंचमी के दिन गीत आरंभ होता है तो होली के दिन की अर्द्धरात्रि से चैता गायन आरंभ होता है। इन दोनों गीतों में ढोलक, झाल तथा करताल वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। होली में तो पौरूष भाव से पूर्ण उल्लास योग शृंगार की अनेक मर्यादाओं को तोड़ जाता है। विटा के होली गीतों पर ब्रजभाषा तथा अवधी के होली गीतों का गहरा प्रभाव रहा है किंतु भोजपुरी, मगही, मैथिली आदि बिहार की बोलियों में होली की विशेष उन्मुक्तता देखी जाती है।

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बिहार के लोकगायन अर्थात् होली, चैता तथा रामायण गाते समय ढोलक वादन के एक-से-एक माहिर देखे जाते हैं। बक्सर जिले के निवासी रामकृतार्थ मिश्र उर्फ गाँधीजी, स्व. किशुन देव राय तथा कंठासुर राय को ढोलक वादन कला में महारत हासिल थी। इसी प्रकार बिंध्यवासिनी देवी, भरत सिंह भारतीय, शारदा सिंहा आदि ने बिहार के लोकगायन के प्रचार-प्रसार में प्रशंसनीय कार्य किया है तो युवा पीढ़ी में अजीत कुमार अकेला, भरत शर्मा व्यास तथा मनोज तिवारी आदि इस लोकगायन को व्यापक बनाने में लगे हुए हैं।

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निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोकगायन की आत्मा आज भी ग्रामीण नारियों तथा पुरुषों के कंठ से फूटे विभिन्न गीतों में बोलती है।

2.भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा | Bharat ka Puratan Vidyapith Nalanda

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी गद्य भाग के पाठ 2 ‘भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा (Bharat ka Puratan Vidyapith Nalanda)’ को पढ़ेंगे। इस पाठ में नालंदा के गौरवमयी इतिहास को भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने बताया है।

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2. भारत का पुरातन विद्यापीठ : नालंदा
लेखक – राजेन्‍द्र प्रसाद

पाठ का सारांश

मगध की प्राचीन राजधानी वैभार गिरि पाँच पर्वतों के मध्य में बसी हई गिरिब्रज या राजगृह के तप्त कुंडों से सात मील उत्तर की ओर नालंदा है। नालंदा हमारे इतिहास में अति आकर्षक नाम है। इसका अतीत अति गौरवपूर्ण रहा है। यह एक ऐसा उज्ज्वल दृष्टान्त है, जहाँ ज्ञान के क्षेत्र में देश तथा जातियों के भेद लुप्त थे। नालंदा की वाणी एशिया महाद्वीप में पर्वतों और समुद्रों के उस पार तक फैली हुई थी।

Class 9th Hindi Chapter 2 Bharat ka Puratan Vidyapith Nalanda

नालंदा भगवान बुद्ध एवं महावीर जैन की कर्मस्थली था। बुद्ध के समय नालंदा गाँव में प्रावारिकों का आम्रवन था। यहीं महावीर ने चौदह वर्षों तक व्यतीत किए थे। सूत्रकृतांग के अनुसार नालंदा के एक धनी नागरिक लेप ने धन-धान्य, शैया, आसन, रथ, स्वर्ण आदि के द्वारा भगवान बुद्ध का स्वागत किया और उनका शिष्य बन गया।

कहानी का प्‍लॉट लेखक शिवपूजन सहाय

तिब्बती विद्वान इतिहास-लेखक लामा तारानाथ के अनुसार नालंदा सारिपुत्त की जन्मभूमि थी। यहाँ इनका एक चैत्य था। राजा अशोक ने एक मंदिर बनवाकर उसे परिवर्द्धित किया। यद्यपि नालंदा की प्राचीनता की अनुश्रुति बुद्ध तथा अशोक दोनों से संबंधित है, किंतु एक प्राणवंत विद्यापीठ के रूप में उसके जीवन का आरंभ गुप्तकाल में हुआ। इतिहास-लेखक तारानाथ के अनुसार भिक्ष नागार्जुन तथा आर्यदेव दोनों का संबंध नालंदा से रहा है। उनका कहना है कि आचार्य दिड्नाग ने यहाँ आकर अनेक प्रतिपक्षियों के साथ शास्त्रों का विचार किया था, जिनमें सुदुर्जय नामक ब्राह्मण अग्रणी था। चौथी शताब्दी में चीनी यात्री फाह्यान नालंदा आए थे। सातवीं सदी में समाट हर्षवर्द्धन के समय में युवानचांग जब यहाँ आए तो नालंदा अपनी उन्नति के शिखर पर था। युवानचांग ने कहा है कि इसका नाम नालंदा इसलिए पड़ा, क्योकि अपने पूर्व-जन्म में उत्पन्न भगवान बुद्ध को तृप्ति नहीं होती थी। इसका कारण यह है कि ज्ञान के क्षेत्र में जो दान दिया जाता है, उसमें न तो ज्ञान देने वाले तृप्त होते हैं और न ही ज्ञान प्राप्त करनेवालों को हो तृप्ति मिलती है।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना जनता के उदार दान से हुई थी। ऐसी मान्यता है कि पाँच सौ व्यापारियों ने अपने धन से भूमि खरीदकर बुद्ध को दान में दी थी। आठवीं सदी के यशोवर्मन के शिलालेख में नालंदा का भव्य वर्णन किया गया है कि यहाँ के विहारों के शिखर आकाश में मेघों को छूते थे। इनके चारों ओर नीले जल से भरे सरोवरों में सुनहरे एवं लाल कमल तैरते थे, सघन आग्रकुंजों की छाया थी। यहाँ के भवनों के शिल्प और स्थापत्य को देखकर आश्चर्य होता था। इनमें अनेक अलंकरणों सहित मूर्तियों थी। चीनी यात्री इत्सिंग के समय इस विहार में तीन सौ बड़े कमरे तथा आठ मंडप थे। पुरातत्व विभाग की खुदाई में नालंदा विश्वविद्यालय के जो अवशेष मिले हैं, उनसे इन वर्णनों की सच्चाई प्रकट होती है।

Bharat ka Puratan Vidyapith Nalanda Video

नालंदा विश्वविद्यालय में कार्यरत शिक्षकों एवं छात्रों के नित्य प्रति के व्यय के लिए सौ गाँवों की आय अक्षय निधि के रूप में समर्पित की गई थी। इत्सिंग के समय इन गाँवों की संख्या बढ़कर दो सौ के पास पहुँच गई थी। नालंदा विश्वविद्यालय के निर्माण एवं अर्थव्यवस्था में उत्तर प्रदेश, बिहार तथा बंगाल का महत्त्वपूर्ण योगदान था। नालंदा की खुदाई में बंगाल के महाराज धर्मपालदेव तथा देवपालदेव के समय के ताम्रपत्र और मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इतना ही नहीं, विदेशों के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का जो संबंध था, उसका स्मारक एक ताम्रपत्र भी खुदाई में मिले हैं। ताम्रपत्र के अनुसार, नालंदा के गुणों से प्रभावित होकर यव द्वीप के सम्राट बालपुत्र ने नालंदा में एक बड़े विहार का निर्माण कराया था। सम्राट देवपालदेव द्वारा दान में दिए गए पाँच गाँवों की आय से अन्तर्राष्ट्रीय आर्य भिक्षु संघ के भोजन, चिकित्सा, शयनासन, विहार की मरम्मत तथा धार्मिक ग्रंथों की प्रतिलिपि आदि में व्यय की जाती थी। यह तो संयोग से बचा हुआ एक प्रमाण है, जो विदेशों में फैली हुई नालंदा की अमिट छाप हमारे सामने रखता है। नालंदा महाविहारीय आर्य भिक्षु संघ की बहुत-सी मिट्टी की मुद्राएँ भी नालंदा में प्राप्त हुई हैं।

नालंदा का शिक्षाक्रम ऐसा व्यावहारिक था कि छात्र पढ़कर दैनिक जीवन में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करते थे। यहाँ मुख्यतः पाँच विषयों की शिक्षा दी जाती थी।

Class 9th Hindi Chapter 2 Bharat ka Puratan Vidyapith Nalanda

जैसे-भाषा का सम्यक् ज्ञान के लिए-शब्द विद्या या व्याकरण की, विषय-वस्तु की परख के लिए तर्कशास्त्र की. स्वास्थ्य ज्ञान के लिए चिकित्साशास्त्र की, अर्थ प्राप्ति के लिए-शिल्पशास्त्र की तथा इसके अतिरिक्त धर्म एवं दर्शनशास्त्र की। शील भद्र योगशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान थे। इनसे पहले इस संस्था के कुलपति धर्मपाल थे। शीलभद्र, ज्ञानचंद्र, प्रभामित्र, स्थिरमति, गुणमति आदि अन्य आचार्य युवानचंग के समाकलीन थे। जब युवानचंग यहाँ से विदा होने लगे तब शीलभद्र एवं अन्य भिक्षुओं ने उनसे आग्रह किया कि वे यहीं रह जाएँ। इस पर युवानचांग ने कहा कि यहाँ आने का मेरा उद्देश्य भगवान बुद्ध के महान धर्म की खोज करना तथा दूसरों को इस धर्म के विषय में समझाना था, ताकि लोग इस धर्म के प्रति आकृष्ट हों और प्रचार-प्रसार कर सकें।

नालंदा के विद्वानों ने विदेशों में जाकर ज्ञान का प्रसार किया। तिब्बत के प्रसिद्ध सम्राट सांग छन गम्पों ने अपने देश में भारतीय लिपि तथा ज्ञान के प्रचार के लिए थोन्मिसम्भोट को बौद्ध और बाह्मण साहित्य की शिक्षा प्राप्त करने नालंदा भेजा। इसके बाद नालंदा के कुलपति आचार्य शान्ति रक्षित सम्राट के आमंत्रण पर तिब्बत गए । इन्होंने ही सबसे पहले तिब्बत में बौद्ध विहार की स्थापना की थी। साहित्य तथा धर्म के क्षेत्र में भी नालंदा एक प्रसिद्ध केन्द्र था । लेखक अपनी अभिलाषा प्रकट करते हुए कहता है कि भूतकाल से शिक्षा लेते हुए नालंदा में पुनः ‘ज्ञान केन्द्र’ की स्थापना करें।

कहानी का प्‍लॉट लेखक शिवपूजन सहाय | Kahani ka Plot

इस पोस्‍ट में हमलोग शिवपूजन सहाय रचित कहानी ‘कहानी के प्‍लॉट(Kahani ka Plot)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

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Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 1 कहानी का प्‍लॉट

लेखक – शिवपूजन सहाय

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प्रस्तुत कहानी ‘कहानी का प्लॉट’ कहानीकार शिवपूजन सहाय की अमर कहानी है। इसमें कहानीकार ने सामाजिक कुरीतियों तथा दहेज की क्रूरता की शिकार भगजोगनी जैसी सुन्दरी की दुर्भाग्यपूर्ण नियति की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है कि किस प्रकार दानव-दहेज की निर्ममता के कारण बूढ़े वर का वरण करने को वह मजबूर हो जाती है। कहानी इस प्रकार है:

कहानीकार के गाँव के पास किसी गाँव में एक बूढ़े मुंशी जी रहते थे। उन्हें एक पुत्री थी, जिसका नाम भगजोगनी था। भगजोगनी का रूप नाम के अनुरूप था। मुंशीजी के बड़े भाई पुलिस दारोगा थे। लेकिन दारोगा ने जो कुछ कमाया, अपनी जिंदगी में ही फूक डाला। उनके मरने के बाद सिर्फ उनकी एक घोड़ी बची थी। मरने के बाद उसी घोड़ी को बेचकर दारोगा जी का श्राद्ध-कर्म खूब धूम-धाम से किया गया।

दारोगाजी के जमाने में मुंशीजी ने भी खूब घी के दीए जलाए । उनके मरते ही सारी अमीरी बालू की भीत की भाँति ढह गई। चूल्हा-चक्की भी ठंढ़ी हो गई। जो एक दिन बटेरा का शोरबा सुड़कता था, अब चंद चने चबाकर दिन गुजारने लगा। मुंशी जी की ऐसी दशा देखकर लोग कहने लगे- ‘थानेदारी की कमाई और फूस का तापना दोनों बराबर है। इतना ही नहीं, जो मुंशीजी चुल्लू के चुल्लू इत्र अपनी पोशाक पर मला करते थे, अब रूखी-सूखी देह में लगाने के लिए चुल्लू-भर कड़वा का तेल मिलना भी मुहाल हो गया। दारोगा जी के जमाने में मुंशीजी के चार-पाँच लड़के हुए पर सब के सब सुबह के चिराग हो गए। जब पाँची उँगलियाँ घी में थी तब कोई खाने वाला नहीं रहा, जब दोनों टाँग दरिद्रता के दलदल में आ फंसी तब एक लड़की पैदा हो गई। इसीलिए कहानीकार ने कहा भी है–किस्मत की फटी चादर का कोई रफूगर नहीं है।’ kahani ka plot shivpujan sahay

कहानीकार सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहता है कि तिलक-दहेज के जमाने में लड़की पैदा करना बड़ी भारी मूर्खता है, लेकिन युगधर्म का क्या दोष ? इस युग में अबला ही प्रबला हो रही है और पुरूष दल को स्त्रीत्व खदेड़े जा रहा है। बेचारे मुंशी जी जब घी तथा गरम मसाने उड़ाते थे तब लड़का पैदा होता था, परन्तु मटर के सत्तू खाने पर मजबूर हो गए तब लड़की पैदा हो गई। यह सच है कि अमीरी की कब्र पर पनपी हुई गरीबी बड़ी जहरीली होती है।

भगजोगनी रूप से तो अमीर थी किन्तु भाग्यहीन थी, क्योंकि जन्म लेते ही माँ के दूध से वंचित हो गई तथा मुंशीजी की फटेहाली में पैदा हुई। जिस दिन पहले-पहले कहानीकार ने उसे देखा, वह करीब ग्यारह-बारह वर्ष की थी। एक ओर कहानीकार उसकी अपूर्व सुन्दरता पर अभिभूत हो जाता है तो दूसरी ओर उसकी दर्दनाक गरीबी देखकर उनका कलेजा काँप जाता है। बेचारी उस उम्र में कमर में सिर्फ एक पतला चिथड़ा-सा लपेटे हुए थी, जो मुश्किल से उसकी लज्जा ढंकने में समर्थ थी। उसके सिर के बाल तेल बिना बुरी तरह बिखरकर बड़े डरावने हो गए थे । उसकी आँखों में अजीब ढंग की करूण-कातरता थी, जैसे दद्रिता-राक्षसी ने उस सुन्दर सुकुमारी का गला टीप दिया हो। इसीलिए कहा गया है-प्रकृत सुन्दरता के लिए कृत्रिम शृंगार की जरूरत नहीं होती, पर भगजोगनी गरीबी की चक्की में पिसी हुई थी, भला उसका सौन्दर्य कैसे खिल सकता था। वह तो दाने-दाने के लिए तरसती थी, एक बित्ता कपड़े के लिए मुहताज थी। सिर में लगाने के लिए एक चुल्लू अलसी का तेल भी सपना हो रहा था । महीने के एक दिन भी भरपेट दाने के लाले पड़े थे। भला हड्डियों के खंडहर में सौन्दर्य देवता कैसे टिके रहते। kahani ka plot shivpujan sahay

मुंशीजी अपना दुखड़ा लेखक को सुनाते हुए फूट-फूटकर रोने लगते हैं तथा बताते है कि बड़ी मुश्किल से दिन में एक-दो मुट्ठी चबेना मिल पाता है। स्थिति इतनी दयनीय है कि किसी की दी हुई मुट्ठी भर भीख लेने के लिए इसके तन पर फटा आँचल भी तो नहीं है। कभी-कभी भीख न मिलने के कारण भूखे रात गुजारनी पड़ती है। मेरी इस दुर्गति पर कोई रहम करने वाला नहीं है, उलटे सब लोग ताने के तीर बरसाते हैं । एक दिन वह था कि भाई साहब के पेशाब से चिराग जलता था और एक दिन यह भी है कि मेरी हड्डियाँ मुफलिसी की आँच से मोमबत्तियों की तरह घुल-घुलकर जल रही हैं। इस लड़की के हाथ पीले करने के लिए हाथ जोड़कर लोगों की बिनती की, पैरों पड़ा, इसकी सुन्दरता के बारे में बताया, परन्तु लाख गिड़गिड़ाने के बावजूद किसी का दिल न पिघला। उलटे दोष मढ़ने लगते हैं कि गरीब घर की लड़की चटोर तथा कंजूस होती है, जिस कारण खानदान बिगड़ जाएगा, फिर बिना तिलक-दहेज के तो बात करना भी नहीं चाहते हैं। हिंदू समाज के सारे कायदे भी अजीब ढंग के हैं।

लेखक दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पर चोट करता हुआ कहता है कि यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जो लोग मोल-भाव करके लड़के की बिक्री करते हैं, वे भले आदमी समझे जाते हैं; और कोई गरीब उसी तरह मोल-भाव करके लड़की को बेचता है तो वह कमीना माना जाता है। यही तो आज की सामाजिक व्यवस्था है। अपनी विवशता की कहानी लेखक को सुनाते-सुनाते गला रुंध गया और भगजोगनी को गोद में बैठाकर फूटफूटकर रोने लगे।

मुंशीजी की दास्तान सुनने के बाद उस रूपवती दरिद्र कन्या से विवाह करने के लिए लेखक ने भी अपने कई मित्रों से अनुरोध किया, परन्तु सबने उनकी बात अनसुनी कर दी, तब मुंशीजी ने अपनी छाती पर पत्थर रखकर इकतालीस-बयालीस साल के व्यक्ति के हाथों सौंपकर शादी की रस्में पूरी की। साल पूरा होते-होते मुंशीजी भी चलते बने। गाँववालों ने गले में घड़ा बाँधकर उन्हें नदी में डुबा दिया।

भगजोगनी का सौन्दर्य जब निखरा तब वह विधवा हो गई और उसने जवानी के उन्माद में सारी मर्यादाओं को तोड़कर अपना सर्वस्व अपने सौतेले बेटे को सुपुर्द कर उसे पति रूप में स्वीकार कर लिया।

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कक्षा 12 हिन्‍दी गाँव का घर | Gaon ka Ghar class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ तेरह ‘गाँव का घर (Gaon ka Ghar class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bseb Class 12th Hindi Chapter 13 गाँव का घर

कवि- ज्ञानेंद्रपति
लेखक- ज्ञानेंद्रपत
जन्म – 1 जनवरी 1950जन्म स्थान – पथरगामा, गोड्डा, झारखंड
निवास स्थान- वाराणसी, उत्तर प्रदेश
माता- सरला देवी
पिता- देवेंद्र प्रसाद चौबे

शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल मे ; बी०ए० और एम०ए० अंग्रेजी विषय में पटना विश्वविद्यालय से। फिर हिन्दी मे भी एम०ए० बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से

वृत्ति- बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित होकर कारा अधिक्षक के रूप मे कार्य करते हुए कैदियों के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम।

गाँव का घर कविता का भावार्थ
गाँव के घर के
अंत:पुर की वह चौखट
टिकुली साटने के लिए सहजन के पेड़ से छुडाई गई गोंद का गेह वह
वह सीमा

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

जिसके भीतर आने से पहले खाँस कर आना पडता था बुजुर्गों को
खड़ाऊँ खटकानी पड़ती थी खबरदार की
और प्राय: तो उसके उधर ही रूकना पड़ता था
एक अदृश्य पर्दे के पार से पुकारना पडता था
किसी को, बगैर नाम लिए
जिसकी तर्जनी की नोक धारण किए रहती थी, सारे काम सहज,
शंख के चिन्‍ह की तरह
गाँव के घर की
उस चौखट की बगल में
गेरू लिपी भीत पर
दूध-डूबे अँगूठे के छापे
उठौना दूध लाने वाले बूढ़े ग्‍वाला दादा के-
हमारे बचपन के भाल पर दुग्‍ध-तिलक-
महीने के अंत तक गिने जाते एक-एक कर

Gaon ka Ghar class 12 hindi

व्‍याख्‍या- प्रस्‍तुत पाठ ज्ञानेन्‍द्रपति द्वारा रचित कविता संग्रह ”संशयात्‍मा” से ली गई है। इसमें प्राचीन गाँव की विशेषता को बताया गया है। कवि कहते हैं कि गाँव के घर में महिलाएँ अपनी टिकुली साटने के लिए सहजन के पेड़ की गोद का उपयोग करती थी। जिस घर में महिलाएँ रहती है, वहाँ बुजुर्ग लोग खाँस कर आते थे तथा महिलाओं को अपनी खड़ाऊ की आवाज से घबरदार करते थे तथा चौखट से बाहर ही उनलोगों को रूकना पड़ता था। पर्दे के पीछे से ही महिलाओं को पुकारना पड़ता था। किसी को बगैर नाम लिए पुकारना पड़ता था। शंख की चिन्‍ह की तरह तर्जनी अंगुली के इशारे पर महिलाएँ घर की सारे काम बहुत आसानी से करनी पड़ती थी। गाँव की घर की चौखट के बगल की दीवार लाल रंग की खड़िया मिट्टी से लिपी हुई है। उस पर दूध में डूबे अँगूठे के छापे बनाए गए हैं। ये छाप उस ग्‍वाल दादा के हैं जो हमारे बचपन में प्रतिदिन दुध लाया करते थे। ये चिन्‍ह हमारे बचपन के मस्‍तक पर दुगध तिलक के होते थे और इन चिन्‍हों को महिने के अंत में गिने जाते थे। अर्थात कवि के कहने का अर्थ है कि दुध का हिसाब उन चिन्‍हों से किया जाता था।

 

गाँव का वह घर अपना गाँव खो चका है
पंचायती राज में जैसे खो गए पंच परमेश्वर
बिजली-बत्ती आ गई कब की, बनी रहने से अधिक गई रहनेवाली
अबके बिटौआ के दहेज मे टी०वी० भी
लालटेनें है अब भी, दिन-भर आलो मे कैलेंडरो से ढंकी-
रात उजाले से अधिक अँधेरा उगलतीं
अँधेरे मे छोड़ दिए जाने के भाव से भरतीं
जबकि चकाचौंध रोशनी मे मदमस्त आर्केस्ट्रा बज रहा है कहीं, बहुत दूर,
पट भिड़काए
कि आवाज भी नहीं आती यहाँ तक, न आवाज की रोशनी,
न रोशनी की आवाज
होरी-चैती बिरहा-आल्हा गुँगे
लोकगीतों की जन्मभूमि में भटकता है
एक शोकगीत अनगाया अनसुना
आकाश और अँधेरे को काटते
दस कोस दूर शहर से आने वाला सर्कस का प्रयास-बुलौआ
तो कब का मर चुका है
कि जैसे गिर गया हो गजदंतो को गँवाकर कोई हाथी
रेते गए उन दाँतो की जरा-सी धवल धूल पर

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

छीज रहे जंगल मे,
लीलने वाले मुँह खोले, शहर मे बुलाते हैं बस
अदालतों और अस्पतालों क फैले-फैले भी रुँधते-गँधाते अमित्र परिसर
कि जिन बुलौओं से
गाँव के घर की रीढ़ झुरझुराती है

Gaon ka Ghar class 12 hindi

व्‍याख्‍या- प्रस्‍तुत पाठ में कवि ने ग्रामीण सभ्‍यता को खो देने से दुखी होकर गाँव की संस्‍कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं, वह प्राचीन गाँव की परंपरा आधुनिक गाँव से करते हैं। वे कहते हैं कि हमलोगों के जमाने का गाँव अब अपना गाँव खो चुका है। पंचायती राज में पंच परमेश्‍वर अब खो चुके हैं। अर्थात अब लोग पंचों की फैसलों को नहीं मान रहे हैं यानी पंचायती राज में पंचपरमेश्‍वर की परंपरा समाप्‍त हो गई है। गाँव में अब बि‍जली बत्ती आ गई है, लेकिन वह बहुत कम समय तक रहती है। अब बेटों के दहेज में टी.वी भी मिल रही है। घर में लालटेनें भी है, लेकिन वह दिन-भर कहीं अलमीरा के कोनों में कलेंडरों से ढ़की रहती है। रात अब उजाले से अधिक अंधेरा रहती है। अधिकतर समय अंधेरा ही रहता है। जबकि घर से बहुत दूर चकाचौंध रोशनी में कहीं आर्केस्‍टा बजता है। उसका न आवाज आती है और न ही उसका रौशनी पहुँच पाता है।

अब गाँवों में पुराने लोकगीत होरी, चैती, बिरहा और आल्‍हा भी कहीं नहीं गाया जाता है। गाँव लोकगीतों की जन्‍मभूमि होती है, लेकिन यहाँ से लोकगीत खत्‍म हो गए हैं। लोकगीतों की जगह पर अनगाया अनसुना शोकगीत अँधेरे में कहीं बजता है।

Gaon ka Ghar class 12 hindi

दस कोस दूर से शहर से सर्कस का प्रकाश लोागों को सर्कस दिखाने के लिए आता था, जिस प्रकाश की परंपरा समाप्‍त हो गई। ऐसा हो गया है जैसे हाथी अपनी दाँतों को गँवाकर कहीं गीर गया है। उनके दाँतों को रेतने से निकलती जो सफेद धुल (दंत के अवशेष) पूरे जंगल में नष्‍ट हो रहें हैं। जंगल को नष्‍ट करने वाले लोग शहरों की ओर बुला रहे हैं। शहर सिर्फ शोषण करने के लिए बुलाते हैं‍

अदालतों और अस्‍पतालों का वातावरण भी बिल्‍कुल बदल चुका है, जिनके बारे में में सोचकर गाँव की घरों की परंपरा झुरझुरा रही है।

इस कविता में कवि ने गाँवों की परंपरा के बारे में बताए हैं कि कैसे शहर हमारी परंपरा को नष्‍ट कर रहे हैं।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी हार-जीत | Har-Jeet class 12 hindi

 

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ बारह ‘हार-जीत (Har-Jeet class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

Har-Jeet class 12 hindi
Bseb Class 12th Hindi Chapter 12 हार-जीत

कवि- अशोक वाजपेयी
लेखक-परिचय
जन्म : 16 जनवरी 1941
जन्मस्थान : दुर्ग, छतीसगढ़
माता-पिता : निर्मला देवी और परमानंद वाजपेयी

शिक्षा: गवर्नमेंट हायर सेकेंडी स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा, सागर विश्वविद्यालय से बी.ए। सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली से अंग्रेजी में एम.ए

वृति :- भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी

सम्मान- साहित्य अकादमी पुरस्कार, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान

कृतियाँ : कहीं नहीं वहीं, एक पतंग अनंत में, शहर अब भी संभावना है, थोड़ी सी जगह, आविन्यों, फिलहाल तीसरा साक्ष्य, बहुरि अकेला।

हार-जीत

वे उत्सव मना रहे हैं। सारे शहर में रोशनी की जा रही है। उन्हें बताया गया है कि

उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं।

प्रस्तुत पंक्तियाँ हार-जीत शीर्षक गद्य कविता से ली गई है जिसके रचनाकार अशोक वाजपेयी है। इन पंक्तियों में कवि ने राजनीतिक झूठ को उजागर किया है। कवि कहते है नेता जनता को दिग्भ्रमित करते है और उन्हे वास्तविकता से दूर करते है। वाजपेयी जी ने इस कविता में जनता और शासक का सही चित्रण प्रस्तुत किया है। शासक वर्ग भोली-भाली जनता को गुमराह करके खुद सुख भोगती है। कवि ने जनता को जागरूक करने का प्रयास किया है ।

नागरिकों में से ज़्यादातर को पता नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे, युदध किस बात पर था। यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त है। उन्हे सिर्फ इतना पता है कि उनकी विजय हई। उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ हार-जीत शीर्षक गद्य कविता से ली गई है जिसके रचनाकार अशोक वाजपेयी है। इन पंक्तियों में कवि ने राजनीतिक झूठ को उजागर किया है। कवि कहते हैं कि भोली-भाली जनता को बताया जाता है कि युद्ध में उनकी सेना विजयी होकर लौट रही है जबकि शहर के नागरिकों को ये भी पता नहीं कि ये युद्ध किनके बीच हो रहा है। युद्ध के होने का कारण क्या था। कवि कहना चाहते हैं कि सत्ताधारी लोग जनता को वास्तविकता से दूर रखते हैं लोगो को तो पता ही नहीं कि आखिर युद्ध किससे हो रहा है। जनता को यहीं बताया जाता है कि उनकी विजय हुई है।

Har-Jeet class 12 hindi

किसकी विजय हुई सेना की, कि शासक की, कि नागरिकों की ? किसी के पास पूछने का अवकाश नहीं है। नागरिकों को नहीं पता कि कितने सैनिक गए थे और कितने विजयी वापस आ रहे हैं।

प्रस्तुत पंक्तियाँ हार-जीत शीर्षक गद्य कविता से ली गई है जिसके रचनाकार अशोक वाजपेयी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने राजनीतिक झूठ को उजागर किया है। कवि कहते हैं कि भोली-भाली जनता को बताया जाता है कि युद्ध में उनकी सेना विजयी हुई है। लेकिन जनता को यह भी पता नहीं कि विजय सेना कि है या शासक की या नागरिकों की। यह बात पूछने के लिए किसी के पास समय भी नहीं है। नागरिकों को यह भी नहीं पता की कितने सैनिक गए थे और कितने वापस आ रहे है।

खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है। सिर्फ एक बूढ़ा मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हए कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं और गाजे-बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है। उस पर कोई ध्यान नहीं देता है और अच्छा यह है कि उस पर सड़कें सींचने भर की जिम्मेवारी है, सच को दर्ज करने या बोलने की नहीं।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

Har-Jeet class 12 hindi

प्रस्तत पंक्तियाँ हार-जीत शीर्षक गदय कविता से ली गई है जिसके रचनाकार अशोक वाजपेयी है। इन पंक्तियों में कवि ने राजनीतिक झूठ को उजागर किया है। कवि कहते है कि खेतों में रहने वाले अर्थात श्रमिक,मजदूर जिन्होने आजादी में अपना योगदान दिया उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। बूढ़ा मशकवाला सड़कों को सीचते हए देश के बदधिजीवी वर्ग की ओर से कहता है कि हमलोग एक बार फिर हार गए है और गाने-बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है। लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं देता और अच्छा है क्योंकि वह राजनीति की ज़िम्मेदारी से मुक्त है।

जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे है।

प्रस्तुत पंक्तियाँ हार-जीत शीर्षक गदय कविता से ली गई है जिसके रचनाकार अशोक वाजपेयी है। इन पंक्तियों में कवि ने राजनीतिक झूठ को उजागर किया है। लेखक के अनुसार शासक और सत्ताधारी वर्ग कभी भी अपनी हार की घोषणा नहीं करता है। वह अपनी हार को भी विजय के रूप में प्रस्तुत करता है तथा जनता को यह स्वीकार करने के लिए विवश करता है कि वह उसे बलवान और समर्थवान समझे।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी प्‍यारे नन्‍हें बेटे को | Pyare Nanhe Bete ko class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ ग्‍यारह ‘प्‍यारे नन्‍हें बेटे को (Pyare Nanhe Bete ko class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

payare nanhe bete class 12 hindi
Bseb Class 12th Hindi Chapter 11 प्‍यारे नन्‍हें बेटे को

कवि- विनोद कुमार शुक्‍ल
लेखक-परिचय
जन्म : 1 जनवरी 1937
जन्मस्थान : राजनांदगाँव (छतीसगढ़)

वृति : इन्दिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में एसोशिएट प्रोफेसर
सम्मान : रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992), दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान(1997), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999)

कृतियाँ : लगभग जयहिंद (प्रथम कविता संग्रह), वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह (1981), सबकुछ होना बचा रहेगा (1992), अतिरिक्त नहीं (2001), नौकर का कमीज, पेड़ पर कमरा

प्यारे नन्हें बेटे को
कंधे पर बैठा
मैं दादा से बड़ा हो गया
सुनना यह ।

Pyare Nanhe Bete ko class 12 hindi

प्यारी बिटिया से पूछंगा
बतलाओ आसपास
कहाँ-कहाँ लोहा है
चिमटा,करकुल सिगड़ी
समसी दरवाजे की साँकल कब्जे
खिला दरवाजे में फँसा हआ
वह बोलेगी झटपट।

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित कविता ‘प्यारे नन्हें बेटो को’ से ली गई है जिसमें कवि ने अपने नन्हें बेटे को कंधे पर बैठाया है। बेटा कहता है कि वह अब दादा से भी बड़ा हो गया है।

कवि प्यारी बिटिया से पूछता है कि बताओ हमारे आसपास लोहा कहाँ है ? बिटिया झटपट बोलेगी लोहा चिमटा, करछुल, लोहे की कड़ाही, सँड़सी, दरवाजे की जंजीर और दरवाजे में लगे कब्जे में है लोहा दरवाजे में लगी मोटी कांटी में भी है।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

रुककर वह फिर याद करेगी।
एक तार लोहे का लंबा
लकड़ी के दो खंबों पर
तना बधा हआ बाहर
सुख रही जिस पर
भैय्या की गीली चडडी !
फिर-एक सैफटी पिन साइकिल पूरी

आसपास वह ध्यान करेगी
सोचेगी
दुबली पतली पर
हरकत में तेजी कि
कितनी जल्दी
जान जाए वह
आसपास कहाँ-कहाँ लोहा है

Pyare Nanhe Bete ko class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित कविता ”प्यारे नन्हें बेटो को” से ली गई है जिसमे कवि अपनी प्यारी बेटी से पूछता कि आसपास लोहा कहाँ है और वह कुछ सोचकर जवाब देती है लकड़ी के दो खंभो पर तना बंधा तार लोहे का है जिसपर नन्हें भाई के गीले कपड़े सूख रहे हैं। इसके अलावा सेफ़्टी पिन और पूरी साईकिल लोहे की बनी है।

पुनः वह अपने आसपास ध्यान करेगी सोचेगी। वह शरीर से भले ही दुबली पतली हो लेकिन वह सजग है। वह बहुत जल्द जान लेती है कि आसपास लोहा कहाँ है।

मैं याद दिलाऊँगा
जैसे सिखलाऊँगा बिटिया को
फावड़ा, कुदाली
टँगिया, बसुला, खुरपी
पास खड़ी बैलगाड़ी के
चक्‍के का पट्टा,
बैलों की गले में
काँसे की घंटी के अंदर
लोहे की गोली।

पत्नी याद दिलाएगी
जैसे समझाएगी बिटिया को
बाल्टी सामने कुएं में लगी लोहे की घिर्री
छत्ते की काड़ी-डंडी और घमेला
हँसिया चाकू और
भिलाई बलाडिला
जगह जगह लोहे के टीले

प्रस्तत पंक्तियाँ विनोद कमार शुक्ल द्वारा रचित कविता ”प्यारे नन्हें बेटो को” से ली गई है जिसमें कवि अपनी प्यारी बेटी को याद दिलाता है कि फावड़ा, कुदाल, टंगीया, बसुला और खुरपी सब लोहा है। पास खड़ी बैलगाड़ी के चक्के का पट्टा और बैलों के गले में कांसे की घंटी के अंदर लोहे की गोली है।

पुनः लेखक की पत्नी याद दिलाती है जैसे अपनी प्यारी बेटी को समझाती हो कि बाल्टी और सामने के कुएं में लगी लोहे की घिरनी, छते की काड़ी, डंडी और घमेला, हंसियाँ, चाकू सब लोहा है। भिलाई और बलाडिला में जगह-जगह लोहे के टीले है।

इसी तरह
घर भर मिलकर
धीरे धीरे सोच सोचकर
एक साथ ढूँढेंगे
कहाँ-कहाँ लोहा है-
इस घटना से
उस घटना तक
कि हर वो आदमी
जो मेहनतकश
लोहा है

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

Pyare Nanhe Bete ko class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित कविता ”प्यारे नन्हें बेटो को” से ली गई है जिसमें कवि अपनी प्यारी बेटी से कहते हैं कि घर के सभी लोग मिलकर सोचेंगे और एक साथ ढूँढ़ेंगे कि लोहा कहाँ-कहाँ है। कवि को महसुस होता है लोहा कदम-कदम पर व्याप्त है। कवि महसूस करता है कि हर वो व्यक्ति जो परिश्रम के सहारे अपनी जीविका चलता है लोहा है।

हर वो औरत
दबी सतायी
बोझ उठाने वाली, लोहा !
जल्दी जल्दी मेरे कंधे से
ऊंचा हो लड़का
लड़की का हो दुल्हा प्यारा
उस घटना तक
कि हर वो आदमी
जो मेहनतकश
लोहा है
हर वो औरत
दबी सतायी
बोझ उठाने वाली लोहा

प्रस्तुत पंक्तियाँ विनोद कुमार शुक्ल दवारा रचित कविता ”प्यारे नन्हें बेटो को” से ली गई है जिसमे कवि अपनी प्यारी बेटी कहते हैं कि वो प्रत्येक औरत जो अत्याचार सह रही है जो दुखों का बोझ उठा रही है लोहा है।

प्यारी बिटिया का पिता सोचता है कि उसका बेटा जल्दी से बड़ा हो जाए और उसकी लड़की को प्यारा सा दूल्हा मिल जाए, जिसके साथ उसकी शादी हो सके। इस प्रकार कवि महसूस करता है कि हर वो व्यक्ति जो परिश्रम के सहारे अपनी जीविका चलता है लोहा है। जो सतायी जा रही है लोहा है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी अधिनायक | Adhinayak class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ दस ‘अधिनायक (Adhinayak class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

Adhinayak class 12 hindi
Bseb Class 12th Hindi Chapter 10 अधिनायक

कवि- रघुवीर सहाय
लेखक-परिचय
जीवनकाल : 9 दिसंबर 1929-30 दिसंबर 1990
जन्मस्थान : लखनऊ, उत्तरप्रदेश
पिता- हरदेव सहाय (शिक्षक)
शिक्षा : एम. ए (अँग्रेजी), लखनऊ विश्वविद्यालय
विशेष अभिरुचि :- संगीत सुनना और फिल्म देखना
वृति : पत्रकारिता (नवजीवन, नवभारत टाइम्स के लिए)

कृतियाँ : कविता :- सीढ़ियों पर धूप में, दूसरा सप्तक, आत्महत्या के विरुद्ध, हंसो-हंसो जल्दी हंसो, लोग भूल गए है।

कहानियाँ :- सीढ़ियों पर धूप में ,रास्ता इधर से है, जो आदमी हम बना रहे है।

निबंध:- सीढ़ियों पर धूप में, दिल्ली मेरा परदेस, लिखने का कारण, वे और नहीं होंगे जो मारे जाएंगे।

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने
जिसका गुन हरचरना गाता है

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ रघुबीर सहाय द्वारा लिखित कविता अधिनायक से ली गई है जिसके माध्यम से कवि कहते हैं कि पता नहीं राष्ट्रगीत में वह भाग्य विधाता कौन है जिसका गुणगान फटा सुथन्ना पहने हरचरना कर रहा है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी पता नहीं किसका गुणगान किया जा रहा है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चँवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है

Adhinayak class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ रघबीर सहाय द्वारा लिखित कविता अधिनायक से ली गई है जिसके माध्यम से कवि पूछते हैं कि मखमल के वस्त्र धारण किए हुए, टमटम पर सवार बल्लम, तुरही आदि राजसी प्रतिकों के साथ पगड़ी धारण किए हए सिर के ऊपर छाता और जिसके आगे-पीछे लोग चँवर हिला रहे है जो अपने स्वागत मे तोपों की सलामी दिलवाता है और जो ढोल-नगाड़े बजवाकर अपनी जय-जयकार करवा रहा है वह कौन है।

पूरब-पश्चिम से आते है
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

Adhinayak class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ रघुबीर सहाय द्वारा लिखित कविता अधिनायक से ली गई है जिसके माध्यम से कवि कहते हैं कि राष्ट्रीय त्योहारों पर सभी दिशाओ से जनता नंगे पाँव आती है। गरीबी के कारण वे कंकाल की तरह प्रतीत होते है। गरीब किसानों की कमाई जन प्रतिनिधियों द्वारा हड़प लिया जाता है और उनके अधिकारों का मेडल भी इनके द्वारा लिया जाता है। कवि पूछते है कि आखिर ये तमगे लगवाने वाला कौन है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है |

प्रस्तुत पंक्तियाँ रघुबीर सहाय द्वारा लिखित कविता अधिनायक से ली गई है जिसके माध्यम से कवि कहते हैं कि इस लोकतान्त्रिक देश में वह महाबली कौन है जो गरीब और मध्यमवर्गीय लोगो के मन पर अपना अधिकार जमा रहा है। लोग ना चाहते हुए भी विवश मन से उसका गुणगान कर रहे है वह महाबली कौन है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी जन-जन का चेहरा एक | Jan-Jan ka Chehra Ek class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ नौ ‘जन-जन का चेहरा एक (Jan-Jan ka Chehra Ek class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

Jan-Jan ka chehra ek class 12 hindi
Bseb Class 12th HindiChapter 9 जन-जन का चेहरा एक

कवि- गजानन माधव मुक्तिबोध
लेखक-परिचय
जीवनकाल : 13 नवंबर 1917-11 सितंबर 1964
जन्मस्थान : श्योपुर, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
माता-पिता : पार्वती बाई और माधवराज मुक्तिबोध
शिक्षा : उज्जैन, विदिशा, अमझरा, सरदारपुर में प्रारम्भिक शिक्षा

1930 में उज्‍जैन के माधव कॉलेज से ग्वालियर बोर्ड की मिडिल परीक्षा में असफल 1931 में सफलता प्राप्‍त, 1935 में माधव कॉलेज से इंटरमीडीएट। 1937 में बी.ए में असफल, 1938 में सफलता, 1953 में नागपुर में हिन्दी से एम.ए

अभिरुचि : अध्ययन-अध्यापन, लेखन, पत्रकारिता, राजनीति

कृतियाँ : चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल (कविता संग्रह), काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी, नई कविता का आत्मसंघर्ष, मुक्तिबोध रचनावली, (6 खंडों में)

जन-जन का चेहरा एक
चाहे जिस देश प्रांत पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक !

Jan-Jan ka Chehra Ek class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है | कवि कहते हैं कि कोई व्यक्ति चाहे किसी भी देश या प्रांत का निवासी हो उन सबमें समानता पाई जाती है।

एशिया की, यूरोप की अमरीका की
गलियों की धूप एक
कष्ट-दुख संताप की
चेहरों पर पड़ी हई झरियों का रूप एक !
जोश में यों ताकत से बंधी हुई
मुठियों का एक लक्ष्य !

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि कोई व्यक्ति चाहे किसी भी देश या प्रांत का निवासी हो उन सबमें समानता पाई जाती है। एशिया यूरोप अमेरिका सभी जगह सूर्य अपनी किरणें समान रूप से बिखेरता है। कष्ट अथवा दुख में व्यक्ति के चेहरे पर पड़ने वाली रेखाएँ, झुर्रियां एक समान होती है जोश में अथवा ताकत में बंधी मुठियाँ एक समान होती है और उनका लक्ष्य भी एक होता है।

पृथ्वी के गोल चारों ओर के धरातल पर
है जनता का दल एक, एक पक्ष ।
जलता हुआ लाल कि भयानक सितारा एक
उद्दीपित उसका विकराल सा इशारा एक

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता मार्क्सवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने प्राणियों की समस्याओं की चर्चा की है। कवि कहते हैं कि सभी प्राणियों की समस्याएँ, भावनाएं समान है लेकिन इस संसार में विभिन्नता है। कवि कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार सारे संसार में सूर्य एक है और अपनी रौशनी सभी चीजों पर समान रूप से बिखेरता है।

गंगा में, इरावती में, मिनाम में
अपार अकुलाती हुई,
नील नदी, आमेजन, मिसौरी में वेदना से गति हुई
बहती-बहाती हुई जिंदगी की धारा एक;
प्यार का इशारा एक, क्रोध का दुद्धारा एक।

Jan-Jan ka Chehra Ek class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है कवि कहते हैं कि गंगा, इरावती, मिनाम, नील, आमेजन, मिसौरी इन सब में अपार जल प्रवाहित होता रहता है। इनके जलों में कोई मौलिक अंतर नहीं है। ये नदियाँ मनुष्य को निरंतर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। ये नदियाँ प्यार और क्रोध दोनों का संदेश देती है।

पृथ्वी का प्रसार
अपनी सेनाओं से किए हुए गिरफ्तार,
गहरी काली छायाएँ पसारकर,
खड़े हुए शत्रु का काले से पहाड़ पर
काला-काला दुर्ग एक,
जन शोषक शत्र एक

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि इस संसार में दुष्ट लोग अनेक अत्याचार करते है। वे अपनी काली छाया सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैला रहे हैं। ये लोग मानवता के दुश्मन है और इन्होंने अपनी अमानवीय कार्यों तथा शोषण का किला खड़ा कर दिया है। जनता का शोषण करने वाले ये सभी शत्रु एक है।

आशामयी लाल-लाल किरणों से अंधकार
चीरता सा मित्र का स्वर्ग एक;
जन-जन का मित्र एक।

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता मार्क्सवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि आज दुनिया में आर्थिक विषमता और शोषण का अंधकार छाया हआ है। इस अंधकार को आशामयी लाल किरणें अर्थात समाजवाद द्वारा ही दूर किया जा सकता है। कवि कहते हैं कि इस अंधकार के समाप्त होते ही सर्वत्र स्वर्ग की तरह शांति हो जाएगी।

विराट प्रकाश एक क्रांति की ज्वाला एक
धड़कते वृक्षों में है सत्य का उजाला एक
लाख-लाख पैरों की मोच में है वेदना का तार एक,
हिये में हिम्मत का सितारा एक।
चाहे जिस देश प्रांत पर का हो
जन-जन का चेहरा एक।

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि प्रकाश का रूप एक है | सभी जगह होने वाली क्रांति की ज्वाला एक है। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में एक ही प्रकार के सत्य का संचार हो रहा है। लाखों लोगों के पैरो में एक ही प्रकार के मोच का अनुभव हो रहा है। शोषण के खिलाफ सभी के हृदय में एक ही प्रकार का साहस है।

एशिया के, यूरोप के, अमरीका के
भिन्न-भिन्न वास स्थान
भौगोलिक, ऐतिहासिक बंधनो के बावजूद,
सभी ओर हिंदुस्तान सभी ओर हिंदुस्तान।

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों वाले एशिया, यूरोप तथा अमेरिका में भौगोलिक और ऐतिहासिक विशिष्टता के बावजूद वे भारत की जीवन शैली से प्रभावित है।

सभी ओर बहनें है सभी ओर भाई है
सभी ओर कन्हैया ने गायें चराई है
जिंदगी की मस्ती की अकुलाती भोर एक
बंसी की धुन सभी ओर एक।

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते है कि भारत की संस्कृति में प्रत्येक स्थान पर भाई-बहन सा प्रेम है। यहाँ भगवान कृष्ण की छवि चारों ओर व्याप्त है। यहाँ हर जगह कृष्ण ने गाय चराई है। यहाँ जिंदगी में मस्ती भरी पड़ी है। सभी ओर कृष्ण के बंसी की धुन व्याप्त है।

दानव दुरात्मा एक,
मानव की आत्मा एक
शोषक और खूनी और चोर एक
जन-जन के शीर्ष पर,
शोषण का खड्ग अति घोर एक
दुनिया के हिस्सों में चारों ओर
जन-जन का युद्ध एक

Jan-Jan ka Chehra Ek class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि पूरे विश्व में दानव और दुरात्मा एक है। शोषक, खूनी और चोर एक है तथा दुनिया के हरेक हिस्से में दुरात्माओं, चोरों के खिलाफ युद्ध भी एक है।

मस्तक की महिमा
व अंतर की ऊष्मा से उठती है ज्वाला अति क्रुद्ध एक।
संग्राम का घोष एक,
जीवन का संतोष एक।

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि सभी जन समूह के मस्तिष्क की चिंता एक है और उनके हृदय की प्रबलता भी एक सी है। उनके भीतर क्रोध की ज्वाला भी एक सी है।

क्रांति का, निर्माण का, विजय का चेहरा एक,
चाहे जिस देश, प्रांत, पुर का हो
जन-जन का चेहरा एक !

प्रस्तुत पंक्तियाँ जन-जन का चेहरा एक शीर्षक कविता से ली गई है जिसके रचयिता मार्क्सवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध है। कवि कहते हैं कि क्रांति निर्माण और विजय का सेहरा एक जैसा होता है। चाहे वह किसी देश, किसी भी प्रांत और किसी भी गाँव का क्यों न हो ! आम आदमी का शोषण के खिलाफ जो संघर्ष है उसका मूल स्वर एक ही होता है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी उषा | Usha class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ आठ ‘उषा (Usha class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

Usha class 12 hindi
Bseb Class 12th Hindi Chapter 8 उषा

कवि – शमशेर बहादुर सिंह
लेखक-परिचय
जन्म : 13 जनवरी 1911
मृत्यु- 1993

जन्मस्थान : देहारादून, उत्तराखंड
माता-पिता : प्रभुदेई और तारीफ सिंह
शिक्षा : 1928 में हाई स्कूल, 1931 में इंटर, 1933 में बी.ए, 1938 में एम.ए
कृतियाँ : चुका भी नहीं हूँ मैं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता (1980) बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1982)

प्रात नभ था बहत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हआ चौका
[अभी गीला पड़ा है ]

Usha class 12 hindi

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित उषा शीर्षक कविता से ली गई है जिसमें कवि ने प्रातः कालीन दृश्य की चर्चा की है। कवि कहते हैं कि सूर्योदय से पूर्व का आसमान नीले शंख की तरह होता है।भोर का आसमान राख से लीपे हए चौके की तरह होता है जो अभी गीला ही है। कवि कहते हैं कि प्रभात कालीन वेला सौंदर्य की साम्राज्ञी होती है।

बहत काली सिल जरा से लाल केसर से
कि जैसे धूल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने

Usha class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित उषा शीर्षक कविता से ली गई है जिसमे कवि ने प्रातः कालीन दृश्य की चर्चा की है। कवि कहते हैं कि भोर का आसमान राख से लीपे हए चौके की तरह होता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने लाल केसर वाली सिल को धो दिया गया है लेकिन उस पर केसर की आभा दिखाई दे रही है। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे स्लेट पर लाल खड़िया चाक मल दिया गया हो।

नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित उषा शीर्षक कविता से ली गई है जिसमें कवि ने प्रातः कालीन दृश्य की चर्चा की है। कवि कहते हैं कि नीला आकाश मानो नीले जल की भांति प्रतीत हो रहा है और सूर्य आकाश में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई सुंदरी नीले जल से बाहर आ रही हो और उसके गोरे रंग की आभा चारों तरफ फैल रहा हो।

और …..
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।

Usha class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ शमशेर बहादुर दवारा रचिर उषा शीर्षक कविता से ली गई है जिसमे कवि ने प्रातः कालीन दृश्य की चर्चा की है। कवि कहते है कि प्रातः कालीन समय सतरंगी होता है।

और आकाश राख से लिपे हए चौके की तरह प्रतीत होता है लेकिन सूर्योदय के बाद उषा रूपी सुंदरी की लालिमा और नीलिमा वाली शोभा नष्ट हो जाती है अर्थात उषा का जादू खत्म हो जाता है।

कड़‍बक कविता का अर्थ

कक्षा 12 हिन्‍दी पुत्र वियोग | Putra Viyog class 12 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के पद्य भाग के पाठ सात ‘पुत्र वियोग (Putra Viyog class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

Putra viyog class 12 hindi
Bseb Class 12th Hindi Chapter 7 पुत्र वियोग

कवियित्री-  सुभद्रा कुमारी चौहान
कवयित्री परिचय
जीवनकाल : 16 अगस्त 1904- 15 फरवरी 1948
जन्मस्थान : निहालपुर, इलाहाबाद उत्तरप्रदेश
माता-पिता : धिराज कुँवर और ठाकुर रामनाथ सिंह

शिक्षा : क्रास्थवेट गर्ल्स स्कूल, इलाहाबाद में प्रारम्भिक शिक्षा। इसी स्‍कूल में प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ पढ़ी थी।

9 वीं तक पढ़ाई के बाद असहयोग आंदोलन में भाग

कर्म क्षेत्र : समाज सेवा, राजनीति, स्‍वाधीनता संघर्ष में सक्रिय भागीदारी, अनेक बार कारावास, मध्‍य प्रदेश में काँग्रेस पार्टी की एम. एल. ए.।

कृतियाँ : मुकुल (कविता संग्रह,1930) त्रिधारा, बिखरे मोत्ती (कहानी संग्रह), सभा के खेल (कहानी संग्रह)

पुरस्कार :- मुकुल पर 1930 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘सेकसरिया पुरस्कार’

प्रस्तुत कविता मुकुल से ली गई है |

Putra Viyog class 12 hindi

पुत्र वियोग
आज दिशाएँ भी हँसती हैं
है उल्लास विश्व पर छाया
मेरा खोया हुआ खिलौना
अब तक मेरे पास न आया |

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री कहती है कि आज चारों ओर खुशी का वातावरण है और सारे संसार में खुशियाँ छाई है लेकिन ये खुशियाँ मेरे लिए व्यर्थ है क्योंकि मेरा खोया हुआ पुत्र अब तक मुझे प्राप्त नहीं हुआ। अर्थात कवयित्री के पुत्र का निधन हो गया है।

शीत न लग जाए, इस भय से
नहीं गोद से जिसे उतारा
छोड़ काम दौड़ कर आई
‘मा’ कहकर जिस समय पुकारा

Putra Viyog class 12 hindi

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमे उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मैंने शीत लगने के भय से उसे अपनी गोद से नहीं उतारा। उसने जब भी माँ कहके आवाज लगाई मैं अपना सारा काम-काज छोड़कर उसके पास दौड़कर आई ताकि उसकी जरूरतों को पूरा कर सकूँ।

थपकी दे दे जिसे सुलाया
जिसके लिए लोरियाँ गाईं,
जिसके मुख पर जरा मलिनता
देख आँखें में रात बिताई।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मैंने जिसके हरेक सुख का ध्यान रखा। जिसे थपकी दे कर सुलाया और जिसके लिए लोरियाँ गाई। उसके चेहरे पर छाई उदासी को महसूस करके जिसका रात भर जाग कर ख्याल रखा।

जिसके लिए भूल अपनापन
पत्थर को भी देव बनाया
कहीं नारियल दूध, बताशे
कहीं चढ़ाकर शीश नवाया।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मैंने जिसके लिए अपने सारे सुखों को भूला दिया। पत्थर को देवता मानकर जिसे नारियल दूध और बताशे चढ़ाएँ। जिसके लिए मैंने देवालयों में शीश नवाया वो आज मेरे पास नहीं है।

Putra Viyog class 12 hindi

फिर भी कोई कुछ न कर सका
छिन ही गया खिलौना मेरा
मैं असहाय विवश बैठी ही
रही उठ गया छौना मेरा।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मेरे द्वारा की गई पूजा अर्चना दुआएँ कोई भी काम नहीं आई। कोई भी मेरा कुछ नहीं कर सका और मेरा हृदय का टुकड़ा मुझसे छिन ही गया। मैं आज असहाय और विवश बैठी हूँ और मेरा नन्हा बच्चा मेरे आँखों के सामने ही भगवान को प्यारा हो गया।

तड़प रहे हैं विकल प्राण ये
मुझको पल भर शांति नहीं है
वह खोया धन पा न सकूँगी
इसमें कुछ भी भ्रांति नहीं है।

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मेरे प्राण तड़प रहे है और मुझे एक पल की भी शांति नहीं है। मैंने जो अनमोल धन खो दिया है उसे मैं अब वापस नहीं पा सकूँगी इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

फिर भी रोता ही रहता है
नहीं मानता है मन मेरा
बड़ा जटिल नीरस लगता है
सूना सूना जीवन मेरा।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मैं जानती हुँ कि मैं अपने पुत्र को प्राप्त नहीं कर सकती। फिर भी मेरा हृदय मेरा मन इस बात को मानने को तैयार नहीं है। मेरा जीवन अब कठिन और नीरस सा हो गया है।

यह लगता है एक बार यदि
पल भर को उसको पा जाती
जी से लगा प्यार से सर
सहला सहला उसको समझाती।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हुई कहती है कि यदि मैं अपने पुत्र को एक पल के लिए भी पा लेती तो उसे जी भर कर प्यार करती और उसे समझती कि वह अपनी माँ को यूं छोड़ कर ना जाए। लेकिन अब उसको पाना संभव नहीं है।

मेरे भैया मेरे बेटे अब
माँ को यों छोड़ न जाना
बड़ा कठिन है बेटा खोकर
माँ को अपना मन समझाना।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होंने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि मैं अपने पुत्र को अगर एक पल के लिए भी पा लेती तो उसे समझाती कि वह मझे छोड़कर न जाए। माँ के लिए अपने बेटे को खोकर अपने मन को सांत्वना देना बड़ा ही कठिन होता है।

भाई-बहिन भूल सकते हैं
पिता भले ही तुम्हें भुलावे
किन्तु रात-दिन की साथिन माँ
कैसे अपना मन समझावे।

प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता पुत्र वियोग से ली गई है जिसमें उन्होने एक माता के पुत्र खो जाने के बाद उसके मन की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कवयित्री अपने पुत्र को याद करती हई कहती है कि भाई-बहन तुम्हें भूल सकते है तुम्हारे पिता भले ही तम्हें भूल जाएँ लेकिन एक माँ जो दिन-रात अपने बच्चे के साथ रही हो वो कैसे अपने मन को समझा सकती है। कवयित्री कहना चाहती है कि माँ का हृदय बच्चे को कभी भी नहीं भूल सकता।

कड़‍बक कविता का अर्थ