कक्षा 12 भूगोल पाठ 5 भूसंसाधन तथा कृषि | Bhu Sansadhan tatha krishi class 12th Notes

इस लेख में बिहार बोर्ड कक्षा 12 भूगोल के पाठ पाँच ‘भूसंसाधन तथा कृषि (Bhu Sansadhan tatha krishi class 12th Notes)’ के नोट्स को पढ़ेंगे।

Bhu Sansadhan tatha krishi

अध्याय 5
भूसंसाधन तथा कृषि

आपके स्कूल की इमारत, सड़के जिन पर आप यात्रा करते हैं, क्रीड़ा उद्यान जहाँ आप खेलते हैं, खेत जिन पर फसलें उगाई जाती हैं एवं चरागाह जहाँ पशु चरते हैं

भू-उपयोग वर्गीकरण

भूराजस्‍व अभिलेख द्वारा अपनाया गया भू-उपयोग वर्गीकरण निम्‍न प्रकार है-

(1) वनों के अधीन क्षेत्र: यह जानना आवश्यक है कि वर्गीकृत वन क्षेत्र तथा वनों के अंतर्गत वास्तविक क्षेत्र दोनों पृथक हैं। सरकार

(2) बंजर व व्यर्थ-भूमि वह भूमि जो प्रचलित प्रौद्योगिकी की मदद से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती, जैसे-बंजर पहाड़ी भूभाग मरूस्थल, खडआदि को कृषि अयोग्य व्यर्थ-भूमि में वर्गीकृत किया गया है।

(3) गैर कृषि-कार्या में प्रयुक्त भूमि : इस संवर्ग में बस्तियाँ (ग्रामीण व शहरी) अवसंरचना (सड़कें, नहरें आदि) उद्योगों, दुकानों आदि हेतु भू-उपयोग सम्मिलित हैं। द्वितीयक व तृतीयक कार्यकलापों में वृद्धि से इस संवर्ग के भू-उपयोग में वृद्धि होती है।

(4) स्थायी चरागाह क्षेत्र : इस प्रकार की अधिकतर भूमि पर ग्राम पंचायत या सरकार का स्वामित्व होता है। इस भूमि का केवल एक छोटा भाग निजी स्वामित्व में होता है। ग्राम पंचायत के स्वामित्व वाली भूमि को ’साझा संपति संसाधन’ कहा जाता है।

(5) विविध तरू-फसलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र : इस संवर्ग में वह भूमि सम्मिलित है जिस पर उद्यान व फलदार वृक्ष हैं। इस प्रकार की अधिकतर भूमि व्यक्तियों के निजी स्वामित्व में है।

(8) पुरातन परती भूमि : यह भी कृषि योग्य भूमि है जो एक वर्ष से अधिक लेकिन पाँच वर्षो से कम समय तक कृषिरहित रहती है। अगर कोई भूभाग पाँच वर्ष से अधिक समय तक कृषि रहित रहता है तो इसे कृषि योग्य व्यर्थ भूमि संवर्ग में सम्मिलित कर दिया जाता है।

(9) निवल बोया क्षेत्र : वह भूमि जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती हैं, वह निवल बोया गया क्षेत्र कहलाता है।

भारत में भू-उपयोग परिवर्तन

(1) अर्थव्यवस्था का आकार, समय के साथ बढ़ता हैः जो बढ़ती जनसंख्या, बदलते आय-स्तर, उपलब्ध प्रौद्योगिकी व इसी से मिलते-जुलते कारकों पर निर्भर है। परिणामस्वरूप समय के साथ भूमि पर दबाव बढ़ता है तथा सीमांत भूमि को भी प्रयोग में लाया जाता है।

(2) दूसरा, समय के साथ अर्थव्यवस्था की संरचना में भी बदलाव होता है। दूसरे शब्दों में, द्वितीय व तृतीयक सेक्टरों में, प्राथमिक सेक्टर की अपेक्षा अधिक तीव्रता से वृद्धि होती है। इस प्रकार के परिवर्तन भारत जैसे विकासशील देश में एक सामान्य बात है। इस प्रकिया में धीरे-धीरे कृषि भूमि गैर-कृषि संबंधित कार्यो में प्रयुक्त होती है।

(3) तीसरा, यद्यपि समय के साथ, कृषि क्रियाकलापों का अर्थव्यवस्था में योगदान कम होता जाता है, भूमि पर कृषि क्रियाकलापों का दबाव कम नहीं होता। कृषि-भूमि पर बढ़ते दबाव के कारण हैं-

(अ) प्रायः विकासशील देशों में कृषि पर निर्भर व्यक्तियों का अनुपात अपेक्षाकृत धीरे-धीरे घटता है जबकि कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान तीव्रता से कम होता है।

(ब) वह जनसंख्या जो कृषि सेक्टर पर निर्भर होती है। प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है।    वन क्षेत्रों, गैर-कृषि कार्यो में प्रयुक्त भूमि, वर्तमान परती भूमि निवल बोया क्षेत्र आदि के अनुपात में वृद्धि के निम्न कारण हो सकते हैंः

(1) गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त क्षेत्र में वृद्धि दर अधिकतम है। इसका कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना है, जिसकी निर्भरता औद्योगिक व सेवा सेक्टरों तथा अवसंरचना संबंधी विस्तार पर उतरोतर बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त, गाँवों व शहरों में, बस्तियों के अंतर्गत क्षेत्रफल में विस्तार से भी इसमें वृद्धि हुई हैं। अतः गैर कृषि कार्यो में प्रयुक्त भूमि का प्रसार कृषि योग्य परंतु व्यर्थ भूमि तथा कृषि भूमि की हानि पर हुआ है।

(1) समय के साथ जैसे-जैसे कृषि तथा गैर कृषि कार्यों हेतु भूमि पर दबाव बढ़ा, वैसे-वैसे व्यर्थ एवं कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में समयानुसार कमी इसकी साक्षी है।

(2) चरागाह भूमि में कमी का कारण कृषि भूमि पर बढ़ता दबाव है। साझी चरागाहों पर गैर-कानूनी तरीकों से कृषि विस्तार ही इसकी न्यूनता का मुख्य कारण है।

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साझा संपति संसाधन

ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के जीवन-यापन में इन भूमियों का विशेष महत्व हैः क्योंकि इनमें से अधिकतर भूमिहीन होने के कारण पशुलापन से प्राप्त आजीविका पर निर्भर हैं। महिलाओं के लिए भी इन भूमियों का विशेष महत्व है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में चारा व ईधन लकड़ी के एकत्रीकरण की जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। इन भूमियों में कमी से उन्हें चारे तथा ईधन की तलाश में दूर तक भटकना पड़ता है।

भारत में कृषि भू-उपयोग

भू-संसाधनों का महत्व उन लोगों के लिए अधिक है जिनकी आजीविका कृषि पर निर्भर हैंः

(1) द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक क्रियाओं की अपेक्षा कृषि पूर्णतया भूमि पर आधारित है। अन्य शब्दों में, कृषि उत्पादन में भूमि का योगदान अन्य सेक्टरों में इसके योगदान से अधिक है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीनता प्रत्यक्ष रूप से वहाँ की गरीबी से संबंधित है।

कि भारत में निवल बोए गए क्षेत्र में बढ़ोतरी की संभावनाएँ सीमित हैं। अतः भूमि बचत प्रौद्योगिकी विकसित करना आज अत्यंत आवश्यक है। यह प्रौद्योगिकी दो भागों में बाँटी जा सकती हैं- पहली, वह जो प्रति इकाई भूमि में फसल विशेष की उत्पादकता बढ़ाएँ तथा दूसरी, वह प्रौद्योगिकी जो एक कृषि वर्ष में गहन भू-उपयोग से सभी फसलों का उत्पादन बढ़ाएँ। दूसरी प्रौद्योगिकी का लाभ यह है कि इसमें सीमित भूमि से भी कुल उत्पादन बढ़ने के साथ श्रमिकों की माँग भी पर्याप्त रूप से बढ़ती है। भारत जैसे देश में भूमि की कमी तथा श्रम की अधिकता है, ऐसी स्थिति में फसल सघनता की आवश्यकता केवल भू-उपयोग हेतु वांछित हैंः अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी जैसी आर्थिक समस्या को भी कम करने के लिए आवश्यक है। फसल गहनता की गणना निम्न प्रकार से की जाती हैः

कृषि गहनता : अर्थात् ;सकल बोया गया क्षेत्र निवल बोया गया क्षेत्र द्ध×100

भारत में फसल ऋतुएँ

हमारे देश के उतरी व आंतरिक भागों में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ-खरीफ, रबी व जायद के नाम से जानी जाती है। खरीफ की फसलें अधिकतर दक्षिण-पश्चिमी मानसून के साथ बोई जाती हैं जिसमें उष्ण कटिबंधीय फसलें सम्मिलित हैं, जैसे-चावल, कपास, जूट, ज्वार, बाजरा, व अरहर आदि।

कृषि के प्रकार

आर्द्रता के प्रमुख उपलब्ध स्रोत के आधार पर कृषि को सिंचित कृषि तथा वर्षा निर्भर (बारानी) कृषि में वर्गीकृत किया जाता है। सिंचित कृषि में भी सिंचाई के उदेश्य के आधार पर अंतर पाया जाता है, जैसे-रक्षित सिंचाई कृषि तथा उत्पादक सिंचाई कृषि। रक्षित सिंचाई का मुख्य उदेश्य आर्द्रता की कमी के कारण फसलों को नष्ट होने से बचाना है जिसका अभिप्राय यह है कि वर्षा के अतिरिक्त जल की कमी को सिंचाई द्वारा पूरा किया जाता है। इस प्रकार की सिंचाई का उद्देश्य अधिकतम क्षेत्र को पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध कराना है। उत्पादक सिंचाई का उद्देश्य फसलों को पर्याप्त मात्रा में पानी

उपलब्ध कराकर अधिकतम उत्पादकता प्राप्त करना है। उत्पादक सिंचाई में जल निवेश की मात्रा रक्षित सिंचाई की अपेक्षा अधिक होती है। वर्षानिर्भर कृषि भी कृषि ऋतु में उपलब्ध आर्द्रता मात्रा के आधार पर दो वर्गोः शुष्क भूमि कृषि तथा आर्द्र भूमि कृषि में बाँटी जाती है। भारत में शुष्क भूमि खेती मुख्यतः उन प्रदेशों तक सीमित है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेंटीमीटर से कम है। इन क्षेत्रों में शुष्कता को सहने में सक्षम फसलें जैसे-रागी, बाजरा, मूँग, चना तथा ग्वार (चारा फसलें) आदि

खाद्यान्न फसल

अनाज

भारत में कुल बोये क्षेत्र के लगभग 54 प्रतिशत भाग पर अनाज बोये जाते हैं। भारत विश्व का लगभग 11 प्रतिशत अनाज उत्पन्न करके अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर है। भारत विविध प्रकार के अनाजों का उत्पादन करता है जिन्हें उतम अनाजों (चावल, गेहूँ) तथा मोटे अनाजों (ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी) आदि में वर्गीकृत किया जाता है।

चावल

भारत की अधिकतर जनसंख्या का प्रमुख भोजन चावल है। यद्यपि यह एक उष्ण आर्द्र कटिबंधीय फसल है, इसकी 3000 से भी अधिक किस्में हैं जो विभिन्न कृषि जलवायु प्रदेशों में उगाई जाती हैं

दक्षिणी राज्यों तथा पश्चिम बंगाल में जलवायु अनुकूलता के कारण एक कृषि वर्ष में चावल की दो या तीन फसलें बोई जाती हैं। पश्चिम बंगाल के किसान चावल की तीन फसलें लेते हैं जिन्हें-औस, असन तथा बोरो कहा जाता है। परंतु हिमालय तथा देश के उतर-पश्चिम भागों में यह दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु में खरीफ के रूप में उगाई जाती है।

भारत विश्व का 21.2 प्रतिशत चावल उत्पादन करता है तथा चीन के बाद भारत का विश्व में दूसरा स्थान है देश के कुल बोए क्षेत्र के एक-चौथाई भाग पर चावल बोया जाता है। वर्ष 2015-16 में देश के प्रमुख चावल उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल, उतर प्रदेश पंजाब थे। चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार पंजाब, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल तथा केरल राज्यों में अधिक है। पंजाब व हरियाणा पारंपरिक रूप से चावल उत्पादक राज्य नहीं है।

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गेहूँ

भारत में चावल के पश्चात् गेहूँ दूसरा प्रमुख अनाज है। भारत विश्व का 11.7 प्रतिशत गेहूँ उत्पादन करता है यह मुख्यतः शीतोष्ण कटिबंधीय फसल है। अतः इसे शरद् अर्थात् रबी ऋतु में बोया जाता है। इस फसल का 85 प्रतिशत क्षेत्र भारत के उतरी मध्य भाग तक केंद्रित है अर्थात् उतर गंगा का मैदान, मालवा पठार तथा हिमालय पर्वतीय श्रेणी में 2700 मीटर सिंचाई तक का क्षेत्र है। रबी फसल होने के कारण यह सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में ही उगाया जाता है। लेकिन हिमालय के उच्च भागों में तथा मध्य प्रदेश के मालवा के पठारी क्षेत्र में यह वर्षा पर निर्भर फसल है।

ज्वार

देश के कुल बोये क्षेत्र के 16.5 प्रतिशत भाग पर मोटे अनाज बोये जाते हैं। इनमें ज्वार प्रमुख है जो कुल बोए क्षेत्र के 5.3 प्रतिशत भाग पर बोया जाता है। यह दक्षिण व मध्य भारत के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख खाद्य फसल है। महाराष्ट्र राज्य अकेला, देश की आधे से अधिक ज्वार उत्पादन करता है। अन्य प्रमुख ज्वार उत्पादनक राज्यों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्रप्रदेश तथा तेलंगाना हैं। दक्षिण राज्यों में यह खरीफ तथा रबी दोनों ऋतुओं में बोया जाता है। परंतु उतर भारत में यह खरीफ की फसल है तथा मुख्यतः चारा फसल के रूप में उगायी जाती हैं

बाजरा

भारत के पश्चिम तथा उतर-पश्चिम भागों में गर्म तथा शुष्क जलवायु में बाजरा बोया जाता है।

यह एकल तथा मिश्रित फसल के रूप में बोया जाता है। यह फसल देश के कुल बोये क्षेत्र के लगभग 5.2 प्रतिशत भाग पर बोई जाती है। बाजरा उत्पादक प्रमुख राज्य-महाराष्ट्र, गुजरात, उतर प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा है।

मक्का

मक्का एक खाद्य तथा चारा फसल है जो निम्न कोटि मिट्टी व अर्धशुष्क जलवायवी परिस्थितियों में उगाई जाती है। यह फसल कुल बोये क्षेत्र के केवल 3.6 प्रतिशत भाग में बोई जाती है। मक्का की कृषि किसी विशेष क्षेत्र में केंद्रित नहीं हैं। यह पूर्वी तथा उतर पूर्वी भारत को छोड़कर देश के लगभग सभी हिस्सों में बोई जाती है। मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान व उतर प्रदेश हैं।

दालें

दालें शाकाहारी भोजन के प्रमुख संघटक है। ये फलीदार फसलें है जो नाइट्रोजन योगीकरण के द्वारा मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरकता बढ़ाती है। भारत दालों का प्रमुख उत्पादक देश है।

देश के कुल बोये क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत भाग दालों के अधीन है। चना तथा अरहर भारत की प्रमुख दालें हैं।

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चना

चना उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों की फसल है। यह मुख्यतः वर्षा आधारित फसल है जो देश के मध्य, पश्चिमी तथा उत्तर-पश्चिमी भागों में रबी की ऋतु में बोई जाती है।

रेशेदार फसलें

कपास तथा जूट भारत की दो प्रमुख रेशेदार फसलें हैं।

कपास

कपास एक उष्ण कटिबंधीय फसल है जो देश के अर्ध-शुष्क भागों में खरीफ ऋतु में बोई जाती है। देश विभाजन के समय भारत का बहुत बड़ा कपास उत्पादन क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। यद्यपि पिछले 50 वर्षो में भारत में इसके क्षेत्रफल में लगातार वृद्धि हुई है। भारत, छोटे रेशे वाली (भारतीय) व लंबे रेशे वाली (अमेरिकन) दोनों प्रकार की कपास का उत्पादन करता है। अमेरिकन कपास को देश के उतर-पश्चिमी भाग में ’नरमा’ कहा जाता है। कपास पर फूल आने के समय आकाश बादलरहित होना चाहिए।

भारत का कपास के उत्पादन में विश्व में चीन के पश्चात् दूसरा स्थान है। देश के समस्त बोए क्षेत्र के लगभग 4.7 प्रतिशत क्षेत्र पर कपास बोया जाता है।

के तीन मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं। इसमें उतर-पश्चिम भारत में पंजाब, हरियाणा तथा उतरी राजस्थानः

जूट

यह पश्चिम बंगाल तथा इससे संस्पर्शी पूर्वी भागों की एक व्यापारिक फसल है। विभाजन के दौरान देश का विशाल जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्ला देश) में चला गया। आज विश्व का लगभग 60 प्रतिशत जूट उत्पादन करता है।

अन्य फसलें

गन्ना

गन्ना एक उष्ण कटिबंधीय फसल है। पश्चिम भारत में गन्ना उत्पादक प्रदेश महाराष्ट्र व गुजरात तक विस्तृत है। दक्षिण भारत में इसकी कृषि कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना व आंध्र प्रदेश के सिंचाई वाले भागों में की जाती है।

ब्राजील के बाद भारत दूसरा बड़ा गन्ना उत्पादक देश था यहाँ विश्व के 19 प्रतिशत गन्ने का उत्पादन होता है। देश के कुल शस्य क्षेत्र के 2.4 प्रतिशत भाग पर ही इसकी कृषि की जाती है। उतर प्रदेश देश का 40 प्रतिशत गन्ना उत्पादन करता है। इसके अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु आंध्र प्रदेश हैं। जहाँ इसका उत्पादन स्तर अधिक है। उतरी भारत में इसका उत्पादन कम है।

चाय

चाय एक रोपण कृषि है जो पेय पदार्थ के रूप में प्रयोग की जाती है। चाय की पतियों में कैफिन तथा टैनिन की प्रचुरता पाई जाती है। यह उतरी चीन के पहाड़ी क्षेत्रों की देशज फसल है। भारत में चाय की खेती 1840 में असम की ब्रह्रापुत्र घाटी में प्रारंभ हुई जो आज भी देश का प्रमुख चाय उत्पादन क्षेत्र है। भारत चाय का अग्रणी उत्पादक देश है तथा विश्व का लगभग 21.8 प्रतिशत चाय का उत्पादन करता है।

कॉफी

कॉफी एक उष्ण कटिबंधीय रोपण कृषि है। कॉफी की तीन किस्में हैंः अरेबिका, रोबस्ता व लिबेरिका हैं। भारत अधिकतर उतम किस्म की ‘अरेबिका‘ कॉफी का उत्पादन करता है, जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत माँग हैं। परंतु भारत में विश्व का केवल 3.7 प्रतिशत कॉफी का उत्पादन होता है। ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया तथा होंडुरास के बाद भारत का विश्व में सातवाँ स्थान है

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भारत में कृषि विकास

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार का तात्कालिक उद्देश्य खाद्योन्नों का उत्पादन बढ़ाना था, जिसमें निम्न उपाय अपनाए गए- (1) व्यापारिक फसलों की जगह खाद्यान्नों का उगाया जाना। (2) कृषि गहनता को बढ़ाना, तथा (3) कृषि योग्य बंजर तथा परती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करना।

1960 के दशक के मध्य में गेहूँ (मैक्सिको) तथा चावल (फिलिपींस) की किस्में- जो अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्में थीं, कृषि के लिए उपलब्ध हुई।

कृषि विकास की इस नीति से खाद्यान्नों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि ‘हरित क्रांति’ के नाम से जानी जाती है।

ऐसा 1970 के दशक के अंत तक रहा तथा 1980 के आरंभ इसके पशचात् यह प्रौद्योगिकी मध्य भारत तथा पूर्वी भारत के भागों में फैली।

कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा प्रौद्योगिकी का विकास

बहुत-सी फसलों जैसे- चावल तथा गेहूँ के उत्पादन तथा पैदावार में प्रभावशाली वृद्धि हुई है अन्य फसलों मुख्यः गन्ना, तिलहन तथा कपास के उत्पादन में प्रशंसनीय वृद्धि हुई है। सिंचाई के प्रसार ने देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसने आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी जैसे बिजों की उतम किस्में, रासायनिक खादों, कीटनाशकों तथा मशीनरी के प्रयोग के लिए आधार प्रदान किया है।

भारतीय कृषि की समस्याएँ

कृषि पारिरिस्थतिकी तथा विभिन्न प्रदेशों के ऐतिहासिक अनुभवों के अनुसार भारतीय कृषि की समस्याएँ भी विभिन्न प्रकार की हैं। अतः देश की अधिकतर कृषि समस्याएँ प्रादेशिक हैं।

अनियमित मानसून पर निर्भरता

भारत में कृषि क्षेत्र का केवल एक-तिहाई भाग ही सिंचित है। शेष कृषि क्षेत्र में फसलों का उत्पादन प्रत्यक्ष रूप से वर्षा पर निर्भर है। वर्ष 2006 और 2017 में महाराष्ट्र, गुजरात तथा राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में आई आकस्मिक बाढ़ इस परिघटना का उदाहरण है।

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निम्न उत्पादकता

अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अपेक्षा भारत में फसलों की उत्पादकता कम है। भारत में अधिकतर फसलों जैसे- चावल, गेहूँ, कपास व तिलहन की प्रति हेक्टेयर पैदावार अमेरिका, रूस तथा जापान से कम है।

भूमि सुधारों की कमी

भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान लंबे समय से शोषित हैं। अंग्रेजी शासन के दौरान, तीन भूराजस्व प्रणालियों-महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा जमींदारी में से जमींदारी प्रथा किसानों के लिए सबसे अधिक शोषणकारी रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्, भूमि सुधारों को प्राथमिकता दी गई, लेकिन ये सुधार कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण पूर्णतः फलीभूत नहीं हुए।

भूमि सुधारों के लागू न होने के परिणामस्वरूप कृषि योग्य भूमि का असमान वितरण जारी रहा जिससे कृषि विकास में बाधा रही है।

छोटे खेत तथा विखंडित जोत

भारत में सीमांत तथा छोटे किसानों की संख्या अधिक है। 60 प्रतिशत से अधिक किसानों पास एक हेक्टेयर से छोटे भूजोत हैं और लगभग 40 प्रतिशत किसानों की जोतों का आकार तो 0.5 हेक्टेयर से भी कम है। बढ़ती जनसंख्या के कारण इन जोतों का औसत आकार और भी सिकुड़ रहा है। इसके अतिरिक्त भारत में अधिकतर भूजोत बिखरे हुए हैं।

कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण

भूमि संसाधनों का निम्नीकरण सिंचाई और कृषि विकास की दोषपूर्ण नीतियों से उत्पन्न हुई समस्याओं में से एक गंभीर समस्या है।

सिंचित क्षेत्रों के फसल प्रतिरूप के दलहन (लेग्यूम) विस्थापित हो गई तथा बहु-फसलीकरण में बढ़ोतरी से परती भूमि में काफी मात्रा में कमी आई है। इससे भूमि में पुनः उरर्वकता पाने की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरूद्ध हुई है जैसे नाइट्रोजन योगीकरण। उष्ण कटिबंधीय आर्द्र व अर्ध शुष्क क्षेत्र भी कई प्रकार के भूमि निम्नीकरण से प्रभावित हुए हैं, जैसे जल द्वारा मृदा अपरदन तथा वायु अपरदन जो प्रायः मानवकृत हैं।

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