कक्षा 12 भूगोल पाठ 2 प्रवास, प्रकार, कारण और परिणाम | Pravas Prakar Karan aur Parinam class 12th Notes

इस लेख में बिहार बोर्ड कक्षा 12 भूगोल के पाठ दाे ‘प्रवास, प्रकार, कारण और परिणाम (Pravas Prakar Karan aur Parinam class 12th Notes)’ के नोट्स को पढ़ेंगे।

Pravas Prakar Karan aur Parinam

अध्याय 2
प्रवास, प्रकार, कारण और परिणाम

रामबाबू का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। 12 वर्ष की आंरभिक आयु में माध्यमिक स्तर का अध्ययन पूरा करने के लिए वह निकटवर्ती कस्बे आरा में चला गया। वह अपनी अभियांत्रिकी की डिग्री के लिए झारखंड में स्थित सिंदरी गया और बाद में भिलाई में उसे नौकरी मिल गई, जहाँ वह पिछले 31 वर्षो से रह रहा है। उसके माता-पिता अशिक्षित थे और उनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत कृषि से होने वाली अल्प आय थी।

अपनी पुस्तक ’मानव भूगोल के मूलभूत सिद्धांत’ में आप प्रवास की संकल्पना और परिभाषा को पहले ही समझ चुके हैं। प्रवास दिक् और काल के संदर्भ में जनसंख्या के पुनर्वितरण का अभिन्न अंग और एक महत्वपूर्ण कारक हैं। देश के विभिन्न भागों में प्रवासियों एक नामी कवि फिराक गोरखपुरी के शब्दों में:

(विश्व के  सभी भागों से लोगों के कारवाँ भारत में आते रहे और बसते रहे और इसी से भारत की विरचना हुई।)

विशेष रूप से मध्य पूर्व और पश्चिमी यूरोप के देशों अमेरिका, आस्ट्रेलिया और पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में प्रवास करते रहे।

भारतीय प्रसार

उपनिवेश काल (ब्रिटिश काल) के दौरान अंग्रेजों द्वारा उतर प्रदेश और बिहार से मॉरीशस, कैरेबियन द्वीपों (ट्रिनीडाड, टोबैगो और गुयाना) फिजी और दक्षिण अफ्रीकाः फ्रांसीसियों और जर्मनों द्वारा रियूनियन द्वीप, गुआडेलोप, मार्टीनीक और सूरीनाम में, फ्रांसीसी तथा डच लोगों और पुर्तगालियों द्वारा गोवा, दमन और दीव से, अंगोला, मोजांबिक व अन्य देशों में करारबद्ध लाखों श्रमिकों को रोपण कृषि में काम करने के लिए भेजा था। ऐसे सभी प्रवास (भारतीय उत्प्रवास अधिनियम) गिरमिट एक्ट नामक समयबद्ध अनुबंध के तहत आते थे।

थाइलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ब्रूनई, इत्यादि देशों में व्यवसाय के लिए गए और यह प्रवृति अब भी जारी है। 1970 के दशक में पश्चिम एशिया में हुई सहसा तेल वृद्धि द्वारा जनित श्रमिकों की माँग के कारण भारत से अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों का नियमित बाह्रा प्रवास हुआ। कुछ बाह्रा प्रवास उद्यमियों

प्रवासियों की तीसरी तरंग में डॉक्टरों, अभियंताओं (1960 के बाद) सॉफ्टवेयर अभियंताओं, प्रबंधन परामर्शदाताओं, वितीय विशेषज्ञों, संचार माध्यम से जुड़े व्यक्तियों और (1980 के बाद) अन्य समाविष्ट थे जिन्होंने सयुंक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किगंडम, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जर्मनी इत्यादि में प्रवास किया।

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प्रवास

वास्तव में प्रवास को 1881 ई॰ में भारत की प्रथम संचालित जनगणना से ही दर्ज करना आरंभ कर दिया गया था। इन आँकड़ों को जन्म के स्थान के आधार पर दर्ज किया गया था। परंतु 1961 की जनगणना में पहला मुख्य संशोधन किया गया था और उसमें दो घटक अर्थात् जन्म स्थान अर्थात् गाँव या नगर (यदि) तो निवास की अवधि सम्मिलित किए गए।

जनगणना में प्रवास पर निम्नलिखित प्रश्न पूछे जाते हैं: क्या व्यक्ति इसी गाँव अथवा शहर में पैदा हुआ है? यदि नहीं, तब जन्म के स्थान की (ग्रामीण/नगरीय) स्थिति, जिले और राज्य का नाम और यदि भारत से बाहर का है तो

भारत की जनगणना में प्रवास की गणना दो आधारों पर की जाती हैः (1) जन्म का स्थान, यदि जन्म का स्थान गणना के स्थान से भिन्न है (इसे जीवनपर्यत प्रवासी के नाम से जाना जाता है) : (2) निवास का स्थान, यदि निवास के पिछला स्थान गणना के स्थान से भिन्न है (इसे निवास के पिछले स्थान से प्रवासी के रूप में जाना जाता है)।

2001 की जनगणना के अनुसार देश के 102.9 करोड़ लोगों में से 30.7 करोड़ (30प्रतिशत) की रिपोर्ट प्रवासियों के रूप में की गई थी जो अपने जन्म के स्थान से अलग रह रहे थे। यद्यपि निवास के (पिछले स्थान के संदर्भ में यह संख्या 31.5 करोड़ (31प्रतिशत) थी।

प्रवास की धाराएँ

आंतारिक प्रवास के अंतर्गत चार धाराओं की पहचान की गई है : (क) ग्रामीण से ग्रामीण

 भारत में 2001 के दौरान पिछले निवास के आधार पर परिकलित 31.5 करोड़ प्रवासियों में से 9.8 करोड़ ने पिछले दस वर्षो में अपने निवास का स्थान बदल लिया है। इनमें से 8.1 करोड़ अंतःराज्यीय प्रवासी थे। इस धारा में स्त्री प्रवासी प्रमुख थी। इनमें से अधिकांश विवाहोपरांत प्रवासी थीं।

दोनों प्रकार के प्रवासों में थोड़ी दूरी के ग्रामीण से ग्रामीण प्रवास की धाराओं में स्त्रियों की संख्या सर्वाधिक हैं। इसके विपरीत आर्थिक कारणों की वजह से अंतर-राज्यीय प्रवास ग्राम से नगर धारा में पुरूष सर्वाधिक हैं।

जनगणना 2001 में अंकित है कि भारत में अन्य देशों से 50 लाख व्यक्यिों का प्रवास हुआ है। इनमें से 96 प्रतिशत पड़ोसी देशों से आए हैं : बांग्लादेश (30 लाख) इसके बाद पाकिस्तान (9 लाख) और नेपाल (5 लाख) इनमें तिब्बत, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और म्यांमार 1.6 लाख शरणार्थी भी समाविष्ट हैं। जहाँ तक भारत से उत्प्रवास का प्रश्न है, ऐसा अनुमान है कि भारतीय डायास्पोरा के लगभग 2 करोड़ लोग हैं जो 110 देशों में फैले हुए हैं।

प्रवास में स्थानिक विभिन्नता

महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्य उतर प्रदेश, बिहार इत्यादि जैसे अन्य राज्यों से प्रवासियों को आकर्षित करते हैं, 23 लाख आप्रवासियों के साथ महाराष्ट्र का सूची में प्रथम स्थान है, इसके बाद दिल्ली, गुजरात और हरियाणा आते हैं। दूसरी ओर उतर प्रदेश (-26 लाख) और बिहार (-17 लाख) वे राज्य हैं जहाँ से उत्प्रवासियों की संख्या सर्वाधिक है।

नगरीय समूहनों में से बृहत् मुंबई में सर्वाधिक संख्या में प्रवासी आए। इसमें अतं: राज्यीय प्रवास का भाग सर्वाधिक है। यह अंतर मुख्य रूप से राज्य के आकार के  कारण है जिसमें ये नगरीय समूहन स्थित हैं।

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प्रवास के कारण

इसके विविध कारण हो सकते हैं जिन्हें बृहत् रूप से दो संवर्गो में रखा जा सकता है :

(1) प्रतिकर्ष कारक जो लोगों को निवास स्थान अथवा उद्गम को छुड़वाने का कारण बनते हैं और

(2) अपकर्ष कारक जो विभिन्न स्थानों से लोगों को आकर्षित करते हैं।

कि पुरूषों और स्त्रियों के लिए प्रवास के कारण भिन्न हैं। उदाहरण के तौर पर काम और रोजगार पुरूष प्रवास के मुख्य कारण (38 प्रतिशत) रहे हैं जबकि यही कारण केवल 3 प्रतिशत स्त्रियों के लिए हैं। इसके विपरीत 65 प्रतिशत स्त्रियाँ विवाह के उपरांत अपने मायके से बाहर जाती हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण हैं, मेघालय इसका अपवाद है जहाँ स्थिति उलट है।

आर्थिक परिणाम

अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों द्वारा भेजी गई हुंडियाँ विदेशी विनिमय के प्रमुख स्रोत में से एक हैं। सन् 2002 में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों से हुंडियों के रूप में 110 खरब अमेरिकी डॉलर प्राप्त किए।

महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे औद्योगिक दृष्टि से विकसित राज्यों में गंदी बस्तियों (स्लम) का विकास देश में अनियंत्रित प्रवास का नकारात्मक परिणाम है। 

सामाजिक परिणाम

नवीन प्रौद्योगिकियों, परिवार नियोजन, बालिका शिक्षा इत्यादि से संबंधित नए विचारों का नगरीय क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर विसरण इन्हीं के माध्यम से होता है।

अन्य

स्रोत प्रदेश के दृष्टिकोण से यदि हुंडियाँ प्रवास के प्रमुख लाभ हैं तो मानव संसाधन, विशेष रूप से कुशल लोगों का ह्रास उसकी गंभीर लागत है। उन्नत कुशलता का बाजार सही मायने में वैश्विक बाजार बन गया है और सर्वाधिक गत्यात्मक औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ गरीब प्रदेशों से उच्च प्रशिक्षित व्यावसायिकों को सार्थक अनुपातों में प्रवेश दे रही है और भर्ती कर रही हैं। परिणामस्वरूप स्रोत प्रदेश के वर्तमान अल्पविकास को बल मिलता है।

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