Aavinyo VVI Subjective Questions – हिन्‍दी कक्षा 10 आविन्यों

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्‍दी के पाठ नौ ‘आविन्यों (Aavinyo VVI Subjective Questions)’ के महत्‍वपूर्ण विषयनिष्‍ठ प्रश्‍नों के उत्तर को पढ़ेंगे।

Aavinyo VVI Subjective Questions

Hindi Aavinyo VVI Subjective Questions आविन्यों

लेखक-अशोक वाजपेयी

लघु-उत्तरीय प्रश्न (20-30 शब्दों में)____दो अंक स्तरीय
प्रश्न 1. आविन्यों क्या है और वह कहाँ अवस्थित है? हर बरस आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है?                             (Text Book)
अथवा, प्रत्येक वर्ष आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है ?  (2014A)
उत्तर- आविन्यों मध्ययुगीन ईसाई मठ है। यह दक्षिणी फ्रांस में रोन नदी के किनारे अवस्थित है। आविन्यों फ्रांस का एक प्रमुख कलाकेंद्र रहा है। यहाँ गर्मियों में फ्रांस और यूरोप का एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रंग-समारोह प्रतिवर्ष होता है।                                                 

प्रश्न
2. नदी के तट पर बैठे हए लेखक को क्या अनुभव होता है?  (Text Book)

उत्तर- नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को लगता है कि जल स्थिर है और तट ही बह रहा है। उन्हें अनुभव हो रहा है कि वे नदी के साथ बह रहे हैं। नदी के पास रहने से लगता है कि स्वयं नदी हो गये हैं। स्वयं में नदी की झलक देखते हैं।

प्रश्न
3, नदी तट पर लेखक को किसकी याद आती है और क्यों ?  (पाठ्य पुस्तक)

अथवा, आविन्यों पाठ के लेखक को नदी तट पर किसकी याद आती है और क्यों? (2014C)
उत्तर- नदी तट पर लेखक को विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता याद आती है। क्योंकि लेखक नदी तट पर बैठकर अनुभव करते हैं कि वे स्वयं नदी हो गये हैं। इसी बात की पुष्टि करते हुए शुक्ल जी ने “नदी-चेहरा लोगों“ से मिलने जाने की बात कहते हैं।

प्रश्न 4. किसके पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता और क्यों? (पाठ्य पुस्तक)
उत्तर- नदी के किनारे और कविता के पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता । क्योंकि दोनों की अभिभूति से बची नहीं जा सकती। नदी और कविता में हम बरबस ही शामिल हो जाते हैं। निरन्तरता नदी और कविता दोनों में हमारी नश्वरता का अनन्त से अभिषेक करती है।

प्रश्न 5. लेखक आविन्यों क्या साथ लेकर गए थे और वहाँ कितने दिनों तक रहे? लेखक की उपलब्धि क्या रही। (पाठ्य पुस्तक 2015C)
उत्तर- लेखक आविन्यों में उन्नीस दिनों तक रहे । वे वहाँ अपने साथ हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें और कुछ संगीत के टेप्स ही ले गए थे। वे उस स्पष्ट एकांत में अपने में और लेखन में डूबे रहे। लेखक की उपलब्धि यही रही कि उन्होंने उन्नीस दिनों में पैंतीस कविताएँ और सत्ताईस गद्य रचनाएँ लिखी ।

प्रश्न 6. मनुष्य जीवन से पत्थर की क्या समानता और विषमता है?
उत्तर- मानवीय जीवन में सुख और दुःख के समय व्यतीत होते हैं। जीवन परिवर्तनशील पथ पर अग्रसर होता है। मानव उतार-चढ़ाव देखता है। पत्थर भी मानव की तरह परिवर्तनशील समय का सामना करता है। पत्थर भी शीत और ताप दोनों का सान्निध्य पाता है। मानव अपनी प्राचीन गाथा को गाता है। पत्थर भी प्राचीनता को अपने में सहेजे रखता है। मानव अपनी भावनाओं को प्रकट करता है। परन्तु पत्थर मूक रहता है।

Siksha Aur Sanskriti VVI Subjective Questions – हिन्‍दी कक्षा 10 शिक्षा और संस्‍कृति

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिन्‍दी के पाठ बाारह ‘शिक्षा और संस्‍कृति (Siksha Aur Sanskriti VVI Subjective Questions)’ के महत्‍वपूर्ण विषयनिष्‍ठ प्रश्‍नों के उत्तर को पढ़ेंगे।

Siksha Aur Sanskriti VVI Subjective Questions

Siksha Aur Sanskriti VVI Subjective Questions Chapter 12 शिक्षा और संस्कृति

लेेखख-महात्मा गाँधी

लघु-उत्तरीय प्रश्न (20-30 शब्दों में)___दो अंक स्तरीय
प्रश्न 1. इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग सीखना क्यों जरूरी है?      (Text Book)
उत्तर- इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग उसकी बुद्धि के विकास का जल्द-से-जल्द और उत्तम तरीका है।

प्रश्न 2. गाँधीजी बढ़िया शिक्षा किसे कहते हैं ?      (Text Book 2013A, 2015A)
उत्तर- अहिंसक प्रतिरोध को गाँधीजी बढ़िया शिक्षा कहते हैं। यह शिक्षा अक्षर-ज्ञान से पूर्व मिलना चाहिए।

प्रश्न 3. गांधीजी के अनुसार शिक्षा का जरूरी अंग क्या होना चाहिए? (2018A)
उत्तर- गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का जरूरी अंग यह होना चाहिए कि बालक जीवन-संग्राम में प्रेम से घृणा को, सत्य से असत्य को और कष्ट-सहन से हिंसा को आसानी के साथ जीतना सीखें।

प्रश्न 4. मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ? (Text Book)
उत्तर- शिक्षा का प्रारंभ इस तरह किया जाए कि बच्चे उपयोगी दस्तकारी सीखें और जिस क्षण से वह अपनी तालीम शुरु करें उसी क्षण उन्हें उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए। इस प्रकार की शिक्षा-पद्धति में मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास संभव है।

प्रश्न 5. शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों? (पाठ्य पुस्तक, 2012A, 2014C)
उत्तर- शिक्षा का ध्येय गाँधीजी चरित्र-निर्माण करना मानते थे। उनके विचार से शिक्षा के माध्यम से मनुष्य में साहस, बल, सदाचार जैसे गुणों का विकास होना चाहिए, क्योंकि चरित्र-निर्माण होने से सामाजिक उत्थान स्वयं होगा । साहसी और सदाचारी व्यक्ति के हाथों में समाज के संगठन का काम आसानी से सौंपा जा सकता है।

प्रश्न 6. गांधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों? (पाठ्य पुस्तक)
उत्तर- गाँधीजी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं, क्योंकि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और स्वयं भी भारतीय जीवन से प्रभावित हुई है। यह सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी ढंग का होगा, जिसमें प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित स्थान सुरक्षित होगा।

प्रश्न 7. गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे?   (Text Book)
उत्तर- कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों के संबंध में गाँधीजी की कल्पना थी कि यह एक ऐसी शांत सामाजिक क्रांति की अग्रदूत बने। जिसमें अत्यंत दूरगामी परिणाम भरे हुए हैं। इससे नगर और ग्राम के संबंधों का एक स्वास्थ्यप्रद और नैतिक आधार प्राप्त होगा और समाज की मौजूदा आरक्षित अवस्था और वर्गों के परस्पर विषाक्त संबंधों की कुछ बड़ी-से-बड़ी बुराइयों को दूर करने में बहुत सहायता मिलेगी। इससे ग्रामीण जन-जीवन विकसित होगा और गरीब-अमीर का अप्राकृतिक भेद नहीं रहेगा।

प्रश्न 8. अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क क्यों बनाया जाना चाहिए? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- गाँधीजी के विचारानुसार अपनी मातृभाषा के माध्यम बनाकर हम अत्यधिक विकास कर सकते हैं। अपनी संस्कृति के माध्यम से जीवन में तेज गति से उत्थान किया जा सकता है। दूसरी संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाने में परहेज नहीं किया जाय । बल्कि अपनी संस्कृति एवं भाषा को आधार बनाकर अन्य भाषा एवं संस्कृति को भी अपने जीवन से युक्त करें।

प्रश्न 9. गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद-कार्य क्यों आवश्यक मानते थे?                                                (Text Book)
उत्तर- गाँधीजी का मानना था कि देशी भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से किसी भी भाषा के विचारों को तथा ज्ञान को आसानी से ग्रहण किया जा सकता है। अंग्रेजी या संसार के अन्य भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार पड़ा है, उसे अपनी ही मातृभाषा के द्वारा प्राप्त करना सरल है। सभी भाषाओं से प्राप्त ज्ञान के लिए अनुवाद की कला परमावश्यक है। अतः इसकी आवश्यकता बड़े पैमाने पर है।

प्रश्न 10. दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है?                                                    (पाठ्य पुस्तक)
उत्तर- दूसरी संस्कृतियों की समझ और कद्र स्वयं अपनी संस्कृति की कद्र होने और उसे हजम कर लेने के बाद होनी चाहिए, पहले हरगिज नहीं। कोई संस्कृति इतने रत्न-भण्डार से भरी हुई नहीं है जितनी हमारी अपनी संस्कृति है। सर्वप्रथम हमें अपनी संस्कृति को जानकर उसमें निहित बातों को अपनाना होगा। इससे चरित्र-निर्माण होगा जो संसार के अन्य संस्कृति से कुछ सीखने की क्षमता प्रदान करेगा।

Dharti Kab Tak Ghumegi – हिंदी कक्षा 10 धरती कब तक घूमेगी

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 5 (Dharti Kab Tak Ghumegi) “ धरती कब तक घूमेगी” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के कवि साँवर दइया है |यह राजस्थानी भाषा के एक प्रमुख कहानीकार हैं। इस कथा का अनुवाद कथाकार ने खुद किया है।

dharti kab tak ghumegi

5. धरती कब तक घूमेगी (Dharti Kab Tak Ghumegi)

लेखक- साँवर दइया
जन्म- बिकानेर (राजस्थान) ;10 अक्टुबर 1948 ई0द्ध
मृत्यु- 30 जूलाई 1992 ई0
हिन्दी अनुवाद- स्वयं
यह राजस्थानी भाषा के एक प्रमुख कहानीकार हैं। इस कथा का अनुवाद कथाकार ने खुद किया है।
पाठ परिचय
प्रस्तुत कहानी समस्या प्रधान कहानी है, जिसमें एक माँ की दुर्दशा का वर्णन है। पति के मरने के बाद माँ घर का बोझ बन जाती है। किसी तरह दोनों शाम रोटी मिल जाती है, जबकि परिवार भरा-पूरा है। जिस माँ ने सबका देखभाल किया उस माँ की देखभाल करने वाला आज कोई नहीं है।
एक माँ के पेट के कारण तीनों बेटों में बारी बाँध दिया जाता है। इस प्रकार माँ एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे में लुढ़कने लगती है। माँ के भोजन के कारण तीनों भाईयों में हमेशा झगड़ा होता था। उसके बाद बड़ा बेटा कैलाश ने अपने दोनों छोटे भाईयों से कहा- ‘यह बात अच्छी नहीं लगती कि माँ हर महीने इधर-उधर लुढ़कती रहे, इसलिए हम तीनों ही माँ को हर महीने पचास-पचास रूपये दिया करें, वह स्वयं रोटी पकाएगी-खाएगी।’ यह फैसला लेने से पहले तीनों भाईयों में से किसी ने मांं से नहीं पूछा । जब तीनों भाईयों ने पचास-पचास रूपये देने का फैसला किया और कहा कि मां अलग खाना बनाकर खाएगी। तो मां ने सोचा कि सिर्फ एक पेट के लिए मेरे बेटों में झगड़ा हो रहा है। अर्थात् दो रोटी के लिए हमेशा घर में कलह लगा रहता है। मां को अपने ही घर में घूटन महसूस हो रही थी। जमीन छोटी हो रही थी। आसमान छोटा हो रहा था। मां ने सोचा कि जब दो रोटी ही खाना है, तो कहीं और जाकर खा लेंगें। ये लाेग भी फ्री में थोड़े ही खिलाते हैं। बदले में इनके बच्‍चों की देखभाल करनी पड़ती है। यह सोचकर मां अर्थात सीता ने अपना घर छोड़ दिया। जब वह घर छोड़ी तो आसमान साफ दिखाई दे रहा था। रास्‍ते चौड़ी हो गयी थी। पृथ्‍वी बड़ी हो गयी थी। उसे घूटन महसूस नहीं हो रहा था। 

इस कहानी के माध्‍यम से कथाकार ने दर्शाया है कि एक मां अपने बच्‍चे को पालती है, लेकिन उसी मां को सभी बच्‍चे मिलकर नहीं पालते है। एक मां के पेट के लिए भाईयों में झगड़ा होता है।   

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Nagar– हिंदी कक्षा 10 नगर

nagar kahani

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 4 (Nagar Kahani) “ नगर” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के कवि सुजाता है |इंडिया
यह तमिल साहित्य के एक प्रमुख लेखक थे। प्रस्तुत कहानी ‘नगर‘ व्यंग्य प्रधान कहानी है। इसमें कहानीकार ने नगरीय अव्यवस्था पर कटाक्ष किया है किस प्रकार ग्रामीण भोली-भाली जनता के साथ नगर में उपेक्षा एवं बदसलूकी होती है। 

nagar kahani
Nagar Kahani

4. नगर
(Nagar Kahani)

लेखक- सुजाता
वास्तविक नाम- सुजाता रंगराजन
जन्म- तमिलनाडु के चेन्नई में ;3 मई 1935 ई0 द्ध
मृत्यु- 27 फरवरी 2008 ई0
हिन्दी अनुवाद- के0 ए0 जमुना
कहानी का स्त्रोत- नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ
इंडिया
यह तमिल साहित्य के एक प्रमुख लेखक थे।
प्रस्तुत कहानी ‘नगर‘ व्यंग्य प्रधान कहानी है। इसमें कहानीकार ने नगरीय अव्यवस्था पर कटाक्ष किया है किस प्रकार ग्रामीण भोली-भाली जनता के साथ नगर में उपेक्षा एवं बदसलूकी होती है। यह कहानी एक ऐसी लड़की से संबंधित है, जो आज ही मदुरै आई है। उसकी माँ वल्लिअम्माल अपनी पुत्री पाप्पाति के साथ मदुरै स्थित बड़े अस्पताल के बहिरंग रोगी विभाग के बाहर बरामदे पर बैठी प्रतिक्षा कर रही थी। उसकी पुत्री को बुखार था। गाँव के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र के डॉक्टर ने उसकी जाँच कर उसे एडमिट करवा देने को कहा। वल्लिअम्माल अनपढ़ थी।
वह इतना भी नहीं जानती थी कि पेसेंट किसे कहते हैं ? फिर भी उसे विभिन्न दफतरों में चिट लेकर जाने को कहा जाता है। डॉक्टर के आदेश की अवहेलना कर उसकी पुत्री को एडमिट नहीं किया जाता है। तंग आकर वह वहाँ से विदा हो जाती है। दुसरे दिन जब बड़े डॉक्टर पाप्पाति को अनुपस्थित देखकर जानकारी लेते हैं तो पता चलता है कि वह वहाँ से विदा हो चुकी है। इससे स्पष्ट होता है कि नगर की व्यवस्था अति अस्त-व्यस्त हो गई है, जहाँ पैसे पर खेल होता है। गरीब एवं ग्रामीण के लिए कोई जगह नहीं है।
मदुरै के एक बड़े अस्पताल में वल्लि अम्माल अपनी लड़की पाप्पति के साथ बहिरंग विभाग के बरामदे में बैठी प्रतिक्षा कर रही थी। पाप्पाति को बुखार था। उसे लेकर गाँव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर गई तो डॉक्टर ने कहा- ‘एक्यूट केस ऑफ मेनिनजाइटिस‘ फिर बारी-बारी से दुसरे डॉक्टरों ने देखा। बड़े डॉक्टर ने एडमिट करने को कहा। वल्लिअम्माल ने बड़े डॉक्टर की ओर दखकर पूछा- ‘बाबुजी बच्ची अच्छी हो जाएगी न ?‘
डॉक्टर ने कहा- ‘पहले एडमिट करवा लें। इस केस को मैं स्वयं दंखुँगा।‘ डॉ0 धनशेखरण श्रीनिवासन को सारी बात समझाकर बड़े डॉक्टर के पिछे दौड़े। श्रीनिवासन ने वल्लिअम्माल से कहा- ये ले । इस चिट को लेकर सिधे चली जाओ। सीढ़ियों के ऊपर कुर्सी पर बैठे सज्जन को देना। बच्ची को लेटी रहने दो।
वल्लिअम्माल चिट लेकर सीधे चली गई। कुर्सी खाली पड़ी थी। थोड़ी देर बाद सज्जन अपने भांजे को भर्ती करा कर लौटे। सब को लाइन लगाने को कहा। आधे घंटे के बाद वल्लिअम्माल से कहा- इस पर डॉक्टर का दस्तखत नहीं है। दस्तखत करवा कर लाओ। फिर वेतन आदि के बारे में पूछकर चिट देकर कहा- इसे लेकर सीधे जाकर बाएँ मुड़ना। तीर का निशान बना होगा। 48 नंबर कमरे में जाना।
वल्लिअम्माल को कुछ समझ में नहीं आया। इधर-उधर घूमकर एक कमरे के पास पहुँची। वहाँ के एक आदमी ने चिट ले ली। कुछ देर बाद पाप्पाति का नाम पढ़कर कहा-
इसे यहाँ क्यों लाई ? ले, इसे लेकर सीधे चली जा। और अपने काम में लग गया। वहाँ बड़ी भीड़ थी। एक आदमी ने चिट रखकर आधे घंटे बाद नाम पुकार कर कहा- इस समय जगह नहीं है। कल सवेरे साढ़े सात बजे आना।
वल्लिअम्माल भागी चक्कर काटकर सीढ़ी के पास पहुँची। बगल का दरवाजा बंद था। इसी में उसकी बेटी स्ट्रेचर पर पड़ी दिखाई दी। पास वाले आदमी से गिड़गिड़ा कर बोली- दरवाजा खोलिए। मेरी बेटी अंदर है। उसने कहा सब बंद हो चुका है, तीन बजे आना। इसी बीच एक आदमी ने कुछ पैसे देकर दरवाजा खुलवाया। वल्लि अम्माल भीतर दौड़ी गई और पाप्पाति को कलेजे से लगाए बाहर आई। फिर बेंच पर बैठकर खुब रोई। इसे समझ में नहीं आ रहा था कि अगले सुबह तक क्या करें ? फिर सोचा इसे मामुली बुखार ही तो है। वापस चलती हुँं। वैद्य जी को दिखा दुँगी। माथे पर खड़िया मिट्टी का लेप कर दुँगी और अगर पाप्पाति ठिक हो गई तो वैदीश्वरण जी के मंदिर जाकर भगवान को भेंट चढाऊँगी। वल्लिअम्माल का साईकिल रिक्शा बस अड्डे की ओर बढ़ चला। (Nagar)

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Maa Kahani– हिंदी वर्णिका कक्षा 10 माँ

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के हिन्‍दी वर्णिका के पाठ 3 (Maa Kahani) “ माँ” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के कवि ईश्वर पेटलीकर है | यह गुजराती भाषा के अति लोकप्रिय कथाकार हैं। श्री पेटलीकर साहित्य के अतिरिक्त सामाजिक और राजनीतक जीवन में भी सक्रिय रह हैं।

maa kahani
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3. माँ (Maa Kahani)
लेखक- ईश्वर पेटलीकर
वास्तविक नाम- ईश्वर मोतीभाई पटेल
जन्म- पेटलाड के समीप पेटली ग्राम में (गुजरात) ;9 मई 1916 ई0 द्ध
मृत्यु- 22 नवंबर 1983 ई0
हिन्दी अनुवाद- गोपाल दास नागर
यह गुजराती भाषा के अति लोकप्रिय कथाकार हैं। श्री पेटलीकर साहित्य के अतिरिक्त सामाजिक और राजनीतक जीवन में भी सक्रिय रह हैं।
पाठ परिचय (Maa Kahani)
प्रस्तुत पाठ ‘माँ‘ एक विचार प्रधान कहानी है। इसमें कहानीकार ने एक माँ की ममता का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। माँ के लिए हर बच्चा समान तथा प्रिय होता है, किन्तु माँ का प्रेम उस बच्चे के प्रति अधिक होता है, जो सबसे छोटा होता है। माँ की चार संतान हैं जिनमें दो बड़े पुत्र शहर में नौकरी करते हैं तथा एक बेटी की शादी हो चूकि है और वह अपने ससुराल में है। छोटी बेटी मंगु पागल है। लोग उसे पागलों की अस्पताल में भर्ती करने की सलाह देते हैं, लकिन माँ कहती है कि जिस लाड़-प्यार से माँ सेवा करती है, वैसा लाड़-प्यार अस्पताल में कौन करेगा ? इसलिए अस्पताल में भर्ती नहीं कराती है। उनकी सेवा देख लोग दंग रह जाते हैं।
जितना ध्यान माँ मंगु को रखती है उतना न तो कमाऊ पुत्रों की और न ही शादी-शुदा पुत्री की। लकिन गाँव की ही लड़की कुसुम जब अस्पताल से ठिक होकर वापस घर लौटती है तब माँ भी अपनी पागल पुत्री को अस्पताल भर्ती कराने को राजी हो जाती है। लकिन पुत्री से अलग होते ही उसकी दशा वैसे ही हो जाती है, जैसे पुत्री की थी। कहानीकार ने इस कहानी के माध्यम से यह सिद्ध करना चाहा है कि सच्चा प्रेम माँ की ममता है, जिसके प्रति अधिक ममता होती है, उससे अलग होने पर उसका दिल टुट जाता है।

सारांश (Maa Kahani)
मंगु को पागलों की अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह लोग जब उसकी माँ को देते तो वह एक ही जवाब देती- माँ होकर सेवा नहीं कर सकती तो अस्पताल वाले क्या करेंगे ?
जन्मजात पागल और गूंगी मंगु को जिस तरह पालती-पोसती सेवा करती उसे देखकर सभी माँ की प्रशंसा करते। मंगु के अलावा माँ को तीन संतानें थी। दो पुत्र और एक पुत्री। बेटी ससुराल चली गई थी और पुत्र पढ़-लिखकर शहरी हो गये थे। उनके बाल-बच्चे थे। जब सभी गाँव आते तो माँ उनको भी प्यार करती किन्तु बहुओं को संतोष नहीं होता। वे जलने लगती। कहती- ‘मंगु को झुठा प्यार-दुलार कर माँ ने ही अधिक पागल बना दिया है।
आदत डाली होती तो पाखाना-पेशाब का तो ख्याल रखती। डाँट से तो पशु भी सीख लेते हैं। बेटी भी ऐसे हीं बाते सुनाती। पुत्र माँ के भाव को समझते थे इसलिए कुछ नहीं कहते थे।
इसी बीच कुसुम अस्पताल गई और दूसरे महीने ही ठीक हो गई। फिर भी डॉक्टरों के कहने पर एक महिना और रही। गाँव आई तो सभी देखने दौड़े। अब लोग कहने लगे- ‘माँ जी, एक बार अस्पताल में मंगु को भर्ती करा के देखो जरूर अच्छी हो जाएगी‘ इस बार माँ ने विरोध नहीं किया। बड़े बेटे को चिट्ठी भेजवाई। लकिन रात की नींद उड़ गई, मन का चैन छिन गया। कैसे रहेगी मंगु अस्पताल में ? कुछ भी तो सऊर नहीं इसे। चिट्ठी पाकर बड़ा बेटा आ गया। मजिस्ट्रेट से जरूरी कागज तैयार करवाये।
माँ को लगा कि बेटा भी मंगु से छुटकारा चाहता है जो जल्दी-जल्दी करवा रहा है। आखिर जाने का दिन आ गया। उस रात माँ को नींद नही आई। जब मंगु को लेकर घर से बाहर निकलने लगी तो जैसे ब्रह्माण्ड का बोझ उस पर आ गया।
माँ भारी कदमों से अस्पताल में दाखिल हुई। मुलाकात का समय था। एक पागल अपने पति से लिपट गई । बोली- ई भूतनियाँ मुझे अच्छे कपड़े नहीं देतीं उसकी परिचारिका ने हँसकर कहा- ‘खा लो, मैं सब दुँगी‘ माँ को विश्वास हो गया कि ये सब लोग दयालु हैं।
डॉक्टर और मेट्रन आ गई। मंगु का कागज देखा। बेटे ने कहा- ‘मेरी मंगु का ठीक से ख्याल रखिएगा।‘ मेट्रन ने कहा- आपको चिंता करने की जरूरत नहीं। बीच में ही माँ ने कहा- बहन ! यह एकदम पागल है, कोई न खिलाए तो खाती नहीं…..टट्टी की भी सुध नहीं……रोशनी में उसे नींद नहीं आती। कहते-कहते माँ रो पड़ी।
सभी लोग उसकी रूलाई से संजीदा हो गए। मेट्रन ने कहा- धीरज रखें। यह भी कुसुम की तरह ठीक हो जाएगी। यहाँ रात को चार-पाँच बार बिछावन की जाँच होती है। जो सोते नहीं उन्हें दवा देकर सुलाया जाता है। जो खुद नहीं खाते उन्हें मुँह में खिलाया जाता है। माँ की बेकली के आगे मेट्रन की शक्ति लुप्त हो गई।
मंगु को छोड़ माँ-बेटे जब बाहर आए तो दोनों के चेहरे पर शोक के बादल थे। रास्ते भर माँ रोती रही। रात भर माँ यही सोचती रही कि मंगु क्या कर रही होगी ? इतनी ठंड में किसी ने उसे कुछ ओढ़ाया होगा या नहीं ? मंगु के बिना आज माँ का विछावन सुना लगा। बाहर बेटे को भी नींद नहीं आ रही थी। सोच रहा था कि मैं मंगु को अच्छी तरह पालूँगा।
सुबह जब चक्की की आवाज शुरू हुआ तो एक चिख सुनाई पड़ी-‘दौड़ो रे दौड़ो ! मेरे मंगु को मार डाला।‘ बेटा चारपाई से उछल पड़ा। माँ मंगु के श्रेणी में मिल गई थी।

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Dahte Vishwas – हिंदी कक्षा 10 ढ़हते विश्वास Dahte Vishwas class 10

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 2 (Dahte Vishwas) “ढ़हते विश्वास” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के सातकोड़ी होता है |यह उड़िया साहित्य के प्रमुख कलाकार है। शिक्षा समाप्ति के बाद इन्होनें सर्वप्रथम भुवनेश्वर में भारतीय रेल यातायात सेवा के अन्तर्गत रेल समन्वय आयुक्त के पद पर नियुक्त हुए। इसके बाद उड़ीसा सरकार के वाणिज्य एवं यातायात विभाग में विशेष सचिव तथा उड़ीसा राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।

dhahte viswa
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2. ढ़हते विश्वास (Dahte Vishwas)
लेखक- सातकोड़ी होता
जन्म- उड़ीसा के मयूरभंज स्थान ;1929 ई0 द्ध

हिन्दी अनुवाद- राजेन्द्र प्रसाद मिश्र
यह उड़िया साहित्य के प्रमुख कलाकार है। शिक्षा समाप्ति के बाद इन्होनें सर्वप्रथम भुवनेश्वर में भारतीय रेल यातायात सेवा के अन्तर्गत रेल समन्वय आयुक्त के पद पर नियुक्त हुए। इसके बाद उड़ीसा सरकार के वाणिज्य एवं यातायात विभाग में विशेष सचिव तथा उड़ीसा राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
पाठ परिचय (Dahte Vishwas)
प्रस्तुत पाठ में प्राकृतिक प्रकोप से उत्पन्न समस्या पर प्रकाश डाला गया है। बाढ़ एवं सुखा से त्रस्त जीवन धैर्य तथा साहस के साथ इन समस्याओं का मुकाबला करता है, लेकिन लोगों का विश्वास तब ढहने लगता है, जब बाढ़ का पानी किनारों को लाँघकर गाँव-घरों को अपने आगोश में लेकर आगे बढ़ता है, तो लोगों का भरोसा टुटने लगता है। लोगों को माँ चण्डेश्वरी पर जो विश्वास था, वह भी क्षीण होने लगता है। बार-बार किसी पर विश्वास करके इन्सान ठगा जा चुका है। उसके साथ विश्वासघात हुआ है। अतः अब कोई व्यक्ति किसी पर विश्वास नहीं करना चाहता ।
सारांश (Dahte Vishwas)
प्रस्तुत कहानी ‘ढहते विश्वास‘ चिंतन प्रधान कहानी है। इसमें कहानीकार सातकोड़ी होता ने उड़ीसा के जन-जीवन का चित्र प्रस्तुत किया है। कहानी एक ऐसे परिवार की आर्थिक दुर्दशा से शुरू होती है, जिसका मुखिया लक्ष्मण कलकŸा में नौकरी करता है, किन्तु उसकी कमाई से परिवार का भरण-पोषण नहीं हो पाता। इसलिए उसकी पत्नि तहसीलदार साहब के घर छिटपुट काम करके उस कमी को पूरा करती है। उसके पास एक बिघा खेत भी है, लकिन बाढ़, सूखा तथा तुफान के कारण वह खेत दुख का कारण बन जाता है।

कई दिनों से लगातार वर्षा होते देखकर लक्ष्मी इस आशंका भयाक्रांत हो गई कि इस बार भी बाढ़ आएगी। तूफान से घर टूट गया था। कर्ज लेकर किसी प्रकार घर की मरम्मत कराती है। तूफान और सूखा से त्रस्त होते हुए भी हल किराए पर लेकर खेती करवाती है। सूखा होने के कारण धान के अंकुर जल गये, फिर भी हार न मानकर बारिश होने पर रोपनी करने का इंतजार किसान कर रहे थे। लकिन लगातार वर्षा होने के कारण बाढ़ आने की चिंता ने लोगों की निन्द हराम कर दी थी। लक्ष्मी का घर देवी नदी के बाँध के निचे था। लक्ष्मी उसी समय ससुराल आई थी, जब दलेई बाँध टुटा था। बाढ़ की भयंकरता के कारण लोगों की खुशी तुराई के फूल की तरह मुरझा गई। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। उस दर्दनाक स्थिति की अनुभूति लक्ष्मी को हो चुकी थी।

इसलिए वह यह सोचकर सिहर उठती है कि यदि पुनः दलेई बाँध टूट जाए तो इस विपिता का सामना वह कैसे कर पाएगी, क्योंकि तूफान और सूखा ने कमर तोड़ दी है। पति परदेश में है। तीन बच्चे हैं।

लक्ष्मी वर्षा की निरंतरता से भीषण बाढ़ आने की बात सोचकर दुखी हो रही थी। उसके पति लक्ष्मण कलकŸा की नौकरी से कुछ पैसे भेज देता था और वह स्वयं तहसीलदार का छिटपुट काम करके बच्चों के साथ अपना भरण-पोषण कर रही थी। भूमि की छोटा टुकड़ा तो प्रकृति-प्रकोप से ही तबाह रहता है।
दलेई बाँध टूटने की विभीषिका तो वह पहले ही देख चुकी थी। वह भयानक अनुभूति रह-रहकर जाग उठती थी। तूफान, सूखा और बाढ़ इन तीन-तीन प्राकृतिक विपदाओं से कौन रक्षा करें ? बाँध की सुरक्षा के लिए ग्रामीण युवक स्वयंसेवी दल बनाकर बाँध की सुरक्षा में संलग्न थे। लक्ष्मी भी बड़े लड़के को बाँध पर भेजकर दो लड़कीयों और एक साल के लड़का के साथ घर पर है।

पूर्व में ऐसी भयानक स्थिति को देखकर भी लोग यहाँ खिसके नहीं। सायद इसी प्रकार नदियों के किनारे नगर और जनपद बनते गये। लक्ष्मी भी पूर्व के आधार पर कुछ चिउड़ा बर्तन-कपड़ा संग्रह कर लिया। गाय, बकरीयों के पगहा खोल दिया।
पानी ताड़ की ओर बढ़ा और शोर मच गया। ग्रामीण युवक काम में जुटे थे और लोगों में जोश भर रहे थे तथा लोगों को ऊँचे पर जाने का निर्देश भी दे रहे थे। सब लोगों का विश्वास आशंका में बदल गया। लोग काँपते पैरों से टीले की ओर भागे। स्कूल में भर गये। देवी स्थान भी भर गया। लोग हतास थे अब तो केवल माँ चंडेश्वरी का ही भरोसा है।

लक्ष्मी भी आशा छोड़कर जैसे-तैसे बच्चों को लेकर भाग रही थी क्योंकि बाँध टूट गया था और बाढ़ वृक्ष घर सबों को जल्दी-जल्दी लील रही थी। शिव मंदिर के समीप पानी का बहाव इतना बढ़ गया कि लक्ष्मी बरगद की जटा में लटककर पेड़ पर चढ़ गयी। वह कब बेहोश हो गई। कोई किसी की पुकार सुननेवाला नहीं। टीले पर लोग अपने को खोज रहे थे। स्कुल भी डुब चुका था। अतः लोग कमर भर पानी में किसी तरह खड़े थे।

लक्ष्मी को होश आने पर उसका छोटा लड़का लापता था। वह रो-चिल्ला रही थी, पर सुननेवाला कौन था ? लोगों का विश्वास देवी-देवताओं पर से भी उठ गया क्योंकि इन पर बार-बार विश्वास करके लोग ठगे जा रहे हैं। लक्ष्मी ने पुनः पिछे देखा पर उसकी दृष्टि शून्य थी। फिर भी एक शिशु शव को उसने पेड़ की तने पर से उठा लिया और सीने से लगा लिया, जबकि वह उसके पुत्र का शव नहीं था।

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Dahi Wali Mangamma – हिंदी कक्षा 10 दही वाली मंगम्मा

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 1 (Dahi Wali Mangamma) “ दही वाली मंगम्मा” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस कविता के कवि श्रीनिवास है | पस्तुत कहानी दही वाली मंगम्मा भावना प्रधान कहानी है। इसमें दो पीढ़ियों की भावनाओं को लेखक ने बड़े ही स्वभाविक ढंग से प्रस्तुत किया है।

dahi wali mangamma
dahi wali mangamma

1. दही वाली मंगम्मा (Dahi Wali Mangamma)

लेखक- श्रीनिवास
जन्म- कर्नाटक के कोलार में ;6 जून 1891 ई0 द्ध
मृत्यु- 6 जून 1986 ई0
पूरा नाम- मास्ती वेंकटेश अय्यंगार
यह कन्नड़ साहित्य के प्रतिष्ठित रचनाकारों में से एक थे।
हिन्दी अनुवाद- बी0 आर0 नारायण
पाठ परिचय
पस्तुत कहानी दही वाली मंगम्मा भावना प्रधान कहानी है। इसमें दो पीढ़ियों की भावनाओं को लेखक ने बड़े ही स्वभाविक ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी एक दही बेचने वाली की है, जो परिवार में सब पर अपनी धाक् जमाना चाहती है, जबकि बहु अपने अधिकार का त्याग करना अपना अपमान समझती है। कहानी का आरंभ दही वाली मंगम्मा के दही बेचने से होता है।
सारांश(Dahi Wali Mangamma)

मंगम्मा अवलूर के समीप वेंकटपुर की रहनेवाली थी और रोज दही बेचने बंगलूर आती थी। वह आते-जाते मेरे पास बैठती और अपनी बातें करती थी।
एक दिन वह मेरे बच्चे को देखकर अपना पुत्र और पति की कहानी कहकर पति को अपनी ओर आकृष्ट करने की रहस्यमयी बातें कहने लगी। आदमी को अपने वश में रखने का तीन-चार अपना अनुभवपूर्ण गुर भी बताया।

पन्द्रह दिन बाद मंगम्मा आई और रोती हुई अपना गृह-कलह तथा बेटा-बहु से अलग होने की दुःखद कहानी सुनाई। इस प्रकार बेटे बहु से विरक्त होकर अपने जोड़े हुए पैसे को अपने साज श्रृंगार पर खर्च करने लगी। इस से वह कुछ लोगों के आलोचना के पात्र भी बन गई। बहु भी उसकी जैकेट पर ताना कसने लगी और बात बढ़ने पर दिए गये गहने भी लौटाने को तैयार हो गई।

झगड़े का कारण तो पोते की पीटाई थी लकिन मूल-रूप में सास-बहू की अधिकार सम्बन्धी ईर्ष्या थी । औरत को अकेली जानकर कुछ लोग उसके धन और प्रतिष्ठा पर भी आँखे उठाते थे। रंगप्पा भी ऐसा ही किया, जिसे बहू के पैनी निगाहों ने ताड़ लिया। उसने पोते को उसके पास भेजने का एक नाटक किया। अब मंगम्मा भी पोते के लिए बाजार से मिठाई खरिदकर ले जाने लगी। एक दिन कौवे ने उसके माथे से मिठाई की दाना ले उड़ा। अंधविश्वास के कारण मंगम्मा भयभीत हो उठी। जिसे माँ जी ने बड़े कुशलता से निवारण किया।

बहू के द्वारा नाटकीय ढ़ंग से पोते को दादी के पास भेजने का बहू का मंत्र बड़ा कारगर हुआ। दूरी बढ़ने से भी प्रेम बढ़ता है। मानसिक तनाव घटता है। हुआ भी ऐसा ही। मंगम्मा को भी बहू में सौहार्द, बेटे और पोते में स्नेह नजर आने लगी। बड़े-बूढ़ों ने भी समझाया।

बहू ने मंगम्मा का काम अपने जिम्मे ले लिया। एक दिन दही बेचने के क्रम में नंजम्मा ( बहू ) आई और मुझे सारी बातें बताई। उसने परिवार का जमा पैसा लुट जाने के भय के कारण बहू बड़ी कुशलता से पुनः परिवार में शांति स्थापित कर लिया। और फिर पहले की तरह रहने लगी।

अंत में लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि सास और बहू में स्वतंत्रता की होड़ लगी है। उसमें माँ बेटे और पति पत्नि है। माँ बेटे पर से अपना अधिकार नही छोड़ना चाहती है तो बहू पति पर अपना अधिकार जमाना चाहती है। यह सारे संसार का ही किस्सा है। (Dahi Wali Mangamma)

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Mere Bina Tum Prabhu– हिंदी कक्षा 10 मेरे बिना तुम प्रभु

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 12 (Mere Bina Tum Prabhu) “ मेरे बिना तुम प्रभु” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के कवि रेनर मारिया रिल्के‘ है |इनकी शिक्षा-दीक्षा अनेक बाधाओं को पार करते हुए हुई। इन्होंने प्राग और म्यूनिख विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई। संगीत, सिनेमा आदि में इनकी गहरी पैठ थी।

Mere bina tum prabhu

12. मेरे बिना तुम प्रभु (Mere Bina Tum Prabhu)
कवि परिचय
कवि- रेनर मारिया रिल्के
जन्म- 4 दिसम्बर, 1875 ई॰, प्राग, ऑस्ट्रिया (अब जर्मनी)
मृत्यु- 29 दिसम्बर, 1936 ई॰
पिता- जोसेफ रिल्के
माता- सोफिया

इनकी शिक्षा-दीक्षा अनेक बाधाओं को पार करते हुए हुई। इन्होंने प्राग और म्यूनिख विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई। संगीत, सिनेमा आदि में इनकी गहरी पैठ थी।
प्रमुख रचनाएँ- प्रमुख कविता संकलन- ‘लाइफ एंड सोंग्स‘, ‘लॉरेंस सेक्रिफाइस‘, ‘एडवेन्ट‘, आदि। कहानी संग्रह- ‘टेल्स ऑफ आलमाइटी‘, उपन्यास- ‘द नोट बुक ऑफ माल्टे लॉरिड्स ब्रिज‘।

कविता परिचय- प्रस्तुत कविता ‘मेरे बिना तुम प्रभु‘ धर्मवीर भारती के द्वारा हिंदी भाषा में अनुवादित जर्मन कविता है। कवि का मानना है कि बिना भक्त के भगवान भी एकाकी और निरुपाय है। उनका अस्तित्व भक्त की सŸा पर निर्भर करती है। भक्त और भगवान एक-दूसरे पर निर्भर है।

12. मेरे बिना तुम प्रभु (Mere Bina Tum Prabhu)
जब मेरा अस्तित्व न रहेगा, प्रभु, तब तुम क्या करोगे ?
जब मैं – तुम्हारा जलपात्र, टूटकर बिखर जाऊँगा ?
जब मैं तुम्हारी मदिरा सूख जाऊँगा या स्वादहिन हो जाऊँगा ?
मैं तुम्हारा वेश हुँ, तुम्हारी वृति हुँ
मुझे खो कर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे ?

कवि कहता है कि हे प्रभु ! जब मैं नहीं रहुँगा तो तुम्हारा क्या होगा ? तुम क्या करोगे ? मैं ही तुम्हारा जलपात्र हुँ, जिससे तुम पानी पीते हो। अगर टूट गया तो या जिससे नशा होता है, तो मेरे द्वारा प्राप्त मदिरा सुख जाएगी अथवा स्वादहीन हो जाएगी। वास्तव में, मैं ही तुम्हारा आवरण हूँ वृŸा हूँ। अगर नहीं रहा तो तुम्हारी महता ही समाप्त हो जाएगी।

मेरे बिना तुम गृहहीन निर्वासित होगे, स्वागत-विहीन
मैं तुम्हारी पादुका हूँ, मेरे बिना तुम्हारे
चरणों में छाले पड़ जाएँगे, वे भटकेंगे लहूलुहान !

मेरे प्रभु, मैं नहीं रहा तो तुम गृहविहीन हो जाओगे। कौन करेगा तुम्हारी पूजा-अर्चना ? वास्तव में, मैं ही तुम्हारी पादुका हुँ जिसके सहारे जहाँ जाता हुँ तुम जाते हो अन्यथा तुम भटकोगे।

तुम्हारा शान्दार लबादा गिर जाएगा
तुम्हारी कृपा दृष्टि जो कभी मेरे कपोलों की
नर्म शय्या पर विश्राम करती थी
निराश होकर वह सुख खोजेगी
जो मैं उसे देता था-

कवि कहता है कि मुझसे ही तुम्हारी शोभा है। मेरे बिना किस पर कृपा करोगे ? कृपा करने का सुख कौन देगा ? मेरे बिना तुम्हार सुख-साधन विलुप्त हो जाऐंगे, जो मैं तुम्हें देता था।

दूर की चट्टानों की ठंढी गोद में
सूर्यास्त के रंगों में घुलने का सुख
प्रभू, प्रभू मुझे आशंका होती है
मेरे बिना तुम क्या करोगे ?

कवि कहता है कि जब मैं नहीं रहुँगा तो संध्याकालीन अस्त होते सूर्य की सुन्दर लालिमा का वर्णन आखिर कौन करेगा ? क्योंकि उस समय सारा वन प्रांत सूर्य की विखर रही लाल किरणों के संयोग से अद्भुत प्रतीत होता है। इसलिए कवि को आशंका होती है कि मैं नहीं रहा तो तुम क्या करोगे।

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Loutkar Aaunga Phir– हिंदी कक्षा 10 लौटकर आऊँगा फिर

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 11 (Loutkar Aaunga Phir) “ लौटकर आऊँगा फिर” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस पाठ के कवि जीवनानंद दास है |रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाँग्ला साहित्य के विकास में जिन लोगों का योगदान है, उनमें सबसे प्रमुख स्थान जीवनानंद दास का है। इन्होंने बंगाल के जीवन में रच बसकर उसकी जड़ों को पहचाना तथा उसे अपनी कविता में स्वर दिया।

Lautkar Aaunga Phir

11. लौटकर आऊँगा फिर (Loutkar Aaunga Phir)
कवि परिचय
कवि- जीवनानंद दास
जन्म- 17 फरवरी, 1899 ई॰, बारीसाल ( बांग्लादेश )
मृत्यु- 22 अक्टुबर, 1954 ई॰

रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाँग्ला साहित्य के विकास में जिन लोगों का योगदान है, उनमें सबसे प्रमुख स्थान जीवनानंद दास का है। इन्होंने बंगाल के जीवन में रच बसकर उसकी जड़ों को पहचाना तथा उसे अपनी कविता में स्वर दिया।

प्रमुख रचनाएँ- झरा पालक, धूसर पांडुलिपि, वनलता सेन, महापृथिवि, सातटि तारार तिमिर, जीवननांद दासेर कविता, रूपसी बाँग्ला, बेला अबेला कालबेला, मनविहंगम, आलोक पृथ्वी आदि। उनके निधन के बाद लगभग एक सौ कहानीयाँ तथा तेरह उपन्यास प्रकाशित किए गए।

कविता परिचय- प्रस्तुत कविता ‘लौटकर आऊँगा फिर‘ कवि प्रयाग शुक्ल द्वारा भाषांतरित जीवनानंद दास की कविता है। इसमें कवि का अपनी मातृभूमि तथा परिवेश का उत्कट प्रेम अभिव्यक्त है। कवि ने इस कविता में एक बार फिर जन्म लेने की लालसा प्रकट कर अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धा प्रकट की है।

11. लौटकर आऊँगा फिर (Loutkar Aaunga Phir)

खेत हैं जहाँ धान के, बहती नदी
के किनारे फिर आऊँगा लौटकर
एक दिन बंगाल में; नहीं शायद
होऊँगा मनुष्य तब, होऊँगा अबाबील

कवि कहता है कि धान के खेत वाले बंगाल में, बहती नदी के किनारे, मैं एक दिन लौटूँगा। हो सकता है मनुष्य बनकर न लौटूँ । अबाबील होकर

या फिर कौवा उस भोर का-फुटेगा नयी
धान की फसल पर जो
कुहरे के पालने से कटहल की छाया तक
भरता पेंग, आऊँगा एक दिन!

या फिर कौआ होकर, भोर की फूटती किरण के साथ धान के खेतों पर छाए कुहासे में, कटहल पेड़ की छाया में जरूर आऊँगा।

बन कर शायद हंस मैं किसी किशोरी का;
घुँघरू लाल पैरों में;
तैरता रहुँगा बस दिन-दिन भर पानी में-
गधं  जहाँ होगी ही भरी, घास की।

 

किसी किशोरी का हंस बनकर, घुँघरू जैसे लाल-लाल पैरों में दिन-दिन भर हरी घास की गंध वाली पानी में, तैरता रहुँगा।

आऊँगा मैं। नदियाँ, मैदान बंगाल के बुलायेंगे-
मैं आऊँगा। जिसे नदी धोती ही रहती है पानी
से इसी सजल किनारे पर।

बंगाल की मचलती नदियाँ, बंगाल के हरे भरे मैदान, जिसे नदियाँ धोती हैं, बुलाएँगे और मैं आऊँगा, उन्हीं सजल नदियों के तट पर।

शायद तुम देखोगे शाम की हवा के साथ उड़ते एक उल्लु को
शायद तुम सुनोगे कपास के पेड़ पर उसकी बोली
घासीली जमीन पर फेंकेगा मुट्ठी भर-भर चावल
शायद कोई बच्चा – उबले हुए !

हो सकता है, शाम की हवा में किसी उड़ते हुए उल्लु को देखो या फिर कपास के पेड़ से तुम्हें उसकी बोली सुनाई दें। हो सकता है, तुम किसी बालक को घास वाली

जमीन पर मुट्ठी भर उबले चावल फेंकते देखो
देखोगे रूपसा के गंदले-से पानी में
नाव लिए जाते एक लड़के को – उड़ते फटे
पाल की नाव !
लौटते होंगे रंगीन बादलों के बीच, सारस
अँधेरे में होऊँगा मैं उन्हीं के बीच में
देखना !

या फिर रूपसा नदी के मटमैले पानी में किसी लड़के को फटे-उड़ते पाल की नाव तेजी से ले जाते देखो या फिर रंगीन बादलों के मध्य उड़ते सारस को देखो, अंधेरे में मैं उनके बीच ही होऊँगा। तुम देखना मैं आऊँगा जरूर। (Loutkar Aaunga Phir)

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Akshar Gyan– हिंदी कक्षा 10 अक्षर ज्ञान

इस पोस्ट में हम बिहार बोर्ड के वर्ग 10 के पद्य भाग के पाठ 10 (Akshar Gyan) “अक्षर ज्ञान” के व्याख्या को पढ़ेंगे, इस कविता के कवि अनामिका है | इसमें बच्चों के अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षण-प्रक्रिया के कौतुकपूर्ण वर्णन चित्रण द्वारा कवियित्री गंभीर आशय व्यक्त करती है।

Akshar gyan
Akshar gyan

10. अक्षर ज्ञान  (Akshar Gyan)

लेखक परिचय
लेखक- अनामिका
जन्म- 17 अगस्त 1961 ई०, मुजफ्फरपुर (बिहार) उम्र- 59 वर्ष

इनके पिता श्यामनंदन किशोर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे।
कवियित्री अनामिका दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम० ए० और पी॰ एच॰ डी॰ करने के बाद सत्यवती कॉलेज दिल्ली में अध्यापन कार्य आरम्भ किया।

प्रमुख रचनाएँ- इन्होंने गद्य और पद्य दोनों में लेखन कार्य किया- गलत पत्तों की चिट्ठी अनुष्ठुप पोस्ट-एलिएट पोएट्री तथा स्त्रीत्व का मानचित्र आदि।

कविता परिचय- प्रस्तुत कविता समसामयिक कवियों की चुनी गई कविताओं की चर्चित श्रृंखला ‘कवि ने कहा‘ से संकलित है। इसमें बच्चों के अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षण-प्रक्रिया के कौतुकपूर्ण वर्णन चित्रण द्वारा कवियित्री गंभीर आशय व्यक्त करती है।

10. अक्षर ज्ञान (Akshar Gyan)

चौखटे में नहीं अँटता
बेटे का ‘क‘
कबुतर ही है न-
फुदक जाता है जरा-सा !

कवियित्री अनामिका बच्चों के अक्षरज्ञान के बारे में कहती है कि जब माता-पिता बच्चों के अक्षर सिखाना आरंभ करते हैं तब बाल्यावस्था के कारण बच्चा बड़ी कठिनाई से ‘क‘ वर्ण का उच्चारण कर पाता है।

पंक्ति से उतर जाता है
उसका ‘ख‘
खरगोस की खालिस बेचैनी में !
गमले-सा टूटता हुआ उसका ‘ग‘
घड़े-सा लुढ़कता हुआ उसका ‘घ‘।

इसके बाद ‘ख‘ वर्ण की बारी आती है। इस प्रकार ‘ग‘ तथा ‘घ‘ वर्ण भी सिखता है। लेकिन अबोधता के कारण बच्चा इन वर्णों को क्रम से नहीं बोल पाता। कभी ‘क‘ कहना भूल जाता है तो कभी ‘ख‘। तात्पर्य यह कि व्यक्ति का प्रारंभिक जीवन सही-गलत के बीच झूलता रहता है। जैसे ‘क, ख, ग, घ‘ के सही ज्ञान के लिए बेचैन रहता है।

‘ङ‘ पर आकर थमक जाता है
उससे नहीं सधता है ‘ङ‘ ।
‘ङ‘ के ‘ड‘ को वह समझता है ‘माँ‘
और उसके बगल के बिंदू (.) को मानता है
गोदी में बैठा ‘बेटा‘

कवियित्री कहती है कि अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा पानेवाला बच्चा ‘क‘ वर्ग के पंचमाक्षर वर्ण ‘ङ‘ का ‘ट‘ वर्ग का ‘ड‘ तथा अनुस्वार वर्ण को गोदी में बैठा बेटा मान लेता है। बच्चा को लगता है कि ‘ड‘ वर्ण के आगे अनुस्वार लगने के कारण ‘ङ‘ वर्ण बन गया।

माँ-बेटे सधते नहीं उससे
और उन्हें लिख लेने की
अनवरत कोशिश में
उसके आ जाते हैं आँसु।
पहली विफलता पर छलके आँसु ही
हैं सायद प्रथमाक्षर
सृष्टि की विकास- कथा के।

कवियित्री कहती हैं कि बच्चा ‘ङ‘ वर्ण का सही उच्चारण नहीं कर पाता है। वह बार-बार लिखता है, ताकि वह उसकी सही उच्चारण कर सके, लेकिन अपने को सही उच्चारण करने में असमर्थ जानकर रो पड़ता है। तात्पर्य यह कि अक्षर-ज्ञान जीवन की विकास-कथा का प्रथम सोपान है। (Akshar Gyan)

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