पाठ 6 आ रही है रवि की सवारी | Aa rahi hai ravi ki sawari

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ छ: ‘आ रही है रवि की सवारी (Aa rahi hai ravi ki sawari)’ को पढ़ेंगे, इस पाठ में हरिवंश राय बच्‍चन ने सूर्योदय का बड़ा ही मोहक वर्णन किया है।

Aa rahi hai ravi ki sawari 

6. आ रही है रवि की सवारी कवि हरिवंश राय बच्‍चन
नवकिरण का रथ सजा है,
कलिकुसुम से पथ सजा है,
बादलोंसे अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी
आ रही रवि की सवारी !

अर्थकवि सूर्योदय का वर्णन करते हुए कहता है कि सूर्योदय के समय सूर्य नई किरणों से सजा रथ पर संवार प्रतीत होता है तो उस समय कलियों एवं फूलों से प्रकृति सज-धज जाती है। जलपूर्ण बादल सूर्य की लाल किरणों के पड़ने से सुनहले रंग का हो जाता है। कवि को यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है, जैसे-कोई राजा सोने की पोशाक धारण कर रथ पर सवार होकर आ रहा हो।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर बच्चन द्वारा लिखित कविता ‘आ रही रवि की सवारी’ से ली गई हैं। इनमें कवि ने सूर्योदय का बड़ा ही मोहक वर्णन किया है।

किरण रूपी रथ पर सवार सूर्य कवि को एक राजा के रथ के समान प्रतीत होता है। उसे लगता है कि घोड़े से सुसज्जित राजा का रथ हो और स्वर्ण की पोशाक पहने राजा उस पर सवार हो तथा उनके मार्ग को फूलों से सज़ा-धजा दिया गया हो, ठीक वैसे ही सूर्योदय के समय उदित हो रहे सूर्य की किरणें रथ के घोड़े के समान लगती हैं, फूलों के खिलने से वातावरण मोहक बन जाता है । जल से पूर्ण बादल का रंग सुनहला हो जाता है। सुबह के समय का ऐसा दृश्य देखकर कवि को लगता है, जैसे सूर्य की सवारी आ रही हो । अतः प्रस्तुत कविता में कवि ने सूर्योदय कालीन प्राकृतिक दृश्य का स्वाभाविक चित्र उपस्थित किया है।

विहग बंदी और चारण,
गा रहे हैं कीर्तिगायन,
छोड़कर मैदान भागी तारकों की फौज सारी !
आ रही रवि की सवारी !

अर्थकवि बच्चन जी कहते हैं कि सूर्योदय के समय पक्षीगण कलरव करने लगते हैं, बंदी तथा चारण ईश्वर अथवा राजा के गुणगान करने लगते हैं तथा सूर्य के प्रकाश में आकाश में टिमटिमाते तारे प्रकाश हीन अर्थात् लुप्त हो जाते हैं। इस प्रकार, कवि को सूर्योदय के समय का दृश्य प्रतीत होता है।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर हरिवंशराय बच्चन द्वारा लिखित कविता ‘आ रही रवि की सवारी’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने सूर्योदय कालीन दृश्य का स्वाभाविक वर्णन किया है।

कवि का कहना है कि सुबह होते ही पक्षीगण अपने कलरव से वातावरण को गुंजायमान बना देते हैं, बंदी तथा चारण प्रभु (राजा) की स्तुति करने लगते हैं तो प्रकाश के फैलते ही तारे समूह ओझल हो जाते हैं। कवि के कहने का तात्पर्य है कि सुबह होत हा प्रकृति म परिवर्तन हो जाता है। प्रकृति के कण-कण में एक नया उत्साह, नया जोश तथा नई जागृति आ जाती है। सभी अपने-अपने नियत कर्म में लग जाते हैं । कवि रवि का सवारी की तुलना राजा की सवारी से करते हुए कहना चाहता है कि जिस प्रकार राजा का यशोगान प्रजा करती है; उसी प्रकार सूर्योदय के स्वागत में प्रकृति अपनी सौन्दर्य सुषमा बिखेर देती है।

चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह
रात का राजा खड़ा है राह में बनकर भिखारी !
आ रही रवि की सवारी !

अर्थकवि बच्चनजी कहते हैं कि सूर्योदय के इस मनोरम दृश्य को देखकर मन प्रसन्न हो उठता है, परन्तु निस्तेज चाँद को देखकर मन खिन्न हो उठता है कि संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति या वस्तु का पतन या विनाश निश्चित है।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कविवर हरिवंशराय बच्चन द्वारा लिखित कविता ‘आ रही रवि की सवारी’ से ली गई हैं। इसमें कवि ने संसार की क्षणभंगुरता की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

कवि सूर्योदय कालीन प्राकृतिक सौन्दर्य देख अपना हार्दिक प्रसन्नता प्रकट करना चाहता है, लेकिन रात भर अपनी चाँदनी से शीतलता प्रदान करने वाले निस्तेज चाँद को देखकर ठिठक जाता है, क्योंकि रात का राजा चाँद असहाय भिखारी के समान प्रतीतहोता है। कवि को ऐसा परिवर्तन यह सोचने को विवश कर देता है कि उत्थान-पतन अथवा जीवन-मरण प्रकृति का शाश्वत नियम है। इसलिए व्यक्ति को अपने उत्थान या ऐश्वर्य पर न तो इठलाना चाहिए और न ही पतन पर व्यथित होना चाहिए। प्रकृति अपने नियम से चलती है, इसलिए सुख-दु:ख दोनों स्थितियों में व्यक्ति को समान भाव में रहना चाहिए। “गीता’ का यही संदेश है। भाषा खड़ीबोली हिन्दी है।

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पाठ 5 मैं नीर भरी दु:ख की बदली | Mai neer bhari dukh ki badli Class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ पाँच ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली(Mai neer bhari dukh ki badli)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में महादेवी वर्मा ने हरिऔध सूर्योदयकालीन प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया है।

Mai neer bhari dukh ki badli

मैं नीर भरी दु:ख की बदली, कवि- महादेवी वर्मा

स्‍पंदन में चिर निस्‍पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्‍व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली !

अर्थ-कवयित्री कहती है कि कंपन में ही चिर शांति निवास करती है। रूदन के बाद ही दुःखी मन प्रसन्नता महसूस करता है। आँखों में दीपक के समान वेदना की भावना ज्वलित रहती है जिस कारण आँसू झरना के समान गिरते रहते हैं। कवयित्री के कहने का भाव है कि वियोग की दशा में मानसिक व्यथा आँसू बनकर जब गिर जाती है तो मन में एक विशेष शांति महसूस होती है।

व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियाँ विरह की गायिका कवयित्री महादेवी वर्मा द्वारा विरचित कविता ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवयित्री ने विरह-वेदना की दशा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।

वेदना की गायिका का मानना है कि अभाव से उत्पन्न दुःख अति प्रिय होता है, क्योंकि इससे प्रेमी के प्रति प्रेम दृढ़ होता है। विरही अपनी वेदना रूपी आँसू से प्रेम रूपी बेलि को सींचती रहती है, जिससे प्रेमी की याद दीपक के समान आँखों में जलती रहती है। साथ ही, आँसू के गिरने से मन हलका हो जाता है और कवयित्री अपने अन्दर एक अलौकिक शांति का अनुभव करती है। इसीलिए कवयित्री अपने को बदली कहकर यह स्पष्ट करना चाहती है कि बदली जल बरसाकर रिक्त हो जाती है और वह आँसू बहाकर शून्यता की स्थिति प्राप्त करना चाहती है।

मेरा पग-पग संगीत भ्‍रा,
श्‍वासों से स्‍वप्‍न-पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय-बयार पली !

अर्थ- कवयित्री कहती हैं कि उसका हर कदम संगीत से पूर्ण है तथा उसकी साँसो से स्वप्न रूपी पुष्प की धूलि (गंध) निकलती है। आकाश के नये-नये रंग टुपट्टा जैसे प्रतीत होते हैं तथा जिसकी छाया में चंदन वन से आने वाली हवा पलती है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री.महादेवी वर्मा द्वारा लिखित कविता “मैं नीर भरी -दुःख की बदली’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इनमें कवयित्री ने वेदना की दशा का वर्णन किया है।

कवयित्री का कहना है कि वेदना की इस दशा में उसके हर कदम संगीतमय हो गये हैं। उसकी साँसों से कल्पना रूपी पुष्प की धूलि झरती प्रतीत होती हैं तो आकाश उसके दुपट्टे के सामन नये-नये रंग उपस्थित कर रहा है। कवयित्री के कहने का भाव यह है कि वह अपने प्रियतम से मिलने के लिए इस प्रकार सज-धज जाना चाहती हैं कि उसका प्रियतम सहजता के साथ उसे स्वीकार कर ले। इस प्रकार मिलन की व्यग्रता के कारण कवयित्री के मन में तरह-तरह के भाव जाग्रत होते हैं।

मैं क्षितिजभृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जलकण हो बरसी
नव जीवनअंकुर बन निकली!

अर्थकवयित्री कहती हैं कि वह अपने अज्ञात प्रियतम-मिलन की क्षीण आशा अथवा निराशा के कारण उसकी चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। उसे लगता है जैसे प्यासी धरती पर बादल जल बरसा कर नया जीवन प्रदान करता है अर्थात् तप्त धरतीको शांति प्रदान करता है, वैसे ही वेदना रूपी आँसू के जल गिरने से उसके मन की – मलिनता अथवा निराशा दूर होती है तथा मनमें नई आशा का संचार होता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ वेदना की गायिका कवयित्री महादेवी वर्मा द्वारा लिखित | कविता ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवयित्री ने वेदना को चरमावस्था का वर्णन किया है।

कवयित्री का कहना है कि वेदना की ज्वाला जितनी तीव्र होती जाती है. उसकी आँखों से अश्रुजल जितने गिरते जाते हैं, उसकी भावना उतनी ही परिपुष्ट होती जाती है। तात्पर्य कि कवयित्री के प्रेमी-मिलन की लालसा लगातार बढ़ती जाती है। इसीलिए कवयित्री अपने आँसुओं की तुलना बदली से करती हुई यह बताना चाहती है कि जिस प्रकार बदली जलपूर्ण होकर सारे आकाश में छा जाती है और जल बरसाकर सारे विश्व को नया जीवन प्रदान करती है, उसी प्रकार कवयित्री वेदना का भार वहन करती हुई अपने करूणा जल से सबको नया जीवन प्रदान करना चाहती है।

पथ को न मलिन करता आना,
पदचिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली ।

अर्थकवयित्री अपने अज्ञात, असीम प्रियतम से आग्रह करती है कि वह इस प्रकार आए कि आने वाला पथ न तो मलिन हो और न ही कोई पदचिह्न ही शेष रह जाए, बल्कि वह इस प्रकार आए कि मात्र सुख या आनंद का ही अनुभव हो।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा द्वारा लिखित कविता – ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवयित्री ने अपने अज्ञात प्रियतम से आग्रह किया है कि वह इस प्रकार आए कि उसका प्रेम-पथ न तो मलिन होने पाए और न ही अपना पद-चिह्न छोड़े ताकि कवयित्री की अनंत. में समाहित होने की | भावना क्षीण न हो। कवयित्री का मानना है कि तृप्ति मिलते ही व्यक्ति का प्रयास मंद हो जाता है, इसलिए कवयित्री चाहती है कि उसकी वेदना उसे सतत् कर्मपथ पर अग्रसर रखे। साथ ही, कवयित्री यह भी चाहती है कि संसार में उसकी याद करके लोग आनंद का अनुभव करें।

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आजचली ।

अर्थकवयित्री कहती है कि चाहे इस विस्तृत संसार में कोई अपना न हो। उसका परिचय तथा उसके जीवन का इतिहास यही हो । उसके मन में इतिहास में अमर बनने के विचार आये थे,जो स्वतः नष्ट हो गए हैं।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ वेदना की अमर गायिका कवयित्री महादेवी वर्मा द्वारा विरचित कविता ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ से ली गई हैं। इनमें कवयित्री ने अस्तित्वहीन बनकर रहने की इच्छा प्रकट की है।

कवयित्री का कहना है कि वह संसार से किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखती। वह मात्र वेदना की गायिका के रूप में अपना इतिहास रचना चाहती है, परन्तु यह विचार भी क्षण भर में लुप्त हो जाते हैं, क्योंकि वह तो नीर भरी दुख की बदली बनकर रहना चाहती है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि कवयित्री अपनी वेदना के माध्यम से उस असीम में समाहित होना चाहती है। उसमें मिलने के बाद व्यक्ति अस्तित्वहीन हो जाता है और उसकी स्मृति ही शेष रह जाती है।

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पाठ 3 गुरूगोविन्‍द सिंह के पद | Guru Gobind singh ke Pad

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ तीन ‘गुरूगोविन्‍द सिंह के पद (Guru Gobind singh ke Pad)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में गुरूगोविन्‍द सिंह ने  मानवीय एकता के संबंध में अपना विचार प्रकट किया है

Guru Gobind singh ke Pad

पद, कविगुरूगोविन्‍द सिंह
कोऊ भयो मुंडिया संन्यासी, कोऊ जोगी भयो,
कोऊ ब्रह्मचारी, कोऊ जतियन मानबो।
हिंदू तुरक कोऊ राफजी इमाम साफी,
मानस की जात सबै एकै पहचानबो।
करता करीम सोई राजक रहीम ओई,
दूसरों न भेद कोई भूल भ्रम मानबों।
एक ही सेव सबही को गुरुदेव एक,
एक ही सरूप सबै, एकै जीत जानबो।

अर्थकवि का कहना है कि इस समाज में कोई अपने को मुंडित सिर वाले संन्यासी कोई जोगी, कोई ब्रह्मचारी, कोई यति, कोई हिन्दू, कोई तुर्क, कोई अपने स्वामी को पीड़ित देखकर भागनेवाला, कोई अपने को धर्मगुरु कहता है। लेकिन इन सारे भेदों के बावजूद वह मूल रूप में मनुष्य है । इस प्रकार राम एवं रहीम दोनों एक ही हैं। उन्हें एकदूसरे से भिन्न मानना सर्वथा भूल या भ्रम है। सारा संसार एक ही गुरु रूप भगवान कीआराधना या सेवा करता है। अतः सबका रूप एक समान है तथा एक ही प्रकाश से सभी – ज्योतित या प्रकाशमान् है।

व्याख्याप्रस्तुत छंद सिखों के दसवें तथा अंतिम गुरु गुरुगोविंद सिंह द्वारा रचितहै। इसमें कवि ने मानवीय एकता के संबंध में अपना विचार प्रकट किया है।कवि का कहना है कि सभी मनुष्य एक समान हैं, चाहे किसी भी जाति के क्यों न हों। अपनी सुविधा के लिए ये विभिन्न जातियों में विभक्त हो गए हैं। लेकिन मूल रूप में ये मनुष्य हैं जिसे कोई नकार नहीं सकता। हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। यह संसार एक ही ईश्वर की ज्योति से प्रकाशित है। धर्म तो मानव द्वारा सृजित है। अतएव इन सारे भेदभावों को त्यागकर हमें मिलजुल कर अन्याय का विरोध करने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए, क्योंकि हम समान रूप से इस अन्याय के शिकार है।

कवि मानवमात्र की एकता के लिए व्यग्र है। वह एकत्वपूर्ण आत्मबोध के लिए ईश्वर की एकता, गुरु, स्वरूप तथा ज्योति की एकता की प्रतिष्ठा करना चाहता है। निष्कर्षतः कवि ने समाज के ऊपरी विभेदों की दीवार तोड़कर आंतरिक एकता स्थापित करने का भरपूर प्रयास किया है, ताकि लोगों में देश-प्रेम की भावना प्रबल हो सके। प्रस्तुत छंद की भाषा पंजाबी मिश्रित ब्रज है।

जैसे एक आग ते कनूका कोट आग उठे,
न्यारे न्यारे कै फेरि आगमै मिलाहिंगे।
जैसे एक धूरते अनेक धूर धूरत हैं,
धूरके कनूका फेर धूरही समाहिंगे।
जैसे एक नदते तरंग कोट उपजत हैं,
पान के तरंग सब पानही कहाहिंगे।
तैसे विस्वरूप ते अभूत भूत प्रगट होइ,
ताही ते उपज सबै ताही मैं समाहिंगे।

अर्थकवि का कहना है जिस प्रकार आग के छोटे कण से करोड़ों आग के कणउत्पन्न हो जाते हैं लेकिन अलग-अलग होते हुए भी पुनः उसी आग में मिल जाते हैं या फिर एक ही धूल के कण अनेक खंडों में विभक्त होने केबाद पुनः मिट्टी का रूप धारण कर लेते हैं। नदी या समुद्र में लहरें अलग-अलग दिखाई देती हैं लेकिन सभी लहरें एक ही जल से उठती हैं। उसी प्रकार निराकार परमब्रह्म से उत्पन्न ये पंचभौतिक शरीर वालेजीव पुनः उसी परमात्मा के दिव्य प्रकाश में समाहित हो जाते हैं । अर्थात् हर वस्तु जहाँ से उत्पन्न होती है, उसे पुनः उसी में मिलना पड़ता है।

व्याख्या प्रस्तुत छंद गुरुगोविंद सिंह द्वारा रचित है। इसमें कवि ने जीवन-मरण के महान् दार्शनिक पक्ष को उद्घाटित किया है।

कवि का कहना है कि संसार अनित्य है, सिर्फ ईश्वर ही सत्य है । जीव जीवन-मरण के कारण आता-जाता रहता है, परन्तु ईश्वर न तो जन्म लेता है और न ही मरता है। वह अजर, अमर, व्यापक तथा बहुरूपी है । वहआवश्यकतानुसार विभिन्न रूपों में प्रकट होता है, लेकिन उसका रूप विश्वरूप है। कवि इस पंचभौतिक शरीर वालों के संबंध में अपना विचार प्रकट करते हुए कहता है कि ये जहाँ से आते हैं, मरणोपरान्त पुनः उसी में मिल जाते हैं।

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पाठ 2 मंझन के पद | Manjhan ke Pad Class 9 Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ दो ‘मंझन के पद (manjhan ke pad class 9 hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में मंझन ने प्रेम के महत्‍व को बताया है।

manjhan ke pad class 9 hindi

पद, कविमंझन

पेम अमोलिक नग सयंसारा।जेहि जिअं पेम सो धनि औतारा।
पेम लागि संसार उपावा।पेम गहा बिधि परगट आवा।
पेम जोति सम सिस्टि अंजोरा।दोसर न पाव पेम कर जोरा।
बिरुला कोइ जाके सिर भागू।सो पावै यह पेम सोहागू।
सबद ऊँच चारिहुं जुग बाजा।पेम पंथ सिर देइ सो राजा।
पेम हाट चहुं दिसि है पसरी गै बनिजौ जे लोइ।
लाहा औ फल गाहक जनि डहकावै कोइ ॥

अर्थकवि मंझन प्रेम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि प्रेम संसार में बहुमूल्य पत्थर के समान है। जिसके हृदय में प्रेम का संचरण होता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। प्रेम के कारण ही ईश्वर इस संसार में प्रकट होता है। प्रेम ज्योति के समान इस संसार को प्रकाशित करता है। किसी अन्य भाव से नहीं बल्कि प्रेम के सहारे ही यह संभव है। कवि का कहना है कि भाग्यवान व्यक्ति को प्रेम करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, क्योंकि प्रेम की महत्ता हर युग में रही है। जिसने अपने-आपको इस प्रेम रूपी अरूप पर अपने को अर्पित कर दिया है अर्थात् जिसने प्रेम को ही अपना सर्वस्व माना है, वह पूज्य और महान हो गया है अथवा हो जाता है। कवि फिर कहता है कि प्रेम का बाजार चारों ओर फैला हुआ है और जो सफल व्यापारी के समान इसे प्राप्त करना चाहता है, “उसे प्रेमस्वरूप की प्राप्ति अवश्य होती है। इसमें किसी को भ्रमित होने या करने की जरूरत नहीं है।

व्याख्याप्रस्तुत कड़बक भक्तिकालीन प्रेममार्गी शाखा के कवि मंझन द्वारा लिखित है। कवि मंझन सूफी मत के कवि हैं। उन्होंने इसमें प्रेम के महत्त्व अथवा विशेषता पर प्रकाश डाला है।कवि का कहना है कि प्रेम जीवन का अमूल्यसाधन है, जिसके सहारे मनुष्य अमरता प्राप्त कर लेता है। प्रेम ईश्वर तक पहुँचने का मात्र साधन ही नहीं, ईश्वर का प्रतिरूप भी है, जो इस प्रेमरस को चख लेता है उसका जीवन धन्य हो जाता है, सारा संसार उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता है। कवि के कहने का तात्पर्य है कि जो व्यक्ति इस प्रेम मार्ग का राही बन जाता है, उसके लिए संसार की कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती। ईश्वर प्रेम का भूखा होता है न कि किसी वस्तु या दिखावे का? इसीलिए कबीर ने भी कहा “ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।’ निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यह संसार प्रेमरूपी ज्योति से ही प्रकाशमान है। इसलिए मनुष्य को कभी किसी प्रकार के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।

अमर न होत कोइ जग हारै।मरि जो मरै तेहि मींचु न मारै।
पेम के आगि सही जेई आंचा।सो जग जनमि काल सेउं बांचा।
पेम सरनि जेइं आपु उबारा।सो न मरै. काहू कर मारा।
एक बार जौ. मरि जीउ पावै।काल बहुरि तेहि नियर न आवै।
मिरितु क फल अब्रित होइ गया।निहअंमर ताहि के कया।
जौ जिउ जानहि काल भौ पेम सरन करि नेम।
फोरै दुहुँ जग काल भौ सरन काल जग पेम ॥

अर्थकवि का कहना है कि इस संसार में कोई अमर नहीं होता किंतु जो स्वयं कोप्रेम के पीछे मार देता है, उसे विष या मृत्यु भी नहीं मारते । क्योंकि प्रेम की आग में जोअपने को तपा देता है, वह इस संसार में जन्म लेकर मृत्यु से भी बच जाता है। कविका विश्वास है कि जो मनुष्य प्रेमरूपी सीढ़ी पर स्वयं को आरूढ़ कर देता है, उसे कोई मार नहीं सकता अर्थात् किसी के मारने से वह मरता नहीं है । जो मनुष्य एकबार प्रेम के पीछे अपने को बलिदान दे देता है, फिर मृत्यु उसके पास कभी नहीं आती है। वह अपने बलिदान के कारण अमर हो जाता है और उसका नाम सदा के लिए अमरता प्राप्त कर लेता है। अतः जो मनुष्य प्रेम रूपी मार्ग पर नियमपूर्वक चलता है, सांसारिक बाधाएँ उसकी कुछ भी नहीं बिगाड़ती हैं तथा वह दोनों ही स्थितियों में अर्थात् जीवन-काल में एवं मृत्यु के बाद भी अमर रहता है।

व्याख्या प्रस्तुत कड़बक भक्तिकालीन प्रेममार्गी शाखा के कवि मंझन द्वारा लिखित है। इसमें कवि ने प्रेम के महत्त्व को प्रतिपादित किया है।कवि ने कहा है कि प्रेम अमर होता है। प्रेम का नाश किसी भी स्थिति में नहीं होता। प्रेम मानवता का मूल है। अर्थात् प्रेम के सिवा संसार में कुछ भी अमर नहीं होता लेकिन जो अनुष्य अपने-आपको प्रेम की बलिवेदी पर अर्पित कर देता है, वह अमर हो जाता है। कवि का मानना है कि जो अपने को भगवत् रूपी आग में तपा देता है, वह निष्कलुष, निर्मल एवं अमर हो जाता है । वह किसी के मारने से भी नहीं मरता । क्योंकि वह पहले ही अपनी सारी इच्छाओं को मार चुका होता है। इसका परिणाम होता हैं कि उसका वह त्याग उसे अमरता प्रदान कर देता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रेम प्रभु तक पहुँचने का सुगम मार्ग है, जो इस प्रेमरस का पान कर लेता है, उसकी सारी सांसारिक इच्छाएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं और उसे सब कुछ प्रेममय प्रतीत होने लगता है। इसी कारण प्रेम को ईश्वर का दूसरा रूप माना गया है।

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रैदास के पद का अर्थ | raidas pad class 9 hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ एक ‘रैदास के पद (raidas pad class 9 hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में रैदास ने ईश्‍वर और भक्त के बीच के संबंध को बताया है।

raidas pad class 9

कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ 1 पद लेखक- रैदास

कैसे छूटै राम नाम रट लागी ।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अंगअंग बास समानी ।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती ।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा ।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा ।

अर्थ– रैदास ईश्वर के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु, तुमसे मेरा नाता कैसे टूट सकता है, क्योंकि तुम चंदन हो और मैं पानी । इन दोनों के आपसी संयोग से मेरा अंग-अंग सुगंधित हो गया है। तुम मँडराते बादल हो तो मैं वन में विचरण करने वाला मोर अर्थात् जिस प्रकार बादल देखकर मोर वन में नाचने लगता है, उसी प्रकार तुम्हारे स्मरण से मेरा मन-मयूर नाच उठता है । हे प्रभु, यदि तुम दीपक हो तो मैं बाती हूँ। अर्थात् जिस प्रकार दीपक के जलते ही घर प्रकाशित हो जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे नामरूपी ज्योति से मेरा अन्तर मन प्रकाशित हो गया है। इसी प्रकार यदि तुम मोती हो तो मैं धागा हूँ अर्थात् मैं तुम में ही समाया हुआ हूँ। तुम सोना हो तो मैं सुहागा हूँ अर्थात् जैसे सुहागा सोना में मिलकर अपना अस्तित्व खो देता है, उसी प्रकार मैं तुम में मिलकर या पाकर अस्तित्वहीन हो गया हूँ। अतः तुम मेरे स्वामी हो और मैं तुम्हारा सेवक (दास) हूँ। इस प्रकार की भक्ति रविदास करते हैं।

Bihar Board Hindi Poetry Chapter 1 raidas pad Class 9 Explanation

व्याख्याप्रस्तुत पद निर्गुण भक्ति धारा के संत कवि रैदास द्वारा विरचित है। इसमें कवि ने विभिन्न उपादानों के माध्यम से भक्त और भगवान के संबंधों का वर्णन किया है।

कवि का कहना है कि भक्त एवं भगवान में अन्योन्याश्रय संबंध है, इन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि भगवान का सान्निध्य पाकर ही भक्त जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति पाता है। इसीलिए कवि ने ईश्वर को चन्दन, बादल, चन्द्रमा, दीपक तथा मोती कहकर यह दर्शाने का प्रयास किया है कि जैसे चन्दन का संयोग पाकर पानी चंदन के समान सुगंधित हो जाता है, वैसे ही भगवान का सान्निध्य पाकर भक्त का जीवन सुगंधमय हो जाता है। जैसे बादल को देखकर मोर नाचने लगता है, वैसे ही ईश्वर के दर्शन मात्र से भक्त का मन-मयूर प्रफुल्ल हो जाता है। अतः कवि ने अपने लिए पानी, मोर, चकोर, बाती तथा धागा उपमानों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आत्मा और परमात्मा में अनन्य संबंध है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है, इसलिए आत्मा जब परमात्मा में एकाकार अर्थात् मिल जाती है, तब भक्त और भगवान के बीच कोई भेद नहीं रह जाता। रैदास ने दास्य भाव से ईश्वर की भक्ति की है। ये मूलतः संत कवि हैं। इनकी भाषा सरल, सरस तथा सहज है।

राम मैं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ।फल. अरु मूल अनूप न पाऊँ ॥
थनहर दूध जो बछरू जुठारी।पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ॥
मलयागिरी बेधियो भुअंगा।विष. अमृत दोऊ एकै संगा ॥
मन ही पूजा मन ही धूप। मन ही सेॐ सहज सरूप ॥
पूजा अरचा न जानूं तेरी । कह रैदास कवन गति मेरी॥

अर्थकवि रैदास का कहना है कि हे प्रभु, मैं तुम्हारी पूजा किस प्रकार करू, क्योंकि अनूठे फल एवं कंद-मूल का अभाव है, गाय के थन का दूध जूठा है, भौरों ने फूलों को तथा मछलियों ने जल को विकृत कर दिया है। मलयपर्वत से अमृततुल्य हवा चंदन पेड़ से लिपटे साँप के कारण विषतुल्य हैं । अर्थात् साँप के कारण चंदन विषाक्त हो गया है । इसलिए शुद्ध मन से तुम्हारी आराधना करना चाहता हूँ। अर्थात् पूजा-अर्चना जैसे बाह्याडंबर में न पड़कर मन-ही-मन तुम्हारा नाम स्मरण करके तुम्हारा स्वरूप अपने हृदय में बसाना चाहता हूँ।

व्याख्याप्रस्तुत पद निर्गुण भक्तिधारा के संत कवि रैदास द्वारा लिखित है। इसमें कवि ने निर्गुण भक्ति की महत्ता पर प्रकाश डालता है।कवि का कहना है कि पूजा-अर्चना दिखावा है, सगुण भक्ति तथा कर्मकांड निरर्थक हैं, क्योंकि ईश्वर किसी चढ़ावे से प्रसन्न नहीं होता। ईश्वर तो सच्चे दिल की पुकार अथवा आंतरिक पूजा से प्रसन्न होता है। कवि प्रभु से आत्म-निवेदन करते हुए कहता है कि तुम्हारी पूजा किन चीजों से करूँ | मेरे पास न तो अनजूठे फल तथा कंद-मूल है, और न गाय का अन जूठा दूध है, भौरे ने फूल का रस चूसकर उसे रसहीन बना दिया है तो मछली ने जल को दूषित कर दिया है। साँप ने चन्दन को छेदकर विषैला बना दिया है अर्थात् साँप के लिपटे रहने के कारण चन्दन विष युक्त हो गया है इसलिए सच्चे मन से तुम्हारा स्मरण कर तुम्हें अपने हृदय में बसाकर उस अद्भुत छवि को निहारता हूँ। कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहता है कि हे प्रभु । तुम्हारी पूजा-अर्चना की विधि का ज्ञान नहीं है, इसलिए मेरी कौन-सी गति होगी। कवि के कहने का तात्पर्य है कि उसे सांसारिक बाह्याडंबर से कोई लेना-देना नहीं है, कवि को प्रभु के नाम स्मरण का भरोसा है।

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हिंदी पाठ 12 शिक्षा में हेर-फेर | Shiksha me Her Pher Class 9

इस पोस्‍ट में हमलोग साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगर रचित निबंध ‘शिक्षा में हेर-फेर (Shiksha me Her Pher)’ को पढ़ेंगे। यह निबंध भारतीय शिक्षा प्रणाली की खामियों को उजागर किया है।

shiksha me her fer

पाठ-परिचय

महान् शिक्षाशास्त्री एवं साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगर ने’शिक्षा में हेर-फेर’ शीर्षक निबंध में भारतीय शिक्षा प्रणाली की खामियों का उजागर किया है। उनका मानना है कि मानव-जीवन का उद्देश्य निश्चित नियमों में आबद्ध करदेना नहीं होता. बल्कि सर्वतोन्मुखी विकास करना होता है। किंत दषित शिक्षा-प्रणाली केकारण बच्चों को आवश्यक शिक्षा के साथ स्वाधीनता के पाठ का अवसर नहीं दियाजाता, जिस कारण बच्चे की चेतना का विकास नहीं हो पाता और आयु बढ़ने पर भी . बुद्धि की दृष्टि से वह बालक ही रह जाता है। लेखक का कहना है कि हमारी शिक्षाप्रणाली ऐसी है कि जिसमें परीक्षा पास कर लेना मुख्य उद्देश्य होता है। परिणामस्वरूप, हमारे बच्चों को व्याकरण शब्दकोष तथा भूगोल के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता। साथ ही दूसरे देशों में बालक जिस आयु में अपने नए दाँतों से बड़े आनंद से गन्ना चबाते हैं, उसी आयु में हमारे बच्चे स्कूल में मास्टर के बेंत हजम करते हैं तथा शिक्षक की कड़वी गालियों का रस लेते हैं जिस कारण बच्‍चों की मांसि‍क पाचन शक्ति का ह्रास होता है। इसका मुख्‍य कारण यह है कि हमारी शिक्षा में बाल्‍काल से ही आनंद के लिए स्‍थान नही होता, हम उसी को कंठस्‍य करते है जो अति आवश्‍यक है। इससे काम तो हो जाता है, लेकिन उसका विकास नही हो पाता। लेखक की मान्‍यता है कि आनन्‍द के साथ पढ़ते रहने से पठन शक्ति बढ़ती है, सहज-स्‍वभाविक नियम से ग्रहण-शक्ति, धारणा-शक्ति तथा चिंतन शक्ति सबल होती है।

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 12 Shiksha me Her Pher Explanation

अंग्रेजी विदेशी भाषा है। शब्द-विन्यास तथा पद-विन्यास की दृष्टि से हमारी भाषा के साथ उसका कोई सामंजस्य नहीं है। इससे अपरिचित होने के कारण बच्चों के मन मेंकोई स्मृति जागृत नहीं होती, उनके सामने कोई चित्र प्रस्तुत नहीं होता और अंधभाव से उनका मन अर्थ को टटोलता रह जाता है। दूसरी बात यह भी है कि नीचे वर्गों में पढ़ाने वाले शिक्षक अल्पज्ञ होते हैं, वे न तो स्वदेशी भाषा अच्छी तरह जानते हैं, न अंग्रेजी।

वे बच्चों को पढ़ाने के बदले मन बहलाने का काम पूरी सफलता के साथ करते हैं । लेखक खेद प्रकट करते हुए कहता है कि मनुष्य के अंदर और बाहर दो उन्मुक्त विचार क्षेत्र हैं, जहाँ से वह जीवन, बल और स्वास्थ्य संचय करता है, वहाँ बालकों को एक विदेशी कारागृह में बंद कर दिया जाता है, जिस कारण साहित्य के कल्पना-राज्य का द्वार उनके लिए अवरूद्ध हो जाता है। लेखक का तर्क है.कि जिस शिक्षा में जीवन नहीं,आनंद, अवकाश या नवीनता नहीं, जहाँ हिलने-डुलने का स्थान नहीं, ऐसी शिक्षा की शुष्क, कठोर, संकीर्णता में क्या बालक कभी मानसिक शक्ति, चित्त का प्रसार या चरित्र की बलिष्ठता प्राप्त कर सकता है ? नहीं, कभी नहीं, वह तो केवल रटना, नकल करना तथा दूसरों की गुलामी करना ही सीख पाएगा। जीवन-यात्रा संपन्न करने के लिए चिंतन शक्ति एवं कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक माना गया है। लेकिन हमारी शिक्षा में पढ़ने की क्रिया के साथ-साथ सोचने की क्रिया नहीं होती, क्योंकि बाल्यकाल से ही चिंतन और कल्पना पर ध्यान नहीं जाता । इसलिए बाल्यकाल से ही बच्चों की स्मरणशक्ति पर बल न देकर चिंतनशक्ति और कल्पनाशक्ति को स्वतंत्र रूप से परिचालित करने का अवसर उन्हें दिया जाना चाहिए, ताकि नीरस शिक्षा में जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ न हो।

लेखक शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कहता है. कि जिस प्रकार बर्बर जातियों के लोग शरीर पर रंग लगाकर अथवा शरीर के विभिन्न अंगों को गोदकर, गर्व का अनुभव करते हैं, जिससे उनके स्वाभाविक, स्वास्थ्य, उज्ज्वलता और लावण्य छिप जाते हैं, उसी तरह हम भी विलायती विद्या का लेप लगाकर दंभ करते हैं, किंतु यथार्थ आंतरिक जीवन के साथ उसका योग बहुत ही कम होता है। इसलिए बाल्यकाल से ही भाषा-शिक्षा के साथ भाव-शिक्षा की व्यवस्था हो और भाव के साथ समस्त जीवन-यात्रा नियमित हो, तभी हमारा व्यवहार सहज, मानवीय तथा व्यावहारिक हो सकता है। हमें अच्छी तरह समझना चाहिए कि जिस भाव से हम जीवन-निर्वाह करते हैं, उसके अनकल हमारी शिक्षा प्रणाली नहीं है। इतना ही नहीं, जिस समाज के बीच हमें जीवन बिताना है, उस समाज का कोई उच्च आदर्श हमें शिक्षा प्रणाली में नहीं मिलता। हमारी शिक्षा जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती। हमारी यह शिक्षा किसी एक ही व्यवसाय तक सीमित रहती है. संपूर्ण जीवन के साथ उसका कोई संबंध नहीं होता । इसी कारण एक व्याक्त युरोपीय दर्शन, विज्ञान तथा न्यायशास्त्र का पंडित तो दूसरी ओर सारे का पोषण भी करता है । फलतः विद्या आर व्यवहार के बीच एक दुर्भेद्य व्यवधान उत्पन्न हा गया है। दोनों में सुसंलग्नता निर्मित नहीं हो पाती।

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 12 Shiksha me Her Pher Explanation

परिणाम यह होता है कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी होते जाते हैं। हमारी पुस्तकीय विद्या उसकी विपरीत दिशा में जीवन को निर्देशित करते हमारे मन में उस विद्या के प्रति अविश्वास और अश्रद्धा का जन्म होता है। हम सोचते हैं कि वह विद्या एक सारहीन वस्तु है और समस्त यूरोपीय सभ्यता इसी मिथ्या पर आधारित है। इस तरह जब हम शिक्षा के प्रति अश्रद्धा व्यक्त करते हैं, तब शिक्षा भी हमारे जीवन से विमुख हो जाती है। हमारे चरित्र पर शिक्षा का प्रभाव विस्तृत परिमाण में नहीं पड़ता तथा शिक्षा और जीवन का आपसी संघर्ष बढ़ जाता है। इसलिए शिक्षा और जीवन में सामंजस्य निर्माण करने की समस्या आज हमारे लिए सर्वप्रधान विचारणीय विषय है। तात्पर्य कि भाषा शिक्षा के साथ-साथ भाव शिक्षा की वृद्धि न होने से यूरोपीय विचारों से हमारी यथार्थ संसर्ग नहीं होता। दूसरी बात, जिन लोगों के विचारों से मातृभाषा का दृढ़ संबंध नहीं होता वे अपनी भाषा से दूर हो जाते हैं और उसके प्रति उनके मन में अवज्ञा की भावना उत्पन्न होती है।

निष्कर्पतः हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि हेर-फेर दूर होने से ही हमारा जीवन सार्थक होगा। हम शिक्षा का सही उपयोग नहीं कर पाते, इसी कारण हमारे जीवन में इतना दैन्य है, जबकि हमारे पास सब कुछ है। इसलिए हमें क्षुधा के साथ अन्‍न गीत के साथ वस्त्र, भाव के साथ भाषा और शिक्षा के साथ जीवन का सामंजस्य होने से समस्या अपने आप दूर हो जाएंगी।

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कक्षा 9 हिंदी सूखी नदी का पुल | Sukhi nadi ka pul Class 9 Hindi

Sukhi nadi ka pul

इस पोस्‍ट में हमलोग रामधारी सिंह दिवाकर रचित कहानी ‘सूखी नदी का पुल(Sukhi nadi ka pul Class 9 Hindi)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 10 सूखी नदी का पुल
रामधारी सिंह दिवाकर

पाठ का सारांश

प्रस्तुत कहानी ‘सूखी नदी का पुल’ गाँव के सामाजिक ताने-बाने में आए बदलाव की कहानी है। कहानी के मूल में लीलावती अर्थात बुच्चीदाय की वह जमीन है जो उसे विवाह के समय पिता ने दान में दी थी।

गाँव के रेलवे स्टेशन पर गाड़ी जैसे ही रुकी, लीलावती उछाह भरे मन से आगवानी के लिए नैहर से आए लोगों को प्लेटफार्म पर देखने लगी। आगवानी में आए भाई, दोनोंभतीजे-सुरेश-नरेश तथा एक अपरिचित को देखकर उसे ऐसा लगा, जैसे—सूखी-प्यासी धरती पर बादल बरस गए हों। स्टेशन के बाहर जीप लगी हुई थी, जिसे देखकर लीलावती उदास हो गई, क्योंकि उसने सोचा था कि टप्परवाली बैलगाडी या ओहार वाली बैलगाड़ी आई होगी। सुरेश यह कहते हुए ड्राइवर वाले सीट पर बैठ गया कि “जीप अपनी है बुआ’ और नरेश ने जेब से कोई काली-सी चीज निकाली और झट से तौलिए में लपेट लिया । बुआ जिज्ञासा भरे शब्दों में पूछा-क्या है? कुछ नहीं, पिस्तौल है। पिस्तौल का नाम सुनते ही बुआ चौंक पड़ी। भैया ने मुस्कराते हुए कहा इसमेंअचरज की क्या बात है, बुच्चीदाय।” भैया के मुँह से बुच्चीदाय संबोधन सुनकर वह प्रेम रस से सराबोर हो गई तथा अपने भाई की ओर गौर से देखने लगी कि गाँवों में कैसा परिवर्तन हो गया कि जीवन भर खादी के कपड़े पहनने वाले अर्थात् आदर्श जीवन व्यतीत करने वाले की जेब में पिस्तौल । यह समय परिवर्तन की देन है। ग्रामीण परिवेश विकृत हो चुका है। आरक्षण के कारण अगड़ी-पिछड़ी तथा ऊँच-नीच की भावनाएँ इतनी प्रबल हो गई हैं कि एक वर्ग दूसरे वर्ग की जान के ग्राहक बन गए हैं। जमीन-जायदाद गले की हड्डी बन गई है। तुम्हारी वाली जमीन गिद्धों के लिए मांस का लोथड़ा बनी हुई है। अच्छा हुआ कि तुम आ गई। जमीन का कोई फैसला करके ही जाना।

    बुच्चीदाय तेरह-चौदह वर्षों के बाद नैहर लौटी है। इससे पहले माँ के श्राद्ध-कर्म में आई थी। जीप पर बैठी वह ग्रामीण सामाजिकता के विषय में सोचते हुए विचार मग्न हो जाती है कि नैहर सिर्फ भाई-भौजाई का नहीं होता बल्कि पूरा गाँव ही अपने भाई-भतीजे के समान होता है। इसी वैचारिक क्रम में उसे खवासिन टोली की सहेलिया माय याद आती है जिसके स्तन का दूध पीकर वह पली-बढ़ी थी। उस समय सामाजिक परिवेश कुछ और ही था, किंतु इस बार हर कुछ परिवर्तित देखती है। नदी पर कठपुल्ला की जगह सीमेंट का पुल, नदी में पानी की जगह रेत ही रेत, क्योंकि नदी सूख गई है। बुआ को गाँव भी बदला-बदला दिखाई दिया। खपरैल की जगह पक्का मकान, बिजली के तार, घर में फोन, फ्रिज, टी.वी. आदि-आदि। लेकिन बुआ तो तरस रही है, सखीसहेलियाँ नदी-पोखर, खेत-खलिहान, नाथ बाबा का थान्ह आदि के लिए, क्योंकि इनके साथ बुआ का गहरा संबध था।

    बुआ सहेलिया माय के लिए दो साड़ियाँ लाई थीं, किंतु शाम हो जाने के कारण वह उसके घर नहीं जा सकी। रात में जब भाई-भौजाई ने सहेलिया माय के परिवार की कहानी सुनाई तो उसके होश उड़ गए, क्योंकि सहेलिया माय का बेटा कलेसरा ने बुआ को विवाह के समय मिली पाँच एकड़ जमीन पर सिकमी बटाई का दावा ठोंक दिया, जिस कारण केस-मुकदमा तो हुआ ही, साथ-साथ कलेसरा ने उनके भाई पर फरसा चला दिया, बीच-बचाव में कलेसरा के बाप सोने लाल की कलाई कटकर जमीन पर गिर गई। कलेसरा खूनी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ था। इन सब कारणों से गाँव अगड़ी तथा पिछड़ी दो वर्गों में बँट गया है। लेकिन बुआ यह सब अवसन्न भाव से देखती रही।दिन के तीसरे पहर बुआ कमल पोखर की तरफ निकल पड़ी तथा पोखर के ऊँचे मोहार पर खड़ी हसरत भरी नजर से खवासटोली की तरफ देखने लगी। शहनाई एवं खुरदुक बाजे की मीठी-मीठी मंगल ध्वनि की आवाज सुनकर लगा कि यह आवाज सहेलिया माय के घर से आ रही है। शहनाई का धुन सुनकर बुआ को रघू काका की याद आ गई क्योंकि उनकी शादी के बाद विदाई के समय काका ने समदौन की धुन बजाई थी— “बड़ा रे जतन से सुग्गा रे हम पोसलौं, सेहो सुग्गा उड़ले अकास।” खवासटोली से आती शहनाई की आवाज से बुआ का मन अशांत-सा हो गया। उन्हें अपने भतीजा से पता चला कि सहेलिया माय की पोती की शादी है। उस शादी में शामिल होने के लिए उनका मन उद्विग्न हो उठा और शाम के समय काँख में साड़ी दबाकर उसके घर चल पड़ी। पहुँचने पर उसने देखा कि आँगन गाँव की औरतों एवं बच्चों से भरा हुआ था। गीत-नाद हो रहा था। ओसारे पर पंजों के बल बैठी सहेलिया माय को लीलावती ने पहचान लिया। वह चुपके से उसके पास गई और पैरों पर गिर पड़ी, लेकिन आँखों का मंद ज्योति के कारण वह पहचान न सकी । लीलावती ने अपना परिचय देती हुई कहनेलगी-लाल बाबू की बेटी, बुच्ची दाय हूँ। सारे लोग उन्हें देख स्तब्ध थे। सहेलिया माय के सूखे स्तनों में जैसे दूध उतर आया, क्योंकि इसी के स्तन का दूध पीकर वह पलीबढ़ी थी। टोले के लोग बुच्ची दाय को देखने उमड़ पड़े। सोनेलाल भर्राई आवाज में कहने लगा कि तुम्हारे आने से जीवन धन्य हो गया । कलेसर उनके पैरों पर गिरकर अपने किए पर पश्चाताप के आँसू बहाने लगा। वहाँ का वातावरण इतना प्रेममय हो गया कि कुछ क्षण के लिए उस आँगन का सब कुछ ठहर गया।

    बारात आई। विवाह की विधियाँ चलती रहीं। बुच्ची दाय भी औरतों की झुंड में बैठी विवाह के भूले-बिसरे गीत रात भर गाती रही। अगले दिन बुच्चीदाय जब अपने भैया के घर लौटने के तैयार हुई तो पूरे टोले के लोगों से घिरी वह आम बगान के इस पार तक आई। इधर बबुआनटोले के लोग तथा भाई, भौजाई एवं भतीजे एकटक इसी तरफ देख रहे थे। इस समय बुच्चीदाय पूर्ण देहातिन लग रही थी। चेहरे पर परम उपलब्धि की अपूर्व आभा छिटक रही थी।

दूसरे दिन सुबह में भैया ने जब उसकी पाँच एकड़ जमीन की बात चलाई तो लीलावती ने कहा कि इस बार इस जमीन का कोई निर्णय करके जाऊँगी, क्योंकि इस जमीन के कारण आप लोग भी परेशानी में रहते हैं। भैया ने जमीन के सारे कागजात तथा हाल में कटाई गई रसीद लीलावती को सुपुर्द कर दिया। बहन लीलावती ने हाथ में कागजात लिए मुस्कुराकर बोली-आपसे वचन चाहती हूँ भैया। आप वचन दीजिए कि दान मिली जमीन का जो मैं करूँगी, उसे आपलोग मंजूर कीजिएगा। भैया ने उत्तर देते हुए कहा-तुम जो फैसला करोगी, हमें मंजूर होगा। लीलावती ने कहा कि यह जमीन सहेलिया माय को रजिस्ट्री करना चाहती हूँ क्योंकि उसका दूध पीकर जिंदगी पाई थी। सहेलिया माय और कलेसर कल फारबिसगंज रजिस्ट्री ऑफिस में मिलेंगे। भाई ने बहन का मान रखने के लिए फारबिसगंज जाने के लिए तैयार हो गए। भैया के खादी के कुर्ते की जेब में पिस्तौल की जगह जमीन के कागजात थे। लीलावती को ऐसा लग रहा था जैसे दूध की कोई उमगी हुई उजली नदी है और उस नदी में वह ऊब-डब नहा रहीहै |

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कक्षा 9 हिंदी पाठ 10 निबंध लेखक जगदीश नारायण चौबे | Nibandh Class 9 Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग जगदीश नारायण चौबे रचित कहानी ‘निबंध(Nibandh class 9 Hindi)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 10 निबंध
जगदीश नारायण चौबे

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘निबंध’ में लेखक ने निबंध-लेखन की कला पर प्रकाश डाला है। लेखक का कहना है कि निबंध-लेखन का सही ज्ञान नहीं होने के कारण छात्र परीक्षा में अच्छे अंक पाने से वंचित रह जाते हैं । लेखक का मानना है कि संसार में जितनी वस्तुएँ हैं, सभी निबंध का विषय बन सकती हैं। लेकिन निबंध-लेखन की सही जानकारी नहीं होने के कारण परीक्षक पाठक ऐसे निबंधों को न तो आद्योपान्त पढ़ पाते हैं और न छात्र लेखकों को अच्छे अंक मिल पाते हैं। इसलिए निबंध-लेखक पाठ को ध्यान में रखकर निबंध लिखना चाहिए । निबंध पाठक एवं लेखक के बीच सेतु का काम करता है। निबंध विचारों की सुनियोजित अभिव्यक्ति है, इसलिए इसमें कसाव होगा, ढीलापन नहीं । निबंध की कोई निर्धारित पृष्ठ संख्या नहीं है। इसका कलेवर बढ़ाने के साथ-साथ नाम भी बदल जाता है, जैसे-प्रबंध, महानिबंध, शोध-प्रबंध, शोध-निबंध आदि।

लेखक का कहना है कि निबंध के लिए निरंतर प्रवाह का होना अनिवार्य है। फ्रैंसिस बेकन तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध इसके प्रमाण हैं।

निबंध-लेखन में छात्र लेखकों द्वारा विषय-प्रतिपादन के साथ, विचारों के पल्लवन के साथ तथा भाषा-शैली के साथ अतिक्रमण होने के कारण हिंदी निबंध नीरस, बोझिल और उबाऊ हो जाता है। अतः हिंदी निबंध तो कहीं की ईंट और कहीं के रोड़े से निर्मित होता है और न भानुमती का पिटारा ही है, बल्कि यह एक ऐसी विधा है जिसमें भूगोल, इतिहास, भौतिकी, रसायन हर विषय पर निबंध लिखा जा सकता है।

निबंध में उद्धरण देने के संबंध में लेखक का कहना है कि हिंदीतर भाषाओं का उद्धरण देते समय उसका हिंदी अनुवाद पहले दे दें और टिप्पणी में मूल पंक्तियों का कम-से-कम लेखक के नाम के साथ, हवाला अवश्य दें।’ अन्यथा वह उद्धरण पाण्डित्य का द्योतक न बनकर, बेवकूफी का उद्घोषक बन जाता है। हिंदी निबंध की दुर्दशा के विषय में लेखक का तर्क है कि छात्र रबर समझकर मनमानी खींचतान करते हुए पृष्ठ को भद्दे तरीकों से भर देते हैं, जिससे निबंध का स्वरूप विकृत हो जाता है। इसलिए निबंध कैसा होना चाहिए, के संबंध में लेखक ने अपना विचार प्रकट किया है कि अच्छे निबंधके लिए कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक होता है, क्योंकि कल्पना अज्ञातलोक काप्रवेशद्वार हैं। इसका सहारा लेकर एक ही विषय पर विभिन्न प्रकार के निबंध लिखे जासकते हैं, जबकि “परिचय, लाभ-हानि, उपसंहार” वाली पुरानी रीति पर लिखे गए निबंध एक ही तरह के हैं। लेखक ने छात्रों से गाय पर निबंध लिखवाकर अनुभव किया कि गाय तो खूटे में बँधी रह गई तथा लिखने वालों की बुद्धि बथान से बाहर न निकल पाई। इसलिए कल्पनाशक्ति के द्वारा किसी विषय के विभिन्न पक्षों से साक्षात्कार करके, उसके परतों को उकेर कर निबंधों को ऐसा बना दिया जाए कि पाठक आद्योपान्त सरसता के साथ पढ़ें।निबंध-लेखन के लिए व्यक्तिगत अनुभव का होना अति आवश्यक है, क्याकि कल्पना के द्वारा उस विषय से परिचित होकर उस आधार पर अपने अनुभव गढ़ सकते है जो निबंध को आकर्षक बनाएँगे। निबंध को आकर्षक, विश्वासोत्पादक तथा रोचक बनाने के लिए विषय से जुड़ना तथा जुड़कर अपने अनुभवों का तर्कसंगत ढंगसे उल्लेख करना नितांत – आवश्यक है। इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण हैं, डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं?’ इसका विषय बिल्कुल अनसुना, लेकिन कल्पना और निजी संपर्क के आधार पर प्रतिपादन इतना विश्वसनीय है कि पाठक विस्मय विमुग्ध हो जाता है । यद्यपि निबंध छोटा है, परन्तु उतने में ही मनुष्य की आदिम व्यवस्था से लेकर आज तक की जययात्रा का समस्त वृत्तांत तथा सभ्यता के बाद भी मनुष्य के भीतरवाले पशु का बढ़ते नाखूनों के रूप में सिर उठाना हमारे विचारों को झकझोर देता है। इस प्रकार श्रेष्ठ निबंध के लिए कल्पना तथा व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ विषय से संबंधित आँकड़े, पुस्तकीय ज्ञान, पत्र-पत्रिकाओं की सूचनाएँ तथा विभिन्न लेखों-निबंधों से प्राप्त जानकारियाँ आवश्यक हैं। अतः निबंध को लोकप्रिय बनाने के लिए उसकी प्राचीन शास्त्रीयता को एक हद तक ढीला करके लालित्य तत्त्व से मढ़ दिया गया है। ऐसे ललित निबंध लेखकों में डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. विद्यानिवास मिश्र, देवेन्द्रनाथ शर्मा, कुबेरनाथ राम आदि प्रमुख हैं , इनके निबंध वैयक्तिक निबंध होते हुए भी उबाऊ प्रतीत नहीं होते । अतः निबंध का आरंभ इतना रोचक हो कि पाठक पढ़ने के लिए लालायित हो उठे। निष्कर्षतः उत्कृष्ट निबंध-लेखन के लिए कल्पनाशक्ति, वैयक्तिक अनुभव, विषयवस्तु का प्रतिपादन तथा सहज भाषा का प्रयोग अनिवार्य है।

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रेल-यात्रा लेखक शरद जोशी | Rail-yatra class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग शरद जोशी रचित कहानी ‘रेल-यात्रा(Rail-yatra class 9th Hindi)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 9 रेल-यात्रा

लेखक शरद जोशी

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पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘रेल-यात्रा’ शरद जोशी की व्यंग्य रचना है। इसमें लेखक ने भारतीय रेल व्यवस्था के माध्यम से सरकार की डपोरशंखी रेल प्रगति की पोल खोल दी है।

रेलमंत्री का मानना है कि भारतीय रेलें तेजी से प्रगति कर रही हैं जबकि लेखक के अनुसार रेल की प्रगति यही है कि एक स्थान से लोगों को दूसरे स्थान तक पहुँचा देती है, लेकिन डब्बे में घुसते ही रेल की प्रगति की सच्चाई का पता चल जाता है। डब्बेमें बैठने की बात तो दूर साँस लेने की जगह नहीं मिलती। धक्कम-धुक्की, मार-पीट,जोर-जबर्दस्ती तथा नोक-झोंक भारतीय रेल यात्रा की प्रधान विशेषता हैं। सरकारीअव्यवस्था के कारण सीट उन्हें ही मिलती है जिन्हें धन-बल है। कुछ बाहुबली भी साट प्राप्त कर लेते हैं।

लेखक का कहना है कि हमारे यहाँ कहा जाता है— ‘ईश्वर आपकी यात्रा सफलकरें’, ऐसा क्यों ? इस संबंध में लेखक का तर्क है कि रेल-यात्रा में भगवान की कृपा ही सर्वोपरि है, क्योंकि रेल कहाँ दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगी, निर्दिष्ट स्थान पर कब पहुँचेगी तथा भीड़ में जगह मिलेगी या नहीं, सारी बातें ईश्वर की कृपा पर निर्भर करती है। भारतीय रेल कर्म पर विश्वास करती है, फल की चिंता नहीं करती। इसका दायित्व मात्र निश्चित स्थान तक पहुँचा देना है, यात्री की जो भी दशा हो, वे जिंदा रहें या मुर्दा, इसको जिम्मेदारी भारतीय रेल को नहीं है। वह पूर्ण ईमानदारी से अपना काम करती है। उसे पता है कि जिसेलेखक भारतीय रेलों की अव्यवस्था पर व्यंग्यात्मक लहजे में कहता है कि भारतीय रेलों ने एक बात सिद्ध कर दी है कि बड़े आराम अथवा पीड़ा के सामने छोटे आराम या पीड़ा का कोई महत्त्व नहीं होता। जैसे किसी घर में कोई मर जाता है अथवा किसी की शादी तय हो जाती है,गाँव जाने के लिए फौरन रेल में चढ़ जाते हैं। भीड़, धक्कामुक्की, गाली-गलौज सब कुछ सहन करते खड़े रहते हैं, क्योंकि घर में आदमी मर गया है अथवा शादी की बात तय हो गई है। भारतीय रेलें हमें चिंतन सिखाती हैं कि जीवन की अंतिम यात्रा अर्थात् मृत्यु के समय मनुष्य खाली हाथ रहता है, उसी प्रकार मनुष्य रेल-यात्रा के समय खाली रहना चाहिए, क्योंकि सामान रहने पर बैठने की समस्या हो जाती है, बैठने पर सामान रखने की समस्या खड़ी हो जाती है, यदि दोनों काम हो जाता है तो प्रश्न उठता है कि दूसरा आदमी कहाँ बैठेगा अथवा सामान रखेगा। तात्पर्य कि रेलों में इतनी अधिक भीड़ रहती है कि कहीं जाने के समय सोचना पड़ जाता है क्योंकि भारतीय रेलें हमें मृत्यु का दर्शन समझाती हैं और अक्सर पटरी से उतरकर उसकी महत्ता का अनुभव करा देती हैं। रेल में चढ़ने के बाद यह कहना कठिन होता है कि वह कहाँ उतरेगा, अस्पताल में या श्मशान में । इसी कारण लोग रेलों की आलोचना करते हैं।

निष्कर्ष रूप में लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि सरकार की उदासीनता तथा रेलों की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण रेल-यात्रा करते हुए हम अक्सर विचारों में डूब जाते हैं। इसका मुख्य कारण रेल की अनियमितता है। यह कहीं भी खड़ी हो जाती है। ऐसा देखकर कोई यात्री लेखक से पूछ बैठता है— “कहिए साहब, आपका क्या ख्याल है, इस कंट्री का कोई फ्यूचर है या नहीं ?” ‘पता नहीं’ जवाब देते हैं “अभी तो ये सोचिए कि इस ट्रेन का कोई फ्यूचर है या नहीं।” अतः इससे स्पष्ट होता है कि आज के विकसित परिवेश में भारतीय रेलें एवं भारतीय अभी भी अविकसित हैं। लेखक व्यंग्यात्मक भाषा में कहता है—-‘आपने भारतीय मनुष्य को भारतीय रेल के पीछेभागते देखा होगा। उसे पायदान से लटके, डिब्बे की छत पर बैठे, भारतीय रेलों के साथ प्रगति करते देखा होगा।’ लेखक का मानना है कि अगर इसी तरह रेल पीछे आती रही तो भारतीय मनुष्य के पास बढ़ते रहने के सिवाय कोई रास्ता नहीं रहेगा। रेल में सफर करते, दिन भर झगड़ते रात भर जागते रेलनिशात् सर्वभूतानां’ चरितार्थ करते रहेंगे।

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पधारो म्हारे देस लेखक अनुपम मिश्र | Padharo mhare desh

इस पोस्‍ट में हमलोग अनुपम मिश्र रचित कहानी ‘पधारो म्हारे देस(Padharo mhare desh)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

Padharo mhare desh

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 8 पधारो म्हारे देस

लेखक अनुपम मिश्र

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पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘पधारो म्हारे देस’ अनुपम मिश्र द्वारा लिखितपुस्तक राजस्थान की रजत बूंदें’ से संकलित है। इसमें लेखक ने जीवन में पानी का क्या महत्त्व या आवश्यकता है, इसकी ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। लेखक काकहना है कि पानी मनुष्य के लिए ईश्वर की सबसे बड़ी देन है। इसका उपयोग सहीढंग से होना चाहिए । पानी का दुरुपयोग करना जीवन को जोखिम में डालना है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पूर्व जहाँ समुद्र की लहरें उठती थीं, वहाँ मरूभमि का विस्तृत क्षेत्र विद्यमान है।

प्रकृति के इस विराट रूप को दूसरे विराट रूप में परिवर्तित होने में लाखों वर्ष लगेहोंगे, लेकिन राजस्थान के लोग यहाँ के पहले वाले रूप को भूले नहीं हैं। वह अपने मनकी गहराई में आज भी उसे हाकड़ों नाम से याद रखे हैं। राजस्थानी भाषा में समुद्र को हाकड़ो कहा जाता है। इसके अतिरिक्त समुद्र के लिए सिंधु, सरितापति, सागर, वाराधिप, आच, उअह, देधाण, वडनीर, वारहर, सफरा-भंडार आदि नामों से संबोधित करते हैं। समुद्र का एक नाम हेल है जो समुद्र की विशालता एवं उदारता का द्योतक है। इस प्रकार राजस्थानी समाज की उदारता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए लेखक यह संदेश देना चाहता है कि विशाल मरुभूमि में रहते हुए भी जिसके कंठ में समुद्र के इतने नाम मिलते हैं तो निश्चय ही इस समाज में महानता है। जबकि इस क्षेत्र की छवि एक सूखे, उजड़े और पिछड़े क्षेत्र की है। थार मरुस्थल इसी का एक भाग है। देश के सारे राज्यों में इसका क्षेत्रफल एवं इसकी आबादी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं, परन्तु वर्षा के मामले में अंतिम है। तात्पर्य कि जहाँ देश के अन्य भागों में वर्षा की औसत 100 सेंटीमीटर से 1000 सेंटीमीटर है, वहीं राजस्थान में वर्षा की औसत मात्रा 25 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर तक है । मरुभूमि में पानी कम तथा गर्मी ज्यादा होने के कारण वहाँ की जनसंख्या विरल है, परन्तु राजस्थान के मरुप्रदेश में दुनिया के अन्य ऐसे प्रदेशों की तुलना में न सिर्फ बसावट ज्यादा है बल्कि उस बसावट में जीवन की सुगंध भी है।

इसीलिए यह क्षेत्र दुनिया के अन्य मरुस्थलों की तुलना में सबसे अधिक जीवंत माना गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि राजस्थान के समाज ने प्रकृति से मिलने वाले इतने कम पानी का रोना नहीं रोया, बल्कि इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और अपने ऊपर से नीचे तक कुछ इस ढंग से खड़ा किया कि पानी का स्वभाव समाज के स्वभाव में बहुत सरल ढंग से बहने लगा। इसी विशेषता के कारण जैसलमेर, बीकानेर तथा जयपुर इतने कम पानी के इलाके में होने के बाद भी देश के अन्य शहरों के मुकाबले में कम सुविधाजनक नहीं था। यही शहर लंबे समय तक सत्ता, व्यापार तथा कला का मुख्य केन्द्र था। ईरान, अफगानिस्तान से लेकर रूस आदि से होनेवाले व्यापार का प्रमुख केन्द्र यही था।

लेखक का मानना है कि राजस्थान के समाज ने अपने जीवन-दर्शन की विशिष्ट गहराई के कारण ही जीवन की, कला की तथा संस्कृति की ऊँचाई को छुआ था। इस जीवन-दर्शन में पानी का काम एक बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था । पानी के काम में यहाँ भाग्य भी है और कर्त्तव्य थी। भाग्य के संबंध में लेखक का तर्क है कि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ द्वारका इसी रास्ते से वापस हुए थे। उनका रथ मरुदेश पार कर रहा था। जैसलमेर के निकट त्रिकंट पर्वत पर तपस्यारत उत्तंग ऋषि के तप से प्रसन्न श्रीकृष्ण ने उन्हें वर माँगने को कहा । ऋषि ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि “यदि मेरे कुछ पुण्य हैं तो भगवन् वर दें कि इस क्षेत्र में कभी जल का अकाल न रहे।’ श्रीकृष्ण ने ‘तथास्तु’ कहकर वरदान दिया था। लेकिन यहाँ के लोगों ने यह वरदान पाकर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा, बल्कि वर्षा की बूदों को सहेज कर इस तरल रजत बूंदों को अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए एक ऐसी भव्य परंपरा बना ली, जिसकी धवलधारा इतिहास से निकल कर वर्तमान तक बहती है और वर्तमान को भी इतिहास बनाने की सामर्थ्य रखती है। यहाँ की मरुभूमि के प्राचीन इतिहास में रेगिस्तान के लिए थार शब्द भी ज्यादे नहीं दिखता । रेगिस्तान के पुराने नामों में स्थल है, जो समुद्र के सूख जाने से निकले स्थल का सूचक है। इस प्रकार स्थल का थल और महाथल बना, जिसे बोलचाल में थली और धरधूधल कहा गया। फिर माड़, मारवाड़, मेवाड़, मेरवाड़, ढूँढ़ार, गोड़वाड़, हाडौती जैसे बड़े विभाजन भी हुए। यहाँ अनेक छोटे-बड़े राजा भीहुए, परन्तु लेखक के अनुसार यहाँ के नायक श्रीकृष्ण ही है, जिन्हे मरुनायकजी की तरहपुकारा जाता है। यहाँ के लोगों ने इन जलबूंदों को टाँकों, कुंड-कुंडियों, बेरियों, जोहड़ों, नाडियों, तालाबों, बाबड़ियों तथा कुओं में उतार लिया, लेकिन इसके लिए जसढोल नहीं पीटा। इन्होंने जल-संग्रह करने की अपनी अनोखी परंपरा का विकास करके देश के अन्य भाग के लोगों को जल-संग्रह करने के लिए प्रेरित किया कि आओ, देखो, हमारी भव्यपरंपरा।

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