अष्टावक्र लेखक विष्‍णु प्रभाकर वर्ग 9 | Astavakra class 9 Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग विष्‍णु प्रभाकर रचित कहानी ‘अष्टावक्र(Astavakra class 9 Hindi)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

Astavakra ..

Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 6 अष्टावक्र

Bihar Board Class 10th Social Science

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘अष्टावक्र’ दलित-पीड़ित जीवन की कहानी है। अष्टावक्र अपनी बूढ़ी माँ के साथ खजांचियों की विशाल अट्टालिका की ओर जाने वाले मार्ग पर अनेक छोटी-छोटी अंधेरी तथा बदबूदार कोठरियाँ बनी हुई हैं, उन्हीं में से एक में अष्टावक्र रहता है। उसका शरीर टेढ़ा-मेढ़ा है, जो हिंडोले की तरह झूलता है। वह स्पष्ट बोल भी नहीं पाता है। उसका रंग श्याम, निरीह नयन, मुख लंबा तथा वक्र, वस्त्र कीट से चिकटे हैं। एकमात्र उसकी माँ उसका सहारा है। उसका पिता उसकी शैशवास्था में ही स्वर्ग सिधार गया। उसके प्रति माँ का स्नेह इतना तीव्र था कि उसने पुत्र की बुद्धि का विकास नहीं होने दिया तथा उसका भोलापन मूर्खता की सीमारेखा पार कर गया। गरीबी तथा बुढ़ापे के कारण उसकी माँ का शरीर शिथिल हो चुका था, फिर भी वह अपने अपंग पुत्र के भरण-पोषण के लिए बेचैन रहती थी। उसके सिर के बाल उलझे हुए तथा जूँ के अड्डे थे।

उसकी माँ जब अष्टावक्र को कुछ कहती तो वह अपने वक्र मुख को और भी वक्र करके कुएँ की जगत् पर बैठ जाता अथवा आने-जाने वालों को देखने लगता। उस समय – वह जड़ भरत या मलूकदास जैसा प्रतीत होता था। माँ ही उसे नित्यकर्म करने को कहती, मुँह धुलवाती तथा रात की बची हुई रोटी एवं खोमचे में बची हुई चाट,देती।

वह खोमचा लगाता था, जिसमें कचालू की चाट, मूंग दाल की पकौड़ियाँ, दही के आलू तथा पानी के बतासे होते थे। वह गली-गली ‘चाट लो चाट, आलू की चाट, पानी के बतासे’ कहकर बेचा करता था। उसकी आवाज सुनकर बच्चे, किशोर तथा कुमार दौड़ पड़ते और उसके स्वर में स्वर मिलाकर कहने लगते ‘पकौड़ी बतासा लो, उल्लू की चाट लो।’ माँ उसे समझाकर भेजती—पैसे के चार बतासे देना, चार पकौड़ी देना तथा चार चम्मच आलू देना, किंतु नासमझी के कारण एक पैसा में चार पत्ते दे देता था। संध्या के समय जब वह लौटता तो माँ लोटे से पैसे निकालकर गिनती और माथा ठोक लेती, क्योंकि डेढ़ रुपये की बिक्री का सामान ले जाकर वह दस-बारह आने लेकर लौटता । माँ के लाख प्रयास के बाद भी उसमें कोई परिवर्तन नहीं आ सका। अन्त में, उसने माँ से कहा-‘चाट तू बेचाकर’ लड़के मुझे मारते हैं। यह सुनकर माँ ने अपने लाल को इस प्रकार निहारा कि उसके शुष्क नयन सजल हो उठे। पुत्र की बात पर उसे याद हो आया. कि शैशव और यौवन तो स्वयं मधुर होती है परन्तु उसकी याद मोटर की धुएँ की तरह काली, कड़वी तथा दुर्गंधपूर्ण होती है। माँ को इस बात का दुःख नहीं हुआ कि बेटा उसे चाट बेचने के बाद भी चाट बेचना नहीं सीखा सका । भगवान ऐसे व्यक्ति को जन्म क्यों देते हैं। तभी बेटे ने कहा-माँ! भूख लगी है। यह सुनकर माँ खीझ उठी। उसने कहा-कंब तक तेरी खातिर में बैठी रहूँगी । अर्थात् मेरे मरने के बाद कौन सहारा होगा। माँ बोलती जा रही थी और वह कुएँ की जगत् पर जाकर लेट गया। काफी रात बीत जाने पर वह खाना लेकर गई। रोटी खाते हुए अष्टावक्र ने इतना ही कहा-माँ। बोलने का कठिनता के कारण इतना लंबा हो गया कि माँ को लगा कि अखिल ब्रह्माण्ड उसे माँ कहकर पुकार रहा हो।

एक बार अष्टावक्र को तेज बुखार आ गया। वह चिथड़ों में लिपटा चूल्हे के पास छटपटा रहा है और माँ चाट बेचने को बैठी है। उसने प्लुत स्वर में कहा-माँ! पानी। माँ ने बेटे को पानी पिलाकर लौटने लगी। बेटे ने पुनः उसी स्वर में कहा-माँ! माँ की ममता जाग उठी। उसने उसके सिर दबातें हुए पैसे की चिन्ता में डूब गई। कुछ दिनों के बाद माँ को ज्वर चढ़ आया । उसने उस दशा में भी पकौड़ी बनाने की रीति बेटे को समझाकर कहा-अब धीरे-धीरे तेल में छोड़ता जा । लेकिन नासमझ अष्टावक्र मुट्ठीभर आलू बेसन कड़ाही में डाल दिया । फलतः उसकी छाती पक गई। माँ ने ज्वरावस्था में थाल तो तैयार कर दिया, किन्तु लौटने पर उसके हाथ से थाल न ले सकी । उसने बेटे की ओर निहारा तथा हाथ फैलाकर कहा-पैसे । बेटे ने लोटे से पैसे निकाल कर उसके हाथ में पैसे रख दिए । दो-तीन दिनों तक बीमार रहने के बाद वह चल बसी। अब उस कोठरी में एक कुल्फी वाला बूढ़ा आ बसा । लेकिन उसी शाम कहीं से घूमते हुए अष्टावक्र अपने सामान के साथ कुएँ की जगत पर चुपचाप बैठ गया। इसके पास कुछ बच्चे आए तथा कुल्फीवाला भी आ गया। कुल्फीवाले के पूछने पर उसने माँ को पुकारा । कुल्फीवाले ने कहा, तुम्हारी माँ मर गई है, अब वह नहीं आएगी। उस रात उसी कुएँ की जगत् पर रात काटी। सबेरे बड़े खजांची ने उसे अपने बाग में भेज दिया, जहाँ खुली जगह पड़ी थी, पर वह उसे अच्छी न लगी। खजांचिन ने उसे कपड़े तथा रोटी दिए, जिसे अस्वीकार कर दिया। उसने कुएँ की जगत् को नहीं छोड़ा और चाटवाला खाली थाल लेकर घूमने लगा। उसे थाल लेकर घूमते हुए देखकर लोग कहने लगे कि इसकी माँ मर गई। माँ के मरने की बात सुनकर उसे विश्वास हो गया कि अब उसकी माँ नहीं आएगी। उसी रात कुल्फी वाले ने उसे दर्द भरे स्वर माँ-माँ पुकारते सुना। उसके पेट में दर्द हो रहा था। कुल्फीवाले ने खजांची से आकर कहा कि अष्टावक्र की हालत अति गंभीर है। उसने अस्पताल को फोन किया। वहाँ से गाड़ी आई और उसे आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कर दी, उसकी स्थिति देखकर डाक्टर बोला, बस, अब समाप्त होने वाला है। नर्स ने कुल्फीवाले से पूछा, ‘यह तुम्हारा मरीज है।’ उसने कहा- ‘मेरा कोई नहीं नहीं है।’

लेकिन धीमे पर गंभीर स्वर में पुकारा— ‘माँ’ । कुछ ही क्षणों में उसकी चेतना मौन हो गई।

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भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्‍मों तक | Bhartiya chitrapat : Muk filmo se swak filmo tak

इस पोस्‍ट में हमलोग शिवपूजन सहाय रचित कहानी ‘भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्‍मों तक(Bhartiya chitrapat : Muk filmo se swak filmo tak )’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

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Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 5 भारतीय चित्रपट : मूक फिल्मों से सवाक् फिल्‍मों तक

लेखक अमृतलाल नागर

Bihar Board Class 10th Social Science

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘भारतीय चित्रपटः मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों तक’ अमृतलाल नागर द्वारा लिखित है। इसमें कहानीकार ने फिल्मों के विकास क्रम को साहित्य रंग में ढालकर कथा रूप प्रदान किया है। कथाकार के अनुसार उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी ने दुनिया को ऐसे-ऐसे चमत्कार दिखाए कि आँखें अचंभे से फटी रह गईं, क्योंकि पहले लोग वैज्ञानिक चमत्कारों से परिचित नहीं थे। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक में जब सिनेमा सिर चढ़कर बोलने लगा तो लोग हक्का-बक्का हो गए।

6 जुलाई, 1896 का दिन देश तथा खासकर मुंबई के लिए एक अनोखा दिन था, क्योंकि इसी दिन भारत में सिनेमा दिखाया गया। अखबार में विज्ञापन निकला कि ‘जिंदा तिलस्मात् देखिए, टिकट एक रुपया ।’ विज्ञापन ने मुंबई की जनता में तहलका मचा दिया। मुंबई में आज जहाँ प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम है, उसी के आसपास वाट्सन होटल में भारत का पहला सिने-प्रदर्शन हुआ। फ्रांस के ल्यूमीयेर ब्रदर्स के एजेंट ने इसे दिखलाने के लिए भारत लाए थे। इससे पहले फ्रांस तथा अमेरिका में इसका प्रदर्शन हो चुका था। उस समय सिनेमा आज की तरह किसी कहानी पर आधारित नहीं होता था। इसकी तस्वीरें छोटी-छोटी थी, जिसमें समुद्र स्नान, कारखाने से निकलते मजदूर आदि के दृश्य थे।

मुंबई में इस दिशा में काम-काज शुरू करने के लिए दो-एक विलायती. कंपनियाँ अपने प्रोजेक्टर तथा कैमरे यहाँ लाईं। 1897 ई. में रूपहले पर्दे पर रक्षा बंधन का त्योहार, दिल्ली के लाल किले, अशोक की लाट आदि के दृश्य दिखाए गए। उस जमाने में इसे बायोस्कोप के नाम से पुकारा जाता था।

      भारत में सर्वप्रथम एक सावे दादा थे, जिनका नाम कुछ और था, ने यह काम आरंभ किया। लेखक को इनसे मुलाकात स्वर्गीय मास्टर विनायक की फिल्म ‘संगम’ लिखने के क्रम में शालिनी स्टूडियोज, कोल्हापुर में हुई थी। इनकी शारीरिक बनावट ऐसी थी कि इन्हें देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ये अपने जमाने के श्रेष्ठ कैमरामैन तथा भारतीय फिल्म व्यवसाय के आदिपुरुष रहे होंगे। इन्होंने ल्यूमीयेर ब्रदर्स के प्रोजेक्टर तथा मशीनें खरीद कर भारत में इस धंधे पर एकाधिपत्य जमा लिया था। इन्होंने छोटीमोटी अनेक फिल्में बनाईं, जिनमें कुछ मान्य नेताओं पर भी थीं। लेकिन फिल्मोद्योग के असली संस्थापक दादा साहब फालके माने जाते हैं । इन्होंने ‘हरिश्चन्द्र’ पर फीचर फिल्म बनाई। इसके बाद इन्होंने फीचर फिल्मों की झड़ी लगा दी। भारत सरकार ने भी फिल्म के सर्वोच्च पुरस्कार को दादा साहब फालके पुरस्कार कहकर इतिहास की वंदना की है। सन् 1940 ई. में किशोर साहू की पहली फिल्म ‘बहूरानी’ का उद्घाटन दादा साहब फालके ने ही किया था। लेखक का फिल्मी दुनिया से संबंध स्थापित कराने वाले बहूरानी फिल्म के अर्थपति स्वर्गीय द्वारकादास डागा थे।

     दादा साहब फालके दबंग तथा जोशीले तथा आत्मप्रशंसक थे, किंतु उनकी विशेषता यह थी कि वे नई पीढ़ी के महत्त्व को नकारते न थे। इसीलिए इन्होंने व्ही. शांताराम, देवकी बोस तथा मूक फिल्म के निर्देशक आनंद प्रसाद एवं जालमर्चेट की प्रशंसा मुक्त कंठ से की है। दादा साहब अपनी फिल्मों के निर्माता, निर्देशक, लेखक, कैमरामैन, प्रोसेसिंग डेवलपिंग करने वाले, प्रचारक, वितरक सबकुछ एक साथ थे। लेखक ने ‘राजा हरिश्चन्द्र’ फिल्म देखी थी, जिसमें हरिश्चन्द्र की रांनी का पार्ट मास्टर सांडु को ही करना पड़ा था। इसका कारण यह था कि वेश्या वर्ग की कुछ महिलाएँ कैमरा के सामने आने पर शरमा गईं तथा कुछ को दलालों ने भगा दिया। इसके बाद भस्मासुर’ लंकादहन आदि फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। ‘लंकादहन’ अपने जमाने की बॉक्स-ऑफिस हिट फिल्म थी।

_ मुंबई के बाद एक पारसी व्यवसायी जे. एफ. मादन ने कोलकाता में मादन थिएटर कंपनी की स्थापना की। 1917 ई. से एलफिंस्टन बाइस्कोप कंपनी भी फिचर फिल्में बनाने लगी। 1913 ई. से 1920 ई. तक फिल्मों में अधिकतर पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्में बनीं। 1930 ई. के आसपास सबसे महान फिल्मी हस्ती बाबूराव पेंटर थे, जो प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक व्ही. शांताराम, बाबूराव पेंढारकर, भालजी पेंढारकर तथा मास्टर विनायक गुरू थे। उनकी बनाई फीचर फिल्म ‘सावकार पाश’ (साहूकार का फंदा) अपने समय की प्रसिद्ध फीचर फिल्म थी। इसी अवधि के नामी फिल्मी स्टार हैं—जिल्लो, जुबैदा, मास्टर बिट्बल, ई. बिलीमोरिया, डी. बिलोमारिया, गौहर, सुलोचना, माधुरी, जाल मर्चेट, अर्मलीन, पृथ्वीराज कपूर आदि-आदि। इसी दशक के अत म इंपीरियल फिल्म कंपना ने भारत की ‘सौटक्का, नाचती-गाती बोलती फिल्‍म ‘आलम आरा’ का निर्माण किया । मादन की बोलती फिल्म ‘शीरी-फरहाद’ भी इसी समय की है।

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ग्राम-गीत का मर्म लेखक लक्ष्मी नारायण सुधांशु | Gram Geet ka Marm

इस पोस्‍ट में हमलोग लक्ष्मी नारायण सुधांशु रचित कहानी ‘ग्राम-गीत का मर्म(Gram Geet ka Marm)’ को पढ़ेंगे। यह कहानी समाजिक कुरितियों के बारे में है।

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Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 3 ग्राम-गीत का मर्म

लेखक लक्ष्मी नारायण सुधांशु

Bihar Board Class 10th Social Science

पाठ का सारांश

प्रस्तुत पाठ ‘ग्राम-गीत का मर्म’ में लेखक लक्ष्मी नारायण सुधांशु ने ग्राम-गीत के मर्म का उद्घाटन करते हुए काव्य और जीवन में उसके महत्त्व का निरूपण किया है। लेखक का कहना है कि ग्राम-गीतों में मानव जीवन के उन प्राथमिक चित्रों के दर्शन होते हैं, जिनमें मनुष्य साधारणतः अपनी लालसा, वासना, प्रेम, घृणा, उल्लास तथा विषाद को समाज की मान्य धारणाओं से ऊपर नहीं उठा सका है और अपनी हृदयगत भावनाओं को प्रकट करने में उसने कृत्रिम शिष्टाचार का प्रतिबंध भी नहीं माना है। उनमें सर्वत्र रूढ़िगत जीवन ही नहीं है, बल्कि कहीं-कहीं प्रेम, वीरता, क्रोध कर्तव्य बोध का भी बहुत ही रमणीय, बाह्य तथा अन्तर्विरोध दिखाया गया है। जीवन की शुद्धता और भावों की सरलता का जितना मार्मिक वर्णन ग्राम-गीतों में मिलता है, उतना परवर्ती कला-गीतों में नहीं मिलता।

ग्राम-गीत ही कला गीत का आरंभिक रूप है। ग्राम-गीत वह जातीय आशु कवित्व है, जो कर्म या क्रीड़ा के ताल पर रचा गया है। गीत का उपयोग जीवन के महत्त्वपूर्ण समाधान के अतिरिक्त मनोरंजन भी है। स्त्री-प्रकृति में गार्हस्थ्‍य कर्म विधान की जो स्वाभाविक प्रेरणा है, उससे गीतों की रचना का अटूट संबंध है। स्त्रियाँ अपना शारीरिक श्रम हल्का करने के लिए गीत गाती हैं। इसके अलावे जन्म, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह, पर्व-त्योहार आदि अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों में उल्लास तथा उमंग की प्रधानता रहती है। वैसे स्त्री-प्रकृति का अनुकरण करते हुए पुरुषों ने भी हल जोतने, नाव खेने तथा पालकी ढ़ोने आदि कामों के समय गाए जाने वाले गीतों की रचना की, परन्तु ग्राम-गीतों की प्रकृति स्त्रैण ही रही, पुरुषत्व का प्रभाव नहीं जम सका। कारण कि स्त्रियों के गीतों में कोमलता का भाव है, जबकि पुरुषों के गीतों में युद्ध की युद्धघोषणा का भाव। इस प्रकार ग्राम-गीतों में प्रेम एवं युद्ध का वर्णन मिलता है। अतः ग्राम-गीत हृदय की वाणी है, मस्तिष्क की ध्वनि नहीं।

लेखक के अनुसार, ग्राम-गीतों से ही काल्पनिक तथा वैचित्र्यपूर्ण कविताओं का विकास हुआ है और यही गीत क्रमशः सभ्य जीवन के अनुक्रम से कला-गीत के रूप में विकसित हो गया। ग्राम-गीत की रचना में जिस प्रकृति और संकल्प का विधान था, कलागीत में उसकी उपेक्षा करना समुचित न माना गया। कला-गीत संस्कृत तथा परिष्कृत होने के बावजूद ग्राम-गीतों के संस्कार से मुक्ति नहीं पा सका। इसका कारण यह है कि जबतक मानव प्रकृति को विषय मानकर काव्य रचनाएँ की जाती रहेंगी, तब तक यह संभव नहीं है। ग्राम-गीत की रचना की स्त्रैण प्रकृति कला गीत में आकर कुछ पौरूषपूर्ण हो गई। अतः ग्राम-गीत में स्त्री की ओर से पुरुष के प्रति प्रेम की जो आसन्नता थी, वह कला गीत में बहुधा पुरुष के उपक्रम के रूप में परिवर्तित होने लगी। राजा-रानी, राजकुमार या राजकुमारी अथवा एक विशिष्ट वर्ग के नायक को लेकर जो काव्य-रचना की गई, इसका मुख्य कारण यह है कि वैसे विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति साधारण जनता के हृदय पर उनके महत्त्व की प्रतिष्ठा बनी हुई थी। ऐसे चरित्र को लेकर काव्य रचना करने में रसोत्कर्ष का काम सामाजिक धारणा के बल पर चल जाता था, फलतः कवि की प्रतिभा अपने चरित्र नायक की विशिष्टता सिद्ध करने में नष्ट हो जाता है। ग्राम-गीत की अब यह प्रवृत्ति काव्य-गीत में भी चलने लगी है। लेखक का मानना है कि एक दुःखी भिखारिणी भी हृदय की उच्चता में रानी को मात दे सकती है। इसलिए जैसे-जैसे उच्च वर्ग के प्रति विशिष्टता का भाव घटने लगा, निम्न वर्ग के प्रति हमारे हृदय में आदर का भाव बढ़ने लगा । हृदय की उच्चता या विशालता चाहे किसी में हो, उसका वर्णन करना ही कवि-कर्म है। ग्राम-गीत में दशरथ, राम, कौशल्या, सीता, लक्ष्मण आदि के नामों की चर्चा है। जैसे श्वसुर के लिए दशरथ, पति के लिए राम, सास के लिए कौशल्या तथा देवर के लिए लक्ष्मण सर्वमान्य हैं। ऐसे वर्णन कला-गीतों में चाहे विशेष महत्त्व प्राप्त न करें, किंतु ग्राम-गीत के ये मेरुदंड माने जाते हैं। मानव जीवन का पारस्परिक संबंध-सूत्र कुछ ऐसा विचित्र है कि जिस बात को हम एक समय और एक देश में बुरा समझते हैं। उसी बात को दूसरे समय तथा दूसरे देश में अच्छा मान लेते हैं। जिस प्रकार वैचित्र्यवाद को हमने अबुद्धिवाद कहकर तिरस्कृत किया, वहीं पश्चिमी काव्य जगत् में रोमांस के नाम पर फल-फूलकर अपने सौरभ से पूर्व को भी आकर्षित करने लगा। प्रेम-दशा जितनी व्यापकत्व विधायिनी होती है, जीवन में उतनी श्रेष्ठ कोई स्थिति नहीं होती। इसीलिए प्रेमिका अथवा प्रेमी प्रकृति के साथ अपने जीवन का जैसा साहचर्य मानते हैं, वैसा और कोई नहीं। मनोविज्ञान का यह तथ्य काव्य में एक प्रणाली के रूप में समाविष्ट कर लिया गया है। प्रिय के अस्तित्व की सृष्टि-व्यापिनी भावना से जीवन और जगत की कोई वस्तु अलग नहीं रह सकती, क्योंकि प्राण-भक्षक को भी रक्षक समझने की शक्ति प्रेम की शक्ति में है।

ग्राम-गीतों में ऐसे वर्णन बहुत हैं, जहाँ नायिका-अपने प्रेमी की खोज में बाघ, भालू, साँप आदि से पता पूछती चलती है। आदि कवि वाल्मीकि ने विरह-विह्वल राम के मुख से सीता की खोज के लिए न जाने कितने पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि से पता पुछवाया है। सीता का पता लगाने के लिए हनुमान को दूत बनाया गया। इसके बाद मेघदूत, पवनदूत, हंसदूत, भ्रमर दूत आदि कितने दूत प्रेम-संभार के लिए आ धमके। इसलिए वैज्ञानिक युग में टेलिफोन, टेलीग्राम, रेडियो आदि को भी दूत बनने की मर्यादा मिलनी चाहिए । कलागीतों में पशु-पक्षी, लता-द्रुम आदि से जो प्रश्न पूछे गए हैं, उनके उत्तर में वे प्रायः मौन रहे हैं। विरही याक्ष का मेघदूत भी मौन ही रहा है, किंतु ग्राम-गीत का दूत मौन नहीं रहा है।

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कक्षा 12 हिन्‍दी संपूर्ण क्रांति | Sampoorna Kranti Class 12th Hindi

sampurn kranti

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 12 हिन्‍दी के गद्य भाग के पाठ तीन ‘संपूर्ण क्रांति ( Sampoorna Kranti class 12 hindi)’ के व्‍याख्‍या सारांश सहित जानेंगे।

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Bseb Class 12th Hindi Chapter 3 संपूर्ण क्रांति

 

संपूर्ण क्रांति
लेखक- जयप्रकाश नारायण

 

लेखक परिचय
जन्म- 11 अक्टूबर 1902
निधन- 08 अक्टूबर 1979
जन्म स्थान – सिताब दियारा गाँव
माता-पिता – फूलरानी तथा हरसूदयाल
शिक्षा- आरंभिक शिक्षा घर पर, आगे की शिक्षा के लिए पटना कॉलेजिएट गए।
1922 में शिक्षा प्राप्ति के लिए अमेरिका गएा माँ की अस्वस्थता के कारण पीएच.डी. नहीं कर पायेा
राजनीतिक जीवन – 1929 में काँग्रेस में शामिल

1932 सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल गए। जेल से निकलकर काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन 1939, 1943 में पुनः जेल गए 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन 1954 में विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन से जुड़े 1974 में छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया। आपातकाल के दौरान जेल गए इनके मार्गदर्शन में जनता पार्टी का गठन हआा

कृतियाँ – रिकंस्ट्रकशन ऑफ इंडियन पोलिटी

सम्मान – 1965 में समाज सेवा के लिए मैग्सेसे सम्मान, 1998 में भारत रत्न

कड़‍बक कविता का अर्थ

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पाठ परिचय

प्रस्तुत पाठ में लोकनायक जय प्रकाश नारायण द्वारा दिया गए ऐतिहासिक भाषण का एक अंश है जिसे उन्होने 05 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में दिया थाा सम्पूर्ण भाषण स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में जनमुक्ति पटना से प्रकाशित हैा भाषण को सुनने के लिए लाखों की संख्या में लोग पूरे प्रदेश से आए थे जिसमें युवाओं का बोलबाला थाा नारायण जी कहते है कि अगर दिनकर जी और रामवृक्ष बेनीपुरी जी होते तो उनकी कविता भारत के नवनिर्माण के लिए क्रांति का कार्य करती लेकिन वो आज हमारे बीच नहीं हैा जयप्रकाश नारायण जी कहते हैं कि ये जिम्मेवारी मैंने माँग के नहीं लिया मझे ये जिम्मेवारी युवा पीढ़ी द्वारा सौपी गई हैा वे कहते है कि मैं नाम का नेता नहीं बनूँगा मैं सबकी बात सुनुंगा लेकिन अंतिम फैसला मेरा होगाा

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लेखक ने अपने परिवार की गरीबी के बावजूद अमेरिका में अपने बल-बूते पर पढ़ाई की तथा वापस आकर काँग्रेस में शामिल हो गए !

जयप्रकाश बाबू से मिलने बहुत सारे नेता आए और सबने एकतरफ उन्हे लोकतंत्र की शिक्षा दी तो दूसरी तरफ लोगों के जुलूस को रोका गयाा लेखक कहते हैा कि ऐसे लोगो को शर्म नहीं आती जो एक तरफ लोकतंत्र की बातें करते है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र को अपने पैरों से कुचलते हैा

कक्षा 12 हिन्‍दी बातचीत सम्‍पूर्ण व्‍याख्‍या

लेखक के कुछ मित्र उनका और इन्दिरा जी का मेल मिलाप करवाना चाहते थेा लेखक कहते हैं कि मेरा इन्दिरा जी से व्यक्तिगत झगड़ा नहीं बल्कि उनकी गलत नीतियों से मेरा झगड़ा हैा लेखक ने कई बार बापू और नेहरू जी की भी आलोचना कीा लेखक कहते हैं कि आज राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ा है जिसका प्रमुख कारण चुनावों का खर्चा हैा आज के लोकतंत्र में जनता को इतना ही अधिकार है कि वह चुनाव करें परंतु चुनाव के बाद अपने ही प्रतिनिधियों पर जनता का कोई अंकुश नहीं होता हैा

लेखक के अनुसार अन्य देशों में प्रेस तथा पत्रिकाएँ प्रतिनिधियों पर अंकुश लगती है लेकिन हमारे देश में इसका बहुत अभाव हैा जयप्रकाश नारायण जी का ये भाषण मंत्रमुग्ध करने वाला थाा

कक्षा 12 हिन्‍दी उसने कहा था

हिन्‍दी वर्णिका बिहार का सिनेमा संसार | bihar ka cinema sansar class 9 hindi

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Bihar Board Class 9 Chapter 7 Hindi Varnika बिहार का सिनेमा संसार

पाठ का सारांश

अपनी रंगमंचीय समृद्धि के लिए सुविख्यात बिहार के कलाजगत ने सिनेमा में भी बहस्तरीय योगदान दिया है। बिहार के विशेषज्ञों तथा कलाकारों ने निर्माण, निर्देशन, अभिनय, गीत, संगीत, पटकथा, संपादन आदि में एक विशेष पहचान बनाई है। भोजपुरी फिल्मों के विकास में तो बिहार अग्रगण्य ही रहा है। फिल्मों के साथ बिहार के इस रिश्ते का प्रारंभ बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से होता है जब 1931 ई. में सवाक् फिल्म ‘आलम आरा’ का प्रदर्शन मुंबई में हुआ और 1933 ई. में रतन टॉकिज राँची में, देव (औरंगाबाद. बिहार) में महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह ‘किंकर द्वारा निर्मित सवाक् फिल्म ‘पुनर्जन्म’ का प्रदर्शन हुआ। bihar ka cinema sansar class 9 hindi

महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह की मृत्यु के बाद लगभग तीन दशकों तक फिल्मनिर्माण में बिहार सुना रहा। इसके बाद विश्वनाथ शाहाबादी ने ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ तथा ‘लागी नाही छुटे राम’ भोजपुरी फिल्म का निर्माण किया । इन फिल्मों के गीत-संगीत वाली लोकप्रियता अन्य भोजपुरी फिल्मों को नहीं मिली । भोजपुरी फिल्मों के दूसरे दौर में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अशोकचन्द्र जैन और मुक्ति नारायण पाठक ने अनेक फिल्में बनाई। इस दौर में ‘गंगा किनारे मोरा गाँव’, ‘दूल्हा गंगा पार के’, दंगल, बिहार बाबू आदि फिल्में बनी थीं। अभिनेता कुणाल भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार बनकर उभरे। इसके बाद मनोज तिवारी और रवि किशन ने अभूतपूर्व प्रसिद्धि पाई।

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बिहार ने सिनेमा संसार को विविध क्षेत्रों में समृद्धि तथा स्तरीयता दी है। रामायण तिवारी, शत्रुघ्न सिन्हा, प्यारे मोहन सहाय, शेखर सुमन, कुणाल, मनोज वाजपेयी. विनीत सिन्हा, मनोज तिवारी और रवि किशन अभिनय के क्षेत्र में एक ऐसे स्वतंत्र अध्याय का निर्माण करते हैं जिसके अभाव में भारतीय सिनेमा का इतिहास अपंग हो जाएगा। इसी प्रकार, बिहारी अभिनेत्री स्व. नूर फातिमा ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त गाँधी के छोटे दृश्य के अभिनय में असीम प्रशंसा पाई थी। bihar ka cinema sansar class 9 hindi

संगीतकार चित्रगुप्त तथा श्याम सागर का सराहनीय योगदान तो सर्वविदित है ही, गिरीश रंजन एवं प्रकाश झा ने निर्माण-निर्देशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गिरीश रंजन की फिल्म ‘कल हमारा है’ तथा ‘डाक बंगला’ हिन्दी फिल्म की खूबसूरत उपहार है तो प्रकाश झा की हिन्दी फिल्में अनेक नूतन आयागो से हिन्दी सिनेमा संसार को परिचित कराया है। पार्श्वगायन में सर्वव्यापी लोकप्रियता प्राप्त करने वालों में उदित नारायण ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाई है।

निर्माण, निर्देशन, अभिनय, पटकथा-लेखन, संगीत, गीत, संपादन आदि क्षेत्रों में इतनी । प्रतिभाओं के बावजूद बिहार सिनेमा उद्योग में पीछे है, यह अति विचारणीय विषय है।

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हिन्‍दी वर्णिका पाठ 6 बिहार में नाट्यकला | bihar me natya kala class 9 hindi

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Bihar Board Class 9 Hindi Chapter 6 बिहार में नाट्यकला

पाठ का सारांश

मुगलकालीन शासन के अंतिम समय में कलाओं को विलासिता तथा व्यवसाय का साधन बना लिया गया था। नाटक के क्षेत्र में कोई गंभीर लेखन नहीं हो रहा था। पारसी थिएटर कम्पनियों की प्रस्तुतियों में उत्तेजनापूर्ण नाटक के अभिनय के साथ नर्तकियों के नृत्य, साजबाज तथा अश्लील प्रदर्शन हुआ करता था। उनका उद्देश्य पैसा कमाना था अर्थात् वे सस्ते मनोरंजन के विक्रेता थे। बिहार में विक्टोरिया नाटक, एलिफिंसटन नाटक मंडली आदि खूब लोकप्रिय हुई। बिहार बंधु’ नामक पत्रिका के संपादक केशवराम भट्ट इन थिएटर कंपिनयों से प्रभावित तो हुए किन्तु उनकी स्तरहीनता की कटु आलोचना की। इन्होंने 1876 ई. में ‘पटना नाटक मंडली’ नामक संस्था की स्थापना की। इसी संस्था से सोदेश्य रंगमंच का प्रारंभ होता है। भट्टजी स्वयं नाटक भी लिखते थे। इसके बाद पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा ने ‘मनोरंजन नाटक मंडली’ नामक नाट्य संस्था की स्थापना की तथा ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक का सफल मंचन किया। बी. एन. कॉलेज के छात्रों ने शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया। महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह ‘किंकर’ ने ‘किंकर नाट्य कला मंच’ की स्थापना की। किंकर जी स्वयं चित्रकार, कवि तथा नाटककार थे। इन्होंने अपने किले के अंदर घुमावदार मंच बनवाया था। किंकर जी ने अपनी संस्था का नाम बदलकर ‘महालक्ष्मी थिएटर’ कर दिया तथा स्वरचित नाटक ‘पुनर्जन्म’ का मंचन अपने ही निर्देशन में किया। bihar me natya kala class 9 hindi

बिहार में नाटकों के मंचन का अखंड क्रम तब शुरू हुआ जब डा. एस. एम. घोषाल, डा. ए. के. सेन एवं ब्रज किशोर प्रसाद ने पटना इप्टा’ की स्थापना की। इसी के आस-पास अनिल मुखर्जी ने बिहार आर्ट थिएटर’ कालिदास रंगालय’ नामक प्रेक्षागृह आदि की स्थापना की। इसी प्रकार पं. जगन्नाथ शुक्ल ने भी बिहार में नाटक तथा रंगमंच के विकास में योगदान दिया था। लेकिन चतुर्भुज जी के एकल व्यक्तित्व ने जितने गहरे तक हिन्दी रंगमंच को प्रभावित किया, उतना उनके अन्य समकालीनों से न हो सका। स्व. पृथ्वीराज कपूर ने भी चतुर्भुज जी की प्रस्तुति तथा अनेक अभिनेताओं की खुली प्रशंसा की। इनके नाटक का विषय राष्ट्रीयता, सामाजिक विषमता का विरोध, नारी जागरण आदि होता था। इन्होंने जयशंकर प्रसाद लिखित ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक का भी सफल मंचन किया था। इनकी नाट्य संस्था का नाम ‘मगध कलाकार’ था। bihar me natya kala class 9 hindi

इप्टा की प्रस्तुतियों में सामाजिक विषमता एवं उत्पीड़नों को रेखांकित किया गया। ‘पटना इप्टा’ को भरपूर गतिशीलता प्रदान करने वाले बजरंग वर्मा, श्याम सागर, परवेज अख्लर आदि थे। इप्टा की प्रस्तुतियों ने राष्ट्रव्यापी प्रशंसा पाई थी। तब कला संगम नामक नाट्य संस्था के माध्यम से प्यारे मोहन सहाय तथा सतीश आनंद ने निर्देशन एवं अभिनय दोनों क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर की पहचान बना ली। bihar me natya kala class 9 hindi

चतुर्भुज जी ने अपनी रंग सक्रियता का प्रारंभ बख्तियारपुर में जिस संस्था की स्थापना के साथ किया था, उसका नाम बिहारी क्लब’ था। रंग मंच की दृष्टि से इन्होंने अनेक नाटक लिखे, जिसका मंचन स्वयं तथा अन्य संस्थानों द्वारा किये गये। ‘कलिंग विजय’ ‘अरावली का शेर’, मेघनाद’, कर्ण’, ‘जलियाँवाला बाग’ आदि नाटकों की व्यापक लोकस्वीकृति मिली। इस प्रकार चतुर्भुज जी, प्यारे मोहन सहाय तथा सतीश आनंद इन तीनों ने बिहारियों को हिन्दी रंगमंच को गगनचुम्बी ऊँचाई प्रदान की।

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प्यारे मोहन सहाय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले प्रथम बिहारी थे। इन्होंने पटना में कला संगम’ की स्थापना की तथा मगध कलाकार’ एवं इप्टा द्वारा प्रारंभ की गई परंपरा को कला संगम’ के माध्यम से आधुनिकता के नये आयामों से परिचित कराया। सतीश आनंद ने बिहार की लोकशैलियों से हिन्दी नाटकों को जोड़ा, जिनमें विदेसिया की काफी चर्चा हुई। इनकी प्रतिभा अभिनय एवं निर्देशन के अलावा अनुवाद में भी अद्वितीय रही। इनके द्वारा ‘गोदान’ एवं ‘मैला आंचल’ का भी सफल मंचन किया गया था। इसके बाद नरेन्द्र नाथ पाण्डेय तथा परवेज अख्तर अभिनय तथा निर्देशन में लगातार ऊँचाइयाँ प्राप्त करते गए। पटना इप्टा में परवेज अख्तर, तनवीर अख्तर तथा जावेद अख्तर तीनों भाइयों ने निर्देशन, अभिनय तथा लेखन में उल्लेखनीय योगदान दिया। जावेद अख्तर महान अभिनेता के साथ ही नाटक लेखक भी है। नाटक लेखन में चतुर्भुज, जगदीशचन्द माथुर, रामवृक्ष बेनीपुरी, सिद्धनाथ कुमार आदि को बिहार ने जन्म दिया। इन्होंने रंगमच की दृष्टि से नाटक लिखे। रामेश्वर सिंह काश्यप का लोहा सिंह’ नाटक पूरे देश में अभूतपूर्व रहा। सिद्धनाथ कुमार रेडियो नाटककारों में उल्लेखनीय रहे हैं। इसी प्रकार कथाकार हृषीकेश सुलभ की ‘अमली’ माटी की गाडी’ ‘बटोही’ ‘धरती’ ‘आबा’ ने नाटय वैभव को राष्ट्रव्यापी गौरव से विभूषित किया है। बिहार के हिन्दी रंगमच का विकास पटना के अलावा आरा, मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, पूर्णिया, बख्यितारपुर तथा पण्डारक आदि जगहों में होता रहा। बिहार में डोमकच तथा सामाचकेवा, भिखारी ठाकुर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने ‘विदेसिया शैली के माध्यम से समाज की अनेक विषमताओं तथा पीड़ाओं को उजागर किया। निष्कर्षतः पटना बिहार की राजधानी ही नहीं, सांस्कृतिक राजधानी भी रहा है। यहाँ कालिदास रंगालय, भारतीय नृत्य कला मंदिर, रवीन्द्र भवन जैसे प्रेक्षागृहों के’ अलावा भारतीय नृत्य कला मंदिर के मुक्ताकाश मंच की बिहार के नाट्य विकास में प्रमुख सहभागिता रही है।

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हिन्‍दी वर्णिका कक्षा 9 मधुबनी चित्रकला | madhubani chitrakala class 9 hindi

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Bihar Board Class 9 Second Hindi Chapter 5 मधुबनी चित्रकला

पाठ का सारांश

बिहार की लोक चित्रकला की समृद्ध परंपरा में मिथिला की रंगीन चित्रकारी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली है। प्राचीन काल से चली आ रही इस परम्‍परा ने समय-समय पर प्रबुद्धजनों का ध्यान आकृष्ट किया है। उपेन्द्र महारथी ने मिथिला चित्रकारी से प्रसन्न होकर सम्पूर्ण बिहार की चित्रकारी पर शोध किया तथा मिथिला चित्रकारी की विशिष्टताओं को चित्रकला विशेषज्ञों के समक्ष उजागर किया। इस लोकसंस्कृति में जनसामान्य का महत्त्व अधिक हुआ करता है। मिथिला की चित्रकला में महिलावर्ग का ही प्रमुख योगदान रहा है, परन्तु शिक्षित एवं कला प्रेमियों के प्रभाव ने प्रसिद्धि देने के साथ ही इसमें अनेक परिष्कार भी किए है। फलतः जमीन, दीवाल तथा कपड़े तक सीमित इस चित्रकारी का अंकन कागज एवं कैनवास पर होने लगा। पहले इसमें स्वयं द्वारा निर्मित रंगों का उपयोग होता था, किंतु अब कृत्रिम रंगों का उपयोग हो रहा है। मिथिलांचल की इस लोकचित्रकला को मधुबनी पेंटिंग के नाम से प्रसिद्धि मिली है। इस चित्र के रंग, विषय, शैली तथा चित्रकार वर्ग में विविधता रही है। संभ्रांत समाज से अलग दलित परिवारों में इसके एक स्वतंत्र रूप का विकास हुआ है। मिथिला चित्रकला में तीन प्रमुख रूप दिखाई पड़ते हैं-1. भूमि आकल्पन, 2. भित्ति चित्रण तथा 3. पट चित्रण।

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भूमि आकल्पन-यह पंरपरा हर संस्कृति में प्रचलित रही है। जैसे-महाराष्ट्र की रंगोली, गुजरात की साँथिया, ब्रज क्षेत्र की साँझी, राजस्थान की माँडना, दक्षिणी प्रदेशी की ओनम तथा असम की अल्पन भूमि आकल्पन के ही विभिन्न रूप है। बिहार में इसे नौका कहा जाता है जो पूजा-पाठ के समय कलश स्थापन की जगह अनिवार्य होता है। मिथिला में इसे अरिपन या अहिपन कहा जाता है जो मांगलिक अवसर पर चित्र बनाया जाता है।

भित्ति चित्र – दीवाल पर बनाये जाने वाले चित्रों को भित्ति चित्र कहते हैं। आकल्पन की अपेक्षा इसमें कलात्मकता अधिक रहती है। मिथिलांचल के भित्ति चित्रों में सर्वाधिक कलात्मकता कोहबर-लेखन में दिखाई पड़ती है। मधुवनी चित्रकला में तीन भाग होते हैं—गोसाई घर (कुलदेवता का स्थान), कोहबर घर तथा कोहबर घर का कोनिया (कोहबर का बाहरी भाग)। इनतीनों जगहों पर चित्रांकन के रूप अलग-अलग होते हैं। कोहबर चित्रांकन नतुष्कोणीय (आयताकार) होता है तथा इसमें कमल का पत्ता, मछली, कछुआ, तोता, बाँस आदि के चित्र बनाए जाते हैं। मिथिला भित्तिचित्रों में राधाकृष्ण की रासलीला, राम-सीता विवाह आदि के चित्र भी बनाए जाते है।

पट-चित्रण – पट-चित्रण की परंपरा ने मिथिलांचल की रंगीन चित्रकला को प्रसिद्धि के शिखरों पर पहुँचाया है। ऐसी मान्यता है कि राजा शिवसिंह के समय पट-चित्रण का विशेष विकास हुआ। कपड़े पर अंकित विभिन्न प्रसंगों के दृश्य आज कागज या कैनवासों पर दिखाई पड़ता है। मिथिला चित्रकला में रंग एवं रेखा के सूक्ष्म प्रयोग देखे जाते है। चित्र का किनारों से घिरा होना आवश्यक होता है। किनारों के अंदर चित्रित दृश्य या प्रसंग रेखा तथा रंगों से भरा रहता है। चित्र कहीं भी खाली नहीं रहता है। अब तो मधुबनी पेंटिंग की चित्रकला मुद्रित रूप में भी मिलती है। madhubani chitrakala class 9 hindi

मधुबनी पेंटिंग का संबंध पूजा-पाठ, मांगलिक अवसरों से तो है ही उसका एक प्रमुख भाग तांत्रिक उद्देश्यों से भी जुड़ा है। वैसे चित्रों में महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली तथा चामुंडा के चित्रांकन मिलते हैं। इनके अतिरिक्त काली, कमला, तारा, छिन्नमस्तिका मातंगी, भैरवी, षोडशी, भुवनेश्वरी, धूमावती, बंगलामुखी आदि के चित्रांकन की भी परंपरा रही है। इस चित्रकला को सुरक्षित रखने तथा विकास देने वालों में ब्राह्मण तथा कायस्थ परिवारों का मुख्य योगदान रहा है। madhubani chitrakala class 9 hindi

इस चित्रकला में सीता देवी, जगदंबा देवी, उषा देवी, यमुना देवी, महासुन्दरी देवी आदि को विशेष प्रसिद्धि मिली है तथा इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। भारत सरकार ने जगदंबा देवी, सीतादेवी तथा गंगा देवी को पद्मश्री से अलंकृत किया है। इस प्रकार मधुबनी चित्रकला तथा इसके चित्रकार अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर बिहार का गौरव बढ़ाए हैं।

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bihar ki chitrakala class 9 hindi | बिहार की चित्रकला

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Bihar Board Class 9 Chapter 4 बिहार की चित्रकला

पाठ का सारांश bihar ki chitrakala class 9 hindi

चित्रकला के विकास में बिहार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। यहाँ पारिवारिक, सामाजिक तथा धार्मिक आचारों के प्रसंग में विभिन्न प्रकार की चित्रकारियाँ होती रही है। मधुबनी की विश्वप्रसिद्ध चित्रकारी अपने मूल रूप में एक लोकचित्रकारी ही है। भोजपुरी, मगही, अंगिका तथा बज्जिका क्षेत्रों में विभिन्न पर्वों एवं उत्सवों में चित्रकारी एवं मूर्तिनिर्माण की परंपरा आज भी विद्यमान है। स्त्रियाँ दीवारों पर पशु, पक्षी, वृक्ष आदि के चित्र अंकित कर देती है, इसे भित्ति चित्र कहते हैं। इसी प्रकार विवाहादि के अवसर पर चौरेठा (चावल का आटा) तथा सिन्दूर के घोल से विभिन्न प्रकार के मंगल सूचक चित्र बनाये जाते हैं। लोक चित्रकार में रंगों की गुणवत्ता एवं विविधता ने मिथिला चित्रकारी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई है। इन चित्रकारियों में नारी वर्ग का ही मुख्य योगदान रहा है। यहाँ रुमाल, तकिए के खोल, बिछावन की चादर आदि पर धागे से चित्र बनाने की परंपरा रही है।

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बिहार में चित्रकला का व्यापक विकास पटना शैली में हुआ है। इस शैली के अंतिम महत्त्वपूर्ण चित्रकार राधा मोहन प्रसाद का कहना है कि “बौद्ध धर्म के विकास के साथसाथ भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक नवीन तथा विकसित अध्याय का आरंभ होता है। इस युग में बिहार और उसकी राजधानी पाटलिपुत्र का स्थान सबसे अग्रगण्य हो उठता है। बिहार में मूर्तिकाला एवं चित्रकला का विकास मौर्यकाल तक हुआ। इस समय बुद्ध के उपदेश तथा उनकी जीवनी के विविध प्रसंगों को मंदिरों की भित्तियों तथा स्तूपों पर उकेरा जाता था। किन्तु बौद्ध धर्म के पतन के साथ-साथ चित्रकला का भी पतन होने लगा। औरंगजेब के शासनकाल में चित्रकार एवं मूर्तिकार अपनी जीविका के लिए देश के विभिन्न नगरों में चले गए। इन्होंने चित्रकारी नहीं छोड़ी। इनकी चित्रकारी में मूल दिल्ली वाली चित्रकारी की विशेषताएँ तथा स्थानीय प्रभाव से कुछ नवीन विशेषताएं भी उभरीं। इसी शैली को पटना शैली अथवा पटना कलम कहा गया। इस चित्र शैली का काल 1760 ई. से 1947 ई. तक माना जाता है। इस चित्रशैली के प्रमुख चित्रकार जयरामदास, शाक लाल, फकीरचंद लाल, पैशेजो, मिर्जा निसार मेंहदी, जयविन्द्र लाल, सोना कुमारी, महादेव लाल तथा ईश्वरी प्रसाद वर्मा आदि थे। महादेव लाल के शिष्य राधा मोहन तथा ईश्वरी प्रसाद के शिष्य दामोदर प्रसाद अम्बष्ठ ने गुरु परंपरा की इस शैली का निर्वाह किया। पटना कलम (शैली) के चित्रों में विषय के रूप में पशु पक्षी, प्राकृतिक दृश्य, किसान, लघु व्यवसायी, बढ़ई, लोहार, गरीब बाह्मण आदि के जीवन तथा कार्य हुआ करते थे। इन्हें स्थानीय जमीदारों का संरक्षण प्राप्त था। इनके चित्रों के मुख्य ग्राहक अंग्रेज व्यापारी एवं अधिकारी उनसे चित्र बनवाते थे। जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर ने ईश्वरी प्रसाद वर्मा के बनाए 300 चित्र खरीदे थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम मधुवनी चित्रकला से अन्तर्राष्ट्रीय जगत को परिचित कराया था। पटना शैली के चित्रों की मुख्य विशेषता यह थी कि इसमें बिहार के वर्ग विभाजित लोकजीवन का यथार्थ अंकन हुआ करती थी। ये चित्रकार अपने द्वारा निर्मित रंगों का उपयोग करते थे। इतना ही नहीं, ये पीले हाथ पेपर, जापानी कैंट पेपर अथवा स्वयं द्वारा निर्मित पेपर पर चित्र बनाने के साथ ही काँच, अभ्रक तथा हाथी दॉत पर भी चित्रकारी करते थे। बिहार परिवर्तनों का प्रदेश रहा है। यहाँ एक-से-एक महान चित्रकार होते रहे हैं। राधामोहन प्रसाद पटना चित्रशैली के ऐसे चित्रकार हुए, जिन्होंने भविष्य के कलात्मक विकास के लिए एक स्थायी और उर्वर भूमि तैयार कर दी। इन्होंने पटना में शिल्पकला महाविद्यालय की स्थापना कर पूरे राज्य में कलात्मक पुनर्जागरण की चेतना को व्यापक उभार प्रदान किया। उपेन्द्र महारथी जैसे महान कलाकार का पदार्पण हुआ। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय जगत में बिहार का नाम विभूसित किया तथा कला को विदेशी प्रभाव से मुक्त कर राष्ट्रीय चेतना, भारतीय धर्म, दर्शन तथा राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत चित्रकारी को प्रोत्साहित किया। दरभंगा निवास के दौरान ही मिथिला की चित्र-मूर्ति आदि लोक कलाओं के महत्त्व से लोगों को परिचित कराया।

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बिहार सरकार ने उपेन्द्र महारथी को उद्योग विभाग में डिजाइनर के पद पर नियुक्त किया। उनका डिजाइन किया हुआ राजगीर का शांति स्तूप उनकी राष्ट्रीयतामूलक कला-चेतना तथा कल्पनाशीलता का कालजयी प्रमाण है। इनकी कला-यात्रा में जापान की उस यात्रा का उल्लेखनीय महत्त्व माना जाता है जो उन्होंने वेणु शिल्प में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए की थी। चित्रकारी, शिल्पकर्म, अध्ययन एवं शोध इनके व्यक्तित्व की चार विशेषताएँ थी। इन्होंने वेणुशिल्प पर एक पुस्तक भी लिखी। चित्रकार श्याम शर्मा के अनुसार बिहार में कलाकर्म और शिल्पधर्म का उन्नयन महारथी जी ने ही किया। राधामोहन बाबू के साथ पटना कलम का अंत माना जाता है। इनके बाद बिहार में कलाकर्म और शिल्पधर्म को जिन लोगों ने आगे बढ़ाया, उनमें श्याम शर्मा प्रमुख हैं। इन्होंने शिल्प महाविद्यालय लखनऊ के प्राध्यापक जयकृष्ण अग्रवाल की देख-रेख में छापाकला में विशेषता प्राप्त कर पटना आए और शिल्प महाविद्यालय, पटना में छापाकला के विशेषज्ञ के रूप में अध्यापन करने लगे। उन्होंने अपनी छापा कला से देखकर कैलिफोर्निया के कला-विभाग के प्रोफेसर ने पूछा-“क्या आप अपनी पुरानी, आकृतियों का प्रयोग करके अपने अतीत की संस्कृति को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं ?” तो उन्होंने उत्तर दिया-यह मेरी परंपरागत आकृतियाँ चासनी में पकी हुई गोली के समान हैं जो दर्शकों को अपने अतीत के बारे में सोचने को बाध्य करती है, पुनर्स्थापित करने के लिए नहीं।”

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bihar ka nritya kala class 9 hindi | बिहार में नृत्यकला

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Bihar Board Class 9 Second Hindi Chapter 3 बिहार में नृत्यकला

पाठ का सारांश

बिहार में लोकनृत्य की सजीव परंपरा रही है। मिथिला एवं भोज में प्रचलित अनेक लोकनृत्य हमारी प्राचीन संस्कृति की कलात्मकता तथा उत्सवशीलता के प्रमाण है। इतना ही नहीं, शास्त्रीय नृत्य का विकास सैकड़ों वर्ष पूर्व यहाँ हो चुका था। मिथिला के संगीत शास्त्री ज्योतिरीश्वर ठाकुर तथा राजा शुभंकर ठाकुर के अनुसार बिहार में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी तक नृत्य संगीत पर अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके थे। जट-जटिन, झिझिया, करिया-झुमर, सामा-चकेवा, डोमकच (जलुआ), झिंझिरी, खेलड़‍िन, नेटुआ, गोड़ऊ, पँवरिया, लौंडा नाच आदि बिहार की लोक संस्कृति की देन हैं । ये प्रायः कथामुलक सामूहिक तथा नाटकीयता के साथ गायन और वादन से युक्त होते हैं।

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मिथिला के मुख्य लोकनृत्य जट-जटिन, झिझिया, करिया-झूमर, विदापत तथा सामाचकेवा हैं। जट-जटिन संवादमूलक नृत्य है। इस नृत्य की सारी भूमिकाएँ स्त्रियाँ ही निभाती हैं। इस नाटिका का मधुर गायन लोगों को तल्लीन कर देने वाली होती है। झिझिया नृत्य में एक औरत छेदवाला घड़ा अपने सिर पर रखकर गायन एवं नृत्य करती है। करिया-झूमर में एक लड़की दूसरी लड़की के हाथ-में-हाथ डालकर गोलाकार घूमती हुई नाचती है। विदापत नाच का प्रचलन विशेषकर दलितवर्ग में है। सामा-चकेवा में अभिनय और गायन के साथ बाँसुरी बजाते श्रीकृष्ण के चारों ओर सतभइया, चुगला, खिड़रिच, बनतीतर, कुत्ता, हाथी आदि की मूर्तियाँ रहती है। लड़कियाँ इन मूर्तियों के चारों ओर नाचती-गाती महारास रचाती हैं। मिथिला में कमलापूजा के समय पुजारी नाचने लगता है। झिंझिरी नृत्य का प्रचलन बाढ़ वाले क्षेत्र में है। बाढ़ के समय चाँदनी रात में स्त्री-पुरुष नाव पर नाच-गान करके आनंद लेते हैं। डोमकच नारी वर्ग का नृत्य है। इसका प्रचलन पूरे बिहार में है। इसमें नारियाँ कमर में ढोलक बाँधकर नाचती हैं। मगह क्षेत्र में नाचने-गाने वाली एक पेशेवर जाति थी, जो मांगलिक कार्यों में खेलड़‍िन का नाच प्रस्तुत करती थी। इस नृत्य का विकास नवादा के रजौली गाँव में हुआ था, किंतु यह नाच अब लुप्त हो गया है। bihar ka nritya kala class 9 hindi

The Pace For Living Chapter in Hindi

भोजपुर, भभुआ, रोहतास, बक्सर तथा छपरा जिले में नेटुआ, गोंडऊ, पँवरिया तथा लौंडा नाच का प्रचलन अनादि काल से है। नेटुआ एक घुमक्कड़ जाति है, जिसे नट कहा जाता है। इस जाति का नाच-गान से पारंपरिक संबंध रहा है। गोड़ऊ नाच अपनी अश्लीलता के बावजूद भोजपुरी संस्कृति में विशेष महत्त्व रखता है। लौंडा नाच में पुरुष ही स्त्री के वेष में नृत्य करते हैं, जिसे लौंडा नाच कहा जाता है। भिखारी ठाकुर ने इस नाच से अनेक नाटकों की शैलियाँ विकसित की। पँवरिया का नाच मल्लाहों का नाच हाता है। वे बाजा बजाते हुए गंगापूजन के लिए भिक्षाटन करते हैं। पुरुष प्रधान धोबिया नाच भोजपुर क्षेत्र में विशेष रूप से प्रचलित है जिसमें ढोलक के साथ हुरुका बजाया जाता है पटना सिटी के मोथा सिंह ने गुड़िया नृत्य का विकास किया था, जिसमें स्त्री-पुरुष मिलता नृत्य करते हैं। bihar ka nritya kala class 9 hindi

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शास्त्रीय नृत्य के भेदों तथा मुद्राओं का विवेचन बिहार में बारहवी-तेरहवीं शता से ही मिलने लगते हैं। परन्तु इनकी विशिष्ट पहचान बीसवीं शताब्दी में बनी, जब हरी उप्पल, नलिन गांगुली, नगेन्द्र मोहिनी, शिवजी मिश्र तथा मधुकर आनंद जैस नर्तकों ने कथक नाच में विशिष्टता हासिल की। हरि उपल ने शांतिनिकेतन से मणिपुरी तथा केरल कलामडल से कथकली की शिक्षा प्राप्त कर बिहार में शास्त्रीय नत्य की प्रथम ज्योति जगाई। भिक्षाटन करके भारतीय नृत्यकला मंदिर की स्थापना की, जो नृत्य प्रशिक्षण के लिए आज देश विख्यात संस्थान है। उप्पल जी की विशेषता थी कि वे कथकली की कोमलता तथा मणिपुरी के वीरभाव दोनों में अपूर्व दक्षता प्राप्त कर ली थी। उन्हीं के सद्प्रयास से नलिन गांगुली, नगेन्द्र मोहिनी एवं मधुकर आनंद जैसे श्रेष्ठ नर्तकों ने बिहार का नाम गौरवान्वित किया। नगेन्द्र मोहिनी कथक तथा भरतनाट्यम में बिहार की अनुपम उपलब्धि है। इन्होंने नृत्यशास्त्र पर अनेक पुस्तकें भी लिखी। इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का आचार्य माना जाता है। पटना के नृत्य गुरुओं में शिवजी मिश्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है । मिश्रजी भारतीय नृत्यकला मंदिर के सम्मानित आचार्य है। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मधुकर आनंद ने नगेन्द्र मोहिनी से कथक की विधिवत् शिक्षा पाई थी। इनकी प्रस्तुतियों से प्रसन्न होकर तत्कालीन अध्यक्ष डा. शिवनारायण सिंह ने इन्हें विश्वविख्यात नर्तक बिरजू महाराज के पास भेज दिया, जहाँ इन्होंने कठिन साधना करके अद्वितीय दक्षता हासिल की। इनकी मृत्यु इकतालीस वर्ष की उम्र में हो गई। इसी प्रकार बिरजू महाराज ने एक सरकारी पदाधिकारी शोभना जी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नृत्यांगना बनने में मदद की। बिहार की नृत्यांगनाओं में नीलम चौधरी, रमादास तथा पल्लवी विश्वास आदि प्रमुख हैं।

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हिंदी वर्णिका बिहार की संगीत-साधना | bihar ki sangeet sadhna class 9 hindi

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पाठ का सारांश

बिहार के लोक विभूतियों में सर्वश्रेष्ठ भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला था कि वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाय और इतना ढीला भी मत कर दो कि उससे संगीत ही न निकले। इससे स्पष्ट होता है कि बुद्ध के समय भी बिहार वीणा के मर्म से परिचित था। चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में गायन तथा नृत्य में प्रवीण गणिकाओं के संरक्षण विधान के संबंध में लिखा है। समुद्रगुप्त वीणा बजाने में इतने निपुण थे कि उन्हें ‘संगीत मार्तण्ड’ कहा जाता था । मिथिला के राजा हरि सिंह देव के दरबारी आचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने अपने ग्रंथ ‘वर्ण रत्नाकर’ में संगीत-शास्त्र का उल्लेख किया है। इसी प्रकार कवि वाणभट्ट ने लोकसंगीत गायन का वर्णन किया है। तात्पर्य कि प्राचीन बिहार में लोकसंगीत एवं शास्त्रीय संगीत का काफी सम्मान था। मुगल साम्राज्य के बिखरने के बाद तानसेन के अनेक शिष्यों को हथुआ, बेतिया, दरभंगा, डुमराँव, बनैली, टेकारी. गिद्धौर के राजदरबारों में सम्मानपूर्ण आश्रय मिला था। इन्होंने ही बिहार में अनेक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार पैदा किए। उस समय यहाँ ध्रुपद गायन की परंपरा थी। पं. शिवदयाल मिश्र जैसे ध्रुपद गायक नेपाल से आए थे। बिहार के प्रमुख शास्त्रीय गायन ध्रुपद, ख्याल तथा ठुमरी थे। ध्रुपद गायन के विकास में दरभंगा, बेतिया तथा डुमराँव घराने का महत्त्वपूर्ण योगदान था। बेतिया के राजा गज सिंह ने ध्रुपद गायक चमारी मलिक एवं कंगाली मलिक को कुरुक्षेत्र से लाकर ध्रुपद गायन आरंभ कराया। इस प्रकार कुंज बिहारी मिश्र, श्यामा मलिक, उमाचरण मलिक, गोरख मिश्र, बच्चा मलिक, शंकर लाल मिश्र तथा काले खाँ आदि ध्रुपद गायकों में प्रमुख थे। बेतिया के राजाओं का इस गायन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। दरभंगा घराने को तो ध्रुपद गायन में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति मिली।

Class 9 Second Hindi Chapter 2 बिहार की संगीत-साधना

दरभंगा घराने के रामचतुर मलिक ध्रुपद, ठुमरी तथा दादरा गायन के सर्वश्रेष्ठ गायक माने जाते हैं। इनका जन्म दरभंगा जिले के आमता गाँव में सन् 1805 में हुआ था। पं. सियाराम तिवारी दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय ध्रुपद गायक थे। इनके गायन का विकास विष्णु देव पाठक तथा लल्लन सिंह जैसे पखावजवादकों की देख-रेख में हुआ। दरभंगा घराने के ही पं. रघुवीर मलिक एवं पं. विदुर मलिक प्रसिद्ध ध्रुपद गायक है। bihar ki sangeet sadhna class 9 hindi

धनगाँई के ध्रुपद परिवारों का संबंध डुमराँव राजघराने से था, इसलिए इसे डुमराँव घराना के नाम से प्रसिद्धि मिली। इस राजदरबार के प्रमुख गायक पं. धनारंग दुबे, बच्‍चू दूबे, पं. सुदीन पाठक, रामप्रसाद पांडेय आदि थे। रामप्रसाद पाण्डेय के गायन की प्रशंसा रवीन्द्र ठाकुर ने भी की थी। शास्त्रीय गायन के ‘ख्याल’ में कुमार श्यामानन्द सिंह ने सर्वाधिक प्रसिद्धि पाई। वे संगीत प्रेमी के साथ-साथ विलियर्ड नामक खेल के चैम्पियन भी थे। बिहार के ख्याल गायकों में मुंगेर के पं. चन्द्रशेखर खाँ. जाकिर हुसैन, उस्‍ताद हुसैन भी प्रमुख थे। ठुमरी गायन में जगदीप मिश्र, गुल मोहम्मद खाँ, राम प्रसाद मिश्र तथा उनके पुत्र गोवर्धन मिश्र ने ठुमरी गायन को काफी प्रसिद्धि दिलाई। अठारह उन्नीसवीं शताब्दी में पटना सिटी में पेशेवर नर्तकी जोहरा तथा कुछ अन्य गतका ठुमरी गायन में उत्कर्ष पर थी। मुजफ्फरपर की पन्नाबाई ठुमरी एवं दादरा गाना काफी प्रसिद्ध थीं। पूर्वी क्षेत्र के ठुमरी गायकों में प्राण फुकने वाले रामप्रसाद था। अतिरिक्त बिन्दा प्रसाद गौड़, विदुर मलिक, रघु झा के नाम भी उल्लेखनीय है।

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बिहार की धरती ने गायन के साथ ही वाद्ययंत्रों को भी अपनी साधना तथा मौलिक प्रतिभा से सजाया है। पखावज, सारंगी, इसराज, सितार, सरोद, शहनाई. तबला. बाँसुरी आदि के एक से बढ़कर एक कलाकार यहाँ पैदा हुए है। यथा-पखावज वादन में विष्णुदेव पाठक तथा शत्रुंजय प्र. को महारत हासिल थी तो सारंगी में मियाँ बहादर खाँ. किशोरी प्रसाद मिश्र, शिवदास मिश्र, हाकिम मिश्र आदि प्रसिद्ध हैं तो इसराज तंतुवाद्य के पंडित चंद्रिका दुबे राष्ट्रीय ख्याति के वादक हो चुके हैं। इसी प्रकार सितारवादन में सुदीन पाठक, पं. रामेश्वर पाठक आदि थे। तबला वादन में पटना के अजय ठाकुर सिद्धहस्त वादक थे तो शहनाई में बिस्मिल्ला खाँ का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। मुज्तबा हुसैन शहनाई तथा बाँसुरी के प्रसिद्ध उस्ताद थे। उन्होंने 1990 ई. में ऑल इण्डिया इंटर कॉलेजिएट सांस्कृतिक समारोह में स्वर्णपदक पाया था। bihar ki sangeet sadhna class 9 hindi

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आज संगीत में पं. गोवर्धन मिश्र, अभय नारायण मलिक, संगीत कुमार नाहर, रामजी मिश्र एवं प्रेम कुमार मलिक ने देश-विदेश में बिहार का गौरव बढ़ाया है तो राजकुमार नाहर, सुधीर पाण्डेय, योगेन्द्र यादव तथा विनोद पाठक ने तबला वादन में नई पीढ़ी को गौरवान्वित किया है।

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