Bihar Board Class 10th Book Notes and Solutions

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Class 10th Book Solutions and Notes

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Class 10th Book Solutions and Notes

मुझे आशा है कि आप को कक्षा 10 के सभी विषय के व्‍याख्‍या को पढ़कर अच्‍छा लगा होगा। इसको पढ़ने के पश्‍चात् आप निश्चित ही अच्‍छा स्‍कोर करेंगें।  इन सभी पाठ को बहुत ही अच्‍छा तरीका से आसान भाषा में तैयार किया गया है ताकि आप सभी को आसानी से समझ में आए। इसमें कक्षा 10 के प्रत्‍येक विषय के सभी चैप्‍टर के प्रत्‍येक पंक्ति का व्‍याख्‍या को सरल भाषा में लिखा गया है। यदि आप बिहार बोर्ड कक्षा 10 से संबंधित किसी भी पाठ के बारे में जानना चाहते हैं, तो नीचे कमेन्‍ट बॉक्‍स में क्लिक कर पूछ सकते हैं। यदि आप और विषय के बारे में पढ़ना चाहते हैं तो भी हमें कमेंट बॉक्‍स में बता सकते हैं। अगर आपका कोई सुझाव हो, तो मैं आपके सुझाव का सम्‍मान करेंगे। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद.

3.Pushp Ki Abhilasha poem in Hindi | कक्षा 7 पुष्प की अभिलाषा

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 7 हिन्‍दी के कविता पाठ तीन ‘ Pushp Ki Abhilasha (पुष्प की अभिलाषा)’ के हर पं‍क्ति के अर्थ को पढ़ेंगे।

Pushp Ki Abhilasha poem in Hindi

3 पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ ।
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ ।।

अर्थ—पुष्प अपनी अभिलाषा प्रकट करते हुए कहता है कि वह न तो देवकन्या के गहनों में गूंथा जाना चाहता है और न ही प्रेमी द्वारा बनाई (लाई) गई माला में बिंधकर प्रियतम को ललचाना चाहता है। Pushp Ki Abhilasha poem in Hindi

चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि, डाला जाऊँ ।
चाह नहीं देवों के सिर पर
चहूँ, भाग्य पर इठलाऊँ ।।

अर्थ–पुण्ण अपनी अभिलाषा प्रकट करते हुए कहता है कि वह न तो सम्राटों के शव पर चढ़ाए जाने का इच्छुक है और न ही देवताओं के ऊपर चढ़ाए जाने का आग्रही है। तात्पर्य यह कि पुण्य किसी भी प्रकार का सम्मान पाना नहीं चाहता है।

मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक ।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक ।।

अर्थ-पुष्प माली से अपनी उत्कट कामना प्रकट करते हुए कहता है कि ओ माली! ___मुझे तोड़कर उस मार्ग पर फेंक देना, जिस मार्ग से देश के सच्चे सपूत अपनी मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने जाते हो। Pushp Ki Abhilasha poem in Hindi

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Dani Per class 7th Hindi

Nachiket story saransh in hindi class 7

2. Nachiketa Story Saransh in Hindi | कक्षा 7 नचिकेता

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 7 हिन्‍दी के कहानी पाठ दो ‘ Nachiketa (नचिकेता)’ कहानी के  सारांश को पढ़ेंगे।

Nachiketa Story Saransh in Hindi

2 नचिकेता

पाठ का सारांश-‘कठोपनिषद्’ से संकलित ‘नचिकेता’ शीर्षक पाठ में महर्षि बाजश्रवा के पुत्र नचिकेता के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डाला गया है। वाजश्रवा ऋषि ने एक यज्ञ किया। उस यज्ञ की पूर्णाहुति हो रही थी। ब्राह्मणों को दक्षिणा में उन्होंने अपनी सारी संपत्ति देने की घोषणा की थी। पर वे बूढ़ी और दुर्बल गाएँ दान कर रहे थे। उनके पुत्र नचिकेता को यह देखा नहीं गया और उसने पिता को टोक दिया । जब पिता ने ध्यान नहीं दिया तब नचिकेता ने कहा कि आपका सबसे प्रिय .. मैं हूँ, मुझे ही दान कर दें। पिता ने क्रोध में कहा कि जाओ, मैंने तुम्हें मृत्यु को दे दिया।
अब नचिकेता अड़ गया और बात लौटाई नहीं जा सकती थी । अत: नचिकेता मृत्यु के देवता यमराज के पास चल पड़ा । तीन दिनों तक भूखे-प्यासे ऋषि-कुमार की प्रतीक्षा करते देख यमराज ने प्रायश्चित स्वरूप नचिकेता से तीन वर माँगने को कहा। – पहले वर में नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता का क्रोध शांत हो जाय। दूसरे वर में उसने यह जानना चाह कि स्वर्ग की प्राप्ति कैसे होती है ? तीसरे वर में उसने आत्मा का रहस्य जानना चाहा । अब यमराज इस अद्भुत बालक पर चौके, जिसे किसी सांसारिक सुख-वैभव की इच्छा नहीं थी। उन्होंने इस कम उम्र के बालक को समझाया कि आत्मा का ज्ञान बड़ा दुर्लभ है। वह कोई और वर माँग ले । उन्होंने नचिकेता को कई प्रलोभन दिए । पर वह तो सिर्फ आत्मा के रहस्य जानना चाहत था । अंत में यमराज ने नचिकेता को आत्मा के संबंध में सारी गूढ़ बातें बताईं। नचिकेता पिता के पास लौटा । वह बड़ा होकर बहुत बड़ा विद्वान और धर्मात्मा ऋषि बना।

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Manav Bano class 7th Hindi

The mountain and the squirrel class 8th English

1. Manav Bano class 7 Hindi | कक्षा 7 मानव बनों

इस पोस्‍ट में हमलोग बिहार बोर्ड कक्षा 7 हिन्‍दी के कविता पाठ ए‍क ‘ Manav Bano (मानव बनों)’ के प्रत्‍येक पंक्ति के अर्थ को पढ़ेंगे।

Manav Bano class 7 Hindi

1.मानव बनो
है भूल करना प्यार भी,
है भूल यह मनुहार भी,
पर भूल है सबसे बड़ी,
करना किसी का आसरा,
मानव बनो, मानव जरा।

अर्थ-कवि लोगों को संदेश देता है कि मानव बनने के लिए किसी से प्रेम करना तथा खुशामद या विनती करना भूल है। इससे भी मानव की सबसे बड़ी भूल उस पर भरोसा करना है, क्योंकि सामान्य मानव बनने के लिए स्वाभिमानी तथा आत्मनिर्भर होना आवश्यक होता है। इसलिए कवि लोगों को सलाह देते हुए कहता है कि मानवं (स्वाभिमानी) बनो, परमुखापेक्षी नहीं।
अब अश्रु दिखलाओ नहीं,

अब हाथ फैलाओ नहीं
हुंकार कर दो एक जिससे,
थरथरा जाए धरा,
मानव बनो, मानव जरा।

अर्थ-कवि किसी को न तो अपना दुःख, पीड़ा, कष्ट या मजबूरी प्रकट करने की सलाह देता है और न ही किसी के समक्ष गिड़गिड़ाने अथवा हाथ फैलाने की इजाजत देता है। कवि मानव को हर स्थिति में स्वाभिमानी की भाँति सारी मजबूरियों को सहते – हुए शेर की भाँति दहाड़ते रहने अर्थात् स्वाभिमानपूर्ण वचनों से संसार को चकित करने का संदेश देता है । कवि के अनुसार ऐसा काम बही कर सकता है, जिसमें स्वाभिमान होता है अथवा मानवता के भाव से ओत-प्रोत होता है। इसीलिए कवि हमें मानव बनने के लिए प्रेरित करता है।  Manav Bano class 7 Hindi 

उफ, हाय कर देना कहीं,
शोभा तुम्हें देता नहीं,
इन आँसुओं से सींचकर कर दो,
विश्व का कण-कण हरा,
मानव बनो, मानव जरा।

अर्थ-कवि कहता है कि कर्मवीर मानव को किसी बात पर दु:खी होना या दःख ‘ प्रकट करना शोभा नहीं देता। कवि अपनी पीड़ारूपी आँसू से सींचकर विश्व के कणकण को हरा-भरा कर देने की सलाह देता है। कवि की अभिलाषा है कि मानव अपनी अन्तर्व्यथा किसी के समक्ष प्रकट किए बिना अपने पौरुष से संसार के हर प्राणी में नवजीवन – का संचार कर दे। इसलिए सामान्य मानव बनना आवश्यक है।

अब हाथ मत अपने मलो,
जलना, अगर ऐसे जलो,
अपने हृदय की भस्म से,
कर दो धरा को उर्वरा,
मानव बनो, मानव जरा।”

अर्थ-कवि कहता है कि समय बीत जाने पर अथवा अवसर खो देने पर पश्चात्ताप करना या दु:ख प्रकट करना व्यर्थ है। समय रहते अपने अधिकार के प्रति सजग होना लाभदायक होता है । जो व्यक्ति समयानुकूल आचरण करता है अथवा अपने दायित्व का निर्वाह सही ढंग से करता है तो उससे समाज को एक नई शक्ति मिलती है। इसीलिए कवि लोगों से आग्रह करता है कि तुम अपने कर्म या आचरण से लोगों के मन की गाँठ खोल दो, ताकि वह भी सामान्य मानव बन सके । Manav Bano class 7 Hindi 

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Varsha Bahar Class 7  Poem in Hindi

Sona class 7 Saransh in Hindi

कुछ सवाल कवि पाब्‍लो नेरूदा | Kuchh sawal class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ बारह ‘कुछ सवाल (Kuchh sawal class 9th Hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में कवि पाब्‍लो नेरूदा ने प्राकृतिक नियमों के साथ-साथ मानव की जिजीविषापर प्रकाश डाला है।

Kuchh sawal class 9th Hindi

कुछ सवाल कवि पाब्‍लो नेरूदा
यदि सारी नदियाँ मीठी हैं
तो समुद्र अपना नमक कहाँ से पाता है ?
ऋतुओं को कैसे मालूम पड़ता है
कि अब पोलके बदलने का वक्त आ गया ?

अर्थकवि प्रश्नात्मक शैली में यह जानना चाहता है कि यदि सारी नदियां का जल मीठा है तो समुद्र का जल कैसे खारा हो गया। ऋतु किस प्रकार अपने नियत समय पर आकर प्रकृति में परिवर्तन ला देती है ? कवि के कहने का तात्पर्य है कि ध्वंस एवं निर्माण प्रकृति के शाश्वत. नियम हैं। दोनों साथ-साथ चलते रहते हैं।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि पाब्लो नेरुदा द्वारा लिखित कविता ‘कुछ सवाल’ – शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने प्राकृतिक नियमों के साथ-साथ मानव की जिजीविषापर प्रकाश डाला है।

कवि का कहना है कि ध्वंस तथा निर्माण सदा से होता रहा है। मनुष्य अपनी जिजीविषा के सहारे सृजन करता रहता है। जैसे नदी का मीठा जल निर्माण का प्रतीक है क्योंकि इस जल को पीकर मनुष्य जीवन धारण करता है तथा नव सृजन के लिए तत्परहोता है। समुद्र का जल खारा होता है। यह विनाश या ध्वंस का प्रतीक है। मनुष्य यह जल पीकर जीवन धारण नहीं कर सकता। समय आने पर ऋतु स्वयं आ जाती है। अर्थात् ऋतु अपने नियम के अनुसार परिवर्तन लाती रहती है और प्रकृति में नव जीवन का संचार कर देती है। तात्पर्य कि जिजीविषा के कारण ही यह सृष्टि गतिमान है।

जाड़े इतने सुस्तरफ्तार क्यों होते हैं
और दूसरी कटाई की घास इतनी चंचल उड्डीयमान ?
कैसे जानती हैं जड़ें
कि उन्हें उजाले की ओर चढ़ना ही है ?

अर्थकवि प्रकृति में होनेवाली दो असमान घटनाओं के बारे में जानना चाहता है कि जाड़ का ऋतु मंद-गति से गुजरती है। तात्पर्य यह है कि जाड़े में अर्थात् इच्छाशक्ति मद होने पर विकास कम होता है जबकि जिजीविषा के फलस्वरूप मानव विकास की सीढ़ी पर तेजी से आगे बढ़ता है। जैसे कटी घास हवा का संयोग पाकर उड़ती हुई प्रतीत होती है । किस प्रकार जड़ें धरती से रस प्राप्त कर पेड़-पौधों में जीवन प्रदान करती हैं। तात्पर्य कि मानव जिजीविषा के भाव के कारण नव-निर्माण के लिए प्रेरित होता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ पाब्लो नेरुदा द्वारा विरचित कविता ‘कुछ सवाल’ शीर्षक से ली गई हैं। इसमें कवि ने मानव की जिजीविषा की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है।

कवि का विश्वास है कि मनुष्य जिजीविषा के बल पर सृष्टि का निर्माण करता रहा है। उत्थान-पतन, ध्वंस-निर्माण प्रकृति का नियम है। दोनों अपने-अपने नियम के अनुसार चलते रहते हैं। ध्वंस के बाद मनुष्य अपनी सुख-सविधा के लिए नए निर्माण में जुट जाता है। कवि अपना विश्वास प्रकट करते हुए कहता है कि जिजीविषा मानव जीवन की ऊर्जा है। जैसे जडें धरती से इसी कामना से रस ग्रहण करती हैं कि एक दिन उसे उजाले की ओर चढ़ना है अर्थात् उससे शाखाओं को विकास पाना है। तात्पर्य कि जो मनुष्य दढता के साथ कर्मपथ पर आरूढ़ हो जाता है, उसका जीवन निश्चय ही सुखमय हो जाता है।

और फिर बयार का स्वागत
ऐसे रंगों और फूलों से करना ?
क्या हमेशा वही वसंत होता है,
वही किरदार फिर दुहराता हुआ ?

अर्थकवि जानना चाहता है कि निर्माण के बाद सारा वातावरण वैसा ही हो जाता है जैसा ध्वंस के पहले था। कवि अपना विश्वास प्रकट करते हुए कहता है कि हर ध्वसके बाद मानव अपनी जिजीविषा के सहारे पहले जैसा ही निर्माण कर लेता है। जिस प्रकार वसंत के आने पर प्रकृति अपने सारे सौन्दर्य के साथ प्रस्तुत हो जाती है और यह परिवर्तन हर वसंत में होता है, उसी प्रकार ध्वंस तथा निर्माण कार्य चलते रहते हैं। अतएव अनुकूलवातावरण का निर्माण होते ही मनुष्य की आशा बलवती हो जाती है और वैसे वातावरणको सभी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ पाब्लो नेरूदा द्वारा लिखित ‘कुछ सवाल’ शीर्षक कविता – से ली गई हैं। इनमें कवि ने वातावरण के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

कवि का मानना है कि वातावरण किसी भी नए सृजन का आधार है। अनुकूल । वातावरण में ही व्यक्ति विकास करता है अथवा एक नया संसार बसाता है । अतएव व्यक्तिअनुकूल वातावरण का हृदय से स्वागत करते हैं क्योंकि व्यक्ति अनुकूल वातावरण में ही जीवन के मर्म को समझता है अथवा महान पद पर आसीन होने में सफल होता है। इसलिए कोई भी व्यक्ति, समाज अथवा देश उपयुक्त वातावरण पाकर ही पूज्य बनता है।

जैसे—बसंत के आने पर बयार का स्वागत अनेक रंगों तथा फूलों से इसलिए किया जाता है, क्योंकि बयार वातावरण को मधुमय बना देते हैं, वैसे ही मनुष्य की अदम्य जिजीविषामें वातावरण ऐसा बन जाता है कि सभी हृदय से उसका स्वागत करते हैं। वसंत की भूमिका – सदा एक-सी रहती है । बयार अर्थात् वातावरण ही स्वागत योग्य बना देते हैं।

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समुद्र कवि सीताकांत महापात्र | Samudra class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ ग्‍यारह ‘समुद्र (Samudra class 9th Hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में सीताकांत महापात्र ने समुद्र के चरित्र तथा मानव की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

Samudra class 9th Hindi

समुद्र कवि सीताकांत महापात्र
समुद्र का कुछ भी नहीं होता ।
मानो अपनी अबूझ भाषा में
कहता रहता है
जो भी ले जाना हो ले जाओ
जितना चाहो ले जाओ
फिर भी रहेगी बची देने की अभिलाषा ।
क्या चाहते हो ले जाना, घोंघे ?
क्या बनाओगे ले जाकर ?
कमीज के बटन ?
नाड़ा काटने के औजार ?
टेबुल पर यादगार ?
किंतु मेरी रेत पर जिस तरह दिखते हैं
उस तरह कभी नहीं दिखेंगे ।

अर्थकवि समुद्र के चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि मनुष्य समुद्र से कितना भी लेता है, उसमें कोई कमी नहीं आती क्योंकि वह अक्षय है। वह मनुष्य की असीम आकांक्षा की ओर इंगित करते हुए कहता है कि मेरे द्वारा सबकुछ देने के बावजूद तुम्हें तृप्ति नहीं मिलेगी। कवि यहाँ मनुष्य की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति को उजागर करता हुआ कहता है कि मनुष्य अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सारे प्राकृतिक सौंदर्य को विद्रूप बना देता है । इसीलिए समुद्र मनुष्य को कहता है कि तुम अपने यादगार के लिए अथवा निजी उपयोग के लिए जिन वस्तुओं का उपयोग करते हो, उनका वास्तविक सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ कवि सीताकांत महापात्र द्वारा लिखित कविता “समुद्र’ शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने समुद्र के चरित्र तथा मानव की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

कवि का कहना है कि समुद्र अक्षय है। वह मनुष्य को सब कुछ देना चाहता है,ताकि मनुष्य संतुष्ट हो जाए । परन्तु मनुष्य अपनी उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के कारण संतुष्ट नहीं हो पाता। वह इसी प्रवृत्ति के कारण प्राकृतिक सौंदर्य का विनाश करने पर तुला हुआ है। समुद्र खेद प्रकट करते हुए कहता है कि चाहे मनुष्य किसी वस्तु का निर्माण क्यों न कर ले,परन्तु समुद्र की रेत पर अर्थात् समाज के बीच मनुष्य जितना सौन्दर्य बिखेरता है अथवा सम्मान पाता है, उतना किसी निर्मित वस्तु के रूप में अथवा व्यक्तिगत संपन्नता में नहीं । तात्पर्य कि समाजरूपी समुद्र के बीच ही मनुष्य के चरित्र का विकास होता है, जैसे समुद्र की रेत पर घोंघे जिस तरह दिखते हैं, वैसे टेबुल पर यादगार के रूप में नहीं।

या खेलकूद में मस्त केंकड़े ?
यदि धर भी लिया उन्हें
तो उनकी आवश्यकतानुसार
नन्हेनन्हे सहस्र गड्ढों के लिए
भला इतनी पृथ्वी पाओगे कहाँ ?
या चाहते हो फोटो ?
वह तो चाहे जितना खींच लो
तुम्हारे टीवी के बगल में
सोता रहूँगा छोटेसे फ्रेम में बँधा
गर्जनतर्जन, मेरा नाच गीत, उद्वेलन
कुछ भी नहीं होगा ।

अर्थकवि मनुष्य को संबोधित करते हुए कहता है कि खेलकूद में मस्त केंकड़ों को यदि पकड़ लेता है तो उनकी आवश्यकतानुसार नन्हे-नन्हें हजारों गड्ढे बनाने के लिए समुद्र के किनारे के अतिरिक्त इतना विस्तृत क्षेत्र कहाँ उपलब्ध हो सकता है। तात्पर्य कि आनन्द प्राप्ति के लिए समाज से बढ़कर कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है। समुद्र मनुष्य की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर खेद प्रकट करते हुए कहता है कि वास्तविक सौन्दर्य का अनुभव प्रकृति के मूल रूप में ही निहित होता है, फोटो या तस्वीर में नहीं। क्योंकि इसमें समुद्र में उठती लहरें तथा गर्जन-तर्जन दृश्य देखने को नहीं मिलते।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि सीताकांत महापात्र द्वारा विरचित कविता ‘समुद्र’ शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति की तीखी आलोचना की है।

कवि का कहना है कि आज मनुष्य अपनी उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के कारण जीवन की सच्चाई से दूर होता जा रहा है। मनुष्य प्रकृति-प्रेम की उपेक्षा कर कृत्रिमता की ओर उन्मुख होता आ रहा है। कवि का कहना है कि जीवन का असली रस प्रकृति से मिलता है। उसमें वास्तविकता होती है। प्रकृति मनुष्य में भाव का संचार करती है, जिससे मनुष्य के अन्दर अनेक प्रकार की कल्पनाएँ स्फुरित होती और उपयुक्त वातावरण पाकर एक ऐसा रूप धारण कर लेती हैं कि मनुष्य को अक्षय बना देती हैं। परन्तु उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के कारण समाज का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। फलतः कवि ने इस प्रवृत्ति का कटु आलोचना की है।

जो ले जाना हो ले जाओ, जी भर
कुछ भी खत्म नहीं होगा मेरा
चिरतृषित सूर्य लगातार
पीते जा रहे हैं मेरी ही छाती से
फिर भी तो मैं नहीं सूखा ।
और जो दे जाओगे, दे जाओ खुशीखुशी
पर दोगे भी क्या
सिवा अस्थिर पदचिह्नों के
एकदो दिनों की रिहायश के बाद
सिवा आतुर वापसी के ?

अर्थसमुद्र मनुष्य से कहता है कि तुम जितना चाहो, जी भर के ले जाओ क्योंकि वह अक्षय है। सूर्य की प्रचंड किरणें भी उसके जल को सूखा नहीं पातीं। वह खेद भरे शब्दों में कहता है कि मनुष्य अपने अस्थिर पदचिह्नों के सिवा दे भी क्या सकता है, क्योंकि मनुष्य को प्रकृति के प्रति कोई खास लगाव नहीं होता। वह तो अपने स्वार्थ कीभूति हात ही वापस लौटने के लिए व्यग्र हो उठता है। अतः कवि के कहने का भाव यह है कि समाज समुद्र के समान अक्षय होता है। समाज उसे हर कुछ देने को व्यग्र रहता है किन्तु स्वार्थी मानव अपनी अभिलाषा की पूर्ति होते ही समाज से अलग हो जाता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ सीताकांत महापात्र द्वारा लिखित कविता ‘समुद्र’ से ली _ गई हैं। इनमें कवि ने मनुष्य की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

कवि समुद्र के माध्यम से सामाजिक चरित्र का उद्घाटन किया है। कवि का कहना है कि समाज समुद्र के समान महान् एवं अक्षय होता है। वह इतना उदार होता है कि व्यक्ति उससे लाभ लेते-लेते थक जाता है, फिर भी वह अक्षय ही रहता है। लेकिन मनुष्य अपनी स्वार्थी-प्रवृत्ति के कारण अपने अस्थिर पदचिह्नों के सिवा कुछ भी नहीं दे पाता। तात्पर्य कि वह अपनी अभिलाषा की पूर्ति होते ही सामाजिक मान्यताओं से अलग ऐसे वातावरण के निर्माण में लग जाता है जिसका समाज में कोई मूल्य नहीं होता। अर्थात् जिससे समाज का कोई कल्याण नहीं होता। अतः कवि के कहने का भाव है कि उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त होती जा रही है और मनुष्य स्वार्थ के कारण अमानवीय होता जा रहा हैं।

उन पदचिह्नों को
लीपपोंछकर मिटाना ही तो है काम मेरा तुम्हारी
आतुर वापसी को
अपने स्वभाव सुलभ
अस्थिर आलोड़न में
मिला लेना ही तो है काम मेरा ।

अर्थकवि उन उपभोक्तावादी लोगों को संदेश देता है कि कवि का काम तो सामाजिक बुराई को उजागर कर उसे दूर करना होता है । कवि की प्रबल इच्छा रहती है कि भटके हुए लोग सहजतापूर्वक स्वस्थ सामाजिक परंपरा से जुड़ जाएँ और कवि का काम भी तो टूटे हुए समाज को संगठित करना होता है, ताकि आदर्श समाज कायम रह सके।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ मानवतावादी कवि सीताकांत महापात्र द्वारा विरचित कविता ‘समुद्र’ शीर्षक कविता से ली गई हैं। इनमें कवि ने उपभोक्तावादी मानव कीतीखी आलोचना करते हुए कहा है कि कवि का कर्म स्वस्थ समाज का निर्माण करना होता है ताकि भटके हुए मानव उस समाज या संस्कृति से जुड़े रहे।

कवि अपना आंतरिक अभिलाषा प्रकट करते हुए कहता है कि वह उन भटके हुए मानवों को समाज से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील रहता है। कवि किसी वर्ग या समुदाय विशेष के लिए नहीं होता, वह समग्र समाज को आदर्श पथ पर अग्रसर होते देखना चाहता है, ताकि स्वस्थ परंपरा कायम रह सके। अतः कवि सामाजिक बगदयों को करने तथा मानवता की स्थापना के लिए होता है।

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10. निम्‍मो की मौत कक्षा 9 हिंदी | Nimmo ki maut class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ दस ‘निम्‍मो की मौत (Nimmo ki maut class 9th Hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में विजय कुमार ने महानगर में काम करने वाली घरेलू नौकरानी की दीन-दशा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।

Nimmo ki maut class 9th Hindi

10. निम्‍मो की मौत कवि विजय कुमार
वह भीगी हुई चिड़िया की तरह
फुरफुराती थी
हम जानते थे
अँधेरे कोने में दुबक
एक सूखी रोटी
और तीन दिन पुराना साग
वह चोरों की तरह खाती रही कई बरस
सालों साल उसने
चिट्ठी नहीं लिखी अम्मा को
टेलीफोन के पास
उसका फटकना निषिद्ध था

अर्थकवि उस घरेलू नौकरानी निम्मों की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए कहता कि वह भागी चिड़िया की तरह घर के अंधेरे कोने में दुबके पंख फड़फड़ाती सखी रोटा चालान दिना का वासी साग खाती हुई जीवन बिताती रही। अशिक्षा के कारण उसनें वर्षों से अपनी माँ को चिट्ठी नहीं लिखी। साथ ही, अभावग्रस्त एवं महानगरीय समाज द्वारा उपेक्षित अथवा तिरस्कृत होने के कारण टेलीफोन के निकट जाने की उसे मनाही थी। कवि के कहने का उद्देश्य यह है कि महानगरों में घरेलू नौकरानी उपेक्षा का पात्र मानी जाती है।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि विजय कुमार द्वारा लिखित कविता निम्मो की मौत पर’ शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने महानगर में काम करने वाली घरेलू नौकरानी की दीन-दशा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।

कवि का कहना है कि निम्मो जैसी घरेलू नौकरानी महानगरों में किस प्रकार नारकीय एवं तिरस्कृत जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर रहती है। उन्हें महानगरीय समाज द्वारा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है, जिस कारण उन्हें किसी अंधेरी कोठरी में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। साथ ही कई दिनों की सूखी रोटी तथा बासी साग खाकर जीवन व्यतीत करना पड़ता है। इस विवशता के कारण उसने अपनी माँ को चिट्ठी नहीं लिख पाई। सामाजिक क्रूरता के कारण किसी टेलीफोन के पास जाने पर भी रोक थी।

घरेलू नौकरानी के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहा है कि महानगरों में नौकरों का घोर शोषण होता है। उन्हें न तो उचित मजदूरी मिलती है और न ही उचिंत सम्मान ही। महानगरीय समाज असंवेदनशील तथा अमानवीय प्रवृत्ति के होते हैं।

Nimmo ki maut class 9th Hindi

हमें मालूम था
लानतों, गाली, लात, घूसों के बाद
लेटी हुई ठंढे फर्श पर
गए रात जब ।
उसकी आँखें मूंदती थीं
एक कंपन
पूरी धरती पर
पसर जाता था
उसकी थमी हुई हिचकियाँ
उसके पीहर तक
चली आती थीं
हर रोज
एक अनुपस्थित घाव
उसके शरीर के भीतर
कहीं रहा होगा
और शायद कुछ अनकही प्रार्थनाएँ नींद में

अर्थ-कवि महानगरों में काम करने वाली घरेलू नौकरानी की दारूण दशा का वर्णन करते हुए कहता है कि उन्हें गृहस्वामी की डाँट, गाली सुनने के साथ ही लात तथा घूसों को भी सहन करना पड़ता है। वह रात में जब सोती थी तो उसका हृदय विदीर्ण हो जाता था। फलतः वह अपनी विवशता पर कराह उठती थी और मन की व्यथा उसे झकझोर डालती थी। यही व्यथा उसकी आह बन उसके मायके तक चली जाती थी। कवि कहता . है कि हर दिन के इस अमानवीय व्यवहार ने उसे अपने-आपसे घृणा उत्पन्न कर दियाऔर सुप्तावस्था में जीवन-मुक्ति के लिए प्रेरित करने लगा।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ मानवीय संवेदना से लबालब कवि विजय कुमार द्वारा लिखित कविता निम्मो की मौत पर’ शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने निम्मो नाम की घरेलू नौकरानी की कारूणिक दशा का मार्मिक वर्णन किया है।

कवि का कहना है कि महानगरीय लोग निर्मम, निष्ठुर तथा अमानवीय होते हैं। वे घरेलू नौकरों के साथ निर्ममतापूर्ण व्यवहार करते हैं। कवि निम्मो की दारूण-दशा का वर्णन करते हुए कहता है कि गृहस्वामी उसके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे। उसे नित्य डॉट एवं गाली देने के साथ ही लात तथा घूसों से प्रहार भी करते थे। लाचार एवं विवश निम्मो जब विकल हो उठती थी। उसकी इस विकलता से धरती काँप उठती थी। वह अपने भाग्य पर रोने लगती थी। यह रूदन उसके मायके तक चली जाती थी। अर्थात् अपने मायके की निर्धनता पर तरस आ जाती थी कि निर्धनता के कारण ही उसे इस नारकीय एवं त्रासदीपूर्ण जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ा।

यह शरीर जो तीस बरस से
इस दुनिया में था
और तीस बरस
उसे रहना था यहाँ
पर एक दिन रेत की दीवार की तरह गिरी वह सहसा
उसके चले जाने में
कोई रहस्य नहीं था।

अर्थकवि कहता है कि यह शरीर अर्थात् निम्मो तीस वर्षों तक इसलिए जीवितरहीं, क्योंकि उसे इतने दिनों तक जीवित रहना था। यानी उसकी आयु तीस वर्ष की हीथी। लेकिन एक दिन जब वह बालू की भीत के समान एकाएक ढह गई, अर्थात् उसकी मृत्यु अचानक हो गई तो उसकी मृत्यु के कारण के बारे में कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई ! तात्पर्य कि महानगरीय समाज में गरीबों की अचानक मृत्यु पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं होता।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ महान् मानवतावादी कवि विजय कुमार द्वारा लिखित कविता ‘निम्मो की मौत, पर’ शीर्षक से ली गई हैं। इनमें कवि ने निम्मो की मृत्यु का बड़ा ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

कवि का कहना है कि निम्मो तीस वर्षों तक अनेक प्रकार की यातनाओं को सहन करती हुई जीवित रही, क्योंकि उसे इतने वर्षों तक सारी दिक्कतों के बावजूद जीवित रहना था। तात्पर्य कि जितने वर्षों तक जीवित रहना निश्चित रहता है, व्यक्ति की मृत्यु उससे पहले नहीं हो सकती, लोगों की ऐसी मान्यता है। निम्मो भी तीस वर्ष पूरे करने के बाद बालू की भीत के समान अचानक ढह गई अर्थात् उसकी मृत्यु हो गई। कवि सामाजिक विषमता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहता है कि यह कितनी बड़ी विडंबना है कि गरीबों की अचानक मृत्यु पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं किया जाता, जबकि अमीरों की अचानक मृत्यु पर अनेक प्रकार के प्रश्न खड़े होते हैं। उसकी जाँच-पड़ताल की जाती है। निम्मो जीवनपर्यन्त दुःख एवं त्रासदी की चक्की में पीसती रही, लेकिन उसकी ओर लोगों का ध्यान नहीं गया। अतः यह दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था तथा अमानवीय व्यवहार की निशानी है।

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रूको बच्‍चों कवि राजेश जोशी | Ruko baccho class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ नौ ‘रूको बच्‍चों (Ruko baccho class 9th Hindi)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में राजेश जोशी ने देश के बच्चों को भ्रष्ट शासन-व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

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9. रूको बच्‍चों
कवि- राजेश जोशी

रुको बच्चो रुको
सड़क पार करने से पहले रुको
तेज रफ्तार से जाती इन गाड़ियों को गुजर जाने दो
वो जो सर्रसे जाती सफेद कार में गया
उस अफसर को कहीं पहुँचने की कोई जल्दी नहीं है
वो बारह या कभी कभी तो इसके भी बाद पहुंचता है अपने विभाग में
दिन महीने और कभी कभी तो बरसों लग जाते हैं
उसकी टेबिल पर रखी जरूरी फाइल को खिसकने में

अर्थकवि बच्चों को चेतावनी भरे शब्दों में कहता है कि सड़क पार करने से पहले रुक जाएँ । तेज गति से जा रही गाड़ियों को गुजर जाने दें। कवि अफसर की कार्यप्रणालीपर चोट करते हुए बच्चों से कहता है कि अभी जो सफेद रंग की कार गुजरी है, वह किसी अफसर की गाड़ी थी। वह गैर जवाबदेह अधिकारी है। वह न तो समय पर कार्यालय जाता है और न ही अपने दायित्व का निर्वाह निष्ठापूर्वक करता है। ऐसे अफसर के विभाग में महत्त्वपूर्ण फाइलें वर्षों धूल चाटती रहती हैं।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी द्वारा रचित कविता ‘रुको बच्चो’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवि ने देश के बच्चों को भ्रष्ट शासन-व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

कवि का कहना है कि हमारी शासन-व्यवस्था दूषित हो गई है। इसके अधिकारी गैरजिम्मेदार, भ्रष्ट तथा हृदयहीन हैं। वे सारे नियम-कानूनों को रौंदकर आगे निकलने की जल्दी में रहते हैं, इसलिए उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता।, कवि बच्चों को सलाह देता है कि उन्हें हमेशा इनसे बचकर रहना चाहिए, अन्यथा उनका भविष्य बिगड़ जाएगा, क्योंकि ये अफसर इतने भ्रष्ट हैं कि ये न तो समय का पालन करते हैं और न ही अपने विभागीय दायित्व का निर्वाह करते हैं। फलतः लोग इनसे तबाह रहते हैं।

रुको बच्चो !
उस न्यायाधीश की कार को निकल जाने दो
कौन पूछ सकता है उससे कि तुम जो चलते हो इतनी तेज कार में
कितने मुकदमे लंबित हैं तुम्हारी अदालत में कितने साल से
कहने को कहा जाता है कि न्याय में देरी न्याय की अवहेलना है।
लेकिन नारा लगाने या सेमीनारों में
बोलने के लिए होते हैं ऐसे वाक्य
कई बार तो पेशी दर पेशी चक्कर पर चक्कर काटते
ऊपर की अदालत तक पहुँच जाता है आदमी
और नहीं हो पाता है इनकी अदालत का फैसला

अर्थकवि बच्चों को न्यायाधीश के कार्य-कलाप पर प्रश्न-चिह्न लगाते हुए कहता है कि ये न्यायकर्ता हैं। ये इतने जिम्मेदार हैं कि इनकी अदालत में मुकदमा फैसला की प्रतीक्षा में वर्षों स्थगित रहते हैं तथा जनता की हाजिरी चलती रहती है। इसलिए गैर जवाबदेह कर्मनिष्ठा के कारण इनकी गाड़ी निकल जाने दो, ताकि किसी संगोष्ठी में अपने विचारों का नारा लगा सकें। अतः कवि इनकी कड़ी आलोचना करते हुए बच्चों को सावधान करता है कि ये न्यायाधीश इतने कर्मठ, जवाबदेह तथा ईमानदार हैं कि मुकदमा दायर करने वाले गुजर जाते हैं लेकिन उनके मुकदमा का फैसला नहीं हो पाता।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी द्वारा लिखित कविता ‘रुको बच्चो’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि ने देश की न्यायपालिका की अव्यवस्था और खामियों पर प्रकाश डाला है।

कवि बच्चों को न्यायाधीश की कार्य-प्रणाली पर प्रश्न-चिह्न लगाते हुए कहते हैं कि ये न्यायमूर्ति हैं। इनकी गाड़ी गुजरे तो रुक जाओ, क्योंकि इनके अन्याय केविरुद्ध कोई आवाज नहीं उठा सकता। वे तो स्वयं न्याय के रक्षक हैं। इनकी अदालत में मुकदमा का फैसला दायरकर्ता के मरणोपरान्त भी नहीं हो पाता। तात्पर्य कि त्रुटिपूर्ण न्याय-व्यवस्था के कारण अदालत में मुकदमे लंबित रहते हैं। मुकदमा के फैसले में विलंब के कारण न्यायपालिका पर विश्वास नहीं रह गया है। न्याय में देरी न्याय की अवहेलना है, यह भाषण के लिए है। सच्चाई तो यह है कि भ्रष्टाचार के कारण न्यायपालिका इसलिए बच्चों को इनकी गतिविधियों पर पैनी दृष्टि रखनी चाहिए।

रुको बच्चो, सड़क पार करने से पहले रुको
उस पुलिस अफसर की बात तो बिलकुल मत करो
वो पैदल चले या कार में
तेज चाल से चलना उसके प्रशिक्षण का हिस्सा है
यह और बात है कि जहाँ घटना घटती है
वहाँ पहुँचता है वो सबसे बाद में

अर्थकवि बच्चों को पुलिस विभाग की खामियों की ओर ध्यान आकृष्ट करता हुआ कहता है कि पुलिस इतनी भ्रष्ट है कि वह किसी घटना के बाद ही घटनास्थल परपहुँचती है चाहे वह पैदल चले अथवा कार से। असामाजिक तत्वों को पुलिस के साथ : सांठ-गांठ रहती हैं । इसलिए इनके संबंध में कुछ भी सोचना व्यर्थ है। तात्पर्य यह है कि पुलिस-विभाग के भ्रष्टाचार के कारण ही चोरी-डकैती आदि होती है।

आशय या भाव प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी द्वारा विरचित कविता “रुको बच्चो’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवि ने पुलिस-विभाग में फैले भ्रष्टाचारसे बच्चों को अवगत कराया है। कवि का कहना है कि भ्रष्ट पुलिस तंत्र के कारण ही देश में असामाजिक तत्वों का वर्चस्व है। पुलिस की कर्तव्यहीनता, स्वार्थ तथा चरित्रहीनता के कारण जनता असुरक्षा महसूस करती है। यह पैसे के हाथों बिकी होती है, इसीलिए किसी घटना के घटित होने के बाद ही घटनास्थल पर पहुँचती है। तात्पर्य कि पुलिस इनअसामाजिक तत्वों को सुरक्षा प्रदान कर अपनी जेब भरती है। अतएव बच्चों को ऐसे भ्रष्टतंत्र से बचकर रहना चाहिए । भाषा खड़ी बोली तथा प्रतीकार्थक है।

रुको बच्चो रुको
साइरन बजाती इस गाड़ी के पीछे पीछे
बहुत तेज गति से आ रही होगी किसी मंत्री की कार
नहीं नहीं उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी नहीं
उसे तो अपनी तोंद के साथ कुर्सी से उठने में लग जाते हैं कई मिनिट
उसकी गाड़ी तो एक भय में भागी जाती है इतनी तेज
सुरक्षा को एक अंधी रफ्तार की दरकार है
रुको बच्चो
इन्हें गुजर जाने दो |
इन्हें जल्दी जाना है
क्योंकि इन्हें कहीं नहीं पहुँचना है ।

अर्थकवि बच्चों को राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहता है कि जब ये कहीं चलते हैं तो इनके आगे पुलिस की गाड़ी होती है जो साइरन बजाती हुई तेज गति से गुजरती है। इन्हें कहीं पहुँचने की कोई जल्दी नहीं होती, बल्कि जनता का हक डकारने के कारण सदा भयभीत रहते हैं। इसीलिए पुलिस-गाड़ी के पीछे तेज गति से भागती इनकी गाड़ी नजर आती है। इसी कारण कवि बच्चों को रूक जाने को कहता है, ताकि देश के भविष्य ये बच्चे अंधी रफ्तार से दब-कुचल न जाएँ अर्थात् ये बच्चे भी दूषित आचरण के न हो जाएँ, इसलिए कवि इन्हें अंधी-दौड़ का हिस्सा न बनने की सलाह देता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी द्वारा लिखितं कविता ‘रुको बच्चो’ शीर्षक पाठ से ली गई है। इनमें कवि ने राजेनताओं अर्थात् मंत्रियों के भ्रष्ट आचरण पर कड़ी चोट की है।

कवि का कहना है कि देश के भाग्यविधाता कहलाने वाले नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। इन्हें जनता की नहीं बल्कि अपनी कुर्सी की चिंता रहती है। इन्हें जनता की दीन-दशा पर तरस नहीं आती। ये स्वार्थी, भ्रष्ट तथा सत्ता-लोभी हैं। ये जनता को धर्म, जाति तथा वर्ग के नाम पर बाँटकर सत्ता पर काबिज रहते हैं तथा निरीह जनता का हक डकारकर स्वर्गिक आनंद प्राप्त करते हैं। इनका शासन बंदूक की नोंक पर चलता है। इसलिए कवि ऐसे स्वच्छ समाज का निर्माण करना चाहता है, जहाँ न्याय, करूणा तथा ईमानदारी की गंगा प्रवाहित हो । सभी स्वच्छ वातावरण में साँस लें। भय तथा आतंक का नामोनिशान नहीं रहे । इसीलिए कवि देश के बच्चों को आगे आने के लिए प्रेरित करता है तथा शासन-व्यवस्था की अंधी-दौड़ का हिस्सा न बनने की सलाह देता है।

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मेरा ईश्‍वर कवि लीलाधर जगूड़ी | Mera ishwar class 9th Hindi

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ आठ ‘मेरा ईश्‍वर ( Mera ishwar)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में लीलाधर जगूड़ी ने प्रभु वर्ग अर्थात् सत्ताधारी वर्ग के प्रति आक्रोश प्रकट किया है।

Mera ishwar class 9th Hindi

मेरा ईश्‍वर कवि लीलाधर जगूड़ी
मेरा ईश्वर मुझसे नाराज़ है
क्योंकि मैंने दुखी न रहने की ठान ली
मेरे देवता नाराज हैं
क्योंकि जो जरूरी नहीं है
मैंने त्यागने की कसम खा ली है

अर्थकवि प्रभु वर्ग अर्थात् शासक-वर्ग पर व्यंग्य करता हुआ कहता है कि वे कवि से अप्रसन्न हैं, क्योंकि उन्होंने इनके अनुकूल न चलने का निश्चय कर लिया है।

कवि ने उस प्रभु वर्ग की खोट नीयत देखकर उसे त्यागने की कसम खा ली है। तात्पर्य कि शासक-वर्ग स्वार्थ की पूर्ति के लिए निरीह लोगों को अपने शिकंजे में फँसाकर उनसे नाजायज लाभं उठाता है।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ कवि लीलाधर जगूड़ी द्वारा लिखित कविता ‘मेरा ईश्वर’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इनमें कवि ने वैसे लोगों पर गहरी चोट की है जोयेन-केन-प्रकारेण निरीह लोगों को अपने शिकंजे में ले लेते हैं तथा उन्हें अपने हाथ की कठपुतली बनाए रखते हैं।

कवि उस प्रभु वर्ग अर्थात् सत्ताधारी वर्ग के प्रति आक्रोश प्रकट करते हुए कहता है कि ये सत्ता सुखभोगी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग को अपना हथकंडा बना उनसे नाजायज लाभ उठाता है। कवि ऐसा करके दुखी रहना नहीं चाहता है, इसलिए वह उस प्रभु वर्ग से अलग रहने में ही अपना शुभ मानता है। अतः कवि के कहने का भाव यह है कि सत्ताधारी वर्ग की गलत नीति के कारण सामाजिक परिवेश दूषित हो रहा है। अतएव ऐसे भ्रष्ट वर्ग का त्याग करने में ही जनता का कल्याण है।

न दुखी रहने का कारोबार करना है
न सुखी रहने का व्यसन
मेरी परेशानियाँ और मेरे दुख ही
ईश्वर का आधार क्यों हों ?
पर सुख भी तो कोई नहीं है मेरे पास
सिवा इसके कि दुखी न रहने की ठान ली है |

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अर्थकवि अपना विचार प्रकट करता है कि उसे न तो ऐसा काम करना है, जोदुख का कारण बने और न ही उसे सुख से रहने की आदत डालनी है। कवि यह नहीं चाहता है कि उसकी परेशानी अथवा दुःख ईश्वर का आधार बने। तात्पर्य है कि कविसहज रूप में रहना चाहता है। सुख एवं दुःख जीवन में आते-जाते ही रहते हैं। अतएव कवि सहज मानवीय-जीवन जीने का निश्चय करता है।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि लीलाधर जगूड़ी द्वारा रचित कविता ‘मेरा ईश्वर’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इनमें कवि ने सहज मानवीय-जीवन की विशेषताओं पर प्रकाश डाला है।

कवि का कहना है कि वह न तो कोई ऐसा व्यापार (कार्य) करना चाहता है जिसमें किसी प्रकार की भूल होने पर दुःख का अनुभव हो और न ही सुख से रहने की आदत डालना चाहता है। दोनों में किसी विपरीत परिस्थिति में दुःखी होना पड़ता है। कवि तो सहज जीवन जीना चाहता है। वह यह भी नहीं चाहता कि उसकी कठिनाई तथा दुःख किसी की आलोचना का विषय बने। जिसने प्रसन्नतापूर्वक रहना सीख लिया है, उसके लिए सुख तथा दुख दोनों एक जैसा प्रतीत होते हैं। कवि के कहने का भाव है कि आलोचना का पात्र वह होता है जो अपनी सुख-सुविधा के लिए दूसरों को दुख देता है, जबकि कवि सहजता में ही जीवन का असली रस पाता है।

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पाठ 7 पुरा हिन्‍दुस्‍तान मिलेगा | Pura Hindustan milega

इस पोस्‍ट में हमलोग कक्षा 9 हिंदी पद्य भाग का पाठ सात ‘पुरा हिन्‍दुस्‍तान मिलेगा (Pura Hindustan milega)’ को पढृेंंगें, इस पाठ में केदारनाथ अग्रवाल ने जनता में आशा का संचार करता है।

Pura Hindustan milega

पुरा हिन्‍दुस्‍तान मिलेगा कवि केदारनाथ अग्रवाल
इसी जन्म में,
इस जीवन में
हमको तुमको मान मिलेगा।
गीतों की खेती करने को,
पूरा हिंदुस्तान मिलेगा ।

अर्थ कवि आम जनता में आशा की स्फूर्ति जगाते हुए कहता है कि वह दिन दूर नहीं है जब जनता मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करेगी। पूँजीपतियों का शोषण बंद होगा तथा लोग खुशी के गीत गाएँगे।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल द्वारा रचित कविता ‘पूरा हिंदुस्तान मिलेगा’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें कवि जनता में आशा का संचार करता है।

कवि कहता है कि पूँजीपतियों के शोषण से मुक्ति पाते ही आम जनता की दशा सुधर जाएगी। सभी स्वतंत्र वातावरण में साँस लेने लगेंगे। खुशियों के फूल खिलजाएँगे। लोग मान-सम्मान के साथ जीवन बिताएँगे। कवि इस कविता के माध्यम से जनता में विश्वास जगाना चाहता है कि इन शोषक वर्गों का अंत होते ही जनता को सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करने का अवसर मिलेगा और लोग खुशी के गीत गाने लगेंगे। यह कविता संबोधन शैली में है। भाषा खड़ीबोली है । मुक्त छंद है।

Pura Hindustan milega

क्लेश जहाँ है,
फूल खिलेगा,
हमको तुमको त्रान मिलेगा।
फूलों की खेती करने को,
पूरा हिंदुस्तान मिलेगा ॥

अर्थकवि अग्रवाल जी कहते हैं कि दुःख के बाद ही सुख के दिन आते हैं।तात्पर्य कि दुःखपूर्ण जीवन बिताने वाले अपने परिश्रम के सहारे सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे। उनमें जब चेतना आएगी तो उन्हें शोषक वर्गों के शोषण से मुक्ति मिल जाएगी। सर्वत्र खुशी के फूल खिल जाएँगे । अतः कवि के कहने का भाव यह है कि जैसे ही देश में एकता का भाव विकसित होगा, पूँजपतियों, शोषकों, सूदखोरों का वर्चस्व खत्म होगा, जनता आजाद भारत में खुली साँस लेगी। सर्वत्र खुशियाली छा जाएगी।

व्याख्या–  प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल द्वारा लिखित कविता ‘पूरा हिंदुस्तान मिलेगा’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इनमें कवि नेपूँजीपतियों, सूदखोरों, नेताओं आदि की निंदा करते हुए जनता में आशा की स्फूर्ति जगाने का प्रयास किया है।

कवि का कहना है कि आजाद हिंदुस्तान में जनता सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करेगी। जनता में जागृति आएगी। शोषक वर्गों का अंत होगा । अर्थात् पूँजीवादी व्यवस्था नष्ट होते ही लोगों को उचित हक मिलेगा। फतलः जनता का सुखमय जीवन होगा। समाजवादी व्यवस्था में जनता का सर्वांगीण विकास होगा। सारे भेदभाव, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर की भावना नष्ट हो जाएगी। इस प्रकार, सारा हिंदुस्तान सबका अपना होगा। कविता संबोधन शैली में रचित है। देश के निर्धन, असहाय, किसान तथा बेरोजगारों की दयनीय दशा का चित्रण है।

दीप बुझे हैं,
जिन आँखों के ;
इन आँखों को ज्ञान मिलेगा |
विद्या की खेती करने को,
पूरा हिंदुस्तान मिलेगा ॥

अर्थ-कवि का कहना है कि जिन लोगों की आँखों के दीपक बुझे हुए हैं अर्थात् जिनमें चेतना का अभाव है, उनमें चेतना का संचार किया जाएगा, ताकि वे अपने अधिकार के प्रति जागरुक हो सकेंगे। सबके लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था होगी। सभी पढ़ने-लिखने में रुचि लेंगे। इस प्रकार जनता शिक्षा प्राप्त कर सुखमय जीवन बिताने लगेंगी।

व्याख्याप्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी तथा शोषकों के कटु आलोचक कवि केदारनाथ अग्रवाल द्वारा विरचित कविता ‘पूरा हिंदुस्तान मिलेगा’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इनमें कवि ने आजाद हिंदुस्तान का चित्र निरूपित करते हुए अपना विश्वास प्रकट किया है।

कवि कहता है कि आजादी के बाद देश का परिदृश्य बदल जाएगा। जिन आँखों के दीपक बुझे हुए हैं, अर्थात् जिन्हें अपने दायित्व का समुचित ज्ञान नहीं है, उन्हेंदायित्व के प्रति जागरुक किया जाएगा। वे शिक्षा प्राप्त कर अनुचित कार्यों का विरोध करेंगे। इसके लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा। कवि के कहने का भाव यह है कि सारे देश में ज्ञान-विज्ञान का ऐसा विकास होगा कि जनता की दशा स्‍वत: सुखमय हो जाएगी।

मैं कहता हूँ,
फिर कहता हूँ
हमको तुमको प्रान मिलेगा।
मोरोंसा नर्तन करने को,
पूरा हिंदुस्तान मिलेगा ।

अर्थकवि आशा भरे शब्दों में कहता है कि आजाद हिंदुस्तान में सारी जनता को । नया जीवन मिलेगा, क्योंकि समाजवादी व्यवस्था के कारण शोषक वर्गों का अंत हो जाएगा। लोग अपनी खुशहाली देखकर मोर जैसे नाच उठेगे। अर्थात् पूँजीवादी व्यवस्था तथा शोषण की प्रवृत्ति नष्ट होने के कारण जनता खुशी से झूम उठेगी।

आशय प्रस्तुत पंक्तियाँ समाजवादी विचारधारा के समर्थक कवि केदारनाथ अग्रवाल द्वारा लिखित कविता ‘पूरा हिंदुस्तान मिलेगा’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसमें । कवि देश की निरीह एवं शोषित जनता में आशा का संचार करते हुए कहता है कि समाजवादी व्यवस्था कायम होते ही शोषित, पीड़ित, भूखे तथा नंगे लोगों के जीवन में खुशहाली आ जाएगी। उन्हें शोषकों के शोषण से मुक्ति मिल जाएगी। अपना सुखमय जीवन देख सभी मयूर की भाँति प्रसन्नता से झूम उठेगे । कवि के मानस में आजाद हिंदुस्तान का ऐसा चित्र है जिसकी उर्वरभूमि में मान-सम्मान, स्वतंत्रता और खुशियों के फूल खिलेंगे।

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